किराए के उस छोटे से सीलन भरे कमरे की खिड़की पर बैठी अंकिता फोन की स्क्रीन को एकटक देख रही थी, जहां बैंक का खाली बैलेंस मानो उसकी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहा था। पटना के बोरिंग रोड स्थित एक सरकारी संविदा परियोजना में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी लगे उसे पूरे तीन महीने हो चुके थे। मन में कितने सपने थे कि जब पहली पगार हाथ में आएगी, तो सबसे पहले माँ के लिए घुटनों का तेल और छोटे भाई की कोचिंग की फीस भरेगी। लेकिन हकीकत की ज़मीन बहुत सख्त और बेरहम निकली थी। दफ्तर का क्लर्क हर महीने की पहली तारीख को एक ही घिसा-पिटा जवाब दोहरा देता था—”ऊपर से फंड पास नहीं हुआ है बिटिया, सरकारी काम है, थोड़ा सब्र रखो, सब एक साथ आ जाएगा।”
सब्र रखना अंकिता के लिए आसान था, वह तो दिन में सिर्फ एक वक्त सादा चावल और दाल खाकर भी महीने निकाल रही थी। मगर घर के हालात सब्र की गुंजाइश नहीं छोड़ रहे थे। फोन की घंटी बजी तो स्क्रीन पर छोटे भाई मोहित का नाम चमक रहा था। अंकिता ने एक गहरी सांस भरकर खुद को सामान्य किया और कॉल उठाई।
“हेलो दीदी! पापा के बीपी की दवा खत्म हो गई है और कल मेरी सेमेस्टर फीस जमा करने की आखिरी तारीख है। आपने कहा था कि दस तारीख तक पैसे भेज दोगी, अभी तक खाते में कुछ नहीं आया? आप शहर जाकर हम सबको भूल गई हो क्या? बड़ी दीदी ने तो शादी के बाद कभी मुड़कर देखा नहीं, और अब आप भी बहाने बना रही हो!” मोहित की आवाज में नाराजगी और तल्खी साफ झलक रही थी।
“मोहित, मेरी बात तो सुन… दफ्तर में बजट की फाइल अटकी हुई है। बाबू कह रहे हैं कि इस हफ्ते के आखिर तक…”
“बस रहने दो दीदी! हमेशा एक ही बहाना। आपको क्या लगता है कि हम यहाँ ऐश कर रहे हैं? अगर पैसे नहीं भेजने थे तो साफ मना कर देतीं, झूठी उम्मीद क्यों दी?” इतना कहकर मोहित ने फोन काट दिया।
कमरे में सन्नाटा पसर गया। अंकिता के हाथ से फोन छूटकर बिस्तर पर गिर पड़ा और आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह कैसे समझाती कि पिछले तीन हफ्तों से उसने फल या दूध का मुंह तक नहीं देखा था? जिस दिन सब कर्मचारी लंच में कैंटीन जाते, वह सिरदर्द का बहाना बनाकर खाली पेट कुर्सी पर बैठी रहती थी ताकि कैंटीन के पचास रुपये बचा सके। खुद के पास कमरे का किराया देने तक के पैसे नहीं बचे थे, मकान मालिक दो बार टोक चुका था।
उस रात अंकिता को नींद नहीं आई। तकिये में मुंह छिपाकर वह देर तक सिसकती रही। उसे लगा कि उसकी सारी पढ़ाई-लिखाई, सारी मेहनत बेकार हो गई। लेकिन फिर उसने अपनी माँ का झुर्रियों भरा चेहरा याद किया। जब वह शहर आ रही थी, तो माँ ने अपनी पुरानी चांदी की पायल बेचकर उसे किराए के पैसे दिए थे और कहा था, “मेरी बेटी अफसर बनकर लौटेगी।” उस विश्वास को अंकिता इतनी आसानी से टूटने नहीं दे सकती थी।
अगली सुबह उसने अपनी झिझक और संकोच को परे धकेल दिया। उसने अपनी साथ काम करने वाली सहकर्मी और सहेली पल्लवी से बात करने का फैसला किया। लंच ब्रेक में अंकिता ने बेहद हिचकिचाते हुए पल्लवी से कहा, “पल्लवी… मुझे तुमसे एक बहुत बड़ी मदद चाहिए। घर में पापा की तबीयत ठीक नहीं है और भाई की पढ़ाई रुकने की कगार पर है। अगर हो सके तो मुझे छह हजार रुपये उधार दे सकती हो? जैसे ही मेरा वेतन आएगा, मैं पाई-पाई लौटा दूंगी।”
पल्लवी ने अंकिता की आंखों में तैरती बेबसी को भांप लिया। उसने बिना कोई सवाल पूछे, बिना किसी हिचकिचाहट के अपने फोन से तुरंत छह हजार रुपये अंकिता के खाते में ट्रांसफर कर दिए। पल्लवी ने अंकिता का हाथ थामते हुए कहा, “पगली, इसमें इतना रोने की क्या बात है? हम दोस्त किस दिन काम आएंगे? तू चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा।”
अंकिता ने राहत की सांस ली और बिना एक पल गंवाए पूरे पांच हजार रुपये सीधे भाई मोहित के खाते में भेज दिए, और बाकी बचे एक हजार रुपयों से कमरे का थोड़ा राशन लिया। पैसे भेजते ही भाई का एक संक्षिप्त मैसेज आया—”पैसे मिल गए।” न कोई हालचाल पूछा, न यह जानने की कोशिश की कि बहन इतने दिनों से किस हाल में जी रही है। उस रूखे मैसेज ने अंकिता के दिल को छलनी कर दिया, लेकिन उसने अपने दर्द को सीने में ही दबा लिया।
पर असल मुश्किल तो अभी बाकी थी। सरकारी दफ्तर के उस सुस्त माहौल में सैलरी आने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं दिख रहे थे। पल्लवी से लिए कर्ज का बोझ अंकिता के सीने पर पत्थर की तरह रखा हुआ था। उसे समझ आ गया था कि सिर्फ एक नौकरी के भरोसे बैठकर वह अपने हालात नहीं बदल सकती। हाथ पर हाथ धरकर रोने से किस्मत नहीं बदलती, उसके लिए पसीना बहाना पड़ता है।
अंकिता ने अपने खाली वक्त का इस्तेमाल करने की ठानी। उसने तय किया कि वह दफ्तर के बाद शाम को खाली नहीं बैठेगी। उसने पास की एक आवासीय बस्ती में जाकर घरों में बात की और कक्षा आठवीं से दसवीं तक के बच्चों को गणित और विज्ञान की ट्यूशन पढ़ाने का काम ढूंढ निकाला। शाम छह बजे जब सरकारी दफ्तर बंद होता, तो जहां बाकी कर्मचारी चाय की थड़ियों पर गपशप लड़ाते, वहीं अंकिता तेज कदमों से पैदल चलकर उस बस्ती की ओर निकल पड़ती ताकि टेम्पो का किराया बच सके।
शाम साढ़े छह से रात साढ़े नौ बजे तक वह लगातार तीन अलग-अलग घरों में बच्चों को पढ़ाती। रात को दस बजे जब वह अपने कमरे पर लौटती, तो थकान से उसका रोम-रोम दुख रहा होता था। पैरों में सूजन आ जाती, गला सूखकर कांटा हो जाता, लेकिन जब वह देखती कि उसने अपनी मेहनत से एक नया रास्ता तलाश लिया है, तो उसके चेहरे पर एक सुकून भरी चमक आ जाती थी। वह रात को दाल-रोटी बनाती, खाती और अगले दिन के सरकारी काम की फाइलों की तैयारी करती।
इस तरह दिन हफ्तों में और हफ्ते एक महीने में बदल गए। ट्यूशन का पहला महीना पूरा हुआ और तीनों घरों से मिलाकर अंकिता को पैंतालीस सौ रुपये नकद मिले। उस रात जब उसने उन रुपयों को अपनी हथेलियों में रखा, तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह उसकी अपनी विशुद्ध मेहनत की कमाई थी, जिसके लिए उसे किसी सरकारी बजट या क्लर्क की मेहरबानी का इंतजार नहीं करना पड़ा था।
अगले ही दिन उसने सबसे पहले पल्लवी को बुलाया और उसके हाथ पर तीन हजार रुपये रखते हुए कहा, “पल्लवी, यह तुम्हारी उधारी की पहली किस्त है। बाकी के पैसे भी मैं अगले महीने दे दूंगी।”
पल्लवी हैरान रह गई, “अरे अंकिता, तुम्हारी सैलरी आ गई क्या? पर क्लर्क तो कह रहा था कि फाइल अभी भी कमिश्नर ऑफिस में है।”
अंकिता ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, “नहीं पल्लवी, यह सैलरी नहीं है। यह मेरी शाम की मेहनत का फल है। मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है। अब मैं किसी के भरोसे नहीं बैठूंगी।” पल्लवी ने गर्व से अपनी सहेली को गले लगा लिया।
इधर दफ्तर में भी अंकिता का काम सबसे अलग चमकने लगा था। वह अपने काम में इतनी तेज और सटीक थी कि बड़े अधिकारी भी उसकी कार्यशैली की तारीफ करने लगे थे। एक दिन परियोजना के मुख्य निदेशक (डायरेक्टर) ने औचक निरीक्षण किया। जब उन्होंने देखा कि सारा डाटा रिकॉर्ड अंकिता ने बिना किसी गलती के और तय समय से पहले ही डिजिटल रूप में व्यवस्थित कर रखा है, तो वे बेहद प्रभावित हुए।
डायरेक्टर साहब ने मंच से अंकिता की लगन की सराहना की। उसी वक्त अंकिता ने हिम्मत जुटाई। जब सब चले गए, तो वह डायरेक्टर साहब के केबिन में गई। उसने कोई रोना नहीं रोया, न ही अपनी गरीबी का ढिंढोरा पीटा। उसने बेहद शालीनता और सम्मान के साथ अपनी और अपने जैसे दर्जनों संविदा कर्मचारियों की समस्या सामने रखी।
“सर, हम सभी संविदा कर्मी अपनी पूरी निष्ठा से काम करते हैं। लेकिन पिछले चार महीनों से वेतन न मिलने के कारण कई साथी गंभीर मानसिक और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। अगर ऊपर से फंड की प्रक्रिया को थोड़ा तेज करवा दिया जाए, तो हम सभी का जीवन आसान हो जाएगा।”
डायरेक्टर साहब अंकिता के आत्मविश्वास, तार्किक बात और निडरता से चकित रह गए। उन्होंने तुरंत वित्त विभाग के उच्चाधिकारियों को फोन लगाया और फाइल को विशेष अनुमति देकर क्लियर करने का सख्त आदेश दिया।
उस मुलाकात का असर यह हुआ कि मात्र चार दिनों के भीतर पूरे विभाग का रुका हुआ बजट रिलीज हो गया। शुक्रवार की दोपहर जब अंकिता कंप्यूटर पर टाइप कर रही थी, तभी उसके फोन पर एक मैसेज की बीप बजी।
उसने स्क्रीन देखी। उसके खाते में पिछले चार महीनों का पूरा वेतन—सत्तर हजार रुपये एक साथ जमा हो चुके थे।
उस पल अंकिता की आंखों के सामने वे सारे दिन घूम गए—वे खाली पेट काटी गई रातें, भाई के ताने, क्लर्क की उपेक्षा, पैदल चलकर ट्यूशन जाने की थकान और आंसुओं से भीगा तकिया। सब कुछ जैसे एक पल में धुल गया था। उसने सबसे पहले अपनी सीट पर ही आंखें बंद करके ईश्वर को धन्यवाद दिया।
