जंजीर और आईना

“बहू… मुझे माफ कर दे,” मनोरमा देवी का गला रुंध गया था। आवाज कांप रही थी। “आज तूने मेरे सामने वो आईना रख दिया जिसे देखने से मैं वर्षों से भाग रही थी। मैं भूल गई थी कि जो दर्द मुझे मेरी सास ने दिया, मैं उसी दर्द को अपनी आदत बना बैठी थी। मुझे लगता था कि अगर मैं सख्त नहीं रहूंगी, तो शायद मेरा हक छिन जाएगा। मैंने हमेशा समझा कि तूने बाबूजी को अपनी मीठी बातों में फंसाकर सब हथिया लिया… पर आज मुझे समझ आया कि बाबूजी गलत नहीं थे। उन्होंने इस घर की कमान सबसे सही और मजबूत हाथों में सौंपी थी।”

  बालकनी में बैठी राधिका अपनी मां कौशल्या जी से फोन पर बात कर रही थी। बाहर हल्की धूप खिली थी, लेकिन राधिका के चेहरे पर उदासी का घना कोहरा छाया हुआ था। हाथ में पकड़ी चाय की प्याली कब की ठंडी हो चुकी थी, पर उसका ध्यान चाय पर नहीं, अपने भीतर सुलगते दर्द पर था।

“मां, मुझे सच में समझ नहीं आता कि औरत अपनी तकलीफों से गुजरकर भी इतनी बेपरवाह और कठोर कैसे हो सकती है? जो आग उसने खुद झेली हो, उसी आग में दूसरी औरत को झोंकते हुए उसकी रूह क्यों नहीं कांपती? जो इंसान समय की मार खाकर भी कुछ न सीखे, उसे फिर कौन सा रिश्ता सिखा सकता है? मेरी सास खुद अपनी सास के जुल्मों की कहानियां बड़े गर्व से सुनाती हैं कि कैसे उन्हें एक-एक पैसे के लिए तरसाया गया, कैसे पूरे दिन चौके में खटाया गया। पर ताज्जुब देखिए, आज ठीक वही बर्ताव वो मेरे साथ दोहरा रही हैं। क्या उन्हें जरा भी याद नहीं आता कि वह दर्द कितना असहनीय होता है?”

दूसरी तरफ से कौशल्या जी ने एक गहरी सांस ली। मां की आवाज में दुनिया भर का तजुर्बा और थोड़ा लाचार सा वात्सल्य घुला था। वे बोलीं, “धीरज रख बेटा। दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो अपनी तकलीफों से सीखकर यह ठान लेते हैं कि जो कांटे उनकी राह में बिछे थे, वो किसी और की राह में नहीं बिछने देंगे। और दूसरे वो, जो अपनी तकलीफ को ही अपनी ताकत का लाइसेंस मान बैठते हैं। उन्हें लगता है कि जब हमने सहा, तो सामने वाले का सहना भी कुदरत का कानून है। तेरी सास इसी दूसरी जमात में फंस गई हैं। तू मेरी बेटी है, मैं तुझे ही समझा सकती हूं। बस इतना याद रख, विरोध जरूर कर, लेकिन अपनी मर्यादा और गरिमा को कभी मत छोड़ना। उन्हें यह आईना दिखा, पर शांत रहकर, ताकि उन्हें समझ आए कि जिस दर्द की वो शिकार थीं, आज उसी दर्द की वो गुनहगार बन रही हैं।”

