संस्कारों की नई भोर

 राजेश्वरी देवी ने आगे बढ़कर शारदा जी का दूसरा हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, “समधन जी, अपनी बहन को माफ कर दीजिए। आपकी बेटी सिर्फ आपकी नहीं, मेरे घर की लक्ष्मी है। आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपके बिना मेरे बेटे की बारात कैसे उठेगी? आपको ही तो आगे खड़े होकर अपने दामाद को आशीर्वाद देना है।”

शारदा जी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हुए राजेश्वरी देवी के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह स्पर्श दो परिवारों के बीच बरसों की कड़वाहट को एक पल में धो गया।

  घर में छोटे बेटे क्षितिज के विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं। शहनाई की धीमी धुन बैकग्राउंड में गूंज रही थी और रिश्तेदारों की चहल-पहल से पूरा दालान भरा हुआ था। लेकिन उसी घर के एक कोने में, सीढ़ियों के नीचे वाले छोटे से स्टोर रूम में खड़ी पल्लवी अपनी साड़ी के पल्लू से आंसुओं को पोंछते हुए अपने चचेरे भाई विवेक से फोन पर बात कर रही थी।

“भैया, डॉक्टर अंकल ने क्या कहा? मम्मी की रिपोर्ट कैसी आई है? वो ठीक तो हैं ना?” पल्लवी की आवाज रुंध गई थी।

“पल्लवी, तू हिम्मत मत हारना। डॉक्टर ने कहा है कि मां का ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ गया था और सीने में इन्फेक्शन के चलते उन्हें सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही है। अभी आईसीयू में भर्ती कराया है। होश में आते ही बस बार-बार तेरी और छोटी पिहू की ही रट लगाए जा रही हैं। अगर हो सके तो एक बार आकर मिल ले, मां को तसल्ली मिल जाएगी,” विवेक ने भारी मन से कहा।

“भैया, मैं हाथ जोड़ती हूं, मम्मी को बोलना कि उनकी पल्लवी बस पहुंच ही रही है,” पल्लवी ने सिसकते हुए फोन काटा। जैसे ही वह मुड़ी, उसके सामने उसकी सास राजेश्वरी देवी हाथ बांधे, तीखी नजरों से घूरती हुई खड़ी थीं। उनकी भृकुटि तनी हुई थी और चेहरे पर कठोरता साफ झलक रही थी।

“वाह महारानी! घर में मंगल गीत गाए जा रहे हैं, दो दिन बाद तेरे देवर की हल्दी की रस्म है, समधियाने से मेहमान आ रहे हैं और तू यहां कालिख पोतने के लिए रोना रो रही है? यह अपशगुन करने की हिम्मत कहां से आई तुझमें?” राजेश्वरी देवी की आवाज में जहर घुला हुआ था।

पल्लवी ने दोनों हाथ जोड़ लिए, उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे, “मां जी, मेरी मां अस्पताल में हैं… आईसीयू में भर्ती हैं। विवेक भैया का फोन था, मां मुझे और पिहू को एक बार देखना चाहती हैं। प्लीज मां जी, बस दो घंटे के लिए मुझे जाने दीजिए। मैं बस एक नजर अपनी मां को देखकर लौट आऊंगी। मुझे तसल्ली हो जाएगी मां जी।”

राजेश्वरी देवी ने होंठ भींचते हुए उसे डांटा, “खबरदार जो एक कदम भी उस चौखट के बाहर निकाला! काबू रख अपनी इस नौटंकी पर। घर में शादी का माहौल है। रिश्तेदार पूछेंगे कि घर की बड़ी बहू कहां गायब है, तो क्या मैं ढोल पीटकर कहूंगी कि उसकी मां बीमार है और वो वहां बैठी है? और अगर… भगवान न करे उस बुढ़िया को कुछ हो गया, तो मेरे बेटे की शादी का क्या होगा? सूतक लग जाएगा और बारात रुक जाएगी! चुपचाप जा, मुंह पर ठंडा पानी मार और सज-धज कर बाहर आ। और एक बात कान खोलकर सुन ले, अनुराग को इस बात की भनक भी नहीं लगनी चाहिए। अगर तूने उसके कान में यह बात डाली, तो इस घर में तेरी खैर नहीं।”

