अवनि ने भरभराई आवाज में कहा, “मां, मैंने अभी-अभी दरवाजे पर खड़े होकर आपकी सारी बातें सुन लीं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किन शब्दों में आपका धन्यवाद करूं। आज के दौर में जहां सासें अक्सर अपनी बहुओं की गलतियां ढूंढती हैं, वहां आपने मुझे इतना ऊंचा स्थान दिया। आपने मुझे सिर्फ एक बहू का दर्जा नहीं दिया, बल्कि अपनी बेटी बनाकर मेरे आत्मसम्मान को पंख दे दिए। आपकी इस सोच, इस प्यार और इस बड़प्पन ने मुझे यह सिखाया है कि रिश्ते कभी खून से बड़े नहीं होते, बल्कि समझ और अपनेपन से बड़े होते हैं।
बालकनी में खड़ी देविका जी हाथ में गर्म चाय का प्याला लिए खिली हुई धूप को निहार रही थीं। देविका जी का स्वभाव हमेशा से ठहराव और सहजता से भरा था। जीवन के साठ बसंत देख चुकीं देविका जी का मानना था कि समय के साथ जो दरख्त अपनी टहनियां नहीं मोड़ते, वे अक्सर आंधियों में टूट जाते हैं। इंसान को बदलते दौर के साथ अपनी सोच के दरवाजे हमेशा खुले रखने चाहिए।
कुछ ही महीने पहले उनके इकलौते बेटे आर्यन का विवाह अवनि से हुआ था। विवाह बड़ी सादगी और पारिवारिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ था। अवनि एक जानी-मानी सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर डेटा एनालिस्ट के पद पर कार्यरत थी। वह जितनी सुलझी हुई और होशियार थी, उतनी ही संवेदनशील भी। शादी तय होते वक्त अवनि के मन में एक गहरा डर बैठा हुआ था। उसने अपने आसपास कई सहेलियों और रिश्तेदारों को शादी के बाद गृहस्थी और करियर के बीच पिसते देखा था। उसे लगता था कि शादी का मतलब शायद अपने सपनों को पीछे छोड़कर केवल रसोई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के घेरे में सिमट जाना है।
गृहप्रवेश के बाद जब शादी की रस्में खत्म हुईं और घर में सामान्य दिनचर्या शुरू होने लगी, तो अवनि के चेहरे पर एक अनकहा तनाव साफ झलक रहा था। शादी के ठीक तीसरे दिन सुबह जब अवनि जल्दी-जल्दी तैयार होकर, अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए रसोई की ओर भागी ताकि सबके लिए चाय-नाश्ता बना सके, तभी देविका जी वहां आ पहुंचीं। उन्होंने अवनि के चेहरे की हड़बड़ाहट और माथे पर आई पसीने की बूंदों को देख लिया था।
देविका जी ने बड़े प्यार से अवनि के हाथ से चाय की केतली ले ली और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोलीं, “अवनि बेटा, इतनी घबराहट किस बात की है? तुम्हारी आंखों में नींद साफ दिखाई दे रही है।”
अवनि ने झेंपते हुए कहा, “मां जी, वो मुझे ऑफिस के लिए भी निकलना है और सोचा कि जाने से पहले नाश्ता और दोपहर का खाना बना दूं। मैं नहीं चाहती कि मेरे काम की वजह से घर का कोई काम छूटे।”
देविका जी हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं, “बेटा, तुमने इतनी पढ़ाई-लिखाई इसलिए की है ताकि अपनी काबिलियत को पहचान सको और समाज में अपनी पहचान बना सको। मैं जानती हूं कि तुम्हारी नौकरी कितनी जिम्मेदारी वाली है। तुम दिनभर दफ्तर में मानसिक रूप से कितना थक जाती हो। इसलिए आज ही एक बात अपने मन में अच्छे से बिठा लो, इस घर की सारी जिम्मेदारियों का बोझ केवल तुम्हारे अकेले के कंधों पर नहीं है। यह घर हम सबका है, तो काम भी सबका है। जब तक मैं हूं, तुम्हें घर-गृहस्थी की चिंता में घुटने की कोई जरूरत नहीं है। हम दोनों मिलकर सारा काम हंसते-खेलते संभाल लेंगे।”