राधिका ने अपनी आंखें पोंछीं। उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान तैर गई, “मां, समझाना किसे कहते हैं? मेरी शादी को आज बारह बरस हो चुके हैं। दो बच्चे बड़े हो गए, पर इस घर में आज भी मेरा दर्जा एक बाहरी इंसान का ही है। कल की बात सुनिए… पड़ोस में किसी की वसीयत की बात चल रही थी, तो सबके सामने बोलीं—’हमारे घर में तो बाबूजी को बहू की मासूमियत ऐसी भायी कि अपनी पत्नी और बेटे को दरकिनार करके तीन मंजिला मकान और पुश्तैनी दुकानें बहू के नाम लिख गए।’ मां, आप ही बताइए, जब बाबूजी आखिरी दिनों में बिस्तर पर थे, छह महीने तक मैंने दिन-रात उनकी सेवा की, उनके घाव साफ किए, तब तो न उनकी बेटी आगे आई और न ही खुद सासू मां से उनकी तीमारदारी झेली गई। बाबूजी ने जाते-जाते मेरे नाम वसीयत इसलिए की ताकि मुझे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन इस बात का ताना मुझे पिछले पांच सालों से हर सुबह-शाम सुनना पड़ता है।”

कौशल्या जी ने उसे हौसला दिया, सांसारिक उतार-चढ़ाव की बातें कहीं और फोन रख दिया। राधिका ने भी खुद को संभाला। उसने अपनी नम आंखें पोंछीं, साड़ी का पल्लू ठीक किया और अपने रोजमर्रा के कामों में जुट गई।

शाम को जब उसके पति प्रतीक दफ्तर से लौटे, तो राधिका के चेहरे की बुझी हुई रंगत देखकर फौरन भांप गए कि घर का मौसम फिर खराब हुआ है। प्रतीक ने ब्रीफकेस मेज पर रखा, टाई की गांठ ढीली की और राधिका के पास आकर बोले, “राधिका, क्या बात है? फिर मां ने कुछ कह दिया क्या? यार, अब तुम्हें इन सब बातों की आदत हो जानी चाहिए। बारह साल कम नहीं होते। मां का मिजाज अब इस उम्र में तो बदलने से रहा। तुम हर छोटी-बड़ी बात को दिल से लगाकर खुद को बीमार क्यों करती हो?”

राधिका ने मुड़कर प्रतीक की आंखों में देखा। उसकी नजरों में कोई शिकवा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी ठहराव भरी स्पष्टता थी। वह बोली, “प्रतीक, आदत डाल लेना किसी बात का हल नहीं होता। जब कोई गलत आदत को अपना स्वभाव बना ले, तो वो परंपरा बन जाती है। आपकी मां को भी उनकी सास ने खूब ताने दिए, उन्हें दबाकर रखा। उन्होंने उस दर्द से यह नहीं सीखा कि किसी का दिल कैसे नहीं दुखाते, बल्कि उन्होंने उसी जहर को पीकर आज मेरे ऊपर उगलना शुरू कर दिया। मैं यह आदत नहीं डालना चाहती, क्योंकि अगर मैंने इसे सामान्य मान लिया, तो कल को जब मेरे बेटे की बहू इस घर में आएगी, अनजाने में मैं भी उसके साथ वही करने लगूंगी। मैं इस कड़वी विरासत को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।”

प्रतीक के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वे चुपचाप पानी का गिलास उठाकर कमरे से बाहर चले गए।

इस बात को करीब एक हफ्ता बीत चुका था। रविवार का दिन था। राधिका की सास, मनोरमा देवी, ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी अपने पैरों को सहला रही थीं। चेहरे पर वही चिरपरिचित नाराजगी और बेरुखी थी। घर की कामवाली शांति बाई बर्तन मांजकर जल्दी-जल्दी निकल रही थी।

मनोरमा देवी ने आवाज लगाई, “अरे ओ शांति! ज़रा सुन तो सही। इधर आ और सरसों का तेल लेकर मेरे घुटनों में थोड़ी मालिश कर दे। सुबह से जोड़ों में जान नहीं है।”

शांति बाई ने वहीं चौखट पर रुककर हाथ जोड़ दिए, “ना माजी, मुझे माफ करो। मेरा काम झाड़ू, पोंछा और बर्तन का है। आपके पैर दबाने का नहीं। पिछले हफ्ते जब आपने बिना बात मेरी पूरी दिहाड़ी काट ली थी और मुझे चोर की तरह डांटा था, तब से मैंने तय कर लिया है कि आपके निजी काम मैं नहीं करूंगी। मुझे दूसरे घर में देर हो रही है, मैं चलती हूं।” शांति बाई ने मुड़कर देखा भी नहीं और तेजी से बाहर निकल गई।

