अवनी आगे बोली, “परिवार तो गया ही, पर इंसानियत का असली चेहरा तब दिखा जब रिश्तेदारों ने मेरे घर आना तो दूर, फोन उठाकर सांत्वना देना भी बंद कर दिया। सबको डर था कि कहीं उन्हें संक्रमण न हो जाए। और जिस लड़के से मेरी सगाई हुई थी, जिसके साथ मैंने पूरी ज़िंदगी बिताने के सपने देखे थे… उसने फोन करके कहा कि उसके परिवार वाले अब यह शादी नहीं कर सकते क्योंकि मेरे घर में सब खत्म हो चुका है और वह किसी अनाथ लड़की की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते।
सुलभा जी सोफे पर बैठी थीं। सामने मेज़ पर चाय का एक प्याला रखा था, जो कब का ठंडा होकर जम चुका था। उम्र के पचासवें पड़ाव पर पहुँच चुकी सुलभा जी की आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। उनकी उंगलियाँ मेज़ पर रखी एक डायरी के पन्नों को बेमकसद पलट रही थीं। इस सन्नाटे में घर की बड़ी दीवार घड़ी की टिक-टिक इतनी तेज़ सुनाई दे रही थी मानो कोई हथौड़े से सीने पर वार कर रहा हो। एक साल पहले तक इसी घर में हर पल हँसी के फव्वारे छूटते थे, बर्तनों की खनक होती थी और शाम की चाय पर भविष्य के सपने बुने जाते थे। पर अब, इस विशाल घर में केवल एक असहनीय खामोशी थी जो हर रोज़ उनका दम घोंटती थी।
अचानक सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ गूँज उठी। मेज़ पर रखा मोबाइल फोन ज़ोर-ज़ोर से थरथराने लगा। किसी अनजान नंबर से कॉल थी। इस बेवक़्त कॉल देखकर सुलभा जी का माथा ठनका। पहली बार फोन बजा और कट गया। उन्होंने अनदेखा कर दिया। उन्हें लगा कि शायद किसी का गलत नंबर डायल हो गया होगा। पर दो मिनट बाद वही नंबर फिर से स्क्रीन पर चमकने लगा। लगातार बजती घंटी किसी बेचैनी की गवाही दे रही थी।
सुलभा जी ने झिझकते हुए फोन उठाया और कान से लगाकर थोड़ी सख्त आवाज़ में कहा, “हेलो! कौन बोल रहा है? आपको पता भी है कि रात के दो बज रहे हैं? किसी को इतनी रात को फोन करने की तमीज़ नहीं है क्या?”
दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। बस एक सन्नाटा था। सुलभा जी कॉल काटने ही वाली थीं कि तभी उनके कानों में किसी के काँपते होंठों से निकलती भारी सांसों और फिर एक दबी हुई सिसकी की आवाज़ पड़ी। वह केवल रोने की आवाज़ नहीं थी, वह रूह को चीर देने वाला विलाप था—एक ऐसा दर्द जो लफ़्ज़ों में ढलने से पहले ही घुट रहा था।
सुलभा जी का दिल एक पल के लिए काँप गया। उनका गुस्सा हवा में काफूर हो गया। एक माँ का संवेदनशील दिल उस सिसकी के पीछे छिपे गहरे अंधकार को भांप गया।
उन्होंने आवाज़ को बेहद नरम करते हुए कहा, “हेलो? कौन हो बेटा? रो क्यों रही हो? क्या बात है?”
फोन के उस पार से एक बेहद धीमी, काँपती हुई और टूटी-फूटी आवाज़ आई, “मुझे… मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझसे गलती से यह नंबर डायल हो गया था। मैं किसी को परेशान नहीं करना चाहती थी… मैं बस… बस बहुत डर गई हूँ।”
“डरो मत बेटा। गहरी सांस लो। बताओ, तुम कहाँ हो और इतनी रात को इस तरह क्यों रो रही हो?” सुलभा जी ने अपनत्व से पूछा।
“कोई नहीं है मेरा… सब खत्म हो गया। मैं अब और सांस नहीं ले पा रही हूँ। मैं बस यह दर्द खत्म करना चाहती हूँ। छत पर खड़ी हूँ… हवा बहुत तेज़ है, बस एक कदम और सब शांत हो जाएगा। मुझे नहीं पता मैंने यह नंबर क्यों मिला दिया, शायद लगा कि जाने से पहले किसी इंसान की आवाज़ सुन लूँ।” लड़की की आवाज़ में मौत का ठंडा सन्नाटा तैर रहा था।
सुलभा जी के रोंगटे खड़े हो गए। उनका हाथ काँपने लगा, पर उन्होंने खुद को पूरी ताकत से संभाला। उन्हें पता था कि इस वक्त उनकी एक गलत बात या घबराहट उस लड़की को मौत के मुँह में धकेल सकती है।
उन्होंने बेहद आश्वस्त, स्थिर और ममतामयी स्वर में कहा, “सुनो मेरी बच्ची… सबसे पहले तुम उस रेलिंग से चार कदम पीछे हटो। मुझे तुम्हारी कदमों की आवाज़ सुनाई देनी चाहिए। पीछे हटो, अभी!”
लड़की ने शायद उस आवाज़ में अपनेपन का ऐसा अधिकार महसूस किया कि फोन पर उसके चप्पलों के पीछे खिसकने की आवाज़ आई।
“शाबाश। अब वहीं बैठ जाओ। देखो, हम दोनों एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी हैं। न मैंने तुम्हें कभी देखा है, न तुमने मुझे। पर सोचो, इस पूरी दुनिया में करोड़ों लोग हैं और तुम्हारा फोन सिर्फ मेरे पास लगा। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। हमारे बीच कोई तो अनकहा रिश्ता इस कायनात ने तय किया होगा। तुम्हारी आँखों से बहते आँसू और तुम्हारी सिसकियाँ मुझे बता रही हैं कि तुम बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रही हो। मैं तुम्हारी कोई बात जज नहीं करूँगी, न तुम्हें उपदेश दूँगी। बस अपना दिल हल्का करो। मुझे बताओ, ऐसा क्या हुआ जिसने तुम्हें इतना तोड़ दिया?”
उस अजनबी लड़की के भीतर का बाँध जैसे फूट पड़ा। उसने फफकते हुए कहा, “आंटी… क्या मैं आपको आंटी कह सकती हूँ?”
“बेशक कह सकती हो बेटा। अपना समझ कर कहो।” सुलभा जी ने धीमे से कहा।
लड़की ने रोते-रोते अपनी दास्तान सुनानी शुरू की, “आंटी, मेरा नाम अवनी है। आज से ठीक डेढ़ महीना पहले तक मेरी दुनिया कितनी मुकम्मल थी। घर में बाबूजी थे, माँ थीं, मेरा छोटा भाई आयुष था। घर में मेरी शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। आयुष दिन भर मुझे चिढ़ाता रहता था कि अब इस घर से मेरी विदाई होगी तो उसका राज चलेगा। बाबूजी अपनी ज़िंदगी भर की जमा-पूंजी मेरी शादी के लिए जोड़ रहे थे। और फिर… अचानक सब बदल गया। उस महामारी ने हमारे हँसते-खेलते घर को ऐसा घेरा कि देखते ही देखते सब बिखर गया।”
अवनी की आवाज़ रुंध गई, पर सुलभा जी ने उसे टोका नहीं। अवनी आगे बोली, “पहले आयुष को सांस लेने में तकलीफ हुई। हम उसे अस्पताल लेकर भागे, पर बेड नहीं मिला। ऑक्सीजन सिलिंडर ढूंढते-ढूंढते बाबूजी थक गए। दो दिन के अंदर मेरा छोटा भाई मेरी आँखों के सामने तड़पकर चला गया। अभी हम संभल भी नहीं पाए थे कि माँ और बाबूजी दोनों की तबीयत बिगड़ गई। एक हफ्ते के अंदर दोनों मुझे अकेला छोड़कर चले गए। जिस घर में कल तक चार लोग थे, वहाँ सिर्फ उनकी तस्वीरें बचीं। मैंने अपने हाथों से अपने पूरे परिवार को मुखाग्नि दी है आंटी…”
सुलभा जी की आँखों से आँसू छलक कर गालों पर बहने लगे। उनका गला भर आया, पर उन्होंने खुद पर काबू रखा ताकि लड़की का हौसला न टूटे।
अवनी आगे बोली, “परिवार तो गया ही, पर इंसानियत का असली चेहरा तब दिखा जब रिश्तेदारों ने मेरे घर आना तो दूर, फोन उठाकर सांत्वना देना भी बंद कर दिया। सबको डर था कि कहीं उन्हें संक्रमण न हो जाए। और जिस लड़के से मेरी सगाई हुई थी, जिसके साथ मैंने पूरी ज़िंदगी बिताने के सपने देखे थे… उसने फोन करके कहा कि उसके परिवार वाले अब यह शादी नहीं कर सकते क्योंकि मेरे घर में सब खत्म हो चुका है और वह किसी अनाथ लड़की की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते। आंटी, मैं अकेले इस वीरान घर में दीवारों को तकती रहती हूँ। हर कमरे से मुझे मेरे भाई की हँसी और माँ की आवाज़ सुनाई देती है। मैं जीकर क्या करूँ? किसके लिए जीऊँ? जब कोई अपना ही नहीं बचा, तो मेरी सांसों का क्या मोल?”
अवनी की बातें सुनकर किसी भी इंसान का कलेजा फट सकता था। सुलभा जी ने अपनी आँखें पोंछीं। उन्होंने महसूस किया कि यह बच्ची दर्द के उस महासागर में डूब रही है जहाँ उम्मीद की कोई नाव नज़र नहीं आती।
सुलभा जी ने बेहद गहरे, स्नेहिल और गंभीर स्वर में कहना शुरू किया, “अवनी बेटा, तुमने जो सहा है, उसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। तुम्हारा दर्द बहुत बड़ा है, और तुम्हारा टूटना स्वाभाविक है। पर एक बात मेरी बहुत ध्यान से सुनो। तुमने कहा कि जिसके साथ शादी होने वाली थी, उसने तुम्हारा साथ छोड़ दिया। बेटा, इसका शोक मत मनाओ, बल्कि ईश्वर का शुक्र अदा करो कि उसने बुरे वक्त में उस इंसान का असली चेहरा तुम्हें दिखा दिया। जो इंसान तुम्हारी ज़िंदगी के सबसे नाज़ुक मोड़ पर, तुम्हारे सबसे बड़े दुख में तुम्हारा हाथ छोड़ दे, वह कल को सुख में भी तुम्हारा सच्चा साथी कभी नहीं बन सकता था। ऐसा कमज़ोर और मतलबपरस्त इंसान तुम्हारे प्यार और तुम्हारी ज़िंदगी के काबिल ही नहीं था। अच्छा हुआ कि यह मुखौटा आज उतर गया, वरना पूरी ज़िंदगी घुट-घुट कर जीनी पड़ती।”
अवनी फोन पर खामोश होकर उनकी बातें सुन रही थी।
सुलभा जी ने आगे कहा, “और रही बात तुम्हारे परिवार की… अवनी, तुम्हारे बाबूजी, तुम्हारी माँ और तुम्हारा भाई, वे तीनों अपनी आखिरी सांस तक उस बीमारी से लड़े होंगे ना? क्या वे अपनी मर्ज़ी से गए? नहीं। वे जीना चाहते थे, तुम्हारे साथ रहना चाहते थे। सोचो, अगर आज वे तुम्हें ऊपर से देख रहे होंगे, तो अपनी प्यारी बेटी को इस तरह घुटने टेकते देखकर उन पर क्या गुज़रेगी? क्या वे इसलिए लड़े थे कि उनकी लाडली उनके जाने के बाद कायरों की तरह अपनी जान दे दे? नहीं बेटा! तुम बची हो, क्योंकि तुम्हारी सांसों में तुम्हारे माता-पिता का अंश बाकी है। तुम जब तक ज़िंदा हो, उनका नाम, उनके संस्कार और उनकी यादें इस दुनिया में ज़िंदा हैं। अगर तुम चली गईं, तो तुम्हारे पूरे परिवार का वजूद हमेशा के लिए मिट जाएगा।”
अवनी की सिसकियों की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई।
सुलभा जी ने अपनी बात जारी रखी, “बेटा, जब सब कुछ छिन जाता है, तब ईश्वर हमें किसी बड़े मकसद के लिए बचाता है। तुम्हारी ज़िंदगी सिर्फ तुम्हारी नहीं है। दुनिया में आज ऐसे हज़ारों लोग हैं जो अपनों को खोकर अंधेरे कमरों में रो रहे हैं, जिनका कोई सुनने वाला नहीं है, जो डिप्रेशन की उस दलदल में फँसे हैं जहाँ से कोई हाथ उन्हें बाहर नहीं खींच रहा। तुम उनके दर्द को समझ सकती हो क्योंकि तुमने उस आग को खुद झेला है। तुम उनकी ताकत बन सकती हो। खुद को खत्म करना हल नहीं है, ज़िंदगी से लड़कर दूसरों का सहारा बनना ही असली जीत है।”
फोन के उस पार कुछ देर गहरा सन्नाटा छाया रहा। फिर एक लंबी, गहरी सांस की आवाज़ आई।
अवनी ने बेहद भीगी हुई आवाज़ में कहा, “आंटी… आज अगर आपने मेरा फोन नहीं उठाया होता, और मुझे इस तरह नहीं समझाया होता, तो शायद कल सुबह मेरा वजूद खत्म हो चुका होता। आपने अजनबी होकर भी मुझे वह बात कह दी जो मेरे अपने खून के रिश्ते भी नहीं कह पाए। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने मेरे सीने पर रखा हुआ मन भर का पत्थर हटा दिया हो। मैं लड़ूंगी आंटी… मैं अपने बाबूजी और माँ की यादों को कायरता के दाग से नहीं मिटने दूंगी। थैंक यू आंटी… थैंक यू सो मच। आपका नाम क्या है आंटी?”
सुलभा जी के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कहा, “मुझे सुलभा कहते हैं बेटा।”
“सुलभा आंटी… आज आपने मुझे एक नया जन्म दिया है। क्या… क्या मैं कभी आपसे बात करने के लिए दोबारा फोन कर सकती हूँ?” अवनी ने संकोच से पूछा।
“कभी भी बेटा। दिन हो या रात, जब भी तुम्हारा मन भारी हो, तुम मुझे बेझिझक फोन कर सकती हो। आज से तुम अकेली नहीं हो। अब हम दोनों के दिलों का एक ऐसा रिश्ता बन चुका है जो खून के रिश्तों से भी गहरा है। अब जाओ, अपने कमरे में जाकर एक गिलास पानी पियो और सो जाओ। कल की सुबह एक नई उम्मीद लेकर आएगी।”
“जी आंटी… अपना ख्याल रखिएगा।” अवनी ने कहा और फोन कट गया।
कॉल खत्म होने के बाद कमरे में फिर वही खामोशी छा गई, लेकिन इस बार वह खामोशी बोझिल नहीं थी; उसमें एक अजीब सा सुकून और ठहराव था। सुलभा जी ने फोन को छाती से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार ये आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि तृप्ति के थे।
सुलभा जी धीरे से उठीं और लिविंग रूम के कोने में सजी एक दीवार की तरफ बढ़ गईं। वहाँ एक बड़ी सी तस्वीर टंगी थी, जिस पर ताज़े फूलों का एक सूखा हार पड़ा था। तस्वीर में सफेद कोट और गले में स्टेथोस्कोप डाले एक नौजवान मुस्कुरा रहा था।
वह उनका इकलौता बेटा था—डॉक्टर रोहन।
रोहन सरकारी अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी था। जब महामारी ने शहर पर हमला बोला, तो वह दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटा रहा। उसने कई हफ़्तों तक घर का मुँह नहीं देखा था। जब सुलभा जी फोन पर उससे घर आने की मिन्नतें करतीं, तो वह हमेशा यही कहता था, “माँ, अगर डॉक्टर ही मैदान छोड़ देंगे तो इन बेसहारा मरीजों को कौन संभालेगा? मेरी ज़िंदगी सिर्फ मेरी नहीं है माँ, यह उन लोगों की अमानत है जिनकी सांसें मेरी देखरेख पर टिकी हैं।”
मरीजों की जान बचाते-बचाते रोहन खुद उस भयानक वायरस की चपेट में आ गया था। उसने अस्पताल के उसी आईसीयू में दम तोड़ दिया जहाँ उसने सैकड़ों लोगों को ज़िंदगी लौटाई थी। रोहन के पिता का साया सुलभा जी के सिर से बहुत पहले ही उठ चुका था, और रोहन ही उनकी पूरी दुनिया था। उसके जाने के बाद सुलभा जी हर रोज़ जीते-जी मर रही थीं। उन्हें लगता था कि अब उनके जीने का कोई औचित्य नहीं बचा। वे खुद को एक बोझ समझती थीं और हर रात ईश्वर से यही प्रार्थना करती थीं कि उनकी भी सांसें थम जाएँ।
पर आज, अवनी से बात करने के बाद सुलभा जी के भीतर का खालीपन अचानक भर गया था।
उन्होंने रोहन की तस्वीर को अपनी कांपती उंगलियों से छुआ। उसकी मुस्कुराती आँखों में देखते हुए सुलभा जी ने रोते हुए फुसफुसाया, “रोहन बेटा… आज तेरी माँ समझ गई कि तू मरीजों के लिए अपनी जान की बाज़ी क्यों लगाता था। दूसरों की ज़िंदगी में रोशनी लाने का सुकून क्या होता है, यह आज मुझे महसूस हुआ। तूने अपनी जान देकर लोगों को बचाया था, और आज तेरे जाने के बाद, तेरी माँ ने एक बेटी को मौत के मुँह से खींचकर वापस ज़िंदगी दी है। तू जहाँ भी है, देख… तेरी माँ अब हारेगी नहीं। मैं तेरे छोड़े हुए उस प्यार और इंसानियत के काम को आगे बढ़ाऊँगी।”
उस रात के बाद से सुलभा जी की ज़िंदगी का रंग बदल गया। उन्होंने घर में अकेले बैठकर रोना बंद कर दिया। अगले ही महीने उन्होंने अपने घर के एक हिस्से में एक छोटा सा काउंसलिंग सेंटर शुरू किया, जहाँ वे ऐसे लोगों से बात करती थीं जिन्होंने महामारी में अपनों को खोया था या जो गहरे अवसाद से जूझ रहे थे।
अवनी भी हर दो-तीन दिन में सुलभा जी को फोन करती थी। धीरे-धीरे उसने खुद को संभाला, एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी शुरू की और बच्चों को पढ़ाने लगी। वह अक्सर सुलभा जी से मिलने जमशेदपुर भी आती। उन दोनों का रिश्ता अब किसी सगी माँ-बेटी से कम नहीं था। एक अजनबी फोन कॉल ने दो वीरान जिंदगियों को जोड़कर उम्मीद का एक ऐसा हरा-भरा दरख्त बना दिया था, जिसकी छाँव में न जाने कितने उदास दिलों को सुकून मिल रहा था।
ज़िंदगी बहुत अनमोल है। कभी-कभी जब हमें लगता है कि हमारे सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, उस वक्त कुदरत हमारे लिए कोई नया दरवाज़ा खोल रही होती है। दुख और तकलीफें ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं, पूरी ज़िंदगी नहीं। जब भी आपके आसपास कोई इंसान खामोश दिखे, परेशान दिखे, तो उससे बात कीजिए। आपका सिर्फ इतना कहना कि ‘सब ठीक हो जाएगा, मैं तुम्हारे साथ हूँ’—किसी डूबते हुए इंसान के लिए तिनके का नहीं, बल्कि पूरे जहाज़ का सहारा बन सकता है। प्यार और सहानुभूति बांटने के लिए किसी पुराने रिश्ते की ज़रूरत नहीं होती; कभी-कभी अजनबी बनकर की गई एक छोटी सी मदद भी रूहानी रिश्ता बन जाती है।
क्या आपने कभी अपनी ज़िंदगी में किसी अजनबी की एक छोटी सी बात या दिलासे से खुद को मुश्किल वक्त से बाहर निकलते महसूस किया है? या क्या आप कभी किसी टूटते हुए इंसान का सहारा बने हैं? अपने अनुभव और विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .