“शेखर बेटा…” गायत्री देवी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह कांपते कदमों से आगे बढ़ीं और शेखर के हाथ पकड़ने की कोशिश की, “हमें माफ कर दे बेटा! हमने तेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया। सोहन का कारोबार लुट गया, कुणाल कर्ज में डूब गया और बैंक वाले उस घर को नीलाम कर रहे हैं। तू बड़ा है, तू ही हमें इस तबाही से बचा सकता है। हमें अपने साथ रख ले बेटा…”
सोहन और कुणाल भी हाथ जोड़कर खड़े थे। सोहन ने रुंधे गले से कहा, “भैया, हमें उस दिन घमंड हो गया था। हमने आपको और भाभी को जो दुख दिया, भगवान हमें उसी की सजा दे रहा है। हमें माफ कर दीजिए।”
बैंगलोर की तेज रफ्तार जिंदगी में शेखर का मन आज बेहद भारी था। हाथ में पकड़े हुए उस सफेद लिफाफे ने उसकी बारह साल की मेहनत, निष्ठा और सपनों पर एक झटके में पानी फेर दिया था। जिस ऑटोमोबाइल डिजाइनिंग कंपनी को उसने दिन-रात एक करके खड़ा करने में योगदान दिया था, मंदी की मार पड़ते ही उसी कंपनी ने सैकड़ों कर्मचारियों के साथ शेखर को भी पिंक स्लिप थमा दी थी। शाम को जब वह फ्लैट का दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल हुआ, तो उसके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं।
उसकी पत्नी अंजलि ने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए उसके कांपते हाथों को थामा। शेखर टूटकर सोफे पर बैठ गया और बोला, “अंजलि, सब खत्म हो गया। आज कंपनी ने छंटनी कर दी। इस उम्र में और इस दौर में अब इतनी जल्दी दूसरी नौकरी मिलना नामुमकिन सा लग रहा है। बच्चों की पढ़ाई, फ्लैट की ईएमआई, राशन… हम कैसे संभालेंगे सब?”
अंजलि ने एक गहरी सांस ली, लेकिन अपने चेहरे पर घबराहट की एक शिकन भी नहीं आने दी। उसने शेखर के कंधे पर हाथ रखा और बेहद संजीदगी से कहा, “सुनिए, जब तक सांस है, तब तक आस है। रोने से तो रास्ता नहीं निकलेगा। भगवान की दया से हमने हमेशा संभलकर खर्च किया है। तीन महीने की जमा पूंजी हमारे पास है, बच्चों की इस सत्र की फीस भी जा चुकी है। हम घर के खर्च आधे कर देंगे। आप हिम्मत मत हारिए, सुकून से दूसरी कंपनियों में आवेदन कीजिए। कोई न कोई दरवाजा जरूर खुलेगा।”
शेखर ने अंजलि की बात मानकर पूरी शिद्दत से नई नौकरियों के लिए भागदौड़ शुरू कर दी। हर सुबह वह उम्मीद की एक नई किरण के साथ निकलता, लेकिन शाम को हाथ सिर्फ निराशा लगती। इंटरव्यू के कई दौर होते, मगर बात सैलरी पैकेज पर आकर अटक जाती या फिर कंपनी कम उम्र के फ्रेशर्स को तरजीह देती। देखते-देखते चार महीने बीत गए। बैंक बैलेंस तेजी से घट रहा था और मकान मालिक ने भी अगले महीने से किराया बढ़ाने का नोटिस थमा दिया था।
