“मेरी बच्ची… मेरी लाडो,” देवकी जी ने अंजलि की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज मेरी आँखें धन्य हो गईं। आज मुझे लगा कि मेरा निशांत जहाँ भी होगा, स्वर्ग से हम पर फूलों की बारिश कर रहा होगा। मेरे घर की बहार लौट आई।”
तभी पीछे खड़ा रोहन दोनों हाथों में मिठाइयों और उपहारों के बड़े-बड़े डिब्बे थामे मुस्कुरा रहा था। उसने जानबूझकर एक मासूम सा मुँह बनाया और बनावटी शिकायत भरे लहजे में बोला,
“अरे वाह माँ जी! यह तो सरासर नाइंसाफी है! अपनी बेटी और अपने नाती-नातिन को देखते ही आपने सारा प्यार उन पर लुटा दिया, और मुझे इस भारी-भरकम सामान के साथ धूप में ही खड़ा छोड़ दिया? मैं भी तो इस घर का दामाद हूँ, मेरा कोई स्वागत-सत्कार नहीं होगा क्या?”
कभी हँसी-ठिठोली और खुशियों से चहकने वाला यह दो-मंजिला मकान अब केवल घड़ियों की टिक-टिक और बूढ़े कदमों की आहटों का गवाह बनकर रह गया था। घर के इकलौते बेटे निशांत की एक भीषण सड़क दुर्घटना में हुई अचानक मौत ने इस पूरे परिवार की रीढ़ ही तोड़ दी थी। उस हादसे ने साठ वर्षीया देवकी जी से उनका जवान बेटा छीना था, और पच्चीस साल की अंजलि के माथे से उसका सुहाग, उसका सिंदूर और उसकी पूरी दुनिया ही छीन ली थी। पीछे छूट गए थे केवल दो मासूम फूल—छह साल का तन्मय और चार साल की नन्हीं परी।
शाम के करीब पाँच बज रहे थे। बाहर आँगन में लगे पारिजात के पेड़ से हल्के-हल्के सफेद-नारंगी फूल झड़कर ज़मीन पर बिखर रहे थे। देवकी जी अपने कमरे में बैठी माला फेर रही थीं, तभी बैठक की चौखट पर एक साये ने दस्तक दी।
“माँ जी… क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?”
देवकी जी ने आँखें खोलीं। सामने रोहन खड़ा था। हाथ में फलों की एक टोकरी और चेहरे पर वही चिर-परिचित सौम्यता व आदर। रोहन, निशांत का कॉलेज के दिनों का सबसे पक्का दोस्त था। एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में सीनियर डिज़ाइनर के पद पर कार्यरत रोहन स्वभाव से अत्यंत गंभीर, विचारवान और संस्कारों से भरा हुआ युवक था। निशांत के इस दुनिया से विदा होने के बाद, पिछले दो वर्षों में यदि इस उजड़े हुए घर को किसी बाहरी इंसान ने संबल दिया था, तो वह रोहन ही था। बच्चों के स्कूल के दाखिले से लेकर देवकी जी की दवाओं और बैंक के कामों तक, रोहन ने कभी इस परिवार को यह महसूस नहीं होने दिया था कि उनका कोई रखवाला नहीं है। उसने बिना किसी स्वार्थ के एक बेटे का फर्ज़ निभाया था।
“आओ बेटा रोहन, बैठो,” देवकी जी ने अपनी माला एक तरफ रखते हुए बड़े वात्सल्य से कहा।
रोहन कुर्सी खींचकर उनके पास बैठ गया। उसके चेहरे पर आज एक अजीब सी कशमकश, एक अनकही हिचकिचाहट और आँखों में एक गंभीर संकल्प तैर रहा था। उसने दो घूँट पानी पिया और फिर अपने दोनों हाथ जोड़कर देवकी जी की ओर देखा।
“माँ जी… आज मैं आपसे कुछ माँगने आया हूँ। शायद मेरी बात सुनकर आपको झटका लगे, लेकिन मैंने यह फैसला बहुत सोच-समझकर और अपने पूरे होशोहवास में लिया है,” रोहन की आवाज़ हल्की सी काँपी, पर शब्दों में सच्चाई की दृढ़ता थी।
देवकी जी ने चौंक कर उसकी ओर देखा, “क्या बात है बेटा? तू इतना गंभीर क्यों हो रहा है? जो कहना है बेहिचक कह।”