अवनि को अपनी कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसने संकोच भरे लहजे में कहा, “लेकिन मां जी, हमारे समाज में तो यही माना जाता है कि घर की रसोई और काम संभालना बहू की पहली जिम्मेदारी है। अगर रिश्तेदार या अड़ोसी-पड़ोसी देखेंगे कि आप रसोई में काम कर रही हैं और मैं दफ्तर जा रही हूं, तो लोग कहेंगे कि कैसी बहू है जो सास से काम करवाती है। मुझे बहुत संकोच होगा।”
देविका जी खिलखिलाकर हंस पड़ीं। उन्होंने अवनि के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और कहा, “अरे पगली, लोगों का क्या है? लोगों का काम ही है कहना। अगर हम लोगों की बातों के हिसाब से अपनी जिंदगी जीने लगे, तो कभी खुश नहीं रह पाएंगे। जब एक मां अपनी बेटी के लिए खुशी-खुशी सब कुछ करती है, तब तो कोई उंगली नहीं उठाता। फिर बहू के लिए करते वक्त लोग सवाल क्यों उठाते हैं? मैंने जब तुम्हें इस घर की दहलीज पार करते देखा था, तभी मन ही मन तय कर लिया था कि मैं तुम्हें बहू बनाकर नहीं, बल्कि एक बेटी बनाकर रखूंगी। और अगर तुम भी मुझे सिर्फ सास की औपचारिकता न मानकर एक मां की तरह समझोगी, तो यह संकोच और हिचकिचाहट खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी। मां और बेटी जब साथ मिलकर काम करती हैं, तो घर स्वर्ग बन जाता है।”
मां जी के इन शब्दों ने अवनि के भीतर बरसों से जमी आशंकाओं की बर्फ को एक पल में पिघला दिया। उसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए। उसने आगे बढ़कर देविका जी को गले से लगा लिया।
दिन बीतने लगे। घर का माहौल सचमुच बेहद सहज और खुशनुमा हो गया था। सुबह आर्यन, अवनि और देविका जी तीनों मिलकर काम बांट लेते। कोई चाय बनाता, कोई फल काटता, तो कोई पौधों को पानी देता। अवनि पूरे दिल से काम करती और जब भी समय मिलता, रसोई में देविका जी का हाथ बंटाती। वहीं देविका जी हमेशा इस बात का ध्यान रखतीं कि अवनि पर काम का अतिरिक्त दबाव न पड़े।
एक बार की बात है, अवनि की कंपनी में एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का फाइनल ऑडिट चल रहा था। पूरे हफ्ते काम का भारी दबाव था। शुक्रवार के दिन एक बहुत महत्वपूर्ण क्लाइंट प्रेजेंटेशन थी, जिसके चलते अवनि को ऑफिस में ही रुकना पड़ा। शाम के छह बजे से मीटिंग शुरू हुई और खत्म होते-होते रात के साढ़े आठ बज गए।
अवनि जब अपनी कैब में बैठी, तो उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। दिनभर की थकान और भूखे पेट रहने के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी। ऊपर से उसके मन में यह घबराहट भी चलने लगी कि आज घर लौटने में बहुत देर हो गई है। सास और पति भूखे बैठे होंगे, रात का खाना भी अभी तक नहीं बना होगा। वह रास्ते भर खुद को कोसती रही कि काश उसने दोपहर में ही कुछ बनाकर रख दिया होता।
रात के करीब सवा नौ बजे जब अवनि ने घर के दरवाजे पर घंटी बजाई, तो उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। दरवाजा आर्यन ने खोला और मुस्कुराकर बोला, “आ गई तुम? थकी हुई लग रही हो, जल्दी हाथ-मुंह धो लो।”
अवनि जैसे ही डाइनिंग एरिया की तरफ बढ़ी, रसोई से आती भीनी-भीनी खुशबू ने उसकी भूख को और बढ़ा दिया। डाइनिंग टेबल पर ताजे बने हुए मेथी के थेपले, गरमा-गर्म दाल और अवनि की पसंदीदा पनीर की सब्जी करीने से ढकी रखी थी। पास ही टेबल पर एक छोटा सा कागज का टुकड़ा रखा था। अवनि ने आगे बढ़कर वह पर्ची उठाई। उस पर देविका जी की सुंदर लिखावट में लिखा था:
“मेरी प्यारी बच्ची, तुम्हारी लगन और मेहनत देखकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। लेकिन अपनी इस सफलता के सफर में अपनी सेहत को कभी पीछे मत छूटने देना। खाना खाकर बिना किसी चिंता के सो जाना, बर्तन मैंने पहले ही समेट दिए हैं। शुभ रात्रि।”
वह छोटा सा नोट पढ़कर अवनि की आंखों से आंसू टपक कर उस कागज पर गिर पड़े। जिस दुनिया में बहुओं से केवल सेवा की उम्मीद की जाती है, वहां उसकी सास उसके काम का सम्मान कर रही थी और उसके स्वास्थ्य की चिंता कर रही थी। उस रात अवनि ने तृप्त होकर खाना खाया और एक गहरी, सुकून भरी नींद सोई।
कुछ दिनों बाद की बात है। रविवार की दोपहर थी। अवनि किसी जरूरी प्रेजेंटेशन की तैयारी के सिलसिले में पास के एक को-वर्किंग कैफे में गई हुई थी। घर पर केवल देविका जी और आर्यन थे। तभी पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला, मालती जी, जो अपनी पुरानी सोच और तीखी बातों के लिए जानी जाती थीं, देविका जी से मिलने आईं।
देविका जी ने आदरपूर्वक उन्हें बिठाया और खुद रसोई में जाकर उनके लिए अदरक वाली चाय और मठरी बनाकर ले आईं। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो मालती जी ने अपनी पैनी नजरों से पूरे घर का मुआयना किया। घर में अवनि को न पाकर उन्होंने तंज भरे लहजे में पूछा, “अरे देविका, तुम्हारी बहू कहीं दिखाई नहीं दे रही? आज तो इतवार है, क्या आज भी वह घर पर नहीं है?”
देविका जी ने बड़े शांत भाव से उत्तर दिया, “जी मालती जी, उसका कोई जरूरी ऑफिस का काम था, इसलिए वह कुछ घंटों के लिए बाहर गई है।”
मालती जी ने चाय का घूंट भरते हुए मुंह बनाया और बोलीं, “सच कहूं देविका, तुम्हारी बहू बहुत ज्यादा मॉडर्न और करियर-ओरिएंटेड है। मुझे तो समझ नहीं आता कि आजकल की लड़कियां शादी के बाद भी इतना बाहर क्यों भागती हैं। भला एक बात बताओ, क्या वह घर के कामकाज में तुम्हारा कोई हाथ बंटाती भी है या सारा बोझ तुम्हारे इस ढलते शरीर पर ही डाल रखा है? आखिर सास का एक रुतबा होना चाहिए, बहुओं को ज्यादा सिर पर चढ़ाना ठीक नहीं होता।”
मालती जी की यह कड़वी बात सुनकर किसी भी सामान्य सास को गुस्सा आ सकता था या वह अपनी बहू की कमियां गिनाने लगती, लेकिन देविका जी के चेहरे पर केवल एक शांत और गरिमामयी मुस्कान तैर गई।
देविका जी ने बड़े ही सौम्य और स्पष्ट शब्दों में कहा, “मालती जी, रिश्तों को रुतबे और हुकूमत से नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान से सींचा जाता है। और जहां तक बात मदद की है, तो सच कहूं तो मदद की जरूरत उसे नहीं, बल्कि मुझे है। मैं उसके जरिए यह सीख रही हूं कि आज की नई पीढ़ी कितनी समझदार, आत्मनिर्भर और सक्षम है। वह अपने सपनों को पूरा करने के साथ-साथ इस घर के हर सदस्य की भावनाओं का पूरा ख्याल रखती है। जब मैं बीमार थी, तो उसने दो दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर मेरी सेवा की थी। मैंने उसे अपनी बहू नहीं, अपनी बेटी माना है और उसने मुझे अपनी मां से भी बढ़कर आदर दिया है। जब रिश्ता मां-बेटी का बन जाए, तो फिर वहां काम कौन कर रहा है और कौन नहीं, इसका हिसाब-किताब नहीं रखा जाता। मेरे लिए इतना ही काफी है कि मेरा घर खुशियों से भरा है।”
संयोग से, अवनि उसी वक्त घर वापस लौटी थी। उसने जैसे ही दरवाजे का लॉक खोला, मालती जी के सवाल और अपनी सास का यह अद्भुत जवाब उसके कानों में पड़ गया। वह दरवाजे की ओट में ही जड़वत खड़ी रह गई। उसकी आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बहने लगी।