शेखर रातों को जागकर छत को घूरता रहता। उसके बाल सफेद होने लगे थे और चेहरे की चमक कहीं खो गई थी। एक शाम जब वह बालकनी में गुमसुम खड़ा था, तब अंजलि चाय के दो कप लेकर आई। उसने कहा, “एक बात कहूँ? हम इस अजनबी महानगर में पाई-पाई के मोहताज होकर घुट-घुट कर क्यों जी रहे हैं? अपने शहर ग्वालियर चलते हैं। वहाँ हमारा अपना मकान है, जमीन है। आपने इतने साल अपने दोनों छोटे भाइयों, सोहन और कुणाल को अपने बच्चों की तरह पाला है। दोनों की शादियाँ करवाईं, माँ की हर जरूरत पूरी की। जब भी फोन आता है, माँ कहती हैं कि बेटा यहाँ आ जाओ, सब मिलकर रहेंगे। वहाँ रहने का किराया तो नहीं लगेगा। आप वहीं रहकर कोई छोटा-मोटा काम या कंसल्टेंसी शुरू कर लेना। जब अपने साथ होते हैं, तो बड़े से बड़ा पहाड़ भी छोटा लगने लगता है।”
शेखर की आँखों में चमक आ गई। बात तो सच थी। जब पिता का साया उठा था, तब शेखर महज बाईस साल का था। उसने अपनी जवानी अपने परिवार के नाम कर दी थी। अपनी हर ख्वाहिश मारकर उसने ग्वालियर के मुख्य इलाके में एक बड़ा दोमंजिला मकान बनवाया था। माँ गायत्री देवी के नाम पर सारा मान-सम्मान रखा और अपनी मोटी तनख्वाह का आधा हिस्सा हर महीने बिना नागा घर भेजता रहा ताकि छोटे भाइयों को किसी चीज की कमी न हो। सोहन ने कपड़े का शोरूम खोला तो पूंजी शेखर ने दी, कुणाल को सरकारी नौकरी की तैयारी और बाद में वकालत की प्रैक्टिस जमाने के लिए भी शेखर ने ही सहारा दिया था।
शेखर ने उसी रात माँ को फोन लगाया। गला रुंधा हुआ था, लेकिन उसने दिल पर पत्थर रखकर सब सच कह दिया, “माँ, मेरी नौकरी चली गई है। चार महीने से बिना काम के हूँ। बैंगलोर का खर्च अब मेरी हैसियत से बाहर हो गया है। मैं अपनी पत्नी और दोनों बच्चों, आरव और मिष्टी को लेकर हमेशा के लिए ग्वालियर आ रहा हूँ। हम अपने घर में ही रहेंगे।”
फोन के उस पार कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। फिर माँ की थोड़ी हिचकिचाती हुई आवाज आई, “हाँ… बेटा… आ जाओ, तुम्हारा ही तो घर है। पर… अचानक यह सब…” शेखर उस सन्नाटे के पीछे छिपे भाव को समझ नहीं पाया। उसे लगा कि शायद माँ उसके इस अचानक आए संकट से दुखी हो गई हैं।
तय यह हुआ कि अंजलि, आरव और मिष्टी को ट्रेन से पहले रवाना कर दिया जाए ताकि बच्चों को ज्यादा परेशानी न हो। शेखर ने घर का सारा जरूरी सामान, कुछ फर्नीचर और बक्से एक मिनी ट्रक में लोड करवाए और खुद ड्राइवर के साथ सड़क के रास्ते निकल पड़ा। सफर लंबा था, रास्ते में ट्रक का टायर पंचर हुआ और इंजन में खराबी आ गई, जिसके कारण शेखर को ग्वालियर पहुँचने में पूरे तीन दिन लग गए। इन तीन दिनों में उसका फोन भी नेटवर्क और बैटरी की वजह से बंद रहा।
तीसरे दिन की दोपहर जब ट्रक उस दोमंजिला आलीशान मकान के सामने रुका, तो शेखर ने राहत की सांस ली। गेट पर नेमप्लेट लगी थी—’मातृ छाया’। यह नाम शेखर ने खुद बड़े फख्र से लिखवाया था। घर की चौखट देखकर उसके थके हुए जिस्म में एक नई जान आ गई। उसने सोचा कि अंदर जाते ही अंजलि चाय बनाएगी, माँ उसके सिर पर हाथ फेरेंगी और दोनों भाई उसका सामान उतारने में मदद करेंगे।
