रिश्तों की गर्माहट

 मयंक भी दफ्तर से आते ही सबसे पहले प्रभावती जी के कमरे में जाता, उनके पैर छूता और दिनभर की बातें साझा करता। सुबह की पहली चाय और शाम का नाश्ता पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर हँसते-खिलखिलाते हुए करता। प्रभावती जी की हर छोटी-बड़ी पसंद का ध्यान ऐसे रखा जाता मानो वे उस घर की सबसे अनमोल धरोहर हों। प्रेम, अपनेपन और बातचीत की इस संजीवनी ने चमत्कार कर दिखाया। कुछ ही महीनों में प्रभावती जी की सभी दवाइयां छूट गईं। 

विशंभर दयाल जी भारतीय डाक विभाग में वरिष्ठ डाकपाल के पद पर तैनात थे। कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन उनके स्वभाव की ऐसी पूंजी थी, जिसे वे जीवन भर संजोए रहे। पत्र छांटने से लेकर सुदूर गाँवों तक लोगों के सुख-दुख के संदेश पहुँचाने में कब उनकी जवानी ढल गई, उन्हें पता ही नहीं चला। उनकी धर्मपत्नी प्रभावती देवी एक सहज, ममतामयी और कुशल गृहिणी थीं, जिन्होंने अभावों में भी घर को हमेशा खुशियों से गुलजार रखा। उनके दो होनहार पुत्र थे—अमित और सुमित। दोनों ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद शहर की जानी-मानी कंपनियों में अच्छी नौकरियां पा ली थीं। घर की सबसे लाडली और छोटी सदस्य थी बेटी रोहिणी, जिसने हाल ही में अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि ली थी।

विशंभर जी काफी समय बाद वार्षिक अवकाश लेकर अपने परिवार के बीच आए थे। इसी अवकाश के दौरान उन्होंने रोहिणी के भविष्य को लेकर बड़ा कदम उठाने का मन बनाया। कुछ समय पहले एक पारिवारिक समारोह में उनकी मुलाकात अपने एक पुराने परिचित के सुपुत्र मयंक से हुई थी। मयंक स्वभाव से बेहद विनम्र, शांत और सुलझा हुआ युवक था। वह एक निजी मल्टीनेशनल फर्म में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत था। विशंभर जी को पहली ही नजर में मयंक का सहज व्यक्तित्व भा गया था। जब उन्होंने परिवार के सामने मयंक का प्रस्ताव रखा, तो सभी ने एकमत से सहमति जताई। बहुत ही सादगी और पारिवारिक गरिमा के साथ रोहिणी और मयंक का विवाह संपन्न हो गया। रोहिणी अपने नए घर में बेहद सुखी थी और मयंक ने दामाद नहीं, बल्कि बेटे जैसा सम्मान विशंभर जी के दिल में बना लिया था।

रांची के एक प्रतिष्ठित इलाके में विशंभर जी का अपना दोमंजिला मकान था, जहाँ अमित और सुमित की अपनी-अपनी गृहस्थी भी बस चुकी थी। पूरा परिवार एक साथ हँसता-खेलता रहता था। कुछ महीनों बाद विशंभर जी की सेवा के चालीस वर्ष पूरे हुए और वे सेवानिवृत्त हो गए। विदाई समारोह के बाद जब वे घर लौटे, तो उनके मन में एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने अपने बेटों और बहुओं को बिठाकर कहा कि उन्होंने पूरी ज़िंदगी व्यस्तता और भागदौड़ में काट दी, अब वे अपनी बची हुई ज़िंदगी अपने पैतृक गाँव माधोपुर की मिट्टी की सौंधी खुशबू और शांत हवाओं के बीच बिताना चाहते हैं। अमित और सुमित ने काफी समझाया कि शहर में सारी सुख-सुविधाएं हैं, पास में डॉक्टर हैं, लेकिन विशंभर जी का निर्णय अटल था। प्रभावती जी भी पति के फैसले के साथ खड़ी थीं। दोनों पुराने गाँव चले गए और अपने पुराने खपरैल वाले पुश्तैनी मकान को संवारकर वहीं बस गए।

