अदालत की संगमरमरी फर्श पर उसके भारी कदम डगमगाए और वह वहीं एक कोने में खंभे का सहारा लेकर बैठ गया। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला, जिसे रोकने की शक्ति अब उसके भीतर नहीं बची थी। कुछ ही कदम की दूरी पर उसकी नजरें उस दृश्य पर टिक गईं, जिसने उसके सीने को छलनी कर दिया था।
उसकी पत्नी राधिका अपनी सात साल की मासूम बेटी अनन्या की नन्हीं उंगलियों को थामे आगे बढ़ रही थी। राधिका के चेहरे पर महीनों की प्रताड़ना, अपमान और संघर्ष से मुक्ति का सुकून था, तो वहीं नन्हीं अनन्या कभी पीछे मुड़कर अपने पिता को देखती और फिर मां के आंचल में अपना चेहरा छुपा लेती। अदालत ने तलाक की अंतिम डिक्री के साथ-साथ बच्ची की पूर्ण कस्टडी राधिका को सौंप दी थी। समरजीत, जो कभी खुद को अपने घर का एकछत्र स्वामी समझता था, आज कानून और कुदरत दोनों के सामने खाली हाथ और बेसहारा खड़ा था।
अदालत परिसर के बाहर निकलती राधिका की गाड़ी जब आंखों से ओझल हो गई, तो समरजीत की बंद आंखों के सामने अपनी बीती जिंदगी का एक-एक पन्ना किसी पुरानी रील की तरह घूमने लगा।
समरजीत एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता था। उसके पिता अपने जमाने के एक बेहद दबंग और सख्त मिजाज इंसान थे। बचपन से ही समरजीत ने अपने घर में यही देखा था कि औरतों की आवाज या तो रसोई तक सीमित रहती है या फिर पुरुषों के गुस्से के आगे खामोश हो जाती है। उसके पिता हमेशा अपनी पत्नी पर हुक्म चलाते, हर छोटी बात पर उन्हें जलील करते और यह जताते कि औरत केवल मर्द की छत्रछाया में जीने के लिए ही बनी है। समरजीत की मां, कौशल्या जी, ने जिंदगी भर इस दमन को सहा था, लेकिन उनके भीतर एक ही दर्द था कि उनका बेटा कभी अपने पिता जैसा न बने।
जब समरजीत की शादी राधिका से हुई, तो राधिका ने इस नए संसार को प्यार, समर्पण और अपनेपन से सींचने की पूरी कोशिश की। राधिका पढ़ी-लिखी, संस्कारी और आत्मसम्मान से भरी लड़की थी। वह शादी के बाद भी एक छोटे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी और घर आकर पूरे परिवार की सेवा में जुट जाती थी। लेकिन समरजीत के भीतर उसके पिता का वह पुराना अहंकार धीरे-धीरे सिर उठाने लगा था।
शादी के कुछ महीनों बाद ही समरजीत ने राधिका के आत्मसम्मान को कुचलना शुरू कर दिया। कभी खाने में नमक कम होने पर पूरी थाली फेंक देना, तो कभी सबके सामने उसके मायके की हैसियत पर ताने कसना उसकी रोज की आदत बन गई थी। जब भी राधिका किसी बात पर अपनी राय रखने की कोशिश करती, समरजीत जोर से चिल्ला उठता, “तुम इस घर की बहू हो, मुझे सिखाने की कोशिश मत करो! इस घर में वही होगा जो मैं तय करूंगा। अपने उस मामूली शिक्षक के दिमाग को स्कूल में ही छोड़ आया करो।”
राधिका कई बार अकेले में रोती, लेकिन घर की शांति बनाए रखने के लिए हर बात को पी जाती। जब नन्हीं अनन्या ने उनके जीवन में कदम रखा, तो राधिका को लगा कि शायद अब समरजीत का दिल पिघलेगा और वह एक जिम्मेदार पति और पिता बनेंगे। लेकिन समरजीत का अहंकार और भी भयानक रूप ले चुका था। वह बच्ची के सामने भी राधिका को अपमानित करने से बाज नहीं आता था।
उस दौर में समरजीत की मां, कौशल्या जी, ने उसे कई बार अकेले में समझाते हुए हाथ जोड़कर कहा था, “समर, बेटा! अपनी पत्नी का सम्मान करना सीख। जो मर्द अपनी औरत की इज्जत नहीं कर सकता, वह कभी सुखी नहीं रह सकता। अपने पिता के उन गलत पदचिन्हों पर मत चल जिन्होंने मुझे जिंदगी भर तिल-तिल कर मारा। राधिका बहुत नेक और धैर्यवान लड़की है, अगर उसका सब्र टूट गया तो यह आशियाना बिखर जाएगा।”
