त्याग का तराजू

 पल्लवी ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “लेकिन आज जब दोनों देवर लाखों कमाने लगे, अपने लिए गाड़ियाँ और फ्लैट खरीदने लगे, और जब अपनी सगी बहन की शादी में हाथ बँटाने की बारी आई तो उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। जब मयंक जी ने सिर्फ इतना कहा कि घर का बोझ तीनों भाई मिलकर उठाएँ ताकि हम अपने दो मासूम बच्चों की पढ़ाई के लिए भी कुछ बचा सकें, तो मैं अचानक स्वार्थी, लालची और घर तोड़ने वाली हो गई? क्या एक माँ का अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना गुनाह है? अगर अपने बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना स्वार्थ है, तो हाँ माँजी, आज से मैं स्वार्थी हूँ!”

 रसोई से उठती छौंक की खुशबू और पूजा घर से आती घंटियों की आवाज़ पूरे घर को जीवंत बना देती थी। इस घर की बड़ी बहू पल्लवी पिछले बारह वर्षों से हर सुबह इसी तरह उठकर पूरे परिवार की सेवा में जुट जाती थी। बारह साल पहले जब पल्लवी ब्याह कर इस घर में आई थी, तब उसका दिल उम्मीदों और सपनों से भरा हुआ था। उसके पति मयंक राज्य प्रशासनिक सेवा में एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत थे। मयंक घर के सबसे बड़े बेटे थे और उनके कंधों पर सिर्फ एक पति होने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि पूरे परिवार का बोझ था।

शादी की पहली ही रात मयंक ने पल्लवी के हाथों को थामकर बहुत संजीदगी से कहा था, “पल्लवी, तुम बहुत अच्छे संस्कारों से आई हो। मुझे जीवनसाथी के रूप में पाकर तुम्हें खुशी मिले, यह मेरी पहली कोशिश होगी। मगर मेरी एक मजबूरी है। बाबूजी के असमय जाने के बाद मेरे दो छोटे भाई—समीर और गौरव—तथा दो छोटी बहनें—आरती और पूजा—मेरी जिम्मेदारी हैं। मैं इनका भविष्य संवारे बिना खुद के सुखों में मग्न नहीं हो सकता।” पल्लवी ने उस रात अपने पति की आँखों में सच्चाई और परिवार के प्रति अगाध निष्ठा देखी थी। उसने बिना किसी शिकवे के अपना हाथ मयंक के हाथ में दे दिया और वचन दिया कि वह हर कदम पर उनके इस कर्तव्य में बराबर की भागीदार बनेगी।

शुरुआती साल संघर्षों से भरे रहे। पल्लवी ने अपने सारे शौक एक किनारे रख दिए। न कभी सोने के नए गहनों की माँग की, न कभी अपनी पसंद की महँगी साड़ियाँ खरीदीं। मयंक का वेतन सरकारी था, जो निश्चित रूप से सम्मानजनक था, लेकिन सात लोगों के भरण-पोषण, भाई-बहनों की पढ़ाई और सामाजिक मान-मर्यादा के आगे हर महीने का बजट खिंच जाता था। पल्लवी ने रसोई का हर कोना ऐसे संभाला कि कभी किसी मेहमान को तंगी का अहसास न हो।

धीरे-धीरे समय बीतता गया। मयंक और पल्लवी ने मिलकर बड़ी बहन आरती की धूमधाम से शादी की। उस शादी के लिए मयंक ने अपना प्रोविडेंट फंड तो निकाला ही, साथ ही कुछ बैंक लोन भी लिया। पल्लवी ने अपने मायके से मिले कुछ कंगन तक खुशी-खुशी बेच दिए ताकि ननद के ससुराल वाले कोई ताना न मार सकें। इसके बाद समीर की इंजीनियरिंग और गौरव की एमबीए की पढ़ाई का पूरा खर्च भी मयंक के वेतन से ही चला। पल्लवी ने कभी माथे पर शिकन नहीं आने दी।

