मयंक ने आगे बढ़कर अपनी माँ के आँसू पोंछे और बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “माँ, जब बाबूजी अस्पताल में थे, तो वे अक्सर मुझसे कहते थे कि ‘मयंक, तुम्हारी माँ को सीढ़ियाँ चढ़ने में घुटनों में बहुत दर्द होता है। जब मैं ठीक होकर घर लौटूंगा, तो हम नीचे बगीचे वाली ज़मीन पर उसके लिए एक सुंदर कमरा और मंदिर बनवाएंगे ताकि उसे कभी ऊपर न चढ़ना पड़े और न ही कभी अकेलापन लगे।’ बाबूजी तो हमें छोड़कर चले गए माँ, लेकिन उनका यह सपना हमारे सीने में जल रहा था।”
रिटायर्ड बैंक मैनेजर शिवप्रसाद जी और उनकी धर्मपत्नी यशोदा जी ने अपने खून-पसीने की एक-एक बूँद सींचकर इस परिवार को वटवृक्ष का रूप दिया था। घर में दो बेटे थे—बड़ा बेटा आलोक, जो शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर था, और छोटा बेटा मयंक, जो एक सॉफ्टवेयर फर्म में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहा था। आलोक की पत्नी वंदना और मयंक की पत्नी दीप्ति, दोनों ही पढ़ी-लिखी, सुलझी हुई और पूरे घर को एक सूत्र में पिरोकर चलने वाली बहुएँ थीं। घर के आँगन में सात साल के कबीर और पाँच साल की नन्हीं परी की खिलखिलाती हँसी हर सुबह नई रौनक भर देती थी।
यशोदा जी का स्वभाव नारियल की तरह ऊपर से शांत और अंदर से अत्यंत कोमल था। उन्होंने कभी खुद को ‘कठोर सास’ के साँचे में नहीं ढाला। वे हमेशा कहती थीं कि बेटियाँ पराए घर से आती हैं, उन्हें अपनापन देकर ही घर को स्वर्ग बनाया जा सकता है। घर में रसोई की कमान दोनों बहुएँ मिलकर संभालती थीं, साफ-सफाई और अन्य भारी कामों के लिए सहायिका लगी थी। यशोदा जी केवल निगरानी रखतीं और पूजा-पाठ, बच्चों की पढ़ाई तथा सामाजिक मेलजोल में समय बिताती थीं। उन्होंने कभी कोई ऐसा कटु वचन नहीं कहा जिससे घर के भीतर कोई दरार पड़ने की आशंका भी पैदा हो। जो भी उस घर को देखता, यही कहता कि आज के कलियुगी दौर में ऐसा संयुक्त परिवार किसी दैवीय वरदान से कम नहीं।
लेकिन समय का चक्र कभी एक समान गति से नहीं घूमता। नियति कब करवट बदल ले, यह कोई नहीं जानता।
सर्दियों के दिन थे। एक सुबह शिवप्रसाद जी को अचानक सीने में भारी दबाव और सांस लेने में तीव्र कठिनाई महसूस हुई। घर में हड़कंप मच गया। आलोक और मयंक ने बिना एक पल गँवाए अपने पिता को शहर के सबसे बड़े हृदय रोग अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया। डॉक्टरों की टीम ने तुरंत सघन चिकित्सा शुरू की।
अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी यशोदा जी का शरीर कांप रहा था। हाथ में पकड़ी रुद्राक्ष की माला बार-बार छूट रही थी। बढ़ती उम्र के इस पड़ाव पर जब जीवनसाथी की साँसें उखड़ती दिखती हैं, तो एक स्त्री के भीतर का पूरा अस्तित्व डोलने लगता है। यशोदा जी के भीतर एक अनजाना, गहरा खौफ धीरे-धीरे अपने पैर पसारने लगा था। वे अक्सर मोहल्ले की औरतों से, समाचार पत्रों में और टीवी पर ऐसी घटनाएँ सुनती-पढ़ती थीं जहाँ पिता या पति के जाते ही बहुओं और बेटों के तेवर बदल जाते थे। कैसे किसी माँ को एक कमरे में बंद कर दिया जाता था, कैसे किसी को वृद्धाश्रम के दरवाजे पर लावारिस छोड़ दिया जाता था।
यशोदा जी के मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह बैठ चुकी थी कि एक स्त्री का असली मान-सम्मान और उसका अस्तित्व सिर्फ उसके सुहाग के जीवित रहने तक ही महफूज़ होता है। पति चाहे कितना भी वृद्ध और अशक्त क्यों न हो, वह उस विशाल छत के मुख्य खंभे की तरह होता है जिसके रहते कोई उस पर आँख उठाने की जुर्रत नहीं करता। अगर वह खंभा ही टूट गया, तो इस घर में मेरा क्या मोल रह जाएगा? क्या ये बेटे और बहुएँ मुझे उसी आदर से रखेंगे? क्या मैं इनके लिए सिर्फ एक बोझ बनकर रह जाऊँगी?