मनोरमा देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसी समय राधिका दालान में बच्चों के कपड़े समेट रही थी। मनोरमा देवी की नजर राधिका पर पड़ी तो उनका पारा और चढ़ गया। वे तंज कसते हुए बोलीं, “देखा! अब इस घर में नौकरों के भी तेवर बढ़ गए हैं। अरे बहू, तू तो दिन भर कमरे में बैठी आराम ही फरमाती है। ज़रा हाथ चला और तेल की शीशी लाकर मेरे पैरों में मल दे। नहीं तो रहने दे, अपनी बेटी पारुल को फोन करती हूं, वही मुझे किसी बड़े डॉक्टर के पास ले जाएगी। यहां तो कोई पानी पूछने वाला भी नहीं है।”

राधिका ने कपड़े तह करके मेज पर रखे। वह बिना किसी उत्तेजना के बहुत शांत कदमों से चलकर मनोरमा देवी के सामने आई। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक सधी हुई मुस्कान थी।

वह बहुत आहिस्ता से बोली, “मम्मी जी, क्या आपने कभी ठंडे दिमाग से सोचा कि शांति बाई ने आपके पैर छूने से भी इनकार क्यों कर दिया? क्या उसके पास सच में दस मिनट का वक्त नहीं था? वक्त तो उसके पास था, पर आपने उसे कभी एक जीता-जागता इंसान समझा ही नहीं। हमेशा उसे डांटना, उसके आत्मसम्मान को कुचलना और अपनी मर्जी का गुलाम समझना—यही किया आपने। वह गरीब जरूर है, लेकिन उसका भी जमीर है। अगर आपने उसके साथ थोड़ा भी अपनापन दिखाया होता, तो वह बिना कहे ही आपके पैर दबा देती। और जहां तक डॉक्टर के पास जाने की बात है, तो मैं तो आपकी नजरों में हमेशा से कामचोर और बुरी ही रही हूं। अगर आपको लगता है कि दीदी ही आपकी सच्ची खैरख्वाह हैं, तो बेशक आप उन्हें बुला लीजिए।”

मनोरमा देवी की त्योरियां चढ़ गईं। उनकी आंखों से चिंगारियां निकलने लगीं। वे चिल्लाकर बोलीं, “तेरी यह जुबान… इतनी हिम्मत! तू मुझे सिखाएगी कि नौकरों से कैसे पेश आते हैं? बोल तो ऐसे रही है जैसे अपने मायके से खजाना लाकर मेरा इलाज करवाएगी। इस घर में जो तू शान से बैठी हुक्म चला रही है, वो मेरे पति की कमाई और मेरे बेटे की मेहनत का पैसा है। अपने मायके से एक धेला नहीं लाई थी तू, इतना घमंड किस बात का है तुझे?”

ड्राइंग रूम में अचानक सन्नाटा छा गया। प्रतीक जो दूसरे कमरे में फाइलों का काम कर रहे थे, मां की तेज आवाज सुनकर बाहर आ गए। बच्चों ने भी सहमकर कमरे का दरवाजा थोड़ा सा खोलकर देखा।

राधिका विचलित नहीं हुई। उसने न तो अपनी आवाज ऊंची की और न ही रोने का कोई नाटक किया। उसने बहुत गहरा सांस लिया, जैसे उसने वर्षों से संजोए किसी फैसले को आज जमीन पर उतारने का निश्चय कर लिया हो।

वह मुड़ी और सीधे अपने बेडरूम की तरफ गई। दो मिनट बाद जब वह लौटी, तो उसके हाथ में एक भारी, पुराना लेदर का फोल्डर था।

राधिका ने उस फोल्डर को बहुत आदर और नफासत के साथ सेंटर टेबल पर मनोरमा देवी के सामने रख दिया।

मनोरमा देवी ने चौंककर देखा, “यह क्या है?”