इस दौरान पल्लवी खुद भी दो बच्चों—बड़ा बेटा आरव और छोटी बेटी तान्या—की माँ बनी। जब बच्चे छोटे थे, तो उनकी ज़रूरतें सीमित थीं। कपड़े, खिलौने और मामूली स्कूल की फीस में सब काम चल जाता था। समय का चक्र अपनी गति से घूमता रहा। समीर को एक बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई और कुछ समय बाद गौरव भी एक बड़ी वित्त कंपनी में अच्छे पैकेज पर नियुक्त हो गया। मयंक और पल्लवी ने दोनों देवरों की शादी भी अच्छे और संभ्रांत घरों की बेटियों से करवा दी।

घर में अब दो नई बहुएँ—समीर की पत्नी रिया और गौरव की पत्नी श्वेता—आ चुकी थीं। पूरा घर भरा-पूरा दिखने लगा था। सास यशोदा देवी अपने बेटों और बहुओं को देखकर फूली नहीं समाती थीं। उन्हें लगता था कि उनका परिवार शहर का सबसे आदर्श परिवार है। लेकिन इस आदर्श चेहरे के पीछे एक कड़वी हकीकत धीरे-धीरे आकार ले रही थी। दोनों छोटे भाई हर महीने लाखों का वेतन पा रहे थे, मगर घर के खर्च के नाम पर उनका रवैया पूरी तरह उदासीन था। उनकी पत्नियाँ हर सप्ताहांत महँगे मॉल में खरीदारी करतीं, नए-नए आधुनिक सामान खरीदतीं और छुट्टियाँ बिताने बाहर जातीं, जबकि घर के राशन, दूध, बिजली के बिल, नौकरों के वेतन और माँ यशोदा देवी की दवाइयों का पूरा खर्च आज भी मयंक के ही बैंक खाते से कट रहा था।

पल्लवी के बच्चे अब बड़े हो रहे थे। आरव अब नौवीं कक्षा में था और उसे उच्च शिक्षा के लिए बेहतर कोचिंग की ज़रूरत थी, वहीं तान्या भी कथक सीखने की ज़िद कर रही थी। एक दिन जब पल्लवी ने बच्चों के स्कूल की बढ़ती फीस और भविष्य की बचत को लेकर मयंक से चर्चा की, तो मयंक की नज़रें झुक गईं। मयंक का पूरा वेतन पुराने कर्ज़ों की किस्तों और घर के रोज़मर्रा के भारी खर्चों में समाप्त हो जाता था। उनके अपने बैंक खाते में आपातकाल के लिए भी पाँच हज़ार रुपये नहीं बचते थे।

इसी बीच सबसे छोटी ननद पूजा के लिए एक बहुत अच्छे घराने से रिश्ते का प्रस्ताव आया। लड़का प्रतिष्ठित परिवार से था और व्यापार करता था। सब कुछ तय हो गया और शादी की तारीख भी पक्की हो गई। पूजा पूरे घर की लाडली थी, इसलिए शादी में एक भव्य आयोजन की आवश्यकता थी। एक शाम बैठक में सभी लोग जमा हुए। मयंक, पल्लवी, यशोदा देवी, समीर, गौरव और उनकी पत्नियाँ चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे।

मयंक ने बात शुरू की, “बाबूजी के जाने के बाद मैंने पूजा को बेटी की तरह पाला है। अब उसकी शादी का वक्त आ गया है। मैंने मोटा-मोटा हिसाब लगाया है, करीब पच्चीस लाख का खर्च आएगा। समीर और गौरव, अब तुम दोनों भी बहुत अच्छा कमा रहे हो। अगर हम तीनों भाई मिलकर इस खर्च को आपस में बराबर बाँट लें, यानी करीब आठ-आठ लाख रुपये, तो किसी एक पर बोझ नहीं पड़ेगा और पूजा की शादी भी बहुत शान से हो जाएगी।”

मयंक की यह बात सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर ने अपनी चाय का कप मेज़ पर रखा और अजीब सा मुँह बनाकर बोला, “भैया, आप जानते हैं कि प्राइवेट सेक्टर की नौकरी का कोई भरोसा नहीं होता। फिर पिछले महीने ही मैंने अपनी नई कार के लिए भारी डाउन पेमेंट किया है और उसकी मोटी ईएमआई जा रही है। मेरे पास आठ लाख तो क्या, इस वक्त अस्सी हज़ार भी लिक्विड कैश में नहीं हैं। आप तो सरकारी अधिकारी हैं, आपका पद बड़ा है, आप बैंक से आसानी से नया लोन ले सकते हैं।”

गौरव ने तुरंत अपनी पत्नी श्वेता की तरफ देखा और बोला, “हाँ भैया, समीर सही कह रहा है। हमने भी शहर के नए पॉश इलाके में एक थ्री-बीएचके फ्लैट बुक किया है। उसकी किस्तें जा रही हैं। अगर मैं यहाँ आठ लाख दूँगा तो मेरी सारी बचत खत्म हो जाएगी और फ्लैट हाथ से निकल जाएगा। वैसे भी आप घर के बड़े हैं, बाबूजी की जगह आप हैं। समाज में आपका नाम है। लोग यही देखेंगे कि बड़े भाई ने बहन की शादी कैसी की। हम छोटे हैं, हम पर कोई उंगली नहीं उठाएगा।”

रिया और श्वेता ने भी अपने पतियों की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि आजकल के ज़माने में खर्चे बहुत बढ़ गए हैं और वे अपनी व्यक्तिगत बचत से कोई समझौता नहीं कर सकतीं।

मयंक के चेहरे का रंग उड़ गया। जिस भाई की इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए उसने अपने सपनों की बलि दी थी, जिस भाई के एमबीए के प्रोजेक्ट के लिए उसने अपनी खुद की छुट्टियों के पैसे काट लिए थे, आज वे दोनों भाई अपनी व्यक्तिगत विलासिता का हवाला देकर अपनी सगी बहन की शादी से मुकर रहे थे। मयंक की आँखों में छलछलाते आँसू देखकर पल्लवी का कलेजा काँप उठा। उसने देखा कि बारह साल तक जिस परिवार को सींचने के लिए उसने अपनी जवानी खपा दी, वह परिवार सिर्फ एक तरफा स्वार्थ की बुनियाद पर खड़ा था।

उस रात मयंक कमरे में फूट-फूट कर रोए। पल्लवी ने अपने पति के आँसू पोंछे और बहुत शांत आवाज़ में कहा, “मयंक, बहुत हो गया। त्याग की भी एक मर्यादा होती है। जब तक आप चुपचाप सब कुछ देते रहेंगे, लोग आपको महान कहते रहेंगे। लेकिन जिस दिन आप अपने बच्चों के भविष्य के लिए रुकेंगे, यही लोग आपको बुरा कहेंगे। अब समय आ गया है कि हम अपनी सीमाएं तय करें। अगर हमने आज अपने बच्चों के लिए कदम नहीं उठाया, तो कल आरव और तान्या अपने सपनों के टूटने का जिम्मेदार हमें मानेंगे और हमें कभी माफ नहीं करेंगे।”

अगले ही दिन मयंक ने एक कड़ा फैसला लिया। उसने घर के संयुक्त खाते में अपना वेतन डालना बंद कर दिया। शाम को उसने दोनों भाइयों और माँ को बैठक में बुलाया और स्पष्ट शब्दों में कहा, “आज से घर के जितने भी सामान्य खर्च हैं—राशन, बिजली, पानी, माँ की दवाइयाँ—वे तीनों भाइयों में बराबर बँटेंगे। हर महीने की पहली तारीख को तीनों को अपना हिस्सा देना होगा।”