दिन बीतते गए, पर शिवप्रसाद जी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। बेहतरीन दवाइयाँ, महँगे इंजेक्शन और डॉक्टरों की भरसक कोशिशें भी विधाता के लिखे को नहीं बदल सकीं। उस मनहूस शाम को मॉनिटर पर चलती सीधी रेखा ने घोषणा कर दी कि शिवप्रसाद जी अब इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुके हैं।
यशोदा जी के सिर पर जैसे आकाश भरभराकर गिर पड़ा। जब पति का पार्थिव शरीर घर लाया गया, तो वे चेतनाशून्य हो गईं। उनकी आँखों के आँसू सूख चुके थे और गला रुंध गया था। अंतिम संस्कार की सारी विधियाँ पूरी हुईं, लेकिन यशोदा जी के दिलो-दिमाग पर केवल एक ही सवाल किसी खंजर की तरह चुभ रहा था—”अब मेरा क्या होगा? जब इस घर का मालिक ही चला गया, तो मैं कहाँ जाऊँगी? अगर कुछ दिनों बाद आलोक और मयंक ने मुझे रखने से मना कर दिया, तो मेरा क्या वजूद रह जाएगा?”
रात के सन्नाटे में जब घर के बाकी लोग थके-हारे सो जाते, यशोदा जी अपनी छत की कड़ियों को घूरती रहतीं। उन्हें नींद की एक बूँद भी मयस्सर नहीं थी। दिन-प्रतिदिन नकारात्मक विचार उनके दिल में विष घोल रहे थे। रही-सही कसर तेरहवीं के दिनों में आने-जाने वाले रिश्तेदारों और मोहल्ले की तथाकथित शुभचिंतक औरतों ने पूरी कर दी।
एक दिन पड़ोस की एक बुज़ुर्ग महिला ने यशोदा जी का हाथ पकड़कर सहानुभूति जताते हुए कान में फुसफुसाया, “यशोदा, अब ज़माना बहुत खराब है। जब तक शिवप्रसाद जी थे, तब तक तुम्हारी हुकूमत थी। अब अपने गहने और बैंक के कागजात अपनी मुट्ठी में बांधकर रखना। आज के बेटे-बहू कब मुँह फेर लें, कोई नहीं कह सकता। फलाने के घर में देखा ना, पिता के जाते ही बेचारी माँ को सर्वेंट क्वार्टर में डाल दिया!”
इस तरह की ज़हरीली बातों ने यशोदा जी के मन के डर को एक विकराल रूप दे दिया। उन्हें हर आहट में षड्यंत्र नजर आने लगा। जब आलोक और मयंक किसी कमरे में धीमी आवाज में बात करते, तो यशोदा जी को लगता कि शायद वे उन्हें कहीं भेजने की योजना बना रहे हैं। जब बहुएँ उनके लिए सादा खाना लेकर आतीं, तो उन्हें लगता कि अब उनका तिरस्कार शुरू हो गया है। भय जब इंसान की आँखों पर पट्टी बाँध देता है, तो उसे उजाले में भी केवल परछाइयाँ दिखाई देने लगती हैं।
तेरहवीं का दिन आया। यशोदा जी के मायके से उनके बड़े भाई सोमनाथ जी और भतीजा गौरव शोक व्यक्त करने पहुँचे। अपने भाई को सामने देखते ही यशोदा जी के सब्र का बाँध टूट पड़ा। वे भाई के सीने से लगकर बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रो पड़ीं। उनके आँसुओं में सिर्फ पति के खोने का गम नहीं था, बल्कि भविष्य के उस अंधकार का खौफ भी था जो उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
रीति-रिवाज और देहरी छुड़वाने की परंपरा के अनुसार, विधवा बहन को कुछ दिनों के लिए पीहर ले जाना आवश्यक माना जाता था ताकि उसका मन थोड़ा बहल सके। बड़े बेटे आलोक ने हाथ जोड़कर मामा जी से कहा, “मामा जी, माँ बहुत टूट चुकी हैं। आप इन्हें कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाइए। शायद जगह बदलने से इनका दिल थोड़ा हल्का हो जाए।”
यशोदा जी भारी मन से अपने भाई और भतीजे के साथ कुरुक्षेत्र स्थित अपने मायके के लिए रवाना हो गईं।