लेकिन जैसे ही उसने मुख्य दरवाजे से अंदर कदम रखा, घर का माहौल किसी वीराने जैसा ठंडा और बेगाना लगा। बैठक में सोहन और कुणाल सोफे पर बैठे मोबाइल चला रहे थे। शेखर को देखकर दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनचाहा मेहमान आ धमका हो।
“अरे भैया, आप आ गए?” सोहन ने औपचारिकता से उठते हुए कहा। उसकी आवाज में अपने बड़े भाई के लिए वह गर्मजोशी नहीं थी जो हमेशा हुआ करती थी।
“हाँ सोहन, रास्ते में गाड़ी खराब हो गई थी। अंजलि और बच्चे कहाँ हैं? दिखाई नहीं दे रहे?” शेखर ने इधर-उधर देखते हुए पूछा।
कुणाल ने नजरें चुराते हुए कहा, “भाभी… वो… पीछे वाले हिस्से में हैं।”
शेखर के कदम तेजी से पीछे के आंगन की तरफ बढ़े। पहली मंजिल पर चार बड़े बेडरूम थे, जिनमें एसी लगे हुए थे। शेखर को लगा था कि उसके परिवार को ऊपर का कोई कमरा दिया गया होगा। लेकिन जब वह आंगन पार करके सीढ़ियों के नीचे बने पुराने अंधेरे स्टोर रूम के पास पहुँचा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उस सीलन भरे, मकड़ी के जालों से घिरे छोटे से स्टोर रूम में, जहाँ कबाड़, टूटे पाइप और पुरानी रजाईयां रखी जाती थीं, जमीन पर एक फटी हुई दरी बिछी थी। कोने में आरव और मिष्टी पसीने से तर-बतर होकर सो रहे थे, क्योंकि कमरे में कोई खिड़की नहीं थी और केवल एक पुराना टेबल फैन घरघरा रहा था। अंजलि एक टूटी हुई बाल्टी के पास बैठकर आरव के माथे पर गीला कपड़ा रख रही थी। कमरे में इतनी उमस थी कि सांस लेना भी दूभर था।
“अंजलि!” शेखर की चीख गले में ही घुट गई।
अंजलि ने सिर उठाकर देखा। उसकी आँखें रो-रोकर सूज चुकी थीं। अपने पति को सामने देखकर वह फफक पड़ी, लेकिन बच्चों की नींद न टूटे इसलिए उसने अपने होंठ भींच लिए।
“यह सब क्या है अंजलि? तुम यहाँ इस कबाड़खाने में क्या कर रही हो? ऊपर के कमरे खाली नहीं थे क्या?” शेखर का शरीर गुस्से और सदमे से कांपने लगा।
अंजलि ने अपने आँसू पोंछते हुए धीमी आवाज में कहा, “ऊपर के कमरों में माँ जी ने कहा कि सोहन और कुणाल के बच्चे पढ़ते हैं, उन्हें डिस्टर्बेंस होगा। गेस्ट रूम में कुणाल के क्लाइंट्स आते हैं। माँ जी ने कहा कि जब तक तुम्हारा कोई पक्का ठिकाना नहीं बन जाता, तब तक तुम लोग यहीं एडजस्ट कर लो। मैंने कुछ नहीं कहा शेखर… मैं तो बस आपके आने का इंतजार कर रही थी।”
शेखर उल्टे पैरों बैठक की तरफ भागा। उसका खून खौल रहा था। बैठक में माँ गायत्री देवी भी आकर बैठ चुकी थीं। शेखर ने सीधे माँ की आँखों में देखा और पूछा, “माँ! यह क्या तमाशा है? जिस घर को बनवाने के लिए मैंने अपनी जवानी के बारह साल झोंक दिए, जिस घर की एक-एक ईंट मेरी गाढ़ी कमाई से लगी है, आज उसी घर में मेरी पत्नी और मासूम बच्चों को जानवरों की तरह स्टोर रूम में फेंक दिया गया? क्या इसीलिए मैंने तुम सबको अपना समझा था?”
