पराए जब अपने बने

मनीष ने आगे बढ़कर अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं। उनकी आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आँसू बह निकले। “भाभी जी, आज आपने मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया है। मैं जिस घमंड में जीता था कि सिर्फ खून के रिश्ते ही अपने होते हैं, वह घमंड आज पूरी तरह टूट चुका है। आपने साबित कर दिया कि रिश्तों की असली पहचान खून से नहीं, बल्कि दिल की संवेदना और आड़े वक्त में साथ खड़े होने की नीयत से होती है। आप हमारे लिए पराए नहीं, ईश्वर का भेजा हुआ फरिश्ता हैं।”

 शालिनी अपने कपड़े जल्दी-जल्दी एक छोटे बैग में ठूंस रही थी, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे और आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसके पति मनीष फोन कान से लगाए बालकनी में लगातार चक्कर काट रहे थे, उनके चेहरे पर चिंता और गुस्से के मिले-जुले भाव साफ देखे जा सकते थे।

शालिनी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। शादी के बाद वह अपने पति मनीष और दो बेटियों के साथ ग्वालियर आ बसी थी। हालांकि, उसके पिता हरिशंकर जी और माँ कांता देवी अपने पुश्तैनी शहर अंबाला में ही रहते थे। शालिनी के दोनों ताऊ-ताई उसी बड़े मकान के बगल वाले हिस्से में रहते थे, इसलिए शालिनी को कभी अपने वृद्ध माता-पिता के अकेलेपन की उतनी चिंता नहीं सताती थी। लेकिन आज सुबह छह बजे जब ताऊजी के लड़के का फोन आया, तो शालिनी के पैरों तले से जमीन खिसक गई।

अंबाला से खबर आई थी कि रात के समय छत पर टहलते हुए हरिशंकर जी का पैर अचानक फिसल गया और वे पक्की सीढ़ियों से नीचे आ गिरे। सिर के पिछले हिस्से में गंभीर चोट आई थी और भारी रक्तस्राव हुआ था। डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत आईसीयू में वेंटिलेटर पर ले लिया था और उनकी हालत बेहद नाजुक बताई जा रही थी। डॉक्टरों का कहना था कि अगले चौबीस घंटे जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे कठिन जंग हैं। ताऊजी ने फोन पर भर्राई आवाज में कहा था, “शालिनी बेटा, जो भी गाड़ी मिले, तुरंत अंबाला के लिए निकल आओ। बाबूजी की हालत बहुत नाजुक है।”

शालिनी के लिए यह खबर किसी पहाड़ के टूट पड़ने जैसी थी। उसका मन एक पल भी रुके बिना उड़कर अपने बाबूजी के पास पहुँच जाना चाहता था। लेकिन एक माँ की ममता और उसकी जिम्मेदारियों ने उसके पैरों में भारी बेड़ियां डाल दी थीं। उसकी बड़ी बेटी अवनि बारहवीं कक्षा में थी और छोटी बेटी तान्या दसवीं में। दोनों के प्री-बोर्ड इम्तिहान चल रहे थे और अगले दो दिनों में मुख्य बोर्ड परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रैक्टिकल और वाइवा थे। अगर शालिनी बेटियों को साथ ले जाती, तो उनका पूरा एक साल बर्बाद हो जाता। और अगर बेटियों को अकेले घर पर छोड़ जाती, तो इतने बड़े शहर में दो किशोरी बच्चियों की सुरक्षा, उनके खाने-पीने और पढ़ाई-लिखाई का क्या होता? मनीष का भी साथ जाना जरूरी था ताकि वे रास्ते में और अस्पताल में शालिनी को संभाल सकें।

मनीष की अपनी सगी छोटी बहन रितिका इसी शहर ग्वालियर में, मुश्किल से छह किलोमीटर दूर एक पॉश बंगले में अपने ससुराल में रहती थी। रितिका का स्वभाव बड़ा विचित्र था। जब भी कोई तीज-त्योहार होता, चाहे करवा चौथ हो, रक्षाबंधन हो, या भाईदूज, रितिका सबसे पहले हक जताने अपने मायके पहुँच जाती थी। महँगे-महँगे उपहार, साड़ियाँ और लिफाफे लेने में वह कभी पीछे नहीं रहती थी। इतना ही नहीं, जब भी उसके ससुराल में कोई बड़ा आयोजन होता, कोई जन्मदिन पार्टी या सत्यनारायण की कथा, वह हुक्म भरे लहजे में फोन करके शालिनी को एक दिन पहले ही बुला लेती थी कि “भाभी, आप आ जाइए, मुझे हलवाई के साथ खड़े रहने और रिश्तेदारों के स्वागत में मदद चाहिए।” शालिनी ने कभी ननद की किसी बात का बुरा नहीं माना था। वह हमेशा एक बड़ी बहन की तरह जाकर उसकी हर जरूरत में साथ देती थी।

आज जब शालिनी पर यह विपत्ति आई, तो मनीष ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सीना तानकर कहा था, “शालिनी, तुम बिल्कुल चिंता मत करो। मेरी अपनी सगी बहन रितिका और जीजाजी यहीं इसी शहर में तो रहते हैं। रितिका को फोन करता हूँ, वह आकर दो-चार दिन बच्चों के पास रह लेगी। जब तक हम अंबाला से नहीं लौटते, बच्चियाँ अपनी बुआ की निगरानी में सुरक्षित रहेंगी।”

मनीष ने तुरंत रितिका का नंबर मिलाया और उसे घर की पूरी स्थिति बताई। लेकिन फोन के उस पार से जो जवाब आया, उसने मनीष के सारे अभिमान की धज्जियां उड़ा दीं।

रितिका ने बेहद ठंडे और बनावटी दुख भरे स्वर में कहा, “अरे भैया! यह तो बहुत बुरा हुआ बाबूजी के साथ। लेकिन भैया, मैं आपके घर कैसे आ सकती हूँ? आज ही मेरी सासू माँ की सगी ननद अपने पूरे परिवार के साथ हमारे यहाँ आ रही हैं। सासू माँ ने सख्त हिदायत दी है कि घर की कोई भी बहू-बेटी बाहर नहीं जाएगी। और वैसे भी, मेरी सास को यह बिल्कुल पसंद नहीं है कि उनकी बेटी के रहते हुए उनकी बहू कहीं और जाकर रहे या घर का काम छोड़कर दूसरों के बच्चों को संभाले। आप तो जानते ही हैं कि मेरे ससुराल का मिजाज कितना कड़ा है। आप एक काम कीजिए, बच्चियों को कुछ पैसे दे जाइए और कहिए कि ऑनलाइन खाना मंगा लेंगी। अब मैं सास की बात काटकर तो नहीं आ सकती ना!”

मनीष ने हताश होकर कहा, “रितिका, अवनि और तान्या तेरी अपनी भतीजियाँ हैं। उनकी बोर्ड की परीक्षाएं हैं, वे अभी इतनी बड़ी नहीं हुईं कि अकेले घर संभाल लें। सिर्फ दो दिन की बात है…”

“भैया, आप मुझे इमोशनली ब्लैकमेल मत कीजिए,” रितिका ने चिढ़ते हुए बात काट दी। “हर किसी की अपनी भी गृहस्थी होती है। मैं अपनी ससुराल में क्लेश मोल नहीं ले सकती।” और इतना कहकर उसने फोन काट दिया।

मनीष फोन हाथ में लिए सन्न खड़े रह गए। उनका चेहरा शर्मिंदगी से सफेद पड़ चुका था। जिस बहन के मान-सम्मान के लिए वे हमेशा खड़े रहते थे, जिस बहन के नाम पर वे घर में रौब जमाते थे, उसने ऐन वक्त पर पीठ दिखा दी थी।

दरअसल, मनीष हमेशा से शालिनी के सामाजिक स्वभाव से चिढ़ते थे। शालिनी का दिल मोम जैसा था। वह अपनी इस बड़ी सी सोसाइटी में किसी के भी दुख-दर्द को देखकर चुपचाप नहीं बैठ सकती थी। सामने वाले फ्लैट में रहने वाले माथुर अंकल की जब तबीयत खराब हुई थी, तो शालिनी ने पूरे हफ्ते उनके लिए दलिया और खिचड़ी बनाकर भेजी थी। तीसरी मंजिल वाली वर्मा जी की बहू जब पहली बार माँ बनने वाली थी, तो शालिनी रात के दो बजे अपनी गाड़ी से उसे अस्पताल लेकर भागी थी। किसी के यहाँ शादी हो, गमी हो, या बच्चों की पढ़ाई में मदद, शालिनी हमेशा बिना किसी स्वार्थ के आगे रहती थी।

मनीष अक्सर झुंझलाकर कहते थे, “शालिनी, तुम इन बाहरी और पराए लोगों के लिए इतनी क्यों खटती हो? यह शहर है, यहाँ कोई किसी का नहीं होता। तुम लोगों के पीछे भागती रहती हो और अपने घर के काम बढ़ाती हो। कल को हमें कोई जरूरत पड़ी तो क्या ये सोसाइटी वाले हमारे काम आएंगे?”

तब शालिनी मुस्कुराते हुए बेहद सहजता से कहती थी, “मनीष जी, इंसान ही इंसान के काम आता है। जब हम दूसरों के आँसुओं को अपना समझते हैं, तभी ईश्वर हमारे रास्ते में नेकदिल लोगों को भेजता है। पराए और अपने में सिर्फ नीयत का फर्क होता है। आप जिन्हें पराया कह रहे हैं, वे हमारे सबसे करीबी पड़ोसी हैं। अगर कभी हमारे ऊपर कोई मुश्किल आई, तो यही पराए हमारे लिए अपने बन जाएंगे।”

“कैसी बातें करती हो तुम? हमें इन पराए लोगों की जरूरत क्यों पड़ेगी भला? मेरी अपनी सगी बहन इसी शहर में रहती है। खून का रिश्ता है हमारा। एक आवाज दूँगा तो दौड़ी चली आएगी,” मनीष हमेशा यही दलील देते थे।

और आज, वही मनीष अपनी लाचारी पर खुद अपनी ही नजरों में गिर चुके थे।

कमरे में घोर सन्नाटा था। समय रेत की तरह फिसल रहा था। अंबाला जाने वाली दोपहर की ट्रेन का समय नजदीक आ रहा था। शालिनी की आँखें आंसुओं से धुंधली थीं और वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी ममता को चुने या अपने मरणासन्न पिता के अंतिम दर्शनों को।

तभी फ्लैट की डोरबेल बजी।

शालिनी ने साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए जाकर दरवाजा खोला। सामने फ्लैट नंबर 302 में रहने वाली उनकी पड़ोसन अल्पना भाभी खड़ी थीं। अल्पना जी के हाथ में नाश्ते की एक प्लेट थी और चेहरे पर एक अजीब सी फिक्र। अल्पना जी एक साधारण, सुलझी हुई महिला थीं, जिनके पति एक निजी कॉलेज में प्रोफेसर थे। पिछले दो सालों से दोनों परिवारों के बीच बस एक पड़ोसी का सामान्य, लेकिन आत्मीय रिश्ता था।

अल्पना जी ने शालिनी के चेहरे पर बिखरे आंसुओं और घर में रखे सूटकेस को देखकर चौंकते हुए पूछा, “अरे शालिनी! क्या हुआ? तुम्हारी आँखें इतनी सूजी हुई क्यों हैं? सब कुशल-मंगल तो है ना?”

शालिनी का सब्र का बाँध टूट गया। वह अल्पना जी के गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़ी। उसने हिचकियों के बीच पूरी बात बता दी—बाबूजी का सीढ़ियों से गिरना, वेंटिलेटर पर होना, अंबाला से तुरंत बुलावा आना, और बेटियों की परीक्षाओं के कारण पैदा हुई यह भयानक उलझन।

अल्पना जी ने एक पल भी नहीं गंवाया। उन्होंने शालिनी के आँसू पोंछे, उसे मजबूती से अपने सीने से लगाया और बड़े ही अधिकार भरे, आत्मीय स्वर में कहा,

“बस इतनी सी बात के लिए तुम रो रही हो शालिनी? यहां की आप रत्ती भर भी चिंता मत करो भाभी, मैं सब देख लूंगी… आप बेफिक्र होकर जाओ। अगर कोई और मदद आपको चाहिए होगी तो आप बस एक फोन कर देना, मैं सब कुछ मैनेज कर दूंगी।”

शालिनी ने अचरज से अल्पना जी की तरफ देखा। उसकी जुबान से शब्द नहीं निकल रहे थे।

अल्पना जी ने मुस्कुराते हुए आगे कहा, “शालिनी, अवनि और तान्या सिर्फ तुम्हारी बेटियाँ नहीं हैं, मेरी भी तो बच्चियाँ हैं। आज से जब तक तुम वापस नहीं लौटतीं, दोनों बच्चियाँ मेरे फ्लैट में रहेंगी। उनका खाना-पीना, समय पर नाश्ता, कपड़े और उनकी पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी मेरी है। अवनि का कल जो केमिस्ट्री का वाइवा है, मेरे पति खुद प्रोफेसर हैं, वे शाम को बैठकर उसका पूरा रिवीजन करवा देंगे। और हाँ, स्कूल की वैन तक बच्चियों को छोड़ने और लाने की जिम्मेदारी मेरी होगी। तुम अपने बाबूजी के पास जाओ और पूरे मन से उनकी सेवा करो। यहाँ की तरफ से अपना दिमाग बिल्कुल खाली कर दो।”

अल्पना जी की इन बातों को सुनकर शालिनी के दिल को जो असीम तसल्ली मिली, उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता था। उसके रोम-रोम से अल्पना जी के लिए दुआएं निकलने लगीं।

शालिनी ने मुड़कर एक तिरछी और अर्थपूर्ण नजर अपने पति मनीष पर डाली। उस मूक दृष्टि में कोई ताना नहीं था, कोई कटुता नहीं थी, लेकिन उसमें एक गहरा सच तैर रहा था। शालिनी की आँखों ने बिना कुछ बोले ही मनीष से कह दिया—”देख लिया आपने? जिसे आप हमेशा ‘पराया’ कहकर दुत्कारते थे, आज वही हमारे अपने खून के रिश्तों से भी ज्यादा अपने निकले।”

मनीष का सिर शर्म और ग्लानि से पूरी तरह झुक गया। वे अपनी नजरें शालिनी से मिला नहीं पा रहे थे। जिस बहन के रसूख और खून के रिश्ते पर उन्हें इतना गुरूर था, उसने विपत्ति के समय दरवाजे बंद कर लिए थे; और जिस पड़ोसन को वे कभी औपचारिक ‘नमस्ते’ से ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे, वह बिना किसी स्वार्थ के अपना घर-बार छोड़कर उनकी बच्चियों की माँ बनने को तैयार खड़ी थी।

शालिनी ने अपनी दोनों बेटियों, अवनि और तान्या को सीने से लगाया। बच्चियों की आँखों में भी डर था, लेकिन अल्पना चाची के स्नेहिल स्पर्श ने उनके भीतर एक सुरक्षा का भाव भर दिया था। शालिनी ने भारी मन लेकिन निश्चिंत होकर अपनी दोनों बच्चियों को अल्पना जी के सुपुर्द किया। मनीष ने आगे बढ़कर हाथ जोड़ते हुए बेहद रुंधे गले से अल्पना जी से कहा, “भाभी जी… आपका यह उपकार मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा।”

अल्पना जी ने हँसते हुए डांटने के अंदाज में कहा, “भाई साहब, शर्मिंदा मत कीजिए। जब पिछले साल मेरे पति को डेंगू हुआ था और मुझे आधी रात को प्लेटलेट्स के लिए भटकना पड़ा था, तो शालिनी भाभी ही थीं जो पूरी रात मेरे साथ अस्पताल में बैठी रही थीं। पड़ोस का रिश्ता भगवान का दिया हुआ सबसे पहला सहारा होता है। आप लोग बिना किसी संकोच के तुरंत निकलिए, गाड़ी छूट जाएगी।”

मनीष और शालिनी स्टेशन पहुंचे और समय से अंबाला की ट्रेन पकड़ ली।

अंबाला पहुँचकर शालिनी सीधे अस्पताल के आईसीयू में पहुँची। बाबूजी की हालत वाकई गंभीर थी, लेकिन शालिनी के वहाँ पहुँचने और उनकी हथेली को अपने माथे से लगाने के कुछ ही घंटों बाद, जैसे एक चमत्कार हुआ। हरिशंकर जी की नब्ज स्थिर होने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि सिर की सूजन कम हो रही है और दवाइयां असर करने लगी हैं। अगले अड़तालीस घंटों में हरिशंकर जी को वेंटिलेटर से बाहर निकाल लिया गया और वे होश में आ गए।

इन पूरे चार दिनों के दौरान, शालिनी जब भी अंबाला से फोन करती, तो अल्पना जी उसे बड़े प्यार से बतातीं कि बच्चियों ने समय पर खाना खाया, दोनों अपनी परीक्षाओं में बहुत अच्छा करके आई हैं और वे बिल्कुल खुश हैं। अवनि और तान्या भी फोन पर अपनी माँ से कहतीं, “माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। अल्पना चाची हमारा माँ जैसा ख्याल रख रही हैं। उन्होंने हमारे लिए वही कढ़ी-चावल बनाए जो आपको पसंद हैं।”

चार दिन बाद, जब हरिशंकर जी पूरी तरह खतरे से बाहर आ गए और उन्हें सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, तो शालिनी और मनीष ने अंबाला से ग्वालियर लौटने का फैसला किया, क्योंकि अब ताऊजी और उनका परिवार अस्पताल की बाकी देखभाल के लिए मौजूद था।

ग्वालियर लौटकर जब शालिनी और मनीष अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि घर का दरवाजा खुला था और अंदर से बच्चियों के हँसने की खिलखिलाहट आ रही थी। अल्पना जी डाइनिंग टेबल पर गरमा-गरम चाय और पकौड़े परोस रही थीं और दोनों बच्चियाँ अपनी किताबों के साथ चहक रही थीं।

शालिनी को देखते ही अवनि और तान्या दौड़कर अपनी माँ से लिपट गईं।

मनीष ने आगे बढ़कर अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं। उनकी आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आँसू बह निकले। “भाभी जी, आज आपने मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया है। मैं जिस घमंड में जीता था कि सिर्फ खून के रिश्ते ही अपने होते हैं, वह घमंड आज पूरी तरह टूट चुका है। आपने साबित कर दिया कि रिश्तों की असली पहचान खून से नहीं, बल्कि दिल की संवेदना और आड़े वक्त में साथ खड़े होने की नीयत से होती है। आप हमारे लिए पराए नहीं, ईश्वर का भेजा हुआ फरिश्ता हैं।”

अल्पना जी ने बहुत ही सादगी से कहा, “मनीष भाई साहब, समाज इसी तरह चलता है। अगर हम एक-दूसरे के सुख-दुख में हाथ नहीं बढ़ाएंगे, तो इंसानियत का क्या मतलब रह जाएगा? शालिनी का यह निस्वार्थ स्वभाव ही है जिसने आज मुझे उसका साथ देने की प्रेरणा दी। जो दूसरों के लिए दिल के दरवाजे खुले रखता है, ईश्वर उसके लिए कभी रास्ते बंद नहीं होने देता।”

उस दिन शाम को, जब घर में सब शांत हो गया, मनीष ने बालकनी में खड़े होकर सोसाइटी के उस खुले मैदान को देखा। जहाँ कभी उन्हें सिर्फ अनजान और पराए चेहरे नजर आते थे, आज वहाँ उन्हें एक भरा-पूरा, आत्मीय परिवार दिखाई दे रहा था। उन्होंने शालिनी का हाथ अपने हाथों में ले लिया। शालिनी ने मुस्कुराकर उनकी आँखों में देखा। अब उनके बीच कोई बहस नहीं थी, कोई मतभेद नहीं था।

वे दोनों समझ चुके थे कि इस विशाल संसार में सबसे बड़ा रिश्ता वही होता है, जो बिना किसी शर्त, बिना किसी मतलब के आपके सबसे बुरे वक्त में आपका हाथ थाम ले। पराए भी अपने बन जाते हैं जब उनके सीने में एक संवेदनशील दिल धड़कता है, और कभी-कभी खून के रिश्ते भी उस समय पराए हो जाते हैं जब उनके भीतर केवल स्वार्थ का वास होता है। सच्चे रिश्तों की यह महक उस घर में हमेशा के लिए बस चुकी थी।

प्रिय पाठकों,

क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा कोई मोड़ आया है जब अपने खून के रिश्तेदारों ने हाथ पीछे खींच लिए हों, लेकिन किसी अनजान या पड़ोसी ने फरिश्ता बनकर आपकी नैया पार लगाई हो? क्या आपको लगता है कि समाज में आज भी इंसानियत और पड़ोस का धर्म सबसे बड़ा रिश्ता है? अपने अनमोल अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

error: Content is protected !!