इतना कहकर राजेश्वरी देवी बुदबुदाते हुए वहां से निकल गईं, “यही होता है जब बिना बाप और भाई की लड़की को ब्याह कर लाओ। शुरू में ही मुझे यह मनहूसियत दिख रही थी, पर मेरे बेटे के सिर पर तो इश्क का भूत सवार था।”

पल्लवी का अतीत उसकी आंखों के सामने घूम गया। जब वह महज सात साल की थी, तब उसके पिता एक गंभीर बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गए थे। उसकी मां शारदा जी ने समाज के तानों और अकेलेपन को झेलते हुए पल्लवी को पाला था। पल्लवी के चाचा और चाची बहुत भले इंसान थे। उन्होंने कभी शारदा जी और पल्लवी को बेसहारा महसूस नहीं होने दिया। चाचा जी ने पल्लवी को अपनी सगी बेटी की तरह पढ़ाया-लिखाया, जिसके दम पर वह एक अच्छे कॉलेज में लेक्चरर बन गई थी।

जब अनुराग के लिए रिश्ता तलाशा जा रहा था, तब राजेश्वरी देवी केवल बड़े घरानों और भारी दहेज की ताक में थीं। लेकिन जब अनुराग ने पल्लवी को देखा, तो वह उसके सादगी, संस्कारों और स्वाभिमान का कायल हो गया। राजेश्वरी देवी को यह रिश्ता बिल्कुल नापसंद था क्योंकि पल्लवी के पिता नहीं थे और न ही कोई सगा भाई, जिससे मोटी रकम या भारी लेन-देन की उम्मीद की जा सके। लेकिन अनुराग और उसके पिता हरिशंकर जी की जिद के आगे राजेश्वरी देवी की एक न चली और पल्लवी ‘सद्भावना निवास’ की बड़ी बहू बनकर आ गई।

ससुराल आने के बाद से ही राजेश्वरी देवी ने पल्लवी को कभी दिल से नहीं अपनाया। उन्होंने घर की जिम्मेदारियों का ऐसा मकड़जाल बुना कि पल्लवी कभी मायके की तरफ मुंह भी न कर सके। अगर कभी वह अपनी मां से मिलने जाने की बात करती, तो तुरंत किसी न किसी रिश्तेदार के आने का बहाना बन जाता या फिर घर के काम का पहाड़ खड़ा कर दिया जाता। शारदा जी बहुत समझदार थीं। वे अपनी बेटी के वैवाहिक जीवन में कोई खटास नहीं चाहती थीं, इसलिए जब भी पल्लवी फोन पर दुखी होती, वे हमेशा यही समझातीं, “बिटिया, ससुराल ही अब तेरा असली घर है। वहां के लोगों को खुश रखना ही तेरा पहला धर्म है। मेरी चिंता मत कर, मेरे साथ तेरे चाचा-चाची और विवेक हैं ना।”

हद तो तब हो गई थी जब पल्लवी गर्भवती थी। राजेश्वरी देवी का मानना था कि उनके खानदान में कभी कोई बेटी पैदा नहीं हुई, इसलिए पल्लवी भी बेटे को ही जन्म देगी। लेकिन ईश्वर की मर्जी कुछ और थी। पल्लवी ने एक बेहद सुंदर, स्वस्थ और चंचल बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने पिहू रखा। बेटी के जन्म पर राजेश्वरी देवी का चेहरा ऐसा उतर गया था मानो उन पर कोई विपत्ति टूट पड़ी हो। उन्होंने न तो अस्पताल में बच्ची का मुंह देखा और न ही घर आने पर कोई खुशी जताई।

लेकिन अनुराग, ससुर हरिशंकर जी और देवर क्षितिज ने बेटी के आगमन पर पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटी थीं। बच्ची के नामकरण संस्कार में शारदा जी ने अपनी बची-खुची जमा पूंजी से अपनी नन्हीं नातिन के लिए सोने की एक सुंदर सी कंठी (चेन) बनवाई थी और बड़े चाव से उसे पहनाया था। उस दिन राजेश्वरी देवी की कुंठा चरम पर पहुंच गई थी। उन्होंने मौका पाकर बच्ची के गले से वह सोने की चेन निकाल ली और अपनी अलमारी में छुपा दी। बाद में जब सब मेहमानों के सामने बात उठी, तो राजेश्वरी देवी तंज कसते हुए बोलीं, “अरे छोड़ो भी, जिस घर में कोई कमाने वाला मर्द नहीं, उनकी इतनी हैसियत कहां कि नातिन को सोने का जेवर दे सकें! वो तो बस पीतल पर पानी चढ़ाकर ले आई होंगी, कहीं गिर-गिरा गई होगी।”

