रिश्तों की मिठास

“अल्पना, मुझे अपनी बड़ी बहन समझकर माफ कर दे,” कामिनी ने रुंधे हुए गले से कहा, “दौलत के घमंड ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपनों और पराए का फर्क भूल गई थी। तूने दोनों डिब्बे लौटाकर मेरी वो आंखें खोल दीं जो शायद कभी नहीं खुलतीं। तू सही थी, रिश्ते डिब्बों की कीमत से नहीं, दिल की मिठास से चलते हैं।”

अल्पना ने कामिनी की आंखों में सच्चा पछतावा देखा। भारतीय नारी का हृदय क्षमा का सागर होता है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए कामिनी के आंसू पोंछे और कहा, “दीदी, आप घर की बड़ी हैं। अपनों से माफी नहीं मांगी जाती। आप घर आ गईं, हमारे लिए यही सबसे बड़ा त्योहार है।”

 वीरेंद्र जी का शहर में रियल एस्टेट और ऑटोमोबाइल के बड़े शो-रूम्स का फलता-फूलता कारोबार था। व्यापार दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की कर रहा था और इसी तरक्की के साथ उनकी पत्नी कामिनी के स्वभाव में एक अजीब सा दंभ घर करता जा रहा था।

कामिनी के लिए इंसान की पहचान उसके बैंक बैलेंस, कपड़ों के ब्रांड और गाड़ी के मॉडल से तय होती थी। हीरे के चमचमाते कंगन और भारी रेशमी साड़ियों में लिपटी कामिनी जब अपनी किटी पार्टियों या हाई-सोसायटी शादियों में जातीं, तो उनके बात करने का अंदाज ऐसा होता मानो पूरी दुनिया उनके कदमों में बिछी हो। धन के इस पहाड़ पर बैठकर उन्हें नीचे खड़े हर इंसान की हैसियत बेहद मामूली नजर आती थी।

वीरेंद्र जी के एक छोटे भाई थे—निखिल कपूर। निखिल स्वभाव से शांत, स्वाभिमानी और बेहद सुलझे हुए इंसान थे। वे शहर की ही एक निजी लॉजिस्टिक्स कंपनी में सीनियर अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। वेतन सीमित था, पर जरूरतों से समझौता करके भी वे अपने परिवार के साथ बेहद खुश और संतुष्ट रहते थे। शहर के पुराने हिस्से में एक छोटे से फ्लैट में निखिल अपनी पत्नी अल्पना और दस साल के बेटे आरव के साथ रहते थे।

अल्पना स्वभाव से अत्यंत सरल, धैर्यवान और मर्यादित महिला थीं। मायके से अच्छे संस्कार मिले थे, इसलिए बड़ों का आदर और छोटों से स्नेह उनके जीवन का मूलमंत्र था। जब भी बड़ा परिवार इकट्ठा होता, कामिनी अल्पना को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती थीं। कभी अल्पना के साधारण सूती सूट पर व्यंग्य कसतीं, तो कभी आरव के सामान्य स्कूल में पढ़ने को लेकर ताने मारतीं। अल्पना इन सब बातों को चुपचाप एक फीकी मुस्कान के साथ पी जाती थीं। वे जानती थीं कि अगर उन्होंने पलटकर जवाब दिया, तो दोनों भाइयों के बीच दरार पड़ जाएगी और वे किसी भी कीमत पर निखिल का दिल दुखाना नहीं चाहती थीं।

दीपावली का पावन त्योहार नजदीक था। पूरे शहर में दीपों की जगमगाहट, पटाखों की गूंज और त्योहार की उमंग फैली हुई थी। वीरेंद्र जी की कोठी पर त्योहार की तैयारियां किसी शाही जलसे से कम नहीं थीं। बड़े-बड़े उद्योगपतियों, राजनेताओं और रईस रिश्तेदारों को उपहार देने के लिए शहर की सबसे महंगी कन्फेक्शनरी से विशेष रूप से ड्राई फ्रूट्स, चांदी के वर्क वाली विशेष मिठाइयां और महंगे उपहार मंगवाए गए थे।

वहीं दूसरी ओर, ड्राइवर, माली, चौकीदार और सफाई कर्मचारियों के लिए कामिनी ने थोक बाजार से सस्ती सोनपापड़ी और साधारण लड्डू के पीले डिब्बे अलग से पैक करवा कर रखवाए थे। निखिल और अल्पना के लिए उपहार तय करते समय भी कामिनी का वही संकीर्ण नजरिया सामने आया। वीरेंद्र जी तो व्यस्तता के चलते इन सब बारीकियों पर ध्यान नहीं दे पाते थे और सब कुछ कामिनी की मर्जी पर छोड़ देते थे।

कामिनी ने ड्राइवर रामू को बुलाकर निर्देश दिए, “सुनो रामू, यह जो लाल और सुनहरे रंग के भारी डिब्बे हैं, यह सिर्फ वीआईपी मेहमानों के लिए हैं। और यह जो हल्के नीले और पीले डिब्बे हैं, यह सोसायटी के गार्ड, सफाई वाले और नौकरों में बांट देना।” फिर कुछ सोचकर उन्होंने पीले डिब्बों में से एक डिब्बा अलग उठाया और नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोलीं, “और हां, यह एक डिब्बा छोटे बाबूजी के घर भी दे आना। कह देना भाभी जी ने शगुन भेजा है।”

दीपावली की पूर्व संध्या पर जब निखिल दफ्तर से थके-हारे लौटे, तो मेज पर मिठाई का वह डिब्बा रखा था। डिब्बा कोई साधारण नहीं था, बल्कि वह लाल और सुनहरे मखमली कवर में लिपटा हुआ, प्रीमियम ड्राई फ्रूट्स और पिस्ता-केसर रोल वाला शाही डिब्बा था। दरअसल, रामू से गलती हो गई थी। जल्दीबाजी में वह कर्मचारियों वाले डिब्बे की जगह गलती से वीआईपी मेहमानों के लिए रखा गया महंगा डिब्बा निखिल के घर छोड़ आया था।

निखिल ने मुस्कुराते हुए अल्पना से कहा, “अल्पना, देखो तो भाभी जी ने कितना सुंदर उपहार भेजा है। लगता है भैया को हमारी याद आ ही गई। कितने भी व्यस्त रहें, पर त्योहार पर अपनों को नहीं भूलते।”

अल्पना ने भी मन ही मन सोचा कि शायद इस बार दीदी के दिल में कोई बदलाव आया हो। उन्होंने श्रद्धा से डिब्बे को भगवान के मंदिर के सामने रख दिया और आरव को उसमें से एक टुकड़ा खिलाते हुए प्रार्थना की कि परिवार का यह स्नेह हमेशा बना रहे। उस रात उस छोटे से घर में केवल मिठाई का स्वाद नहीं था, बल्कि यह भरोसा भी था कि बड़े भाई की छत्रछाया अब भी उनके सिर पर है।

लेकिन यह खुशी ज्यादा देर टिकने वाली नहीं थी।

अगली सुबह, जब दीपावली की रोशनी चारों तरफ बिखर रही थी, कामिनी अपने बैठक में उपहारों की गिनती कर रही थीं। अचानक उनकी नजर एक सूची पर पड़ी और उन्होंने देखा कि वीआईपी डिब्बों में से एक डिब्बा कम है, जबकि नौकरों वाले डिब्बों में एक डिब्बा अतिरिक्त बच गया है। उन्होंने तुरंत रामू को बुलाया और डांटते हुए पूछा, “रामू! एक मखमली डिब्बा कहां गया? मैंने तुम्हें गिनती करके दिए थे!”

रामू डरते हुए बोला, “मेमसाब, कल शाम को जब मैं छोटे साहब के घर गया था, तो जल्दी में गाड़ी की पिछली सीट से डिब्बा उठाकर दे आया था। शायद वही डिब्बा वहां चला गया।”

यह सुनते ही कामिनी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उनके माथे पर गुस्से की लकीरें उभर आईं। उन्होंने जोर से मेज पर हाथ पटका, “तुम अंधे हो क्या? तुम्हें अक्ल नहीं है कि किसे क्या देना है? वह डिब्बा पांच हजार रुपये का था, एक्सक्लूसिव इंपोर्टेड ड्राई फ्रूट्स थे उसमें! और तुमने वह उठाकर उन लोगों को दे दिया जिनकी इतनी हैसियत भी नहीं कि खुद कभी ऐसी मिठाई खरीदकर खा सकें!”

रामू सिर झुकाए खड़ा कांपता रहा। कामिनी का गुस्सा शांत नहीं हुआ। धन के अहंकार ने उनके भीतर से मर्यादा का आखिरी तिनका भी छीन लिया था। उन्होंने तुरंत अपना स्मार्टफोन उठाया और अल्पना का नंबर मिला दिया।

उधर, छोटे से घर में अल्पना रसोई में त्योहार की खीर बना रही थीं। फोन की घंटी बजी तो स्क्रीन पर ‘दीदी’ का नाम देखकर उनके चेहरे पर एक सहज मुस्कान आ गई। उन्होंने तुरंत फोन उठाया और आदर से कहा, “प्रणाम दीदी! आपको और भैया को दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।”

दूसरी तरफ से कोई शुभकामना नहीं आई, बल्कि एक तीखा और व्यंग्य भरा स्वर गूंजा, “सुनो अल्पना, शुभकामनाओं की औपचारिकता बाद में करना। पहले मेरी बात कान खोलकर सुनो। कल शाम को रामू मूर्खों की तरह तुम्हारे घर गलत डिब्बा दे आया था। वह मखमली डिब्बा हमारे बहुत खास और रईस मेहमानों के लिए था, बहुत कीमती मिठाई है उसमें। तुम्हारे जैसे लोगों के लिए वह नहीं था। तुम्हारे लिए जो डिब्बा रखा था, वह घर पर ही छूट गया।”

अल्पना के हाथ में पकड़ा हुआ चम्मच वहीं रुक गया। उनके कानों में कामिनी के शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे।

कामिनी बिना रुके आगे बोलीं, “अब देखो, तुमने डिब्बा खोल तो लिया ही होगा, पर मैं रामू को वापस तुम्हारे घर भेज रही हूं। वह दूसरा डिब्बा लेकर आ रहा है। तुम वह महंगा वाला डिब्बा रामू को फौरन लौटा देना और जो वह दे, उसे रख लेना। इतनी महंगी चीजें तुम लोगों के रोजमर्रा के खाने की नहीं हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। अल्पना की आंखों में अपमान के आंसू छलक आए। बात मिठाई की नहीं थी, बात उस गहरे घाव की थी जो कामिनी ने एक ही झटके में उनके आत्मसम्मान पर लगा दिया था। क्या खून का रिश्ता सिर्फ कुछ रुपयों और मिठाई के डिब्बे की कीमत से आंका जाएगा? क्या छोटे भाई के परिवार की औकात एक नौकर के बराबर भी नहीं थी?

अल्पना ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने अपनी पलकों पर आए आंसुओं को पोंछा और अपने भीतर के स्वाभिमान को समेटा। उनकी आवाज में न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई कंपकंपाहट; उसमें केवल एक अडिग गरिमा थी।

अल्पना ने बेहद शांत स्वर में कहा, “दीदी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। रामू भैया आ रहे हैं, तो मैं वह डिब्बा उन्हें दे दूंगी।”

फोन कट गया। कमरे में बैठे निखिल ने फोन का लाउडस्पीकर ऑन होने के कारण भाभी की एक-एक बात सुन ली थी। निखिल का सिर शर्म और बेबसी से झुक गया था। उनके अपने सगे बड़े भाई के घर से यह व्यवहार मिला था। उन्होंने भारी मन से अल्पना की तरफ देखा और कहा, “अल्पना… मुझे माफ कर दो। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि तुम्हें यह सब न सुनना पड़े।”

अल्पना तुरंत निखिल के पास आईं, उनके कंधे पर हाथ रखा और बोलीं, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? हमारे पास जो है, वह ईमानदारी की कमाई है। किसी के ताने हमारी कीमत तय नहीं कर सकते। स्वाभिमान से बड़ी कोई दौलत नहीं होती।”

आधे घंटे बाद रामू दरवाजे पर खड़ा था। उसके हाथ में पीले रंग का सस्ता डिब्बा था और चेहरे पर गहरी झिझक।

अल्पना अंदर गईं। उन्होंने मंदिर के पास से वह लाल मखमली डिब्बा उठाया, जो अभी तक आधा ही खुला था। फिर उन्होंने वह डिब्बा रामू के हाथ में थमा दिया। इसके साथ ही, जब रामू ने वह पीला डिब्बा अल्पना की ओर बढ़ाया, तो अल्पना ने अपने दोनों हाथ पीछे खींच लिए।

अल्पना ने बड़ी ही शालीनता से कहा, “रामू भैया, यह पीला डिब्बा भी आप अपने साथ वापस ले जाइए। दीदी से कहिएगा कि छोटे भाई का परिवार मिठाई का भूखा नहीं है, अपनेपन और सम्मान का भूखा था। जब मन में इतना परायापन और तौल-मोल है, तो यह मिठाई हमारे गले से नीचे नहीं उतरेगी। भाभी जी से कहना कि यह दोनों डिब्बे वही रख लें, शायद उनकी दौलत में इससे थोड़ा और इजाफा हो जाए।”

रामू चुपचाप दोनों डिब्बे लेकर भारी कदमों से लौट गया।

जब रामू कोठी पर पहुंचा और उसने दोनों डिब्बे कामिनी की मेज पर रख दिए, तो कामिनी हैरान रह गईं। “यह क्या? दोनों डिब्बे क्यों ले आए? उसने दूसरा डिब्बा नहीं रखा?”

रामू ने हाथ जोड़कर कहा, “मेमसाब, छोटी भाभी ने कहा है कि उन्हें मिठाई नहीं, सम्मान चाहिए था। और उन्होंने दोनों डिब्बे आपको वापस लौटा दिए हैं।”

कामिनी के चेहरे पर एक पल के लिए घमंड की चमक उभरी, “देखा! इसे कहते हैं नखरे। गरीब हैं तो क्या हुआ, तेवर तो पूरे हैं!”

लेकिन उसी वक्त बैठक के दरवाजे पर वीरेंद्र जी आकर खड़े हो गए थे। वे बाहर से लौट रहे थे और उन्होंने रामू की बात और कामिनी की प्रतिक्रिया साफ सुन ली थी। वीरेंद्र जी का चेहरा गुस्से और आत्मग्लानि से लाल हो चुका था।

“कामिनी!” वीरेंद्र जी की गरजती आवाज ने पूरे हॉल को कंपा दिया।

कामिनी चौंककर पीछे हटीं, “अरे आप? क्या हुआ, इतने गुस्से में क्यों हैं?”

“तुमने आज मेरे छोटे भाई की दहलीज पर सिर्फ एक डिब्बा नहीं भेजा था कामिनी, तुमने मेरे कुल की मर्यादा, मेरे संस्कारों और हमारे रिश्तों की अर्थी सजाकर भेजी थी!” वीरेंद्र जी की आंखों में आंसू थे।

“आप यह क्या कह रहे हैं? जरा सी मिठाई की तो बात थी…” कामिनी ने अपनी सफाई देनी चाही।

“जरा सी मिठाई?” वीरेंद्र जी आगे बढ़े और उन्होंने मेज पर रखे उन दोनों डिब्बों को उठाकर देखा। “कामिनी, जिस पैसे पर तुम इतना इतराती हो, क्या तुम्हें पता है कि जब मैंने अपना पहला शो-रूम शुरू किया था और बैंक से लोन नहीं मिल रहा था, तब इसी निखिल ने अपनी पहली नौकरी की सारी जमा-पूंजी लाकर मेरे हाथ में रख दी थी? उसने अपनी पढ़ाई के बाद अपने सपनों को कुर्बान करके एक छोटी नौकरी चुनी ताकि घर में नियमित पैसा आ सके और मैं व्यापार कर सकूं!”

कामिनी की सांसें जैसे थम गईं। उन्हें इस बात की जानकारी कभी नहीं दी गई थी।

वीरेंद्र जी का गला रुंध गया, “अरे, जिस भाई ने कभी मुझसे अपने त्याग का हिसाब नहीं मांगा, आज मेरी पत्नी ने उसके घर पांच हजार रुपये की मिठाई के लिए भिखारी जैसा बर्ताव कर दिया? क्या इसी दिन के लिए मैंने दौलत कमाई थी कि मैं अपने ही सगे भाई को नौकरों से भी बदतर समझूं? आज तुमने निखिल और अल्पना का नहीं, मेरा सिर शर्म से झुका दिया है।”

वीरेंद्र जी के शब्द कामिनी के अंतर्मन को हथौड़े की तरह चोट पहुंचा रहे थे। उनके दिमाग में अल्पना के शांत शब्द और रामू का चेहरा घूमने लगा। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि जिसे वे अपनी शान समझ रही थीं, वह दरअसल उनका खोखलापन था। दौलत के नशे ने उन्हें इतना अंधा कर दिया था कि वे उन रिश्तों की कद्र भूल गईं जिन्होंने उनकी इस इमारत की नींव रखी थी।

कामिनी वहीं सोफे पर बैठ गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका झूठा अहंकार आंसुओं के साथ बह रहा था। “मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया… मुझे माफ कर दीजिए। मैं सच में अंधी हो गई थी।”

वीरेंद्र जी ने गहरी सांस ली और कहा, “माफी मुझसे मत मांगो कामिनी। अगर आज हमने यह गलती नहीं सुधारी, तो यह दीपावली हमारे जीवन का सबसे काला दिन बन जाएगी। उठो, अगर दिल में सचमुच पछतावा है, तो मेरे साथ चलो।”

उधर, छोटे से फ्लैट में दीपावली की शाम उतर आई थी। घर के बाहर कुछ दीये जल रहे थे, लेकिन घर के भीतर एक उदास खामोशी पसरी हुई थी। निखिल खिड़की के पास खड़े थे और अल्पना आरव को तैयार कर रही थीं।

तभी दरवाजे की घंटी बजी। निखिल ने जाकर दरवाजा खोला, तो सामने देखकर वे स्तब्ध रह गए।

सामने वीरेंद्र जी और कामिनी खड़े थे। कामिनी के हाथों में कोई मिठाई का डिब्बा नहीं था, बल्कि उनके चेहरे पर गहरा पश्चाताप था। इससे पहले कि निखिल कुछ समझ पाते, वीरेंद्र जी आगे बढ़े और उन्होंने अपने छोटे भाई को सीने से लगा लिया। दोनों भाइयों की आंखें भर आईं।

“भैया… आप? यहां?” निखिल के मुंह से बमुश्किल शब्द निकले।

कामिनी आगे बढ़ीं और उन्होंने अल्पना के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। इस बार उनके हाथों में हीरों की चमक नहीं थी, बल्कि पश्चाताप की कंपकंपी थी।

“अल्पना, मुझे अपनी बड़ी बहन समझकर माफ कर दे,” कामिनी ने रुंधे हुए गले से कहा, “दौलत के घमंड ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपनों और पराए का फर्क भूल गई थी। तूने दोनों डिब्बे लौटाकर मेरी वो आंखें खोल दीं जो शायद कभी नहीं खुलतीं। तू सही थी, रिश्ते डिब्बों की कीमत से नहीं, दिल की मिठास से चलते हैं।”

अल्पना ने कामिनी की आंखों में सच्चा पछतावा देखा। भारतीय नारी का हृदय क्षमा का सागर होता है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए कामिनी के आंसू पोंछे और कहा, “दीदी, आप घर की बड़ी हैं। अपनों से माफी नहीं मांगी जाती। आप घर आ गईं, हमारे लिए यही सबसे बड़ा त्योहार है।”

उस शाम उस छोटे से फ्लैट में जो दीये जले, वे केवल तेल और बाती के नहीं थे; वे प्रेम, क्षमा और रिश्तों के पुनर्जन्म के दीये थे। अल्पना ने घर में बनी सादी बेसन की चक्की और खीर सबके सामने परोसी। उस सादे खाने का स्वाद उन तमाम मखमली डिब्बों की महंगी मिठाइयों से कहीं ज्यादा मीठा था, क्योंकि उसमें अहंकार का कोई तिनका नहीं था।

कामिनी ने उस दिन सीखा कि दौलत केवल तिजोरियों में अच्छी लगती है, अगर वह दिमाग में चढ़ जाए तो इंसान अपनों से ही फकीर हो जाता है।

पैसा इंसान की हैसियत बदल सकता है, लेकिन अगर वह उसकी नीयत और रिश्तों को बदल दे, तो वह संपन्नता किसी अभिशाप से कम नहीं होती। कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए महंगे उपहारों की नहीं, बस एक सच्चे और साफ दिल की जरूरत होती है।

क्या आपके आसपास भी कभी पैसे के अहंकार ने रिश्तों में ऐसी खटास घोली है? और क्या हर रिश्ते को एक दूसरा मौका मिलना चाहिए? अपनी अनमोल राय हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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