लेकिन उस वक्त समरजीत के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी थी। वह अपनी मां की बात को यह कहकर टाल देता था कि “मां, तुम औरतों का स्वभाव ही ऐसा होता है, तुम्हें बस पुरुषों पर हुक्म चलाना अच्छा लगता है।”
धीरे-धीरे बात हाथ से निकल गई। एक दिन समरजीत ने एक पारिवारिक दावत में सबके सामने राधिका पर हाथ उठा दिया, केवल इसलिए क्योंकि उसने समरजीत को ज्यादा शराब पीने से रोक दिया था। वह थप्पड़ सिर्फ राधिका के गाल पर नहीं, बल्कि उस रिश्ते की अंतिम सांस पर पड़ा था। उसी रात राधिका ने अपनी बेटी को उठाया और हमेशा के लिए उस घर की चौखट लांघ गई। उसने साफ कह दिया था कि वह अपने आत्मसम्मान और अपनी बेटी के भविष्य का सौदा कभी नहीं करेगी।
और आज… छह महीने की अदालती लड़ाई के बाद, सब कुछ हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।
समरजीत अपने वीरान घर लौटा। घर का हर कोना जैसे उस पर हंस रहा था। सोफे पर बिखरे अनन्या के खिलौने, दीवार पर टंगी शादी की तस्वीर और रसोई में पसरा सन्नाटा उसकी छाती पर भारी पत्थर की तरह दब रहा था। मां कौशल्या जी पूजा के कमरे में बैठी केवल माला फेर रही थीं, उनकी आंखों में भी आंसुओं के सिवा कुछ न था।
समरजीत मां के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा, “मां! मैं बर्बाद हो गया। सब कुछ खत्म हो गया। मेरी बच्ची, मेरी पत्नी मुझसे दूर हो गईं। काश मैंने उस दिन तुम्हारी बात सुनी होती… काश मैंने अपने उस झूठे अहंकार को त्याग दिया होता!”
कौशल्या जी ने भारी मन से बेटे के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “पछतावा जब देर से आता है बेटा, तो वह केवल आग बन जाता है। लेकिन अगर तुम्हारे भीतर सचमुच अपनी भूल का अहसास जागा है, तो रोने से कुछ नहीं होगा। जो पाप तुमने राधिका की आत्मा को चोट पहुंचाकर किया है, उसका प्रायश्चित करना होगा। अब वह तुम्हारी पत्नी नहीं है, लेकिन अनन्या की मां तो हमेशा रहेगी। अपने अहंकार को पूरी तरह मारकर अब एक सच्चा इंसान बनकर दिखाओ।”
मां की इन बातों ने समरजीत की चेतना को पूरी तरह झकझोर दिया। उसने तय किया कि वह अब अपनी गलतियों का रोना नहीं रोएगा, बल्कि खुद को उस इंसान में बदलेगा जो सच्चा सम्मान और स्नेह देना जानता हो। उसने शराब को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। अपने गुस्से और अहंकार पर काबू पाने के लिए उसने आत्म-मंथन शुरू किया।
शुरुआती महीनों में राधिका ने समरजीत से किसी भी तरह का संपर्क रखने से साफ इनकार कर दिया था। जब भी समरजीत अनन्या से मिलने के लिए कोर्ट के आदेश के तहत जाता, राधिका उसे केवल गेट से ही बच्ची को सौंप देती और एक शब्द भी बात नहीं करती। समरजीत ने कभी इस पर नाराजगी नहीं जताई। उसने हर अपमान को अपनी सजा मानकर स्वीकार किया। वह अनन्या के साथ घंटों पार्क में खेलता, उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखता, लेकिन उसने कभी राधिका के फैसलों में दखल नहीं दिया।
समय बीतता गया। करीब डेढ़ साल गुजर चुका था। एक दिन अचानक मौसम ने करवट ली और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। उसी शाम राधिका की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उसे तेज निमोनिया और सांस लेने में गंभीर तकलीफ होने लगी। घर में केवल बुजुर्ग मां-बाप और नन्हीं अनन्या थी। उस तूफानी रात में कोई भी टैक्सी या एम्बुलेंस मिलने को तैयार नहीं थी। राधिका के पिता ने घबराकर समरजीत को फोन मिला दिया।
