“अरे शारदा, ये क्या कर रही हो? छोड़ो, मैं ठीक हूं।” “आप बिल्कुल ठीक नहीं हैं,” शारदा जी ने मजबूती से उनका पैर थामते हुए बड़ी ममता से कहा। “जब ब्याह होकर इस दहलीज पर आई थी, तब से आज तक आपकी पेशानी की एक-एक शिकन को पहचानती हूं। कल जब से मयंक ने मेरी उम्र और रूप की बात छेड़ी है, और आज जब से आप सैर से लौटे हैं, आपके चेहरे पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है। क्या बात है? अपने मन की बात मुझसे भी छुपाएंगे क्या?”
जब मयंक अपने कमरे से लैपटॉप बंद करके बाहर हॉल में आया। सामने सोफे पर बैठी उसकी मां शारदा जी चश्मा नाक पर टिकाए पुरानी रजाई के फटे हुए कोने पर महीन धागे से तुरपाई कर रही थीं। उनके चांदी जैसे सफेद बाल माथे पर बिखरे थे और आंखों के नीचे उभरी गहरी लकीरें उनके बीते संघर्षों की गवाही दे रही थीं। मयंक कुछ पल चुपचाप अपनी मां को निहारता रहा, फिर चेहरे पर एक नटखट मुस्कान सजाते हुए उनके पास जा बैठा और हाथ से सुई-धागा छीनकर एक तरफ रख दिया।
“मां, जरा सच-सच बताओ, तुम्हारी और पापा की उम्र में असली अंतर कितना है? पापा तो आज भी रिटायर्ड बैंक मैनेजर कम और किसी कॉलेज के लेक्चरर ज्यादा लगते हैं, और तुम देखो… अभी से किसी पुराने जमाने की दादी मां जैसी दिखने लगी हो। चलो उठो आज, शाम को मैं तुम्हें शहर के सबसे बेहतरीन स्पा और सैलून ले चलता हूं। तुम्हारे बालों में वो सुंदर भूरा रंग करवाएंगे, थोड़ा फेशियल वगैरह होगा, फिर देखना तुम बिल्कुल वैसी लगोगी जैसी तब लगती थीं जब मुझे पहली बार बोर्डिंग स्कूल छोड़ने शिमला गई थीं। याद है, वहां मेरे दोस्त तुम्हें मेरी बड़ी बहन समझ बैठे थे और मुझे चिढ़ाते थे? मुझे तुमसे उस दिन कितनी जलन हुई थी!”
मयंक की इस मासूम छेड़खानी पर कोने में अखबार पढ़ रहे उसके पिता हरिशंकर जी ने चश्मे के ऊपर से देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की, पर बेहद भावुक मुस्कुराहट तैर गई। उन्होंने अखबार को मोड़कर मेज पर रखा और गंभीर मगर बेहद आत्मीय आवाज में बोले, “मयंक, तूने अपनी मां का वो रूप तो बस धुंधला सा देखा है बेटा, जो असली सौंदर्य था वो तो सिर्फ मेरी आंखों ने देखा है। जब यह ब्याह कर इस घर में आई थी, तो ऐसा लगता था मानो साक्षात कोई अप्सरा आंगन में उतर आई हो। हम दोनों की उम्र में महज तीन-चार साल का ही फर्क है, पर इस घर की चौखट को संभाले रखने में, मेरी मामूली तन्ख्वाह में पूरा संसार बसाने में और तेरी हर जिद पूरी करने में इसने अपना रूप, अपनी सेहत और अपनी जवानी सब होम कर दी। सच कहूं शारदा, मेरी वजह से तूने जिंदगी में बड़े समझौते किए हैं, बड़ी तंगहाली और दुख देखे हैं। आज अपने जवान बेटे के सामने मैं हाथ जोड़कर तुझसे अपने हर उस अभाव और गलती के लिए माफी मांगता हूं।”
शारदा जी का हाथ ठिठक गया। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और अचकचाकर पति की ओर देखा। उनकी पलकों के पोर भीग गए थे, पर चेहरे पर संकोच था। “अरे, कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं आप दोनों आज! भला भरे-पूरे परिवार में, इस उम्र में कोई अपनी गृहस्थी के दिनों को दुख कहता है क्या? घर-परिवार संभालना कोई कुर्बानी नहीं, मेरा अपना संसार था ये।”
मयंक ठहाका मारकर हंस पड़ा और पिता के कंधे पर हाथ रखकर बोला, “देखा पापा! आज आपको मां पर जरूरत से ज्यादा प्यार उमड़ रहा है, और सच कहूं तो मुझे भी मां की बड़ी कद्र होती है। खास तौर पर जब से मेरी शादी हुई है और अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियां समझ आने लगी हैं, मुझे मां की हर एक बात पल-पल याद आती है।”
पिता-पुत्र की इस हंसी-मजाक की आवाज रसोई तक पहुंच चुकी थी। मयंक की पत्नी नंदिनी हाथ में चाय की ट्रे लिए मुस्कुराते हुए कमरे में दाखिल हुई। उसने मेज पर चाय के कप सजाते हुए बनावटी नाराजगी से अपनी भौंहें मटकाईं, “अच्छा जी! तो जनाब को शादी के बाद मेरी वजह से मां की याद आती है? मतलब मैं इतना सताती हूं आपको? फिर तो बाबूजी को भी अपनी मां की बहुत याद आती होगी! लेकिन नहीं, देखिए हमारे बाबूजी तो आज भी अपनी धर्मपत्नी पर ही जान छिड़कते हैं और सबके सामने दिल की बात कह रहे हैं।”
मयंक ने तुरंत कान पकड़ लिए, “अरे बाबा, तुम कब आईं? सारी बातें सुन लीं क्या? अब जब पापा इस उम्र में आकर अपनी पुरानी गलतियों की माफी मांग सकते हैं, तो मैं तो वैसे भी तुम्हारा मुरीद हूं। पर एक बात बताओ मां, सच-सच बताना, बाबूजी तुमसे ज्यादा प्रेम करते हैं या तुम इनसे ज्यादा करती हो?”
शारदा जी ने चाय का घूंट भरा और उनके चेहरे पर एक असीम, शांत गरिमा छा गई। वे धीमी आवाज में बोलीं, “बेटा, जब रिश्ते चालीस साल पुराने हो जाएं ना, तो प्यार नापा-तौला नहीं जाता। वह सांसों की तरह सहज हो जाता है। पर हां, इतना मैं जानती हूं कि अगर कभी विधाता हमारे सामने कोई कठिन परीक्षा रख दे, जैसे सावित्री ने यमराज के आगे से सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे, तो मैं भी बिना एक पल सोचे इनके आगे अपनी ढाल बना दूंगी। इनके हिस्से की हर तकलीफ, हर बीमारी और यहां तक कि मौत भी आए, तो मैं हंसते-हंसते इनकी जगह खुद चली जाऊंगी ताकि इन्हें कभी कोई कष्ट न देखना पड़े।”
कमरे में एक पल के लिए गहरा सन्नाटा खिंच गया। बात इतनी भारी और मर्मस्पर्शी थी कि नंदिनी की आंखें भर आईं। उसने तुरंत माहौल को संभालते हुए कहा, “बस-बस, अब कोई भी ऐसी विदाई या दुख की बात नहीं करेगा। किसी को कहीं नहीं जाना है। हम सब मिलकर यूं ही इस घर को खुशियों से भरकर रखेंगे। चलिए, पकोड़े ठंडे हो रहे हैं, सब लोग जल्दी से नाश्ता खत्म कीजिए।”
मयंक प्लेट उठाकर नंदिनी के साथ रसोई की ओर बढ़ गया ताकि रात के खाने की तैयारी में मदद कर सके। ड्राइंग रूम में अब सिर्फ हरिशंकर जी और शारदा जी अकेले रह गए थे। जैसे ही शारदा जी चाय के खाली कप उठाने के लिए आगे बढ़ीं, हरिशंकर जी ने तेजी से आगे बढ़कर उनका कांपता हुआ हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आंखों में एक अनजाना भय और गहरी बेचैनी तैर रही थी। उन्होंने थरथराती आवाज में फुसफुसाते हुए कहा, “शारदा, अगर तू वाकई मुझसे इतना प्रेम करती है, तो आज के बाद कभी अपनी जुबान से यह मत कहना कि तू मुझसे पहले इस दुनिया से चली जाएगी। मैं यह बोझ कभी नहीं सह पाऊंगा।”
शारदा जी ने हैरानी से देखा, पर इससे पहले कि वे कुछ पूछतीं, हरिशंकर जी ने उनका हाथ छोड़ दिया और नजरें फेरकर बालकनी की ओर देखने लगे।
अगली सुबह, हमेशा की तरह हरिशंकर जी रोज गार्डन में मॉर्निंग वॉक के लिए निकले। सुबह की ठंडी हवा और ओस की बूंदों के बीच उनके पुराने साथी जगदीश जी और त्रिलोकी बाबू एक बेंच पर बैठे सुस्ता रहे थे। हरिशंकर जी भी उनके पास जाकर बैठ गए। बातों-बातों में शहर के हाल-चाल से बात पारिवारिक जीवन की ओर मुड़ गई।
त्रिलोकी बाबू ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “भाई हरिशंकर, सच मानो तो हम मर्दों का वजूद औरतों के बिना बिल्कुल बंजर जमीन जैसा है। मेरे साढ़ू भाई हैं ना, अमृतसर वाले, पिछले बरस उनकी पत्नी का अचानक हार्ट अटैक से इंतकाल हो गया। उस आदमी की हालत देखी नहीं जाती। भरा-पूरा घर है, बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं, पर वह जीता-जागता मुर्दा बन गया है। न समय पर खाना, न कोई दवा पूछने वाला, न मन का दर्द बांटने वाला। उम्र के इस पड़ाव पर अगर पत्नी का साथ छूट जाए, तो मर्द की जिंदगी नरक से भी बदतर हो जाती है। इसके उलट औरतें बड़ी मजबूत होती हैं भाई, पति चला भी जाए तो वे बच्चों में, नाती-पोतों में, पूजा-पाठ में खुद को समेटकर पूरी जिंदगी काट लेती हैं। पर मर्द… मर्द तो अंदर से बिल्कुल खोखला हो जाता है।”
त्रिलोकी बाबू की ये बातें हरिशंकर जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ गईं। उनके जेहन में पिछली शाम को कही गई शारदा की वह बात गूंज उठी—’मैं इनकी जगह खुद चली जाऊंगी।’ उन्हें लगा जैसे सांस लेना भारी हो रहा हो।
सच्चाई यही है कि समाज में औरतें अपना रोना रोकर, पड़ोसनों से बात करके या आंसुओं के जरिए अपने मन का बोझ हल्का कर लेती हैं, लेकिन पुरुष का स्वभाव ऐसा गढ़ा गया है कि वह अपने भीतर के डर और दर्द को सीने के तहखाने में बंद कर लेता है। हरिशंकर जी के चेहरे पर भी वही मौन उदासी और चिंता की गहरी लकीरें खिंच गईं। वे पूरे रास्ते चुपचाप घर लौटे। उनके दिल में यह खौफ बैठ गया था कि अगर शारदा को कुछ हो गया, तो वे इस दुनिया में अकेले एक दिन भी कैसे जी पाएंगे? घर आकर भी वे गुमसुम रहे। न नाश्ते में रुचि दिखाई, न किसी से ठीक से बात की।
शारदा जी एक समर्पित पत्नी थीं। चालीस वर्षों के साथ ने उन्हें अपने पति के हर मौन को पढ़ना सिखा दिया था। उन्होंने देख लिया था कि कल शाम से ही हरिशंकर जी के भीतर कोई गहरा तूफान चल रहा है।
दोपहर को जब मयंक अपने ऑफिस चला गया और नंदिनी अपनी ऑनलाइन क्लास में व्यस्त थी, तब शारदा जी एक कटोरी में गुनगुना सरसों का तेल लेकर ड्राइंग रूम में आईं, जहां हरिशंकर जी सोफे पर सिर टिकाए आंखें मूंदे पड़े थे। शारदा जी बिना कुछ बोले उनके पैरों के पास बैठ गईं और उनके थके हुए पैरों पर तेल की मालिश करने लगीं।
हरिशंकर जी ने चौंककर पैर पीछे खींचने चाहे, “अरे शारदा, ये क्या कर रही हो? छोड़ो, मैं ठीक हूं।”
“आप बिल्कुल ठीक नहीं हैं,” शारदा जी ने मजबूती से उनका पैर थामते हुए बड़ी ममता से कहा। “जब ब्याह होकर इस दहलीज पर आई थी, तब से आज तक आपकी पेशानी की एक-एक शिकन को पहचानती हूं। कल जब से मयंक ने मेरी उम्र और रूप की बात छेड़ी है, और आज जब से आप सैर से लौटे हैं, आपके चेहरे पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है। क्या बात है? अपने मन की बात मुझसे भी छुपाएंगे क्या?”
हरिशंकर जी की आंखें छलछला आईं। जिस डर को वे चौबीस घंटे से अपने भीतर दबाए हुए थे, वह बांध टूट गया। उन्होंने बच्चों की तरह शारदा के दोनों हाथ पकड़ लिए और रुंधे गले से बोले, “शारदा, आज सुबह पार्क में त्रिलोकी अपने साढ़ू की बात बता रहा था जिसकी पत्नी गुजर गई। मैं सोच रहा था कि हम पुरुष बाहर से कितने भी कठोर दिखें, भीतर से कितने लाचार होते हैं। तुमने कल कह तो दिया कि तुम मेरे बदले अपने प्राण दे दोगी, पर क्या तुमने कभी सोचा है कि अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरा क्या होगा? यह घर, ये दीवारें, ये रिश्ते सब तुम्हारे होने से हैं। अगर तुम पहले चली गईं, तो मैं तो जीते जी मर जाऊंगा। मुझे उस वीराने से डर लगता है शारदा। मैं ईश्वर से हर रोज यह मांगता हूं कि जब भी बुलावा आए, पहले मेरा आए। मैं तुम्हारे बिना एक पल भी इस दुनिया में सांस नहीं लेना चाहता।”
शारदा जी ने अपने पति की ओर देखा। एक पुरुष जो जीवन भर परिवार का संबल बना रहा, आज अपने प्रेम और अकेलेपन के डर के सामने कितना निश्छल और निर्दोष लग रहा था। उनकी आंखों से भी आंसू छलक पड़े, पर उनके होठों पर एक बहुत ही पावन और संबल देने वाली मुस्कान आ गई।
उन्होंने अपने आंचल से हरिशंकर जी की आंखें पोंछीं और अत्यंत कोमलता से बोलीं, “आप भी ना, कैसी बच्चों जैसी चिंताएं पाल लेते हैं! विधाता ने हमारे जीवन की डोर बांधी है, तो वही तय करेगा कि किसे कब जाना है। पर जो जीवन आज हमारे हाथों में है, उसे हम इस डर में क्यों घिसट-घिसट कर जिएं कि कल कौन पहले जाएगा? सच्चा प्रेम एक-दूसरे के बिना मरने की कामना में नहीं, बल्कि जब तक सांसें हैं, तब तक एक-दूसरे के जीवन को खुशियों से भरने में है।”
शारदा जी ने उनका हाथ अपने माथे पर रखते हुए आगे कहा, “अगर उम्र ढल रही है, तो क्या हुआ? हमने साथ मिलकर बसंत देखा है, तो अब साथ मिलकर पतझड़ भी देखेंगे। जब तक हम साथ हैं, हम एक-दूसरे की लाठी बनेंगे, डर की वजह नहीं। आप वादा कीजिए कि आज के बाद ऐसा नकारात्मक विचार अपने मन में कभी नहीं लाएंगे। हम दोनों अपनी इस ढलती उम्र को भी उसी खूबसूरती से जिएंगे जैसे हमने अपनी जवानी को जिया था।”
हरिशंकर जी ने अपनी पत्नी की आंखों में देखा। वहां कोई डर नहीं था, केवल अगाध विश्वास, समर्पण और जीवन के प्रति एक सकारात्मक ऊर्जा थी। उनके मन का सारा बोझ, सारा भय एक पल में धुल गया। उन्हें समझ आ गया कि सच्चा जीवन साथी केवल सुख-दुख का भागीदार ही नहीं होता, बल्कि मन के गहरे अंधकारों में उम्मीद की लौ जलाने वाला मार्गदर्शक भी होता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और शारदा के सिर पर अपना हाथ रख दिया।
शाम को जब मयंक और नंदिनी काम से लौटे, तो उन्होंने घर का नजारा ही बदला हुआ पाया। हरिशंकर जी और शारदा जी साथ बैठकर पुराने हिंदी गानों की धुन पर चाय की चुस्कियां ले रहे थे और दोनों के चेहरों पर एक नई चमक और सुकून था। मयंक ने मुस्कुराते हुए नंदिनी की ओर देखा, जैसे कह रहा हो—’असली प्रेम उम्र की बंदिशों से परे होता है।’ उस घर की फिजाओं में अब किसी विदाई का खौफ नहीं, बल्कि जीवन के हर एक पल को पूरे सम्मान और आत्मीयता से साथ जीने का अटूट संकल्प गूंज रहा था।
दोस्तों, उम्र के आखिरी पड़ाव पर आकर अक्सर इंसान अकेलेपन के डर से घिर जाता है, लेकिन सच्चा जीवन साथी वही है जो इस डर को अपनी सकारात्मक सोच और अगाध प्रेम से दूर कर दे। आपके विचार में क्या आज के दौर में भी पति-पत्नी के बीच ऐसा निस्वार्थ और गहरा समर्पण देखने को मिलता है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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लेखिका : नेहा पटेल