गाँव का जीवन खुला और आत्मीय था। सुबह पक्षियों की चहचहाहट, नीम के पेड़ की ठंडी छांव और शाम को चौपाल पर बैठना विशंभर जी को एक नई ऊर्जा देता था। प्रभावती देवी भी आँगन में तुलसी सींचतीं, गाय की सेवा करतीं और पुराने पड़ोसियों से बतियातीं। एक दिन आँगन में खाट पर बैठे-बैठे प्रभावती जी ने बातों-बातों में अपनी एक पुरानी अभिलाषा ज़ाहिर की। उन्होंने कहा कि गृहस्थी के झंझटों में ज़िंदगी बीत गई, अब जब कोई जिम्मेदारी नहीं बची है, तो वे एक बार दक्षिण और उत्तर के प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा करना चाहती हैं।

विशंभर जी ने पत्नी के चेहरे पर बरसों बाद एक निश्छल इच्छा देखी, तो वे तुरंत तैयार हो गए। उन्होंने तुरंत हवाई यात्रा और विशेष दर्शन के टिकट बुक कराए। कुछ ही दिनों में दोनों पति-पत्नी अपने जीवन के सबसे सुनहरे सफर पर निकल पड़े। रामेश्वरम के विशाल सागर तट से लेकर मदुरै के भव्य मंदिरों के दर्शन करते हुए वे प्रयागराज पहुँचे। प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर पवित्र स्नान किया, शाम के समय दीपदान किया और जलती हुई बत्तियों को लहरों पर तैरते देख प्रभावती जी का मन असीम शांति से भर गया। दोनों का यह सफर किसी दैवीय आशीर्वाद जैसा बीता। तीर्थाटन की तृप्ति और ढेर सारी सुनहरी स्मृतियाँ लेकर दोनों वापस अपने गाँव माधोपुर लौट आए।

परंतु जीवन की धूप-छांव का हिसाब कोई पहले से नहीं लगा सकता। इंसान भविष्य की योजनाएं बनाता है, पर नियति अपनी अलग ही पटकथा लिख रही होती है। तीर्थ यात्रा से लौटे अभी कुछ ही हफ्ते हुए थे कि एक रात विशंभर जी खाना खाकर रोज की तरह सोने चले गए। अगली सुबह जब बहुत देर तक उनका कमरा नहीं खुला, तो प्रभावती जी जगाने पहुँचीं। विशंभर जी की देह ठंडी पड़ चुकी थी। गाँव के चिकित्सक ने आकर जांच की और बताया कि रात को सोते समय ही उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा था, जिससे उनका देहांत हो गया।

इस आकस्मिक आघात ने प्रभावती जी की दुनिया ही उजाड़ दी। सूचना मिलते ही अमित, सुमित, रोहिणी और मयंक बदहवास हालत में गाँव पहुँचे। घर में कोहराम मच गया। दोनों बेटों ने भारी मन से अपने पिता को मुखाग्नि दी। तेरह दिनों तक पूरा परिवार गाँव में ही रुका। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया, गाँव-जवार के लोगों की पंगत बैठी और पिता की आत्मा की शांति के लिए सभी धार्मिक विधान पूरे किए गए। इसके बाद जब लौटने का समय आया, तो बेटों ने प्रभावती जी को अकेले गाँव में छोड़ना उचित नहीं समझा। प्रभावती जी अपने पति की यादों से भरे उस घर को भारी मन से ताला लगाकर बेटों के साथ रांची आ गईं।

शहर का वह बड़ा मकान प्रभावती जी के लिए किसी पिंजरे जैसा साबित होने लगा। दोनों बेटे सुबह तैयार होकर दफ्तर निकल जाते, बहुएं अपने-अपने बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग और अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहतीं। पूरा घर दिनभर मौन की चादर ओढ़े रहता और शाम को जब सब लौटते, तो अपने-अपने कमरों में मोबाइल या टीवी में सिमट जाते। प्रभावती जी बैठक के कोने में रखी आरामकुर्सी पर बैठी शून्य को निहारती रहतीं। गाँव में जहाँ हर राहगीर रुककर राम-राम करता था, यहाँ बगल वाले फ्लैट के लोग भी एक-दूसरे को नहीं पहचानते थे। इस अकेलेपन और पति के वियोग ने प्रभावती जी के शरीर को भीतर से खोखला कर दिया। उन्हें भूख लगना बंद हो गई, रक्तचाप बढ़ने लगा और वे आए दिन बीमार रहने लगीं। डॉक्टरों को दिखाया गया, महंगी दवाइयां शुरू हुईं, पर उनकी हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी।

माँ की लगातार गिरती सेहत की खबर जब रोहिणी और मयंक को मिली, तो वे तुरंत मिलने पहुँचे। मयंक ने जब अपनी सास के मुरझाए चेहरे, बुझी हुई आँखों और कमरे के सन्नाटे को देखा, तो वह सब कुछ भांप गया। उसने देखा कि मेज पर दवाइयों की शीशियां तो भरी पड़ी हैं, पर कमरे में किसी अपने के दो बोल सुनने वाला कोई नहीं है। मयंक ने रोहिणी को एक तरफ बुलाकर धीरे से कहा कि माता जी को दवाइयों की नहीं, आत्मीयता और संगति की जरूरत है, उन्हें अपने साथ घर ले चलना चाहिए।

रोहिणी अपने भाइयों से बात करके प्रभावती जी को अपने घर ले आई। मयंक का घर आते ही जैसे उस सूने जीवन में बहार लौट आई। मयंक और रोहिणी के दोनों छोटे बच्चे अपनी नानी के आते ही उनके इर्द-गिर्द चहकने लगे। शाम होते ही दोनों बच्चे नानी की गोद में सिर रखकर परियों और राजा-रानियों की कहानियां सुनते। प्रभावती जी जब बच्चों को अपने हाथों से खाना खिलातीं, तो उनकी आँखों की खोई हुई चमक वापस लौट आती। रात को दोनों बच्चे अपनी नानी के पास ही सोते, जिससे प्रभावती जी को रात का सन्नाटा अब डराता नहीं था।

मयंक भी दफ्तर से आते ही सबसे पहले प्रभावती जी के कमरे में जाता, उनके पैर छूता और दिनभर की बातें साझा करता। सुबह की पहली चाय और शाम का नाश्ता पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर हँसते-खिलखिलाते हुए करता। प्रभावती जी की हर छोटी-बड़ी पसंद का ध्यान ऐसे रखा जाता मानो वे उस घर की सबसे अनमोल धरोहर हों। प्रेम, अपनेपन और बातचीत की इस संजीवनी ने चमत्कार कर दिखाया। कुछ ही महीनों में प्रभावती जी की सभी दवाइयां छूट गईं। उनका चेहरा फिर से खिल उठा और वे पहले जैसी स्वस्थ और प्रफुल्लित हो गईं।

कुछ महीनों बाद अमित और सुमित अपनी माँ से मिलने रोहिणी के घर पहुँचे। वे अपनी माँ को देखकर स्तब्ध रह गए। जिस माँ को वे रांची के अपने घर से अशक्त, मौन और बीमार हालत में छोड़कर आए थे, वही माँ आज अपने नाती-पोतों के साथ हँस-हँसकर लूडो खेल रही थी और पूरे घर में उसकी जीवंतता गूंज रही थी। दोनों बेटों ने माँ से कहा कि अब उनकी तबीयत ठीक हो गई है, इसलिए वे उन्हें वापस अपने साथ ले जाने आए हैं।

प्रभावती जी ने मुस्कुराते हुए अपने बेटों के सिर पर हाथ फेरा और बहुत ही शांत भाव से कहा कि वे अब यहीं खुश हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास दुनिया की हर सुविधा थी, लेकिन जिस चीज़ की उन्हें सबसे ज्यादा ज़रूरत थी—यानी अपनों का थोड़ा सा समय और प्रेम—वह उन्हें इस छोटे से घर में मिला है।

माँ की इस बात ने अमित और सुमित की आँखें खोल दीं। उन्हें अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि परिवार का अर्थ सिर्फ एक छत के नीचे रहना और ज़रूरत का सामान जुटा देना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में समय बिताना और आत्मीयता बांटना होता है। बुजुर्गों को महंगे इलाज से ज्यादा अपनों के दो मीठे बोल और सम्मान की ज़रूरत होती है, जो बड़ी से बड़ी बीमारी को बिना किसी दवा के जड़ से मिटा सकती है। दोनों बेटों ने अपनी गलतियों से सीख ली और अपने जीवन में परिवार को समय देने का संकल्प लिया।

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अक्सर हम अपने बुजुर्गों को सुख-सुविधाएं तो दे देते हैं, लेकिन अपना वक्त देना भूल जाते हैं। क्या आज की व्यस्त जीवनशैली में हम अपने माता-पिता को वह अपनत्व दे पा रहे हैं जिसके वे असली हकदार हैं? इस विषय पर आपकी क्या राय है, नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।

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