शारदा जी का सिर शर्म और अपमान से झुक गया था, उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे। लेकिन तभी अनुराग आगे आया था। अनुराग ने नामकरण के समय की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद की थीं, जिसमें साफ दिख रहा था कि शारदा जी ने जब बच्ची को गोद में लिया था, तब उन्होंने वह चेन पहनाई थी और बाद में जब राजेश्वरी देवी ने बच्ची को लिया, तब वह चेन उनके हाथ में फिसलती नजर आई थी। अनुराग ने एकांत में ले जाकर अपनी मां से सख्ती से कहा था, “मां, यह फोटो देख लीजिए। अगर आप चाहती हैं कि इस भरे समाज में आपकी इज्जत बची रहे, तो वह चेन चुपचाप नन्हीं के तकिए के नीचे रख दीजिए, वरना सच सामने आते देर नहीं लगेगी।”

राजेश्वरी देवी ने अपमान का घूंट पीकर वह चेन लौटा दी थी, लेकिन उस दिन के बाद से उनके दिल में शारदा जी के प्रति नफरत की दीवार और ऊंची हो गई थी। अब जब छोटे बेटे क्षितिज का विवाह उनके मायके की एक धनी रिश्तेदारी में तय हुआ था, तो राजेश्वरी देवी अपनी सारी अधूरी हसरतें पूरी करने में जुटी थीं। वे दिखाना चाहती थीं कि उनका असली रुतबा क्या है।

और आज, जब शारदा जी अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रही थीं, राजेश्वरी देवी के पत्थर दिल में जरा भी रहम नहीं आया। उन्हें सिर्फ अपनी शादी की शानो-शौकत और तथाकथित ‘अपशगुन’ की चिंता थी।

पल्लवी अपनी चार साल की बेटी पिहू को सीने से चिपकाए अपने कमरे में रो रही थी। रात के बारह बज चुके थे। पूरे घर में सन्नाटा था। पल्लवी का दिल डूब रहा था। बार-बार उसके कानों में भाई विवेक की आवाज गूंज रही थी कि ‘मां आईसीयू में है और सिर्फ तुझे पुकार रही है।’ पल्लवी ने ईश्वर के आगे हाथ जोड़े, “हे भगवान, मेरी मां को बचा लेना… मुझे कोई रास्ता दिखाओ।”

तभी कमरे का दरवाजा खुला और अनुराग अंदर आया। उसने देखा कि पल्लवी लाल सूजी हुई आंखों के साथ कांप रही है और तकिए में मुंह छुपाकर सिसक रही है। अनुराग उसके पास बैठ गया और उसका कंधा हिलाया, “पल्लवी… क्या बात है? तुम इतनी परेशान क्यों हो? पिछले दो दिनों से मैं देख रहा हूं कि तुम बहुत गुमसुम हो। क्या हुआ है, मुझे बताओगी नहीं?”

पल्लवी ने पहले तो सास के डर से टालने की कोशिश की, “कुछ नहीं… बस थकान है।”

अनुराग ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया, “पल्लवी, मैं तुम्हारा पति हूं। तुम्हारी हर सांस को पहचानता हूं। मुझसे सच छुपाने की कोशिश मत करो। क्या बात है?”

पल्लवी के सब्र का बांध टूट गया। वह अनुराग के सीने से लगकर बिलख पड़ी, “अनुराग… मेरी मां अस्पताल में हैं। आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। वो मुझे और पिहू को एक बार देखना चाहती हैं… लेकिन मां जी ने मुझे सख्त मना किया है। उन्होंने कहा है कि अगर मैं गई तो शादी में अपशगुन हो जाएगा, बारात रुक जाएगी… अनुराग, मैं अपनी मां की इकलौती बेटी हूं। अगर मेरी मां को कुछ हो गया तो मैं जीते जी मर जाऊंगी… प्लीज मुझे जाने दो अनुराग!”