राधिका ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी, यह वही कागजात हैं, जिनका ताना मुझे पिछले पांच सालों से हर तीसरे दिन सुनना पड़ता है। इस फोल्डर में इस तीन मंजिला मकान के पुश्तैनी दस्तावेज हैं, उन दोनों दुकानों के पेपर हैं, और वो सारी फिक्स्ड डिपॉजिट्स हैं जो बाबूजी अपनी वसीयत में मेरे नाम कर गए थे। आज मैं पैसों की, जायदाद की और इस अहसान की बात को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना चाहती हूं।”

प्रतीक आगे बढ़े, “राधिका, यह क्या पागलपन है? बाबूजी ने यह सब तुम्हारी सेवा और तुम्हारी निष्ठा देखकर तुम्हें दिया था। तुम्हें यह सब करने की कोई जरूरत नहीं है।”

राधिका ने हाथ उठाकर प्रतीक को रोक दिया। उसकी नजरें केवल मनोरमा देवी पर टिकी थीं।

राधिका ने कहना जारी रखा, “बाबूजी जब अपनी अंतिम सांसें गिन रहे थे, तब उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था—’बहू, यह जायदाद मैं तुम्हें इसलिए नहीं दे रहा कि तुम अमीर बनो, बल्कि इसलिए दे रहा हूं कि मेरे जाने के बाद इस घर में तुम्हारी रीढ़ की हड्डी कभी झुकने न पाए। तुम इस घर की असली नींव हो।’ लेकिन मम्मी जी, मुझे यह दौलत नहीं चाहिए अगर इसकी कीमत मुझे अपनी आत्मा और अपने आत्मसम्मान को रोज गिरवी रखकर चुकानी पड़े।”

राधिका ने फोल्डर खोलकर कागजात आगे बढ़ाए, “मम्मी जी, इन सभी पेपर्स पर मेरे हस्ताक्षर की जहां जरूरत होगी, मैं खुशी-खुशी कर दूंगी। यह पूरी संपत्ति आप अपने नाम करवा लीजिए, या अपनी बेटी पारुल को दे दीजिए, या जिसे चाहे सौंप दीजिए। अगर इन कागजों को पाकर आपको लगता है कि कोई आपकी सेवा कर सकता है, आपका ख्याल रख सकता है और आपको सच्चा प्यार दे सकता है, तो यह सब आपका है। लेकिन मुझे… मुझे इस रोज-रोज की तानेबाजी, इस अविश्वास और इस घुटन भरे माहौल से हमेशा के लिए मुक्त कर दीजिए। मुझे आपके बेटे की सादगी और अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा है, हम एक कमरे के किराए के मकान में भी भूखे नहीं मरेंगे।”

कमरे में मानो समय ठहर गया था।

मनोरमा देवी ने उन कागजों को देखा। वे वही कागजात थे, जिनकी खातिर उन्होंने पिछले पांच साल से बहू के मन में कांटे बोए थे। उन्हें लगता था कि बहू इन संपत्तियों के बल पर उन पर राज करना चाहती है। पर आज, उसी बहू ने बिना किसी झिझक, बिना किसी लालच के, वह पूरी दौलत एक झटके में उनके कदमों में लाकर रख दी थी।

मनोरमा देवी के कानों में अपनी खुद की पुरानी यादें गूंजने लगीं। उन्हें याद आया कि जब वे ब्याह कर आई थीं, तो उनकी सास भी ठीक इसी तरह उन्हें हर बात पर मायके का ताना देती थीं। उन्हें याद आया कि कैसे एक बार जब उनसे चांदी का चम्मच खो गया था, तो उनकी सास ने पूरे मोहल्ले के सामने उन्हें चोर साबित कर दिया था। उस रात वे घंटों तक तकिए में मुंह छिपाकर रोई थीं और ईश्वर से प्रार्थना की थी कि काश कोई उन्हें समझे।