मयंक का यह कहना था कि घर में मानो भूकंप आ गया। दोनों छोटे भाइयों के चेहरों पर गुस्सा साफ झलकने लगा।

समीर चिल्लाकर बोला, “अगर हमें पाई-पाई का हिसाब देना है और घर का खर्च ही बाँटना है, तो हम एक साथ क्यों रहें? हम अपना खर्च खुद उठा लेंगे। हमें संयुक्त रसोई में नहीं रहना।” गौरव ने भी तुरंत ताव में आकर कहा, “हाँ, हम कल से ही अपना राशन अलग लाएंगे। हम पर कोई हुक्म नहीं चला सकता।”

अगले ही दिन हवेली के बड़े से आँगन में दो नए गैस चूल्हे रख दिए गए। एक ही छत के नीचे अब तीन अलग-अलग चूल्हे जलने लगे। पूरे मोहल्ले में कानाफूसी होने लगी कि इतने बड़े सरकारी अधिकारी के घर में अलगाव हो गया।

इस पूरे घटनाक्रम का सारा ठीकरा यशोदा देवी ने पल्लवी के सिर पर फोड़ दिया। माँ का अंधा मोह हमेशा अपने उन बेटों के पक्ष में झुक जाता है जो अपनी पत्नियों के इशारे पर चलते हैं, जबकि जो बेटा सब कुछ न्योछावर करता रहा, उसी की पत्नी खलनायक बन जाती है।

यशोदा देवी गुस्से में लाल-पीली होकर पल्लवी के कमरे के बाहर आकर ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगीं, “कलयुगी बहू आई है मेरे घर में! मैं सब समझती हूँ, यह सब इसी का किया-धरा है। इसी ने मेरे सीधे-सादे मयंक के कान भरे हैं। नहीं तो मेरा बेटा कभी अपने सगे भाइयों से पाई-पाई का हिसाब नहीं माँगता। बारह साल तक सब हँसी-खुशी चल रहा था। जैसे ही देवर कमाने लगे, इस औरत के पेट में दर्द होने लगा। इसने भाइयों का प्यार छीन लिया, मेरा भरा-पूरा परिवार तोड़ दिया!”

पल्लवी रसोई में चुपचाप खड़ी सुन रही थी। उसने पिछले बारह सालों में कभी सास की किसी बात का पलटकर जवाब नहीं दिया था। लेकिन आज जब उसके आत्मसम्मान, उसके त्याग और उसके पति की ईमानदारी पर कीचड़ उछाला जा रहा था, तो उसके भीतर का सब्र टूट गया। वह बाहर आई। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि एक असाधारण गरिमा और दृढ़ता थी।

पल्लवी ने हाथ जोड़कर बहुत ही संयमित मगर स्पष्ट स्वर में कहा, “मांजी, आपकी बात बिल्कुल सच है। बारह साल तक मयंक जी अकेले सब कुछ कर रहे थे, अपनी जेब से, अपने खून-पसीने से। तब तक मैं इस घर की सबसे संस्कारी, सबसे समझदार और कुलवधू थी, क्योंकि मैंने कभी अपने लिए कोई साड़ी नहीं माँगी, कभी अपनी पसंद का खाना नहीं बनवाया और अपने गहने तक ननद की शादी में हँसते-हँसते दे दिए। तब मैं बहुत अच्छी थी।”

पल्लवी ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “लेकिन आज जब दोनों देवर लाखों कमाने लगे, अपने लिए गाड़ियाँ और फ्लैट खरीदने लगे, और जब अपनी सगी बहन की शादी में हाथ बँटाने की बारी आई तो उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। जब मयंक जी ने सिर्फ इतना कहा कि घर का बोझ तीनों भाई मिलकर उठाएँ ताकि हम अपने दो मासूम बच्चों की पढ़ाई के लिए भी कुछ बचा सकें, तो मैं अचानक स्वार्थी, लालची और घर तोड़ने वाली हो गई? क्या एक माँ का अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना गुनाह है? अगर अपने बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना स्वार्थ है, तो हाँ माँजी, आज से मैं स्वार्थी हूँ!”

यशोदा देवी अवाक रह गईं। उनके पास पल्लवी के इन तर्कों का कोई जवाब नहीं था। दोनों देवर और देवरानियाँ भी अपने कमरों के दरवाजों के पीछे से यह सब सुन रहे थे और शर्म से उनकी नज़रें झुक गई थीं।

पल्लवी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “मांजी, आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए। पूजा सिर्फ मयंक की बहन नहीं, मेरी भी सबसे छोटी बहन जैसी है। उसकी शादी की पूरी जिम्मेदारी मयंक जी और मैं अकेले ही उठाएंगे। हम अपनी बची हुई ज़मीन का टुकड़ा बेचेंगे या बैंक से लोन लेंगे, लेकिन पूजा की शादी में कोई कमी नहीं रहने देंगे। पर याद रखिएगा, उस शादी के बाद हम पर कोई झूठे फर्ज़ का बोझ नहीं डालेगा। हम सिर्फ अपने बच्चों और आपकी सेवा करेंगे, किसी की विलासिता का साधन नहीं बनेंगे।”

यह कहकर पल्लवी अपने कमरे में चली गई। कमरे में मयंक ने पल्लवी का हाथ कसकर पकड़ लिया। आज मयंक को अपनी पत्नी पर गर्व हो रहा था कि उसने वह सच कह दिया जिसे मयंक पारिवारिक मर्यादा के चलते कभी अपनी ज़ुबान पर नहीं ला पा रहे थे।

समय किसी के लिए नहीं रुकता। मयंक और पल्लवी ने मिलकर बैंक से पर्सनल लोन लिया और अपनी एक पुरानी ज़मीन का हिस्सा बेचकर पूजा की शादी की तैयारियाँ पूरी गरिमा से शुरू कीं। शादी का दिन आया। मंडप बहुत सुंदर सजा था। शादी के पूरे तीन दिन पल्लवी ने बिना किसी कड़वाहट के, एक बड़ी भाभी और माँ के रूप में सारे रस्मो-रिवाज़ निभाए। उसने दोनों देवरानियों को भी पूरा मान-सम्मान दिया, लेकिन अपनी उस आत्मसम्मान की रेखा को कभी टूटने नहीं दिया।

विदाई के समय जब पूजा पल्लवी के गले लगी, तो उसने रोते हुए कहा, “भाभी, अगर आप और भैया न होते तो शायद आज मेरी शादी इतनी खुशियों से न होती। मैं जानती हूँ कि मेरे दोनों सगे भाइयों ने क्या किया। मुझे भैया से ज्यादा आप पर गर्व है कि आपने कभी मुझे पराया नहीं समझा।”

पूजा की विदाई के बाद घर में एक अजीब सा खालीपन था, लेकिन वह खालीपन कड़वाहट का नहीं था। पूजा के ससुराल वालों ने जब मयंक और पल्लवी की तारीफों के पुल बाँधे और समाज में मयंक के त्याग की मिसाल दी गई, तो समीर और गौरव के भीतर का सोया हुआ ज़मीर आखिरकार जाग गया। उन्हें इस बात का गहरा अहसास हुआ कि समाज में उनकी जो भी पहचान बनी थी, वह इसी बड़े भाई और भाभी के त्याग की नींव पर खड़ी थी। यदि मयंक ने अपनी जवानी में अपने बच्चों की तरह उन्हें न संभाला होता, तो आज वे इस मुकाम पर कभी नहीं पहुँचते।

शादी के दो दिन बाद, शाम के समय समीर और गौरव अपनी पत्नियों के साथ मयंक और पल्लवी के कमरे में आए। दोनों भाइयों की आँखों में गहरा पछतावा था। समीर आगे बढ़ा और उसने मयंक के पैर छू लिए।

समीर भर्राए गले से बोला, “भैया, हमें माफ कर दीजिए। पैसे की चमक ने हमारी आँखों पर ऐसा पर्दा डाल दिया था कि हम अपने ही परिवार के उस कर्ज को भूल गए जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता। भाभी, आपने उस दिन जो कहा था, वह कोई ताना नहीं था, बल्कि हमारे अंधेपन पर एक ज़ोरदार तमाचा था। अगर आपने वह आईना न दिखाया होता, तो हम ज़िंदगी भर इंसान कहलाने के लायक नहीं रहते।”

गौरव ने अपने चेकबुक से एक चेक निकालकर मयंक के सामने रखा और कहा, “भैया, यह पूजा की शादी के खर्च का हमारा हिस्सा है। हमने अपनी फिजूलखर्ची रोककर यह व्यवस्था की है। हम जानते हैं कि आपके त्याग की कोई कीमत नहीं हो सकती, लेकिन हम अपने पाप का बोझ थोड़ा हल्का करना चाहते हैं। और आज के बाद घर का हर खर्च तीनों भाई मिलकर ही उठाएंगे। अलग चूल्हा जलना हमारे लिए शर्म की बात है।”

रिया और श्वेता ने भी पल्लवी के पास जाकर अपनी गलतियों की माफी माँगी। उन्होंने स्वीकार किया कि आधुनिकता और निजी जीवन की आड़ में वे परिवार की उस संयुक्त शक्ति को भूल गई थीं जो हर मुश्किल में ढाल बनती है।

दरवाज़े पर खड़ी यशोदा देवी यह सब देख रही थीं। उनकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। वे आगे बढ़ीं और उन्होंने पल्लवी को अपने सीने से लगा लिया।

यशोदा देवी ने कांपती आवाज़ में कहा, “बहू, मुझे माफ कर दे। माँ की ममता में मैं इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई कि जिस बेटे ने बारह साल तक अपनी हड्डियों का चूल्हा बनाकर सबको पकाया, उसकी अपनी भी एक गृहस्थी है, उसके भी बच्चे हैं। तूने उस दिन कड़वा सच बोलकर घर तोड़ा नहीं, बल्कि मेरे बिखरते हुए बच्चों को एक सही दिशा देकर इस घर को हमेशा के लिए बचा लिया। तू इस घर की सिर्फ बहू नहीं, इस परिवार की रीढ़ है।”

पल्लवी की आँखों से भी आँसू छलक पड़े, लेकिन ये आँसू राहत और संतोष के थे। अगले ही दिन हवेली के आँगन से वे दोनों अलग चूल्हे हमेशा के लिए हटा दिए गए और मुख्य रसोई में एक बार फिर पूरे परिवार के लिए एक साथ खाना बनने लगा। मयंक ने अपने दोनों भाइयों को गले से लगाया।

आरव और तान्या अपने चाचा-चाचियों के साथ हँस-खेल रहे थे। पल्लवी ने देखा कि जब रिश्तों में त्याग के साथ-साथ आत्मसम्मान और स्पष्टता की सीमा खिंच जाती है, तो परिवार बिखरता नहीं, बल्कि और अधिक मज़बूत होकर निखरता है। हवेली की चौखट पर अब कोई झूठा मुखौटा नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सच्ची समझ, सम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी की नई सुबह हो चुकी थी।

एक संयुक्त परिवार में जब बड़े अपने कर्तव्य निभाते-निभाते थक जाएँ, तो क्या छोटों का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वे बिना माँगे अपनी जिम्मेदारी संभालें? क्या अपने बच्चों के हक के लिए आवाज़ उठाने वाली बहू को स्वार्थी कहना उचित है? अपनी बेबाक राय नीचे ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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