अनुराग का चेहरा गुस्से और अविश्वास से सफेद पड़ गया। उसने अपनी मुट्ठियां भींच लीं। “मां ने तुमसे यह सब कहा? और तुमने मुझसे छुपाया? पल्लवी, जिस मां ने अपनी पूरी जिंदगी अकेले घुट-घुट कर तुम्हें इस काबिल बनाया, आज वो सांसों के लिए लड़ रही हैं और तुम यहां अपशगुन के डर से बैठी हो? रिश्ते इंसानों से बनते हैं पल्लवी, तमाशों से नहीं!”

अनुराग ने तुरंत पल्लवी का हाथ पकड़ा और पिहू को गोद में उठाकर कमरे से बाहर निकला। वह सीधे नीचे हॉल में गया जहां उसके पिता हरिशंकर जी और देवर क्षितिज शादी की खरीदारी की लिस्ट देख रहे थे। राजेश्वरी देवी भी पास में ही बैठी काजू-बादाम के डिब्बे पैक कर रही थीं।

अनुराग की गरजती आवाज से पूरा दालान दहल उठा, “मां!”

राजेश्वरी देवी ने चौंककर सिर उठाया। अनुराग के चेहरे पर ऐसा आक्रोश था जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।

“अनुराग… क्या हुआ बेटा? इतनी रात को क्यों चिल्ला रहे हो?” हरिशंकर जी ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।

अनुराग ने पल्लवी को आगे किया, “पिताजी, आज इस घर के संस्कारों की परीक्षा है। हमारी समधन जी, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपनी बेटी के सम्मान के लिए न्योछावर कर दी, वे इस वक्त अस्पताल में आईसीयू में हैं। और मेरी मां ने पल्लवी को वहां जाने से इसलिए रोक दिया क्योंकि हमारे घर में शादी का जश्न चल रहा है! इन्हें डर है कि कहीं कोई अपशगुन न हो जाए!”

क्षितिज झटके से खड़ा हो गया, “क्या? भाभी, मौसी जी अस्पताल में हैं और आपने हमें बताया तक नहीं?”

राजेश्वरी देवी ने बात संभालनी चाही, “अरे… तुम लोग समझ नहीं रहे हो। परसों क्षितिज की हल्दी है। अगर इस वक्त कोई अनहोनी हो गई, तो सब धरा का धरा रह जाएगा। समाज क्या कहेगा?”

हरिशंकर जी अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। उनकी आवाज में ऐसा अधिकार और गुस्सा था कि राजेश्वरी देवी सहम गईं। “चुप रहो राजेश्वरी! समाज क्या कहेगा? समाज यह कहेगा कि सद्भावना निवास के लोग इतने खुदगर्ज और निर्दयी हैं कि अपनी बहू की बीमार मां को देखने की इजाजत तक नहीं दी? यह शादी, यह जश्न, यह दिखावा किस काम का अगर हमारे सीने में दिल ही न हो? जिस मां ने अपनी बेटी हमें सौंपी, आज वो बीमार है और हम यहां ढोल बजाएंगे?”

क्षितिज ने आगे बढ़कर पल्लवी के हाथ थाम लिए, “भाभी, मेरी शादी और मेरी खुशियां आपकी मुस्कान से बड़ी नहीं हैं। अगर मौसी जी को देखने के लिए मुझे अपनी शादी टालनी भी पड़े, तो मैं खुशी-खुशी टाल दूंगा। पहले वो हमारी मां हैं, शादी तो बाद में भी हो जाएगी।”

राजेश्वरी देवी ने जब अपने पति और दोनों बेटों की आंखों में तिरस्कार और पीड़ा देखी, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस समाज और मान-मर्यादा के नाम पर वे अपनी नफरत को छुपा रही थीं, आज उसी परिवार ने उनके खोखले अहंकार को चकनाचूर कर दिया था।

हरिशंकर जी ने कहा, “अनुराग, गाड़ी निकालो। हम सब अभी अस्पताल चलेंगे।”

राजेश्वरी देवी स्तब्ध खड़ी थीं। लेकिन तभी पल्लवी ने आगे बढ़कर अपनी सास के हाथ जोड़ लिए, “मां जी, मेरे मन में आपके प्रति कोई मैल नहीं है। मैं जानती हूं कि आप अपने बेटे की शादी को लेकर बहुत भावुक हैं। लेकिन एक बार सोचिए, अगर आज आपकी जगह मेरी मां होती और मैं आपकी बेटी होती, तो क्या आप मुझे रोकतीं? मां का दर्द तो हर जगह एक जैसा होता है ना मां जी?”