उसने तुरंत पल्लवी के बाकी बचे तीन हजार रुपये चुकाए। उसके बाद उसने अपने मकान मालिक का पिछला सारा किराया चुकता किया। अब भी उसके पास एक अच्छी-खासी रकम बची थी।
शाम को उसने घर फोन किया। इस बार फोन माँ ने उठाया था।
“हेलो माँ, कैसी हो?” अंकिता की आवाज में आज एक अलग ही गूंज और आत्मविश्वास था।
“बिटिया, मैं ठीक हूँ। तू कैसी है? बहुत कमजोर लग रही थी पिछली बार वीडियो कॉल पर,” माँ की ममता भरी आवाज ने अंकिता का दिल छू लिया।
“माँ, अब सब ठीक है। मैंने तुम्हारे खाते में पच्चीस हजार रुपये भेजे हैं। सबसे पहले तुम अपने घुटनों के इलाज के लिए बड़े डॉक्टर के पास जाओगी। और सुनो, मोहित से कहो कि अपनी बची हुई किताबों और हॉस्टल की पूरी फीस भर दे।”
दूसरी तरफ से कुछ पलों के लिए चुप्पी छा गई। फिर मोहित की लड़खड़ाती हुई आवाज आई, जो शायद पास ही खड़ा था और लाउडस्पीकर पर सुन रहा था।
“दीदी… क्या सच में सैलरी आ गई?” मोहित की आवाज में अब गुस्सा नहीं, बल्कि गहरी शर्मिंदगी थी।
“हाँ मोहित, पूरी सैलरी आ गई। और सिर्फ सैलरी ही नहीं, तुम्हारी दीदी अब शाम को बच्चों को भी पढ़ाती है। अब इस घर में पैसों की वजह से किसी की पढ़ाई या इलाज नहीं रुकेगा,” अंकिता ने स्नेह से कहा।
फोन पर मोहित फफक कर रो पड़ा, “दीदी, मुझे माफ कर दो। मुझे बाद में पल्लवी दीदी के एक जानने वाले से पता चला था कि दफ्तर में सचमुच सैलरी नहीं आ रही थी और आप खुद तंगी में रहकर हमें पैसे भेज रही थीं। मैंने आपको बहुत बुरा-भला कहा… मैं बहुत शर्मिंदा हूँ दीदी।”
अंकिता की आंखें भी नम हो गईं, लेकिन आज उन आंसुओं में दर्द नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व था। उसने कहा, “पगले, भाई-बहनों में माफी कैसी? परिवार में जब एक पर संकट आता है, तो सब घबरा जाते हैं। बस इतना याद रखना कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अपनों पर विश्वास कभी नहीं खोना चाहिए।”
उस दिन अंकिता को समझ आया कि आत्मनिर्भरता सिर्फ पैसों से नहीं आती, वह आत्मसम्मान और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के हौसले से आती है। जो बेटियां अपने परिवार की ढाल बनती हैं, वे कभी कमजोर नहीं होतीं। उसकी पहली कमाई सिर्फ रुपयों का हिसाब नहीं थी, बल्कि उसके स्वाभिमान, धैर्य और कभी न हार मानने वाले जज्बे की जीत थी।
जीवन में कई बार ऐसा मोड़ आता है जब अपने ही हमारी मजबूरियों को समझे बिना हमें गलत ठहरा देते हैं, पर सच्चा स्वाभिमान वही है जो आंसुओं को हथियार बनाकर अपनी तकदीर खुद लिखे। क्या आपने या आपके किसी परिचित ने कभी जीवन में ऐसी मुश्किल घड़ी का सामना करते हुए खुद को साबित किया है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : रमा शुक्ला