रीमा एक शिक्षित, सुंदर और संस्कारी महिला थी। उसकी शादी अमित से हुई थी, जो एक निजी कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत था। अमित का परिवार छोटा और सुखी था। घर में उसके सास-ससुर, पति और दो बच्चे थे। सास-ससुर रीमा को अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे और उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखते थे। फिर भी रीमा का मन अपने मायके में ही लगा रहता था।
रीमा महाराष्ट्र के एक छोटे-से शहर में पली-बढ़ी थी। उसके माता-पिता, भाई-भाभी और बचपन की यादें वहीं थीं। शादी के बाद वह दिल्ली आ गई थी, लेकिन उसका मन आज भी मायके की गलियों में भटकता रहता था। जब भी उसे समय मिलता, वह मायके जाने की योजना बनाने लगती। त्योहार हो, छुट्टी हो या किसी रिश्तेदार का समारोह, वह हर अवसर पर मायके जाने के लिए उत्सुक रहती थी।
शुरुआत में अमित को रीमा का मायके जाना बहुत अच्छा लगता था। वह स्वयं उसे स्टेशन छोड़ने जाता और लौटते समय उसके लिए पसंदीदा मिठाइयाँ भी लाता था। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि रीमा अपने मायके के प्रति इतनी आकर्षित है कि अपने वर्तमान परिवार की खुशियों और जरूरतों को अनदेखा करने लगी है।
एक दिन अमित ने प्यार से कहा, “रीमा, इस रविवार को माँ-पिताजी की शादी की सालगिरह है। हम सब मिलकर घर पर एक छोटा-सा समारोह रखना चाहते हैं। तुम माँ के साथ मिलकर कुछ तैयारियाँ कर लेना।”
रीमा ने तुरंत कहा, “लेकिन अमित, उसी दिन मेरी भाभी ने मुझे मायके बुलाया है। वहाँ मेरी सहेली भी आने वाली है। मैं यह अवसर छोड़ नहीं सकती।”
अमित ने समझाने की कोशिश की, “तुम अगले सप्ताह चली जाना। माँ-पिताजी तुम्हारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं।”
रीमा को उसकी बात बुरी लगी। वह नाराज होकर बोली, “तुम नहीं समझ सकते कि मायका मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण है। वहाँ मुझे अपनेपन का एहसास होता है।”
अमित चुप हो गया। वह रीमा को दुखी नहीं करना चाहता था, लेकिन उसके मन में एक सवाल उठने लगा था—क्या रीमा इस घर को कभी अपना घर मान पाएगी?
कुछ दिनों बाद रीमा फिर मायके चली गई। वहाँ पहुँचते ही उसकी माँ ने उसे गले लगा लिया। पिता ने उसके पसंदीदा फल मँगवाए और भाई ने उसके लिए नए कपड़े खरीदे। रीमा को लगा कि उसके मायके में आज भी सब कुछ वैसा ही है, जैसा शादी से पहले था।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं। भाई की अपनी जिम्मेदारियाँ थीं, भाभी को घर और बच्चों की देखभाल करनी होती थी और माता-पिता भी अब पहले की तरह स्वस्थ नहीं रहते थे। फिर भी रीमा चाहती थी कि सब लोग अपना समय और ध्यान केवल उसी को दें।
एक शाम रीमा ने अपनी भाभी से कहा, “तुम पहले की तरह मेरे साथ बैठकर बातें नहीं करतीं। अब तो मुझे लगता है कि इस घर में मेरी कोई अहमियत ही नहीं रही।”
भाभी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “दीदी, ऐसा बिल्कुल नहीं है। आप इस घर की बेटी हैं और हमेशा रहेंगी। लेकिन अब हमारी भी कुछ जिम्मेदारियाँ हैं। आपकी अपनी गृहस्थी है और हमारी अपनी। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा प्यार कम हो गया है।”
रीमा को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने मन ही मन सोचा कि शादी के बाद मायके में उसका महत्व कम हो गया है। वह उदास होकर अपने कमरे में चली गई।
अगले दिन उसकी माँ उसके पास आईं और प्यार से बोलीं, “बेटा, तुम्हें याद है, जब तुम छोटी थीं, तो हमेशा कहती थीं कि बड़ी होकर अपने घर को बहुत सुंदर बनाओगी? आज तुम्हारा अपना परिवार है। तुम्हारे पति और बच्चे तुम्हारे साथ समय बिताना चाहते हैं। तुम्हें दोनों घरों के बीच प्रेम का पुल बनना चाहिए, न कि किसी एक घर को दूसरे से अधिक महत्व देना चाहिए।”
रीमा ने माँ की बात सुनी, लेकिन वह अभी भी अपने मन के मोह से बाहर नहीं निकल पाई थी।
कुछ सप्ताह बाद एक ऐसी घटना घटी जिसने उसकी जिंदगी बदल दी।
एक दिन अमित का फोन आया। उसकी आवाज घबराई हुई थी। उसने बताया कि रीमा के ससुर की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। रीमा उस समय मायके में थी। खबर सुनते ही वह तुरंत दिल्ली के लिए निकल पड़ी।
अस्पताल पहुँचकर उसने देखा कि अमित कई घंटों से अकेले ही डॉक्टरों से बात कर रहा था। उसकी सास एक कोने में बैठी रो रही थीं और बच्चे भी दादा की चिंता में परेशान थे। अमित ने रीमा को देखते ही राहत की साँस ली।
रीमा की सास ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, तुम्हारे आने से मुझे हिम्मत मिली है। अब हम सब मिलकर इस कठिन समय का सामना करेंगे।”
उन शब्दों ने रीमा के मन को झकझोर दिया। जिस परिवार को वह अक्सर अपनी जिम्मेदारी समझकर निभाती थी, आज वही परिवार उसे अपने सबसे कठिन समय में पुकार रहा था। उसे एहसास हुआ कि प्यार केवल अच्छे समय में साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का सहारा बनने का नाम भी है।
अगले कई दिनों तक रीमा ने अस्पताल और घर की जिम्मेदारियाँ सँभालीं। वह सास के साथ बैठती, बच्चों को समझाती और अमित का हौसला बढ़ाती। धीरे-धीरे उसके ससुर की तबीयत में सुधार होने लगा।
एक शाम जब रीमा उनके पास बैठी थी, तो ससुर ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “बेटी, तुम इस घर में आई थीं, तब से हमने तुम्हें अपनी बेटी माना है। हम कभी नहीं चाहते कि तुम अपने माता-पिता से दूर हो जाओ। मायके का प्यार जीवन भर साथ रहता है। बस इतना चाहते हैं कि इस घर में भी तुम्हें वही अपनापन महसूस हो।”
रीमा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपने ससुर का हाथ चूमते हुए कहा, “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं मायके के मोह में इतनी खो गई थी कि आपके प्यार को ठीक से समझ ही नहीं पाई। मैंने हमेशा मायके को अपना घर माना, लेकिन यह भूल गई कि आपने भी मुझे बेटी की तरह अपनाया है।”
ससुर ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, माफी माँगने की जरूरत नहीं। रिश्ते समझने में कभी देर नहीं होती। बस प्यार और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना।”
उस दिन रीमा ने मन ही मन एक संकल्प लिया। वह अपने माता-पिता से पहले की तरह मिलती रहेगी, उनकी सेवा करेगी और उनके सुख-दुख में साथ देगी। लेकिन अब वह अपने पति, बच्चों और सास-ससुर की भावनाओं का भी पूरा ध्यान रखेगी।
कुछ महीनों बाद रक्षाबंधन का त्योहार आया। रीमा ने अपने भाई को राखी भेजी और वीडियो कॉल पर माता-पिता से लंबी बातचीत की। उसने उनसे कहा कि वह अगले सप्ताह उनसे मिलने आएगी। इसके बाद उसने घर में सबके साथ मिलकर त्योहार मनाया। बच्चों की हँसी, सास की मुस्कान और अमित के चेहरे पर संतोष देखकर उसे एक अनोखी खुशी मिली।
अब रीमा समझ चुकी थी कि मायके से प्रेम करना कोई गलत बात नहीं है। गलत तब होता है, जब उस प्रेम के मोह में हम अपने वर्तमान रिश्तों की उपेक्षा करने लगते हैं। मायका वह जड़ है, जिससे बेटी को संस्कार और प्रेम मिलता है, जबकि ससुराल वह आँगन है, जहाँ वह अपने नए रिश्तों को सींचकर एक सुंदर संसार बनाती है।
रीमा ने अपने जीवन में दोनों घरों को समान प्रेम और सम्मान देना सीख लिया। अब वह मायके जाती तो पूरे उत्साह से जाती, लेकिन लौटते समय उसे अपने घर आने की भी उतनी ही खुशी होती।
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