पल्लवी के इस निश्छल और मर्यादित सवाल ने राजेश्वरी देवी के भीतर बरसों से जमी पत्थर की परत को एक झटके में तोड़ दिया। उनके सामने अपनी ही बेटी की कल्पना कौंध गई। उन्होंने पल्लवी के आंसुओं को देखा, जिसमें न कोई विद्रोह था, न कोई नफरत, बस एक असहाय बेटी की तड़प थी। राजेश्वरी देवी की आंखें अचानक भर आईं। उनका अहंकार ममता और पश्चाताप के आगे नतमस्तक हो गया।

राजेश्वरी देवी ने कांपते हाथों से पल्लवी के आंसू पोंछे और रुंधे गले से बोलीं, “मुझे माफ कर दे बहू… मैं अंधी हो गई थी। अपने झूठे घमंड और दिखावे में मैंने यह भुला दिया कि किसी की मां का दर्द क्या होता है। चल, हम सब अभी चलेंगे। समधन जी को कुछ नहीं होगा, उन्हें कुछ हो ही नहीं सकता जब तक उनकी यह बेटी और हम सब उनके साथ हैं।”

पंद्रह मिनट के भीतर पूरा परिवार अस्पताल के आईसीयू के बाहर पहुंच गया। डॉक्टर ने जब देखा कि पूरा परिवार रात के दो बजे एक साथ खड़ा है, तो उन्होंने विशेष अनुमति देकर पल्लवी, अनुराग और राजेश्वरी देवी को अंदर जाने दिया।

शारदा जी ऑक्सीजन मास्क लगाए, अधखुली आंखों से दरवाजे की तरफ देख रही थीं। जैसे ही पल्लवी ने जाकर उनका हाथ पकड़ा और बोली, “मां… मैं आ गई मां, देखो तुम्हारी पल्लवी आ गई,” शारदा जी के चेहरे पर एक असीम शांति छा गई। उनकी मॉनिटर की धड़कनें जो पहले अनियमित थीं, धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।

राजेश्वरी देवी ने आगे बढ़कर शारदा जी का दूसरा हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, “समधन जी, अपनी बहन को माफ कर दीजिए। आपकी बेटी सिर्फ आपकी नहीं, मेरे घर की लक्ष्मी है। आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपके बिना मेरे बेटे की बारात कैसे उठेगी? आपको ही तो आगे खड़े होकर अपने दामाद को आशीर्वाद देना है।”

शारदा जी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हुए राजेश्वरी देवी के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह स्पर्श दो परिवारों के बीच बरसों की कड़वाहट को एक पल में धो गया।

अगले दो दिनों में डॉक्टरों की अथक मेहनत और परिवार के सच्चे प्यार व प्रार्थनाओं ने चमत्कार कर दिखाया। शादी वाले दिन सुबह शारदा जी को आईसीयू से प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया और वे पूरी तरह खतरे से बाहर थीं।

क्षितिज की बारात जब उठी, तो सबसे पहले वह अस्पताल के उस कमरे के सामने रुकी। क्षितिज, अनुराग, पल्लवी और खुद राजेश्वरी देवी ने जाकर शारदा जी के चरण स्पर्श किए और उनका आशीर्वाद लिया। शारदा जी ने अस्पताल के बिस्तर से ही अपने दामाद और देवर को फूलों का हार पहनाया। उस दिन सद्भावना निवास की शादी सिर्फ दो युवाओं का मिलन नहीं थी, बल्कि वह इंसानियत, ममता और सच्चे पारिवारिक संस्कारों की सबसे बड़ी जीत थी।

अक्सर झूठी शान, खोखले रीति-रिवाजों और तथाकथित अपशगुन के डर में हम अपनों की जीती-जागती सांसों की कीमत भूल जाते हैं। पर सच यही है कि जिस घर में बहू के मायके और उसकी ममता का सम्मान होता है, वहीं ईश्वर का वास होता है। क्या आपको भी लगता है कि किसी भी मांगलिक कार्य से बढ़कर परिवार और मानवीय संवेदनाएं होती हैं? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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