समरजीत ने बिना एक पल गंवाए अपनी गाड़ी निकाली और पानी से लबालब भरी सड़कों को पार करते हुए सीधे राधिका के घर पहुंचा। उसने बिना किसी झिझक के राधिका को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी में लिटाकर शहर के सबसे बड़े अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया। पूरी रात वह अस्पताल के गलियारे में नंगे पैर टहलता रहा। उसने खुद दवाइयों की व्यवस्था की, डॉक्टरों से मिन्नतें कीं और ईश्वर से केवल राधिका के जीवन की भीख मांगी।
अगली सुबह जब राधिका को होश आया, तो उसने देखा कि समरजीत आईसीयू के बाहर फर्श पर बैठकर दोनों हाथ जोड़े भगवान से प्रार्थना कर रहा था। उसके चेहरे पर न कोई अहंकार था, न कोई गुरूर; केवल एक गहरी तड़प और समर्पण था।
अगले तीन दिनों तक समरजीत ने अस्पताल में एक सेवक की तरह दिन-रात सेवा की। उसने नन्हीं अनन्या की देखभाल की, उसे स्कूल पहुंचाया और राधिका के माता-पिता को सांत्वना दी। उसने राधिका से एक बार भी पुरानी बातें नहीं छेड़ीं, न ही किसी अहसान का जिक्र किया। जब राधिका पूरी तरह ठीक होकर डिस्चार्ज होने लगी, तो समरजीत ने हाथ जोड़कर कहा, “राधिका, तुम पूरी तरह स्वस्थ हो, यह देखकर मेरे दिल को शांति मिली। मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिए हैं, मैं जानता हूं कि उन घावों को कभी भरा नहीं जा सकता। मैं सिर्फ यह कहना चाहता था कि अगर भविष्य में तुम्हें या अनन्या को कभी भी किसी सहारे की जरूरत हो, तो तुम मुझे एक पिता और एक मददगार के रूप में हमेशा तैयार पाओगी। मुझे माफ कर देना।”
इतना कहकर समरजीत चुपचाप अपने कदम बाहर की ओर बढ़ाने लगा। लेकिन इस बार, कुछ अलग हुआ।
राधिका ने देखा कि यह वह समरजीत नहीं था जो कभी अपनी आवाज से घर की दीवारें हिला देता था। यह वह इंसान था जिसका अहंकार पूरी तरह भस्म हो चुका था और जिसकी जगह सच्चा पश्चाताप और विनम्रता ले चुकी थी। राधिका की आंखों से आंसू बह निकले। उसने देखा कि अनन्या दौड़कर समरजीत के पैरों से लिपट गई थी और कह रही थी, “पापा, मत जाओ… आज हमारे साथ चलो।”
राधिका ने आगे बढ़कर समरजीत का हाथ थाम लिया। पहली बार उसकी आंखों में कड़वाहट की जगह एक नई शुरुआत की उम्मीद थी। उसने धीमी मगर दृढ़ आवाज में कहा, “समरजीत… इंसान गलतियों का पुतला होता है, लेकिन जो इंसान अपनी गलतियों को पहचानकर खुद को पूरी तरह बदल ले, वह दोबारा भरोसा पाने का हकदार बन जाता है। इस बार हम किसी पुराने ढर्रे पर नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान की नींव पर एक नया घर बनाएंगे।”
समरजीत की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बह निकले। उसने अपनी पत्नी और बेटी को अपने आलिंगन में समेट लिया। जिस आशियाने को अहंकार की आंधी ने उजाड़ दिया था, उसे आज सच्चे प्रायश्चित और सम्मान की रोशनी ने दोबारा आबाद कर दिया था।
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि अहंकार और गलत परंपराओं की अंधी नकल किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। अक्सर पुरुष अपनी झूठी शान में अपनों का ही मान-सम्मान कुचल देते हैं, लेकिन जब आंखें खुलती हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। समय रहते अगर इंसान अपनी भूल सुधार ले और नारी के आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखे, तो उजड़े हुए परिवार भी दोबारा संवर सकते हैं।
क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में ‘अहंकार’ की जगह ‘सम्मान’ ही किसी परिवार की असली नींव होता है? अपने विचार और अनुभव हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : के कामेश्वरी