गायत्री देवी के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था। उल्टे उन्होंने अपनी त्योरियां चढ़ा लीं और कड़े स्वर में बोलीं, “आते ही महाभारत मत शुरू करो शेखर! तब तुम्हारी नौकरी थी, तुम कमाते थे तो घर में पैसा देते थे। कोई एहसान नहीं किया, बड़े बेटे का फर्ज निभाया था। अब तुम्हारी नौकरी छूट गई है, तुम चार जनों का बोझ लेकर आ गए हो। सोहन और कुणाल का अपना परिवार है, उनके अपने खर्चे हैं। वे तुम्हारे बच्चों का खर्च क्यों उठाएँ? हमने छत दी है रहने को, यही बहुत है। जब कमाने लगो, तो अपने लिए अलग मकान देख लेना।”
सोहन ने भी माँ की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “हाँ भैया, दुनिया प्रैक्टिकल होकर चलती है। जज्बातों से पेट नहीं भरता। अब आप बेरोजगार हैं, तो आपको थोड़ा तालमेल बिठाकर ही चलना पड़ेगा।”
कुणाल, जिसे शेखर ने अपनी जेब काटकर वकालत की भारी-भरकम फीस भरकर पढ़ाया था, उसने तो हद ही कर दी। उसने ठंडे लहजे में कहा, “कानूनी तौर पर यह मकान माँ के नाम पर रजिस्टर्ड है भैया। आप यहाँ मालिकाना हक नहीं जता सकते। बेहतर होगा कि आप कोई छोटा-मोटा काम ढूंढें और अपना गुजारा करें।”
शेखर अवाक रह गया। जिन भाइयों की उंगली पकड़कर उसने उन्हें चलना सिखाया था, आज वे उसे कानून और औकात का पाठ पढ़ा रहे थे। जिस माँ को उसने भगवान का दर्जा दिया था, उसके लिए शेखर का वजूद सिर्फ तब तक था जब तक उसकी जेब से हर महीने पैसे निकलते थे। आज जब उसकी जेब खाली हुई, तो उसका दर्जा एक बेगाने से भी बदतर हो गया था। शेखर की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन वे आँसू लाचारी के नहीं, बल्कि आत्मग्लानि और आत्मसम्मान के थे।
वह वापस स्टोर रूम में गया। उसने बच्चों को जगाया।
अंजलि ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ? क्या बात हुई?”
शेखर ने अंजलि के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और स्थिर आवाज में कहा, “अंजलि, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं रिश्तों के जिस पेड़ को अपने खून-पसीने से सींच रहा था, उसकी जड़ें सिर्फ पैसे की खाद पर टिकी थीं। यह मेरा घर नहीं है। जिस चौखट पर मेरी पत्नी का सम्मान नहीं, मेरे बच्चों के लिए सांस लेने भर की जगह नहीं, वह चौखट चाहे सोने की भी हो, मेरे किसी काम की नहीं। हम यहाँ एक पल भी नहीं रुकेंगे।”
“लेकिन हम जाएँगे कहाँ? हमारे पास तो कुछ भी नहीं बचा,” अंजलि ने सहमते हुए कहा।
शेखर की आँखों में एक नई चमक, एक दृढ़ संकल्प तैर गया। उसने कहा, “मेरे पास तुम हो, मेरे बच्चे हैं और मेरे दो हाथ हैं। हमने मेहनत से सब कुछ बनाया था, हम फिर बना लेंगे। पर इस अपमान के घूंट को पीकर मैं अपनी रूह को नहीं मारूँगा।”
शेखर ने बाहर खड़े ट्रक ड्राइवर से कहा कि वह सामान नीचे न उतारे। उसने स्टोर रूम से अंजलि और बच्चों के बैग उठाए और बिना पीछे मुड़े घर के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया। माँ और भाइयों को लगा था कि शेखर गिड़गिड़ाएगा, माफी माँगेगा और स्टोर रूम में ही पड़ा रहेगा। लेकिन जब उन्होंने शेखर को दृढ़ कदमों से बाहर जाते देखा, तो वे हक्के-बक्के रह गए।
“शेखर, एक बार बाहर कदम रख दिया तो वापस मत आना!” सोहन ने पीछे से अहंकार में चिल्लाकर कहा।
शेखर रुका, मुड़ा और मुस्कुरा दिया। उसने कहा, “सोहन, इस दहलीज पर तो मैं तब भी वापस नहीं आऊँगा जब यह पूरी हवेली मुझे दान में दी जा रही हो। तुम सब इस मकान को मुबारक समझो, मैं अपनी दुनिया खुद बनाऊँगा।”
