मायके का मोह – डॉ आभा माहेश्वरी

सावन की पहली बारिश हो रही थी। आँगन में रखे तुलसी के चौरे से मिट्टी की सौंधी सुगंध उठ रही थी। खिड़की के पास बैठी सुमन बारिश की बूँदों को निहार रही थी, लेकिन उसकी आँखों में बादलों से भी अधिक नमी थी। आज सुबह ही मायके से माँ का फोन आया था— “बेटी, इस बार सावन में आ जा। तेरे बिना घर सूना-सूना लगता है।”

माँ के ये शब्द सुनते ही सुमन का मन वर्षों पीछे लौट गया। वही पुराना घर, वही नीम का पेड़, वही आँगन जहाँ उसने बचपन की अठखेलियाँ की थीं। वही चौखट, जिसके भीतर उसकी हँसी गूँजती थी और वही माँ, जिसकी गोद में सिर रखकर वह अपने सारे दुःख भूल जाती थी।

शादी को पंद्रह वर्ष हो चुके थे। सुमन दो बच्चों की माँ थी। पति राजेश एक अच्छे इंसान थे और ससुराल में भी उसे किसी बात की कमी नहीं थी। फिर भी न जाने क्यों, जब भी मायके की याद आती, उसके भीतर कुछ पिघलने लगता। उसे लगता, जैसे जीवन की भागदौड़ में कहीं उसका बचपन छूट गया हो, जिसे वह बार-बार पकड़ने की कोशिश करती थी।

सुमन के लिए मायका केवल एक घर नहीं था, बल्कि वह संसार था जहाँ उसे किसी भूमिका में बँधकर नहीं रहना पड़ता था। वहाँ वह किसी की पत्नी, बहू या माँ होने से पहले केवल सुमन थी— माँ की लाड़ली बेटी, पिता की दुलारी और भाई की प्यारी बहन।

      उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। उनके जाने के बाद मायके का आँगन जैसे कुछ और सूना हो गया था। माँ अकेली रह गई थीं। छोटा भाई सुमित नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहता था। माँ दिनभर घर के कामों में लगी रहतीं, पर शाम होते ही उनकी आँखें दरवाजे पर टिक जातीं। शायद उन्हें लगता कि किसी दिन उनकी बेटी अचानक आ जाएगी और घर फिर से खिल उठेगा।

      सुमन ने राजेश से मायके जाने की इच्छा जताई तो उन्होंने सहजता से कहा, “तो इसमें सोचने की क्या बात है? माँ ने बुलाया है, चली जाओ। कुछ दिन उनके साथ रह आओ।”

राजेश की सहज स्वीकृति ने सुमन का मन हल्का कर दिया। अगले ही दिन वह बच्चों के साथ मायके पहुँच गई।

घर के दरवाजे पर माँ खड़ी थीं। सुमन को देखते ही उनकी आँखें चमक उठीं। उन्होंने बेटी को गले लगाया तो दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

       अगली सुबह सुमन ने माँ को डॉक्टर के पास ले जाने का निर्णय लिया। जाँच के बाद पता चला कि माँ को नियमित दवाइयों और उचित देखभाल की आवश्यकता थी। सुमन ने उनके लिए दवाइयों का समय तय किया, डॉक्टर से आगे की सलाह ली और भाई सुमित से भी बात की। दोनों ने मिलकर माँ की देखभाल की जिम्मेदारी बाँटने का निश्चय किया।

कुछ दिन बाद सुमन के लौटने का समय आया। माँ चुपचाप उसके कपड़े बैग में रखने लगीं। सुमन ने माँ के हाथ पकड़ लिए।

“माँ, मैं जा रही हूँ, लेकिन अब आपको अकेले सब सहने नहीं दूँगी। हर महीने आऊँगी, रोज फोन करूँगी और जब भी जरूरत होगी, आपके पास रहूँगी।”

माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटी को गले लगाकर कहा, “बेटी, मायके का मोह बुरा नहीं होता। बस इतना याद रखना कि जिस घर से तू जुड़ी है, उस घर के रिश्तों को भी अपने स्नेह से सींचती रहना।”

सुमन ने माँ के चरण छुए और भारी मन से विदा ली। गाड़ी आगे बढ़ रही थी, लेकिन उसकी नजरें तब तक पीछे मुड़ती रहीं, जब तक घर की वो चौखट दिखाई देती रही डहाँ से वो विदा होकर ससुराल गई थी।।

रास्ते में उसने महसूस किया कि मायके का मोह केवल पुराने घर, बचपन की यादों या माँ के हाथ के खाने का मोह नहीं है। यह उस निःस्वार्थ प्रेम का मोह है, जहाँ हमारी गलतियों पर भी अपनापन मिलता है, जहाँ हमारी खामोशी भी सुनी जाती है और जहाँ उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए, हम किसी के लिए हमेशा बच्चे बने रहते हैं जैसे कई आज भी मेरे बड़े भाई और बड़ी भाभी मुझे बच्चे जैसा ही स्नेह करते हैं।

ससुराल उसका वर्तमान था, उसके बच्चों का संसार था और उसकी गृहस्थी की जिम्मेदारी थी। लेकिन मायका उसके जीवन की वह जड़ था, जिससे उसे भावनाओं का पोषण मिलता था।

उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह अपने मायके को केवल यादों में जीवित नहीं रखेगी, बल्कि अपने समय, अपने स्नेह और अपनी उपस्थिति से उसे जीवंत बनाए रखेगी।

क्योंकि बेटी विवाह के बाद घर बदलती है, अपनेपन का अर्थ नहीं। मायका पीछे छूट सकता है, लेकिन माँ की गोद में मिलने वाला सुकून जीवनभर मन के भीतर बसा रहता है।

   और सच तो यह है कि मायके का मोह किसी बेटी की कमजोरी नहीं, उसके हृदय में बसे उस प्रेम की पहचान है, जो समय, दूरी और जिम्मेदारियों के बावजूद कभी कम नहीं होता और दिन पर दिन प्रगाढ़ होता जाता है।

लेखिका:डॉ आभा माहेश्वरी अलीगढ 

#मायके का मोह

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