और आज? आज वे खुद अपनी सास का वही डरावना रूप बन चुकी थीं। जिस जुल्म से वे कभी नफरत करती थीं, आज वे खुद वही जुल्म अपनी बहू पर ढहा रही थीं।

मनोरमा देवी के हाथ कांपने लगे। उन्होंने मेज पर रखे उन कागजों को देखा और फिर सामने खड़ी राधिका को। राधिका के चेहरे पर न कोई क्रोध था, न कोई घमंड। वहां केवल एक गहरी, शांत गरिमा थी—एक ऐसी गरिमा जो किसी भी दौलत से कहीं बड़ी थी।

प्रतीक चुपचाप अपनी मां को देख रहे थे। उनकी आंखों में भी एक अनुत्तरित सवाल था।

अचानक मनोरमा देवी की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वे फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने आगे बढ़कर उन कागजों को समेटा और एक तरफ फेंक दिया। फिर उन्होंने दोनों हाथों से राधिका के हाथ पकड़ लिए।

“बहू… मुझे माफ कर दे,” मनोरमा देवी का गला रुंध गया था। आवाज कांप रही थी। “आज तूने मेरे सामने वो आईना रख दिया जिसे देखने से मैं वर्षों से भाग रही थी। मैं भूल गई थी कि जो दर्द मुझे मेरी सास ने दिया, मैं उसी दर्द को अपनी आदत बना बैठी थी। मुझे लगता था कि अगर मैं सख्त नहीं रहूंगी, तो शायद मेरा हक छिन जाएगा। मैंने हमेशा समझा कि तूने बाबूजी को अपनी मीठी बातों में फंसाकर सब हथिया लिया… पर आज मुझे समझ आया कि बाबूजी गलत नहीं थे। उन्होंने इस घर की कमान सबसे सही और मजबूत हाथों में सौंपी थी।”

राधिका ने अपनी सास के आंसुओं को देखा, तो उसका दिल भी पिघल गया। वह नीचे झुकी और अपनी सास के घुटनों के पास बैठ गई। उसने अपने आंचल से मनोरमा देवी के आंसू पोंछे।

“मम्मी जी, मुझे आपसे कोई दौलत या जायदाद नहीं चाहिए। मुझे बस आपका वो आशीर्वाद चाहिए जो एक मां अपनी बेटी को देती है। मुझे इस घर में केवल एक बहू नहीं, एक इंसान समझा जाए, बस इतनी सी चाहत है मेरी।”

मनोरमा देवी ने राधिका को उठाकर सीधे अपने गले से लगा लिया। वर्षों से जमी बर्फ उस एक आलिंगन में पिघलकर बह गई।

मनोरमा देवी ने प्रतीक की तरफ देखा और बोलीं, “बेटा, आज तेरी मां हार गई और इस घर की मर्यादा जीत गई। आज से यह घर, यह परिवार और हम सब सिर्फ और सिर्फ राधिका के हैं।” फिर उन्होंने राधिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “चल, अब यह तेल की शीशी उठा और मेरे पैरों में लगा दे… अब किसी डॉक्टर या पारुल की जरूरत नहीं है, मेरी दवा तो मेरे सामने बैठी है।”

राधिका की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उसने मुस्कुराते हुए सरसों के तेल की शीशी उठाई और अपनी सास के पैरों की मालिश करने बैठ गई। कमरे में खिली धूप अब पहले से कहीं अधिक गुनगुनी और सुकून भरी लग रही थी। वह घर, जो बारह सालों से तानों की तपिश में झुलस रहा था, आज पहली बार ममता और पश्चाताप की पावन फुहारों से महक उठा था।

क्या आपको लगता है कि समाज में अक्सर सास अपनी पुरानी तकलीफों का बदला अनजाने में बहू से लेने लगती है, और इस कड़वे चक्र को केवल प्यार और गरिमापूर्ण दृढ़ता से ही तोड़ा जा सकता है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : रमा शुक्ला

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