ग्वालियर के बाहरी इलाके में शेखर का एक पुराना कॉलेज का दोस्त रहता था, मयंक। मयंक को जब सारी बात पता चली, तो उसने बिना एक पल गंवाए शेखर को अपने पुश्तैनी मकान का निचला हिस्सा रहने के लिए दे दिया। मयंक ने कहा, “शेखर, तू मेरा दोस्त बाद में है, पहले एक खुद्दार इंसान है। जब तक तू अपने पैरों पर दोबारा खड़ा नहीं होता, यह घर तेरा है। कोई किराया नहीं, बस अपनी लड़ाई लड़।”
शेखर और अंजलि ने उस छोटे से दो कमरों के घर को अपनी मेहनत से संवारा। शेखर जानता था कि अब कॉर्पोरेट नौकरी के भरोसे बैठने का वक्त नहीं है। उसके पास इंजीनियरिंग का हुनर था और अंजलि के पास बेहतरीन स्वाद।
अंजलि ने कहा, “शेखर, हमारे पास कुछ हजार रुपये बचे हैं। क्यों न हम अपना कोई काम शुरू करें? मुझे खाना बनाने का शौक है और इस इंडस्ट्रियल एरिया में सैकड़ों लड़के-लड़कियां रहते हैं जिन्हें घर का सात्विक खाना नहीं मिलता।”
शेखर को विचार भा गया। उसने कहा, “और मैं अपनी इंजीनियरिंग की सूझबूझ से इस काम की लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन संभालूँगा।”
दोनों ने मिलकर ‘घर का स्वाद’ नाम से एक छोटा सा टिफिन सर्विस और क्लाउड किचन शुरू किया। शुरुआत बेहद कठिन थी। सुबह चार बजे उठकर शेखर खुद सब्जी मंडी जाता, अंजलि मसालों की तैयारी करती। आरव और मिष्टी भी अपनी पढ़ाई पूरी करके पैकेजिंग में माँ का हाथ बंटाते। शेखर अपनी पुरानी बाइक पर टिफिन लादकर खुद ऑफिसों और हॉस्टलों में डिलीवरी देने जाता।
शुरुआत में सिर्फ पांच टिफिन का ऑर्डर मिला था। लेकिन अंजलि के हाथों का जादुई स्वाद, शुद्धता और शेखर का समय की पाबंदी का अनुशासन रंग लाने लगा। जो एक बार उनका टिफिन खाता, वह दूसरा टिफिन किसी और का नहीं ले सकता था। शेखर ने अपनी तकनीकी समझ का इस्तेमाल करके एक साधारण सी वेबसाइट और व्हाट्सएप आधारित ऑर्डरिंग सिस्टम बना दिया।
तीन महीने के भीतर पांच टिफिन पचास में बदले, और छह महीने होते-होते यह संख्या तीन सौ पार कर गई। शेखर ने दो डिलीवरी बॉय रखे और पास की एक बड़ी आईटी फर्म के कैफेटेरिया का कॉन्ट्रैक्ट भी अपने नाम कर लिया। उसने अपनी ऑटोमोबाइल समझ का उपयोग करके खाने की डिलीवरी के लिए कस्टमाइज्ड इंसुलेटेड बॉक्स तैयार करवाए, जिससे खाना तीन घंटे तक चूल्हे से उतरा हुआ सा गरम रहता था। इस इनोवेशन की शहर के अखबारों में भी चर्चा हुई।
एक साल के भीतर, शेखर और अंजलि का छोटा सा क्लाउड किचन ग्वालियर की एक जानी-मानी कैटरिंग और फूड डिलीवरी कंपनी में तब्दील हो गया। अब शेखर के पास पंद्रह कर्मचारियों की टीम थी। उसने मयंक का सारा कर्ज ससम्मान ब्याज समेत लौटाया और शहर के एक पॉश इलाके में अपने लिए एक खूबसूरत 3-बीएचके फ्लैट बुक करवा लिया। आरव और मिष्टी का दाखिला शहर के सबसे बेहतरीन स्कूल में हो चुका था।
इधर, ‘मातृ छाया’ में वक्त ने ऐसा पासा पलटा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। सोहन का कपड़े का शोरूम भारी घाटे में चला गया क्योंकि उसने गलत सट्टेबाजी में पैसा लगा दिया था। कुणाल की वकालत चली नहीं और वह एक फर्जी जमीन के सौदे में उलझकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने लगा। जिस आलीशान मकान पर वे घमंड कर रहे थे, उस पर बैंक का भारी-भरकम कर्ज चढ़ चुका था।
घर में हर रोज कलेश होने लगे। सोहन की पत्नी और कुणाल की पत्नी अब माँ गायत्री देवी को बात-बात पर ताने मारने लगीं। जो माँ कभी हुकुम चलाती थी, अब वही माँ रसोई के एक कोने में बैठकर अपनी किस्मत पर रोती थी। जब बैंक ने मकान कुर्क करने का लीगल नोटिस चस्पा कर दिया, तब जाकर भाइयों की आँखें खुलीं।
एक रविवार की सुबह, शेखर अपने नए फ्लैट की बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहा था। अंजलि बच्चों को नाश्ता करा रही थी। तभी डोरबेल बजी।
शेखर ने दरवाजा खोला, तो सामने का नजारा देखकर स्तब्ध रह गया। दरवाजे पर माँ गायत्री देवी, सोहन और कुणाल सिर झुकाए खड़े थे। तीनों के चेहरे बुझे हुए थे, कपड़े मैले थे और आँखों में गहरी शर्मिंदगी थी।
“शेखर बेटा…” गायत्री देवी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह कांपते कदमों से आगे बढ़ीं और शेखर के हाथ पकड़ने की कोशिश की, “हमें माफ कर दे बेटा! हमने तेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया। सोहन का कारोबार लुट गया, कुणाल कर्ज में डूब गया और बैंक वाले उस घर को नीलाम कर रहे हैं। तू बड़ा है, तू ही हमें इस तबाही से बचा सकता है। हमें अपने साथ रख ले बेटा…”
सोहन और कुणाल भी हाथ जोड़कर खड़े थे। सोहन ने रुंधे गले से कहा, “भैया, हमें उस दिन घमंड हो गया था। हमने आपको और भाभी को जो दुख दिया, भगवान हमें उसी की सजा दे रहा है। हमें माफ कर दीजिए।”
शेखर ने शांत भाव से अपनी माँ और दोनों भाइयों को देखा। अंजलि भी पीछे आकर खड़ी हो गई थी। शेखर के मन में न तो कोई गुस्सा था, न प्रतिशोध की भावना, और न ही कोई अहंकार।
शेखर ने धीमे से माँ के हाथों को थामा और बेहद गरिमापूर्ण लहजे में कहा, “माँ, आप अंदर आइए। आप मेरी माँ हैं और हमेशा रहेंगी। आप जब तक चाहें, इस घर में रह सकती हैं। आपकी हर सेवा होगी, हर दवाई का ध्यान रखा जाएगा।”
फिर वह सोहन और कुणाल की तरफ मुड़ा। उसकी आवाज में एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी, “और तुम दोनों सुनो। उस दिन तुमने मुझे एक बहुत बड़ा सबक सिखाया था कि रिश्ते पैसों से नहीं, स्वाभिमान और आपसी सम्मान से चलते हैं। उस दिन अगर तुमने मुझे स्टोर रूम में न धकेला होता, तो शायद मैं आज भी किसी की नौकरी की गुलामी कर रहा होता। तुम्हारे उस दुर्व्यवहार ने मेरे भीतर सोए हुए उस इंसान को जगाया जो अपनी तकदीर खुद लिखना जानता है।”
शेखर ने अपनी जेब से एक चेक निकाला और कुणाल के हाथ में रख दिया।
“यह बैंक के कर्ज की रकम का चेक है। इसे ले जाओ और ‘मातृ छाया’ को नीलाम होने से बचा लो। मैंने वह मकान अपने पसीने से बनाया था, मैं उसकी ईंटों को बिखरते नहीं देख सकता। यह मेरा तुम दोनों पर आखिरी उपकार है, बड़े भाई के तौर पर। लेकिन याद रखना, इस मकान की चाबी अब तुम्हारी है, और मेरी जिंदगी का रास्ता मेरा है। मैं तुम्हें पैसे से मदद कर सकता हूँ, लेकिन अपने दिल में वह पुरानी जगह अब कभी नहीं दे पाऊँगा। क्योंकि जहाँ स्वाभिमान की बलि चढ़ जाए, वहाँ रिश्ते कभी दोबारा सांस नहीं ले सकते।”
सोहन और कुणाल शर्म से गड़ गए। वे बिना कुछ कहे, सिर झुकाए चेक लेकर चले गए। माँ गायत्री देवी वहीं सोफे पर बैठकर रो रही थीं, लेकिन इस बार उनके आँसू प्रायश्चित के थे।
शेखर ने अंजलि की तरफ देखा। अंजलि की आँखों में अपने पति के लिए असीम गर्व और प्यार था। जिंदगी ने उन्हें एक अंधेरे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत, धैर्य और एक-दूसरे के विश्वास के दम पर उस मोड़ को ही अपनी सफलता की सबसे बड़ी मंजिल बना दिया था।
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लेखिका : निधि गुप्ता