रोहन ने एक गहरी सांस ली, “माँ जी, मैंने अपने बाबूजी और अपने पूरे परिवार से बात कर ली है। मेरी माँ के जाने के बाद बाबूजी ही मेरे सब कुछ हैं, और वे मेरे विचारों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। जब मैंने उनके सामने अंजलि जी का हाथ थामने का प्रस्ताव रखा, तो वे पल भर के लिए भी नहीं हिचकिचाए। बाबूजी ने कहा कि अंजलि जैसी त्याग की मूरत और संस्कारी बेटी अगर हमारे घर की बहू बनेगी, तो यह हमारे पूरे खानदान का सौभाग्य होगा। माँ जी… मैं अंजलि से विवाह करना चाहता हूँ। मैं तन्मय और परी को अपना नाम, अपना प्यार और अपना भविष्य देना चाहता हूँ। आप बस एक बार अंजलि से बात कर लीजिए…”
रोहन के ये शब्द देवकी जी के कानों में पड़े, तो उन्हें लगा मानो उनके सीने में बरसों से जमी बर्फ पर किसी ने अमृत की बूँदें छिड़क दी हों। उनकी बूढ़ी आँखों में एक पल के लिए चमक कौंधी, लेकिन अगले ही पल समाज का डर, अंजलि की मानसिक स्थिति और एक अनजाना संकोच उनके चेहरे पर उभर आया।
देवकी जी की आँखें भर आईं। उन्होंने रोहन के सिर पर हाथ रखा, “बेटा रोहन, तेरी इस सोच, तेरी इस विशालता को मैं किस शब्द में धन्यवाद दूँ? आज के इस मतलबी दौर में जहाँ लोग परायों की क्या, अपनों की भी विपत्ति में मुँह मोड़ लेते हैं, वहाँ तू दो अनाथ बच्चों और एक विधवा का हाथ थामने का साहस कर रहा है। लेकिन बेटा, तू जानता है न कि अंजलि किस दौर से गुजर रही है? वह तो अपने आप में ही सिमट चुकी है। क्या वह इस नए रिश्ते को स्वीकार कर पाएगी?”
“माँ जी, प्यार किसी पर थोपा नहीं जाता, वह वक्त के साथ विश्वास बनकर पनपता है। मैं अंजलि जी को उनकी शर्तों पर, उनकी पुरानी यादों के पूरे सम्मान के साथ अपनाना चाहता हूँ। मुझे बस आपका आशीर्वाद और उनका साथ चाहिए,” रोहन ने बड़ी शालीनता से सिर झुका दिया।
रोहन के जाने के बाद देवकी जी काफी देर तक अपनी जगह पर सुन्न बैठी रहीं। फिर उन्होंने अपनी सफेद सूती साड़ी का पल्लू कसकर कमर में खोंसा। आज एक सास को अपनी ममता के सबसे बड़े इम्तिहान से गुजरना था। उन्होंने अपने कांपते कदमों को अंजलि के कमरे की ओर मोड़ दिया।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर गहरा सन्नाटा और एक घुटन भरी उदासी पसरी थी। खिड़की की लोहे की सलाखों को पकड़े अंजलि बाहर ढलते हुए सूरज को शून्य नज़रों से निहार रही थी। उसके बदन पर एक बेरंग, फीकी सी खादी की साड़ी थी। माथा बिल्कुल खाली, सूनी कलाइयाँ और आँखों के नीचे आंसुओं के सूख चुके काले निशान। जिस उम्र में लड़कियों के सपनों में नए-नए रंग खिलते हैं, उस उम्र में अंजलि एक ज़िंदा लाश की तरह दिन काट रही थी। पास ही जमीन पर बैठे तन्मय और परी अपनी टूटी हुई पेंसिलों से पन्नों पर लकीरें खींच रहे थे।
देवकी जी ने भीतर कदम रखा। उनकी चूड़ियों की हल्की सी खनक से अंजलि चौंकी और उसने तुरंत अपना पल्लू सिर पर खींच लिया।
“माँ जी… आप क्यों आईं? मुझे आवाज़ दे दी होती, मैं आपके लिए काढ़ा ले आती,” अंजलि ने बुझे हुए स्वर में कहा।
देवकी जी ने कुछ नहीं कहा। वे चुपचाप आगे बढ़ीं, अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर अपने पास बैठा लिया। उन्होंने अंजलि की सूखी हथेलियों को अपनी हथेलियों में समेट लिया और उसके रूखे, बिखरे बालों पर अपनी कांपती उंगलियाँ फेरने लगीं।
“अंजलि… मेरी बच्ची,” देवकी जी का गला रुंध गया। “आज मैं तुझसे एक सास बनकर नहीं, उस माँ के रूप में बात करने आई हूँ जिसने तुझे अपनी कोख से भले न जन्मा हो, पर जिसकी आत्मा तेरे हर दर्द पर लहूलुहान होती है। मेरी बात को बहुत ध्यान से सुनना बेटी।”
अंजलि ने सहमी हुई नज़रों से अपनी सास की तरफ देखा।
देवकी जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “बिटिया, ज़िंदगी बहुत लंबी और बेहद बेरहम होती है। आज मैं ज़िंदा हूँ, तेरे सिर पर मेरी बूढ़ी छाँव है। तेरे मायके में भी तेरे बूढ़े माता-पिता बैठे हैं, जो रोज़ तेरी सलामती की दुआ करते हैं। लेकिन कल जब हम दोनों बूढ़े इस दुनिया की चौखट लांघकर चले जाएँगे, तब सोच इस भयानक और मतलबी समाज के बीच तू अकेली कैसे खड़ी रहेगी? इन दो नन्हे-मुन्ने बच्चों की उंगली पकड़कर यह तूफानी समंदर अकेले कैसे पार करेगी? केवल यादों के सहारे इतनी लंबी उम्र नहीं काटी जा सकती मेरी बच्ची।”
इतना सुनते ही अंजलि के सीने में बरसों से दबा दर्द ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। वह देवकी जी की गोद में गिर पड़ी और ज़ोर-ज़ोर से सिसक-सिसक कर रोने लगी। उसका पूरा शरीर कांप रहा था।
“नहीं माँ… भगवान के लिए मुझसे ऐसा कुछ मत कहिए!” अंजलि की हिचकियाँ बंध गईं। “मेरी तकदीर में जब विधाता ने दुख ही दुख लिख दिया, तो मैं किसी और की ज़िंदगी में ग्रहण बनकर क्यों जाऊँ? अगर मेरे भाग्य में सुख होता, तो निशांत जी मुझे इस भरी जवानी में बीच मझधार में छोड़कर क्यों चले जाते? मुझे कोई नया सवेरा नहीं चाहिए माँ। मैं अपने पति की यादों, उनके छोड़े हुए इस घर और इन दो बच्चों की परवरिश में अपनी बाकी बची ज़िंदगी घिस लूँगी। मैं अभागन हूँ माँ, मुझे किसी खुशियों की लालसा नहीं है।”
अंजलि का यह क्रंदन सुनकर देवकी जी की अपनी आँखों से भी आँसुओं की धारा बह निकली। उनके दिल पर जैसे किसी ने आरी चला दी हो। उन्होंने अंजलि का चेहरा दोनों हाथों से ऊपर उठाया और उसके भीगे गालों को चूम लिया।
“चुप हो जा अंजलि! अपने मुँह से खुद को अभागन मत कह!” देवकी जी की आवाज़ में ममता के साथ-साथ एक गजब की कड़क आ गई। “जो चला गया, उस पर न तेरा ज़ोर था और न मेरा। मैंने भी तो अपना एकलौता जवान बेटा खोया है अंजलि! एक माँ के सामने उसकी औलाद की अर्थी उठ जाए, इससे बड़ा नरक इस दुनिया में क्या होगा? क्या मेरा कलेजा नहीं फटा था? लेकिन जो चला गया, उसके साथ जो ज़िंदा हैं, उनकी साँसों का गला तो नहीं घोंटा जा सकता ना? क्या निशांत की आत्मा यह देखकर खुश होगी कि उसकी पत्नी और उसके बच्चे तिल-तिल कर जीते जी मर रहे हैं?”
अंजलि ने रोते हुए नज़रें झुका लीं।
देवकी जी ने उसके आँसू पोंछते हुए बहुत ही भावुक स्वर में कहा, “रोहन ने आज तेरा हाथ माँगा है बेटी। उसने इन दोनों अनाथ बच्चों को अपना नाम और अपनी छत्रछाया देने का पवित्र संकल्प लिया है। वह कोई एहसान नहीं कर रहा, वह पूरे सम्मान और प्यार के साथ तुझे अपनी अर्धांगिनी बनाना चाहता है। ऐसा देवता स्वरूप इंसान आज के युग में लाखों में एक मिलता है। अंजलि, अगर तूने आज यह कदम नहीं उठाया, तो तू अपने साथ-साथ इन दोनों मासूमों के भविष्य की भी हत्या कर देगी। एक माँ होने के नाते मैं आज तुझसे भीख माँगती हूँ, और एक सास होने के नाते तुझे हुक्म देती हूँ कि तू अपनी इस पुरानी, उदास खोल से बाहर निकल और एक नई अंजलि बनकर अपनी ज़िंदगी को दूसरा मौका दे। तुझे मेरी कसम है बेटी, तुझे अपने इस बूढ़े माँ के आँसुओं की कसम है!”
अपनी सास के पैरों में गिरकर अंजलि केवल रोती रही। जिस सास को समाज हमेशा ‘क्रूर’ और ‘शोषक’ के रूप में चित्रित करता है, आज वही सास अपनी विधवा बहू की सूनी माँग में रंग भरने के लिए अपने आँचल का वास्ता दे रही थी। इस अलौकिक, निस्वार्थ और महान मातृत्व के आगे अंजलि का सारा प्रतिरोध, सारी ज़िद तिनके की तरह बह गई। उसने सिसकते हुए धीरे से अपनी स्वीकृति में सिर हिला दिया।
अगले ही महीने, शहर के एक शांत और ऐतिहासिक आर्य समाज मंदिर के प्रांगण में एक अत्यंत सादा लेकिन गरिमामय विवाह समारोह आयोजित हुआ। हवन कुंड में उठती पावन अग्नि की लपटें गवाह थीं उस ऐतिहासिक मोड़ की। समाज के तथाकथित पहरुओं, दूर के रिश्तेदारों और कुछ संकीर्ण सोच वाले पड़ोसियों ने पीठ पीछे खूब फुसफुसाहट की। किसी ने कहा, “देखो तो, जवान बेटे की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई कि सास ने बहू की डोली सजा दी! ज़रूर कोई चाल होगी।” लेकिन देवकी जी चट्टान की तरह अडिग रहीं। उन्होंने किसी ताने, किसी व्यंग्य की परवाह नहीं की।
उस दिन देवकी जी ने खुद अपने कांपते हाथों से अंजलि को लाल बनारसी चुनरी ओढ़ाई। उन्होंने खुद अपनी ‘बेटी’ का कन्यादान किया और रोहन के हाथों में अंजलि का हाथ सौंपते हुए कहा, “बेटा, आज से यह मेरी बहू नहीं, मेरी सबसे प्यारी बेटी है। इसकी आँखों में कभी आँसू मत आने देना।” विदाई के समय अंजलि जब देवकी जी के गले लगकर रो रही थी, तो देवकी जी ने हँसते हुए उसके आँसू पोंछे थे और उसे एक नए संसार में कदम रखने का हौसला दिया था।
वक्त अपनी रफ्तार से बहता रहा। छह महीने बीत चुके थे।
आज सुबह से ही मणिनगर वाले उस ‘शांति निकेतन’ की फिज़ा बिल्कुल बदली हुई थी। घर के मुख्य द्वार पर ताज़े आम के पत्तों का तोरण बँधा था। रसोई से उड़ती शुद्ध देसी घी के मालपुए, कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी और मेवे वाली खीर की खुशबू से पूरा मोहल्ला महक रहा था। देवकी जी सुबह चार बजे से ही रसोई में जुटी हुई थीं। उनके बूढ़े पैरों में आज न जाने कहाँ से सोलह साल की लड़की जैसी फुर्ती आ गई थी। उन्होंने घर के हर कोने को फूलों से सजाया था।
तभी बाहर सड़क पर एक कार आकर रुकी और दरवाजे की घंटी बजी। साथ ही बाहर से नन्हे-मुन्ने कदमों की दौड़ और चहकती हुई आवाज़ें गूँज उठीं—”नानी… ओ नानी! दरवाज़ा खोलो, हम आ गए!”
(तन्मय और परी अब देवकी जी को दादी नहीं, बल्कि ‘नानी’ कहते थे, क्योंकि देवकी जी ने अंजलि को विदा करके खुद को उसकी सगी माँ का दर्जा दे दिया था)।
देवकी जी ने अपने आँचल से बेसन में सने हाथ जल्दी-जल्दी पोंछे और लगभग दौड़ती हुई मुख्य द्वार की ओर भागीं। जैसे ही उन्होंने सिटकनी खोली, तन्मय और परी दोनों झपटकर उनकी टांगों से लिपट गए।
“मेरी जान! मेरे बच्चे!” देवकी जी घुटनों के बल बैठ गईं और दोनों बच्चों के माथे, गालों को पागलों की तरह चूमने लगीं। बच्चों के चेहरे पर आज वह पुराना सहमा हुआ डर नहीं था; वे स्वस्थ, खिले हुए और नए सुंदर कपड़ों में राजकुमार और राजकुमारी जैसे लग रहे थे।
तभी देवकी जी ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। चौखट पर अंजलि खड़ी थी।
देवकी जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने खड़ी अंजलि को देखकर उन्हें अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हुआ। रानी गुलाबी रंग की भारी कांजीवरम रेशमी साड़ी, हाथों में खनकती लाल और हरी काँच की चूड़ियाँ, माथे पर झिलमिलाती महरून रंग की बड़ी बिंदी और माँग में भरा हुआ सुर्ख गहरा सिंदूर। अंजलि के चेहरे पर एक अलौकिक तेज, एक गहरा आत्मिक सुकून और स्वाभिमान का ऐसा नूर चमक रहा था, जिसने उसकी पुरानी सारी उदासी, उसके पीलेपन और उसकी खामोशी को हमेशा के लिए धो दिया था। रोहन के निस्वार्थ प्रेम, अथाह सम्मान और अपनत्व ने अंजलि को सचमुच एक नई ज़िंदगी बख्श दी थी।
अंजलि की आँखें भर आईं। वह तेजी से आगे बढ़ी और “माँ!” कहकर सीधे देवकी जी के सीने से लिपट गई।
देवकी जी ने अपनी दोनों बाँहें उसके चारों तरफ कस दीं। दोनों औरतें उस चौखट पर खड़ी होकर रो रही थीं, लेकिन आज उन आँसुओं में किसी मातम की चीख नहीं थी; आज उन बूँदों में एक तपस्या के सफल होने की, एक उजड़े हुए चमन में दोबारा बसंत लौटने की पावन तृप्ति थी।
“मेरी बच्ची… मेरी लाडो,” देवकी जी ने अंजलि की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज मेरी आँखें धन्य हो गईं। आज मुझे लगा कि मेरा निशांत जहाँ भी होगा, स्वर्ग से हम पर फूलों की बारिश कर रहा होगा। मेरे घर की बहार लौट आई।”
तभी पीछे खड़ा रोहन दोनों हाथों में मिठाइयों और उपहारों के बड़े-बड़े डिब्बे थामे मुस्कुरा रहा था। उसने जानबूझकर एक मासूम सा मुँह बनाया और बनावटी शिकायत भरे लहजे में बोला,
“अरे वाह माँ जी! यह तो सरासर नाइंसाफी है! अपनी बेटी और अपने नाती-नातिन को देखते ही आपने सारा प्यार उन पर लुटा दिया, और मुझे इस भारी-भरकम सामान के साथ धूप में ही खड़ा छोड़ दिया? मैं भी तो इस घर का दामाद हूँ, मेरा कोई स्वागत-सत्कार नहीं होगा क्या?”
रोहन की इस मासूम और छेड़खानी भरी बात पर पूरे दालान में एक ज़ोरदार, खुशनुमा ठहाका गूँज उठा। अंजलि ने अपनी साड़ी के पल्लू से मुँह छुपाकर हँस दिया, और बच्चों ने ताली बजा दी।
देवकी जी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। वे आगे बढ़ीं, उन्होंने रोहन के सिर पर अपना हाथ रखा और फिर अपनी दोनों बाहों का घेरा बनाकर उन चारों को—रोहन, अंजलि और दोनों नन्हे बच्चों को—एक साथ अपने सीने में समेट लिया।
उस दोपहर ‘शांति निकेतन’ के आँगन में केवल सूरज की धूप नहीं खिली थी, बल्कि वहाँ इंसानियत, ममता और साहस का एक ऐसा अमर सवेरा हुआ था, जिसने यह साबित कर दिया था कि अगर एक माँ चाहे, तो वह अपनी ममता के बल पर समाज की सदियों पुरानी रूढ़ियों की ज़ंजीरों को तोड़कर, मौत के सन्नाटे को भी जीवन के सबसे मधुर संगीत में बदल सकती है।
प्रिय पाठकों,
क्या हमारे समाज को आज देवकी जी जैसी साहसी और विशाल हृदय वाली माताओं की ज़रूरत नहीं है, जो अपनी विधवा बहुओं को जीवन भर आंसुओं और सफेद साड़ियों में घुटने के लिए छोड़ने के बजाय, उन्हें अपनी बेटी बनाकर उनका नया संसार बसाने का हौसला दिखा सकें? क्या रूढ़ियों को तोड़कर किसी बेसहारा को सम्मानजनक जीवन देना ही धर्म का सबसे सच्चा रूप नहीं है? इस प्रेरक और दिल को छू लेने वाली कहानी पर आपके क्या विचार हैं, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखकर बताएँ।
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