मायके पहुँचकर भाभी, भतीजों और बहुओं ने पलकों पर बिठा लिया। सुबह से शाम तक यशोदा जी की पसंद का ध्यान रखा जाता। कोई भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ता, हर कोई उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की चेष्टा करता। धीरे-धीरे एक महीना बीत गया।
अब यशोदा जी का मन कुरुक्षेत्र में उचटने लगा था। उनकी आँखें हर पल दरवाजे पर टिकी रहतीं कि कब उनका बड़ा बेटा आलोक या छोटा बेटा मयंक गाड़ी लेकर उन्हें लेने आएगा। हफ्ते में दो-तीन बार फोन पर बात होती थी। दोनों बेटे बड़े ही आदर से पूछते, “माँ, आप कैसी हैं? दवा समय पर ले रही हैं ना?” बहुएँ भी बच्चों से बात करवातीं। लेकिन कोई भी यह नहीं कहता कि ‘माँ, हम आपको लेने आ रहे हैं।’
यशोदा जी के दिल में वह पुराना डर फिर से सिर उठाने लगा। “क्या वे सचमुच मुझे भूल गए? क्या वे जानबूझकर मुझे यहाँ छोड़ गए हैं ताकि अपनी नई जिंदगी अपनी मर्जी से जी सकें? फोन पर तो सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं, पर लेने कोई नहीं आ रहा!”
इस नई चिंता ने उन्हें फिर से बीमार कर दिया। उनका खाना-पीना छूट गया। जब बड़े भाई सोमनाथ जी ने बहन की यह गिरती हालत और बेचैनी देखी, तो उन्होंने स्थिति को समझा। उन्होंने उसी शहर में रहने वाले अपने छोटे भाई दीनानाथ को सूचित किया। छोटा भाई आया और अपनी दीदी को कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गया ताकि माहौल थोड़ा बदले। लेकिन यशोदा जी का मन अब कहीं नहीं लग रहा था। उनकी आत्मा तो अपने उसी ‘आनंद निवास’ में, अपने पोते-पोतियों की किलकारियों में अटकी हुई थी।
आख़िरकार, एक दोपहर यशोदा जी ने अपने दोनों भाइयों के सामने हाथ जोड़ दिए। उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े, “भैया, मुझे मेरे घर छोड़ आओ। मेरा मन यहाँ बिल्कुल नहीं लग रहा है। मुझे मेरे बच्चों की, मेरे नाती-पोतों की याद दिन-रात सता रही है। अगर वे मुझे किसी कोने में भी पड़ा रहने देंगे, तो भी मैं अपने पति की उस चौखट को नहीं छोड़ना चाहती। मुझे वहीं ले चलो।”
सोमनाथ जी ने अपनी बहन के सिर पर हाथ फेरा और एक हल्की, रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, “ठीक है बहना, जैसी तुम्हारी इच्छा। कल सुबह ही हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आते हैं।”
अगली सुबह कुरुक्षेत्र से कार चली। जैसे-जैसे कार चंडीगढ़ की सीमा में प्रवेश कर रही थी, यशोदा जी के दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। उनका गला सूख रहा था। वे सोच रही थीं कि पता नहीं घर में उनका कैसा स्वागत होगा, क्या बच्चे उन्हें देखकर खुश होंगे या फिर उनके चेहरे पर कोई तनाव आ जाएगा।
कार सेक्टर बाईस की उसी जानी-पहचानी सड़क पर मुड़ी और ‘आनंद निवास’ के मुख्य द्वार के सामने आकर रुक गई।
यशोदा जी ने खिड़की से बाहर देखा और ठगी सी रह गईं। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
सामने का दृश्य कुछ बदला-बदला सा था। मुख्य बंगले के सामने जो खाली पड़ी बगीचे की ज़मीन थी, जहाँ कभी घास और पुराने गमले रखे रहते थे, वहाँ एक नया, भव्य और हवादार निर्माण खड़ा था। उस नई इमारत की दीवारें ताज़ा पेंट से चमक रही थीं। पूरा घर इतना अलग दिख रहा था कि एक पल के लिए यशोदा जी का कलेजा मुँह को आ गया। उनके मन में बिजली की तरह एक भयानक विचार कौंधा—”हे भगवान! क्या मेरे जाते ही बेटों ने यह मकान किसी को बेच दिया? क्या उन्होंने ज़मीन का बँटवारा कर दिया? यह तो मेरा घर नहीं लग रहा!”
यशोदा जी का चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने कांपती नज़रों से अपने भाई सोमनाथ जी की ओर देखा। लेकिन भाई के चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि उनकी आँखों में एक गहरी चमक और होंठों पर एक आत्मीय मुस्कान खिली हुई थी।
“उतरो माँ…”
एक जानी-पहचानी, भरी हुई आवाज़ कानों में पड़ी। यशोदा जी की तंद्रा टूटी। कार का दरवाज़ा खुला। सामने बड़ा बेटा आलोक और छोटा बेटा मयंक दोनों हाथ जोड़े खड़े थे। उनके पीछे दोनों बहुएँ—वंदना और दीप्ति—आरती की थाली लिए मुस्कुराती हुई खड़ी थीं। कबीर और नन्हीं परी दौड़कर आए और “दादी! दादी!” कहते हुए अपनी नन्हीं बाहें उनके घुटनों के चारों तरफ लपेट दीं।
यशोदा जी अवाक होकर कार से नीचे उतरीं। उनके पैर कांप रहे थे। वे कुछ समझ नहीं पा रही थीं कि यह सब क्या हो रहा है।
आलोक ने बड़े ही अदब से अपनी माँ का हाथ अपने हाथों में थामा और उन्हें उस नए बने हिस्से की ओर ले गया।
“माँ, अंदर चलिए। देखिए, आपका नया ठिकाना।”
जैसे ही यशोदा जी ने उस नए कक्ष के भीतर कदम रखा, उनकी आँखें आश्चर्य और आंसुओं से भर गईं।
वह केवल एक कमरा नहीं था, बल्कि स्वर्ग का एक टुकड़ा था। बैठक के बगल में जो खाली ज़मीन थी, वहाँ दोनों बेटों ने मिलकर अपनी माँ के लिए एक बेहद विशाल, खुला, चारों तरफ से खिड़कियों वाला हवादार कमरा बनवाया था। उस कमरे के फर्श पर ऐसा मार्बल लगा था जिस पर पैर फिसलने का कोई डर न हो। कमरे के साथ ही एक भव्य, नक्काशीदार संगमरमर का निजी मंदिर स्थापित किया गया था, जहाँ शिवप्रसाद जी के पसंदीदा लड्डू गोपाल और शिवलिंग विराजित थे। धूप और अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू पूरे कक्ष को महका रही थी। कमरे में यशोदा जी की ज़रूरत की हर एक सुविधा—आरामदायक मेडिकल गद्दा, उनके घुटनों के दर्द को ध्यान में रखकर बनाया गया विशेष बाथरूम, उनकी पसंदीदा किताबों की अलमारी और गर्म पानी की व्यवस्था—सब कुछ मौजूद था।
लेकिन सबसे भावुक कर देने वाली बात कुछ और ही थी।
उस कमरे के दो बड़े दरवाज़े अंदर ही अंदर दोनों बेटों—आलोक और मयंक—के शयनकक्षों से सीधे जुड़ते थे!
मयंक ने आगे बढ़कर अपनी माँ के आँसू पोंछे और बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “माँ, जब बाबूजी अस्पताल में थे, तो वे अक्सर मुझसे कहते थे कि ‘मयंक, तुम्हारी माँ को सीढ़ियाँ चढ़ने में घुटनों में बहुत दर्द होता है। जब मैं ठीक होकर घर लौटूंगा, तो हम नीचे बगीचे वाली ज़मीन पर उसके लिए एक सुंदर कमरा और मंदिर बनवाएंगे ताकि उसे कभी ऊपर न चढ़ना पड़े और न ही कभी अकेलापन लगे।’ बाबूजी तो हमें छोड़कर चले गए माँ, लेकिन उनका यह सपना हमारे सीने में जल रहा था।”
आलोक की आवाज़ भी भर्रा आई, उसने कहा, “माँ, आप जब कुरुक्षेत्र गईं, तो हमने सोचा कि यही सही वक्त है। हमने रात-दिन एक करके, कारीगरों को दुगनी दिहाड़ी देकर ठीक एक महीने के भीतर यह कमरा और मंदिर तैयार करवाया ताकि जब आप लौटें, तो आपको बाबूजी की यह अंतिम इच्छा पूरी मिले। हमने इस कमरे के दरवाज़े अपने कमरों से इसलिए जोड़े हैं ताकि रात के किसी भी पहर अगर आपको एक घूँट पानी की भी ज़रूरत हो, या आपका मन घबराए, तो आपको आवाज़ न लगानी पड़े। आपकी एक आह पर आपके दोनों बेटे और बहुएँ आपके सिरहाने खड़े मिलेंगे।”
बड़ी बहू वंदना ने आगे बढ़कर यशोदा जी के पैर छुए और आरती की थाली मेज़ पर रखते हुए कहा, “माँ जी, आपने हमें अपनी बेटियों की तरह प्यार दिया है। जब बाबूजी चले गए, तो हमें लगा कि हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य आपकी आँखों में कभी सूनापन न आने देना है। आप पूरे एक महीने हमसे दूर रहीं, हमारा एक-एक दिन एक साल की तरह बीता है।”
छोटी बहू दीप्ति ने रुंधे गले से कहा, “माँ जी, अब आप इस घर की मालकिन हैं, हमारी रीढ़ हैं। आपके बिना यह घर केवल ईंट-पत्थरों का ढेर था।”
यशोदा जी जड़वत खड़ी रहीं। उनके पैरों तले ज़मीन नहीं थी, बल्कि ऐसा लग रहा था मानो वे बादलों पर खड़ी हों। उनकी आँखों से पश्चाताप, कृतज्ञता और असीम वात्सल्य के आँसू अविरल बहने लगे।
उन्हें अपने उन काले, डरावने विचारों पर, अपने उस संशय पर और अपनी उस कमज़ोर सोच पर इतनी गहरी शर्मिंदगी महसूस हुई कि उनका सिर अपने आप झुक गया। वे मन ही मन सोच रही थीं कि वे कितनी नासमझ थीं जो दुनिया की सुनी-सुनाई बातों में आकर, दूसरों के दिए तानों से डरकर, अपनी ही कोख से जन्मे बच्चों और अपने ही संस्कारों पर संदेह करने लगी थीं!
यशोदा जी लड़खड़ाते कदमों से कमरे के बीच में लगी शिवप्रसाद जी की बड़ी सी माला चढ़ी तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो गईं। तस्वीर में शिवप्रसाद जी का चेहरा वही चिर-परिचित, गंभीर और आत्मीय मुस्कान लिए हुए था।
यशोदा जी को लगा मानो उस शांत तस्वीर के भीतर से शिवप्रसाद जी की आवाज़ गूँज रही हो—”क्यों यशोदा? अपनी ही परवरिश और संस्कारों पर इतना अविश्वास? क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि जो पेड़ हमने नेकी और सच्चाई से सींचा है, उसकी छाँव कभी धूप नहीं बन सकती?”
यशोदा जी ने अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं। उन्होंने नम आँखों से, अपने हृदय की गहराइयों से स्वर्गीय पति की तस्वीर से अपनी उस अंधी शंका और गलत सोच के लिए बार-बार क्षमा माँगी।
जैसे ही वे मुड़ीं, दोनों बेटे, दोनों बहुएँ और दोनों मासूम बच्चे एक साथ आगे बढ़े और उन सबने मिलकर यशोदा जी को अपनी बाँहों के घेरे में ले लिया। नन्हीं परी ने यशोदा जी के आँसू अपनी नन्हीं उँगलियों से पोंछते हुए कहा, “दादी, अब आप हमें छोड़कर कहीं मत जाना।”
उस एक पल में उस कमरे के भीतर जो उजास फैली, वह दुनिया की किसी भी रोशनी से कहीं अधिक पवित्र और दिव्य थी। यशोदा जी के चेहरे पर आज एक अलौकिक तेज, एक असीम आत्मशांति और गर्व का नूर चमक रहा था। आज एक माँ की ममता जीत गई थी, एक परिवार के संस्कार जीत गए थे और संदेह का वह भयानक, काल्पनिक अंधेरा हमेशा-हमेशा के लिए भस्म हो चुका था।
सुनी-सुनाई बातों और दुनिया की कड़वाहट में आकर अपने ही खून पर, अपने ही परिवार पर शक करना इंसान की सबसे बड़ी भूल होती है। सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं; अगर दुनिया में स्वार्थ और बेरुखी है, तो उसी दुनिया में त्याग, सेवा और संस्कारों की अमर सुगंध भी जीवित है।
यशोदा जी ने एक बार फिर मुड़कर तस्वीर की ओर देखा—उस पवित्र फ्रेम के भीतर शिवप्रसाद जी की मुस्कुराहट अब पहले से कहीं अधिक गहरी, जीवंत और तृप्त नजर आ रही थी।
प्रिय पाठकों,
क्या बुजुर्गों का अपने बच्चों पर ऐसा अविश्वास केवल समाज के नकारात्मक माहौल की वजह से होता है? क्या हमें दूसरों के कड़वे अनुभवों को अपने ही सुंदर परिवार पर थोपकर रिश्तों में संशय की दीवार खड़ी करनी चाहिए? इस मर्मस्पर्शी और प्रेरणादायी कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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