वह मन ही मन सोच रही थी कि जिस समाज में सास-बहू के रिश्ते को हमेशा खटास, तानों और खींचतान का प्रतीक माना जाता है, वहां उसकी सास बाहर वालों के सामने ढाल बनकर उसके आत्मसम्मान की रक्षा कर रही थीं। उन्होंने न केवल उसका मान बढ़ाया था, बल्कि एक रूढ़िवादी सोच को बिना किसी कटुता के आईना भी दिखा दिया था।
मालती जी निरुत्तर हो गईं। उनके पास देविका जी के इस निश्छल और उदार नजरिए का कोई जवाब नहीं था। वे कुछ देर इधर-उधर की बातें करके वहां से चली गईं।
मालती जी के जाने के बाद अवनि धीरे से कमरे के अंदर आई। उसका चेहरा भावुकता से भीगा हुआ था। देविका जी ने जब उसे देखा, तो मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे अवनि, आ गई तुम बेटा? आओ बैठो, मैं तुम्हारे लिए भी गरमा-गर्म चाय बनाती हूं।”
अवनि बिना कुछ बोले सीधे जाकर देविका जी के चरणों में बैठ गई और उनके घुटनों पर अपना सिर रखकर रो पड़ी।
देविका जी चौंक गईं। उन्होंने घबराकर अवनि का चेहरा ऊपर उठाया और बोलीं, “क्या हुआ अवनि? तुम रो क्यों रही हो बेटा? रास्ते में कुछ हुआ क्या? किसी ने कुछ कहा?”
अवनि ने भरभराई आवाज में कहा, “मां, मैंने अभी-अभी दरवाजे पर खड़े होकर आपकी सारी बातें सुन लीं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किन शब्दों में आपका धन्यवाद करूं। आज के दौर में जहां सासें अक्सर अपनी बहुओं की गलतियां ढूंढती हैं, वहां आपने मुझे इतना ऊंचा स्थान दिया। आपने मुझे सिर्फ एक बहू का दर्जा नहीं दिया, बल्कि अपनी बेटी बनाकर मेरे आत्मसम्मान को पंख दे दिए। आपकी इस सोच, इस प्यार और इस बड़प्पन ने मुझे यह सिखाया है कि रिश्ते कभी खून से बड़े नहीं होते, बल्कि समझ और अपनेपन से बड़े होते हैं। अगर घर में प्यार और विश्वास हो, तो जिंदगी की कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं लगती। काश, इस दुनिया के हर घर में, हर बेटी को आप जैसी समझदार, सहृदय और ममतामयी मां मिले।”
देविका जी की आंखें भी नम हो गईं। उन्होंने अवनि को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और उसका माथा चूमते हुए कहा, “बेटा, सम्मान एकतरफा नहीं होता। तुमने मुझे जो प्यार और अधिकार दिया, उसी ने मुझे यह हौसला दिया। जब तक हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े हैं, इस घर की खुशियों को कभी किसी की नजर नहीं लग सकती।”
आर्यन भी कमरे में आ गया और दोनों को यूं गले मिलते देख मुस्कुरा पड़ा। उस घर की दीवारों में अब किसी डर, संकोच या तानों की गूंज नहीं थी, बल्कि वहां आपसी समझ, निस्वार्थ प्रेम और एक नई सोच की सुगंध बसी हुई थी। वह घर सचमुच एक आदर्श आशियाना बन चुका था, जहां एक सास ने अपनी रूढ़िवादिता को त्यागकर अपनी बहू के सपनों को अपनी दुआओं का हिस्सा बना लिया था।
दोस्तों, आज के बदलते दौर में भी कई घरों में बहुओं से वही पुराने ढर्रे पर चलने की उम्मीद की जाती है, जिसके कारण कई रिश्ते कड़वाहट की भेंट चढ़ जाते हैं। लेकिन अगर हर सास अपनी बहू को अपनी ही बेटी मानकर उसके काम, उसकी मेहनत और उसकी भावनाओं का सम्मान करने लगे, तो कोई भी घर टूटने से बच सकता है।
क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में सास-बहू के पारंपरिक टकराव को मिटाने के लिए देविका जी जैसी सोच का हर घर में होना जरूरी है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .