सदानंद जी ने धीमे से मुस्कराते हुए अपनी चाल चली और बोले, “बेटा, जब दो समझदार और स्वाभिमानी औरतें अपने-अपने सच को साबित करने में लगी हों, तो समझदार पुरुषों को बीच में नहीं बोलना चाहिए, बल्कि एक तीसरा रास्ता निकालना चाहिए।”
सदानंद जी बिना कुछ कहे उठे, छाता उठाया और चुपचाप बाहर निकल गए। समीर समझ गया कि पिता का इशारा क्या है। पंद्रह मिनट बाद सदानंद जी हाथ में एक बड़ा सा पैकेट लेकर लौटे। वे सीधे रसोई में चले गए, जहाँ कल्याणी देवी और अनुराधा अभी भी अपने-अपने तर्कों की किताब खोले बैठी थीं।
चाय की सबसे खूबसूरत बात यह है कि उसे कभी किसी की इजाजत की दरकार नहीं होती। वह मिट्टी के कुल्हड़ में भी उतनी ही शिद्दत से महकती है जितनी चीनी मिट्टी के नाज़ुक कपों में। खुशी का माहौल हो या मन में घुली कोई खटास, दिल पर लगी कोई गहरी चोट हो या दिनभर की भागदौड़ से टूटी हुई देह, जब उबलते हुए पानी में चायपत्ती, कुटी हुई इलायची और अदरक का मेल होता है, तो वह हर ज़ख्म पर एक हल्का सा मरहम रख देती है। चाय कभी यह नहीं देखती कि उसे पीने वाला महलों का शहंशाह है या फुटपाथ पर बैठा कोई फकीर। वह बस अपने असली रंग में रहती है, बेपरवाह और खरी।
कुछ ऐसी ही खरी और सुलझी हुई थी अनुराधा। पटना के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी अनुराधा ने जब इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की, तो उसने घर बैठकर शादी के दिन गिनने के बजाय शहर के एक प्रतिष्ठित निजी कॉलेज में एडहॉक लेक्चरर के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया। तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन अनुराधा के भीतर का स्वाभिमान उसे किसी पर बोझ नहीं बनने देता था। अपने छोटे-मोटे खर्च वह खुद उठाती, किताबें खरीदती और अपने पैरों पर खड़े होने के सुकून को महसूस करती थी। उसके पिता एक सीधे-सादे बैंक क्लर्क थे और माँ हमेशा यही चिंता करती थी कि बेटी ज्यादा पढ़-लिख गई तो रिश्ते मिलने में मुश्किल होगी। अनुराधा भी यह भली-भांति जानती थी कि हमारे समाज में बेटियों के फैसलों की एक निश्चित मियाद होती है, जिसके बाद शादी का मंडप ही उनका अगला पड़ाव बनता है। इसलिए उसने कभी बेवजह की बगावत नहीं की, बल्कि अपने काम और अध्ययन से अपनी दुनिया को समृद्ध करती रही।
समीर से उसकी पहली मुलाकात एक बेहद सहज माहौल में हुई थी। समीर जल संसाधन विभाग में एक प्रथम श्रेणी का सरकारी इंजीनियर था। ऊँचा-पूरा कद, सौम्य और ठहरा हुआ चेहरा, और बात करने का ऐसा सलीका जो किसी भी इंसान को पल भर में अपना बना ले। जब दोनों को बात करने के लिए अलग कमरे में भेजा गया, तो समीर ने कोई लाग-लपेट नहीं रखी। उसने बेहद शालीनता से पूछा, “अनुराधा जी, मैं काम के सिलसिले में अक्सर दौरे पर रहता हूँ और घर पर माँ-बाबूजी का ख्याल रखना मेरी पहली प्राथमिकता है। क्या आप इस जिम्मेदारी और मेरे साथ अपनी ज़िंदगी की शुरुआत करने के लिए सहज महसूस कर रही हैं?”
अनुराधा ने उसकी आँखों में झाँका। वहाँ किसी अजनबी को परखने का घमंड नहीं, बल्कि एक सच्चा आदर था। अनुराधा ने सिर्फ इतना कहा, “सच्चाई के साथ निभाई गई हर जिम्मेदारी मुझे स्वीकार है।”
समीर की माँ, कल्याणी देवी, कभी शहर के एक बड़े सरकारी कन्या विद्यालय में हेडमिस्ट्रेस रह चुकी थीं। अपने सख्त अनुशासन, सिद्धांतों और मजबूत इच्छाशक्ति के लिए वे पूरे मोहल्ले में जानी जाती थीं। कुछ साल पहले जब उन्हें गठिया और दिल की तकलीफ ने घेरा, तो समीर और उसके पिता सदानंद जी ने एक तरह से ज़िद ठान ली कि अब माँ सिर्फ आराम करेंगी। कल्याणी देवी ने शुरू में इसका खूब विरोध किया, क्योंकि जिस औरत ने चालीस साल तक सैकड़ों छात्राओं और शिक्षकों के अनुशासन को संभाला हो, उसके लिए चारदीवारी में सिमट कर बैठना किसी सज़ा से कम नहीं था। पर परिवार के बेइंतहा प्यार और चिंता के आगे आखिरकार उन्हें झुकना ही पड़ा था।
समीर और अनुराधा की शादी पूरे धूमधाम और उल्लास के साथ संपन्न हुई। कल्याणी देवी ने विदाई के समय अनुराधा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा था, “अब यह घर तुम्हारा है, इसे सँभालना भी तुम्हारा फर्ज़ है।”
लेकिन दो अलग-अलग पीढ़ियों के उसूल जब एक ही चौखट के नीचे आते हैं, तो शुरुआत में तालमेल बिठाना उतना आसान नहीं होता। शादी के बमुश्किल दो हफ्ते ही बीते थे कि घर के भीतर अदृश्य लकीरें खिंचने लगीं। कल्याणी देवी का जीवन पुराने नियमों, परंपराओं और कठोर मितव्ययिता पर टिका था। वहीं अनुराधा की सोच आधुनिक, व्यावहारिक और समय बचाने वाले उपायों पर यकीन रखती थी।
सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, घर के हर कोने में दोनों के स्वाभिमान की मूक रस्साकशी शुरू हो गई। कल्याणी देवी चाहती थीं कि मसाले हमेशा सिलबट्टे पर ही पिसे जाएँ, क्योंकि उनकी नज़र में मिक्सी के ब्लेड मसालों का असली स्वाद और खुशबू मार देते हैं। अनुराधा जब सुबह कॉलेज जाने की जल्दी में मिक्सी का स्विच ऑन करती, तो कल्याणी देवी का माथा ठनक जाता। वे फौरन रसोई की दहलीज पर आकर खड़ी हो जातीं और कहतीं, “इतनी भी क्या हड़बड़ी है बहू? खाने में सब्र का स्वाद न हो, तो पेट तो भर जाता है, पर तृप्ति नहीं मिलती।”
अनुराधा संयम से मुस्कुराकर जवाब देती, “माँ जी, स्वाद मसालों के अनुपात से आता है, पत्थर से घिसने से नहीं। अगर हम मशीनों का सही इस्तेमाल करेंगे तो वही समय हम किसी अच्छी किताब को पढ़ने या थोड़ा आराम करने में लगा सकते हैं।”
कल्याणी देवी अपनी भवें सिकोड़ते हुए कहतीं, “हमने चालीस साल तक गृहस्थी और नौकरी दोनों संभाली है। कभी मिक्सी और आधुनिक बर्तनों के बहाने नहीं ढूंढे। सब कुछ सलीके से वक्त पर ही होता था।”
अनुराधा भी अपनी बात पर अड़ी रहती, “माँ जी, वह आपका ज़माना था। आज की दुनिया की रफ्तार अलग है। अब समझदारी इसी में है कि मेहनत के साथ-साथ थोड़ा स्मार्ट वर्क भी किया जाए।”
जब राशन का सामान आता, तो कल्याणी देवी ऑनलाइन डिलीवरी के पैकेट्स देखकर सिर पकड़ लेतीं। “इतने पैसे में तो पूरे मोहल्ले के लिए महीने भर का किराना आ जाता! बाज़ार जाकर खुद अपनी आँखों से देखकर तोल-मोल कराने का जो मज़ा और बचत है, वो इस फोन के डिब्बों में कहाँ?”
अनुराधा उन्हें समझाने की कोशिश करती, “माँ जी, बाज़ार आने-जाने का पेट्रोल, धूप में खपना और घंटों बर्बाद करना भी तो एक नुकसान ही है। फोन पर चीजें सस्ती भी मिलती हैं और समय भी बचता है।”
इस वैचारिक खींचतान में घर के दोनों पुरुष—समीर और सदानंद जी—बेहद सतर्क रहते थे। समीर जानता था कि माँ अपने जीवन के अनुभवों से सही हैं और अनुराधा अपने वर्तमान के नज़रिए से गलत नहीं है। किसी एक का पक्ष लेना मतलब दूसरे के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना था। सदानंद जी तो रिटायरमेंट के बाद इस कला में माहिर हो चुके थे कि कब अखबार के पीछे छुप जाना है और कब चुपचाप बालकनी में टहलने निकल जाना है। हफ्ते के दिनों में तो सब अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते और बात ज्यादा नहीं बढ़ती, लेकिन रविवार का दिन घर के लिए किसी शांत ज्वालामुखी जैसा होता था, जहाँ कभी भी तर्कों का लावा फूट सकता था।
ऐसा ही एक रविवार आया। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मौसम में एक ठंडी सी सिहरन थी। शाम के करीब चार बज रहे थे।
कल्याणी देवी ने हॉल में बैठे-बैठे आवाज़ लगाई, “अनुराधा, बारिश का मौसम है। आज शाम के नाश्ते में बेसन का चीला बनाओ, उसमें थोड़ी अजवाइन और बारीक कटी हरी मिर्च डालना। इस मौसम में वही पेट के लिए सबसे सही रहता है।”
अनुराधा, जो रसोई में चाय के बर्तन चढ़ा रही थी, बाहर आकर बोली, “माँ जी, चीला तो हम पिछले हफ्ते भी दो बार खा चुके हैं। समीर को और बाबूजी को बारिश में गर्मागर्म सूजी का उपमा पसंद है, जिसमें मैं खूब सारी सब्जियाँ और मूंगफली डालूंगी। हल्का भी रहेगा और मौसम के हिसाब से अच्छा भी लगेगा।”
“उपमा भी कोई शाम का नाश्ता है?” कल्याणी देवी ने अपनी चश्मे के ऊपर से देखते हुए कहा, “बारिश में बेसन की तासीर अच्छी होती है। तुम मेरी बात समझती क्यों नहीं? मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी परिवार की सेहत का ध्यान रखकर खाना बनाया है।”
अनुराधा ने भी अपने तर्क को पीछे नहीं खींचा, “माँ जी, सूजी पचने में आसान होती है और हरी सब्जियों से पोषण भी मिलता है। सेहत का ख्याल रखने का मतलब यह नहीं कि हम हर बार एक ही चीज़ दोहराते रहें।”
दोनों अपने-अपने फैसले पर अड़ी थीं। कल्याणी देवी का चीला बनाम अनुराधा का उपमा। दोनों के बीच शब्दों का ऐसा आदान-प्रदान शुरू हुआ कि रसोई का तापमान कमरे से ज्यादा गर्म हो गया।
सदानंद जी और समीर हॉल में बैठे शतरंज की बिसात बिछाए हुए थे। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। समीर ने दबी आवाज़ में कहा, “बाबूजी, अगर आज फैसला नहीं हुआ, तो शाम की चाय भी नसीब नहीं होगी।”
सदानंद जी ने धीमे से मुस्कराते हुए अपनी चाल चली और बोले, “बेटा, जब दो समझदार और स्वाभिमानी औरतें अपने-अपने सच को साबित करने में लगी हों, तो समझदार पुरुषों को बीच में नहीं बोलना चाहिए, बल्कि एक तीसरा रास्ता निकालना चाहिए।”
सदानंद जी बिना कुछ कहे उठे, छाता उठाया और चुपचाप बाहर निकल गए। समीर समझ गया कि पिता का इशारा क्या है। पंद्रह मिनट बाद सदानंद जी हाथ में एक बड़ा सा पैकेट लेकर लौटे। वे सीधे रसोई में चले गए, जहाँ कल्याणी देवी और अनुराधा अभी भी अपने-अपने तर्कों की किताब खोले बैठी थीं।
सदानंद जी ने पैकेट स्लैब पर रखा और बोले, “बहू, तुम दोनों जरा बाहर बैठो। आज शाम का नाश्ता हम बनाएंगे।”
अनुराधा और कल्याणी देवी ने हैरान होकर पैकेट देखा। उसमें ताज़ा पनीर और ब्रेड के पैकेट थे। समीर भी अपनी आस्तीनें चढ़ाते हुए रसोई में आ धमका। उसने झटपट बेसन का गाढ़ा घोल तैयार किया, उसमें मसाले डाले, और सदानंद जी ने बड़ी ही नफासत से पनीर के बड़े-बड़े टुकड़े काटकर ब्रेड के बीच में सजा दिए।
देखते ही देखते कड़ाही में तेल खौलने लगा और थोड़ी ही देर में छन-छन की आवाज़ के साथ सुनहरे, करारे ब्रेड पकौड़े प्लेट में सजने लगे।
हॉल में बैठी कल्याणी देवी और अनुराधा एक-दूसरे का मुँह ताक रही थीं। न चीला बना, न उपमा। दोनों का ही गणित फेल हो चुका था।
अनुराधा ने तिरछी नज़र से कल्याणी देवी को देखा और हल्के से कुढ़ते हुए बोली, “लीजिए माँ जी, न आपकी चली, न मेरी। दोनों बाप-बेटे ने मिलकर अपना ही मेन्यू पास करवा लिया। अब बताइए, आपका क्या कहना है?”
कल्याणी देवी ने भी पहले तो थोड़ा मुँह बनाया, फिर अपनी कमर सीधी करते हुए एक गहरी सांस ली और बोलीं, “मेरा तो बस यही कहना है… कि इन तीखे पकौड़ों के साथ चाय बिल्कुल कड़क होनी चाहिए, जिसमें अदरक इतना हो कि गले की सारी कड़वाहट उतर जाए!”
अनुराधा एक पल के लिए रुकी, और फिर उसके चेहरे पर एक खिलखिलाती हुई मुस्कान फैल गई। उसने कहा, “और दो कुटी हुई इलायची भी, ताकि महक दूर तक जाए!”
कल्याणी देवी भी अपनी हँसी नहीं रोक पाईं। उनके चेहरे की सारी सख्ती एक पल में पिघल गई। उन्होंने अनुराधा का हाथ थामते हुए कहा, “चलो, कम से कम इस एक बात पर तो हम दोनों की राय एक हुई।”
“हाँ माँ जी, और शायद यही सबसे ज़रूरी भी है,” अनुराधा ने आदर से कहा और झटपट उठकर चाय की पतीली चढ़ाने चली गई।
रसोई से जब अदरक और इलायची की महक उठी और प्लेटों में पकौड़े परोसे गए, तो उस शाम उस घर में किसी की हार नहीं हुई थी, बल्कि दो पीढ़ियों ने एक-दूसरे के वजूद, उसकी सोच और उसके आत्मसम्मान को अपनाना सीख लिया था।
घर केवल ईंट-पत्थरों या एक जैसे विचारों से नहीं बनते। घर बनते हैं अलग-अलग विचारों के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर, थोड़ा सा त्याग और ढेर सारे प्यार की मिठास घोलने से। जैसे कड़क चाय में दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही रिश्तों में भी जब अहंकार घुल जाता है, तो सिर्फ अपनापन बाकी रह जाता है।
क्या आपके घर में भी कभी सास-बहू या दो पीढ़ियों के बीच ऐसी ही प्यारी और नोक-झोंक भरी तकरार हुई है, जिसका अंत किसी छोटी सी मुस्कान या एक कप चाय पर हुआ हो? अपनी राय और अनुभव हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं!
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