विदाई के समय बजने वाली शहनाई की धुन जैसे-जैसे कानों से ओझल हो रही थी, वैसे-वैसे मन में अजीब सी उथल-पुथल तेज होती जा रही थी। फूलों से सजी कार चंडीगढ़ की चौड़ी और शांत सड़कों पर सरसराती हुई आगे बढ़ रही थी। लाल सुर्ख जोड़े में लिपटी हुई तन्वी ने अपनी भीगी पलकें उठाईं और गाड़ी की खिड़की से बाहर झाँका। उसके हाथों की मेहंदी की खुशबू अभी ताजी थी, कलाई में बंधी लाख की चूड़ियाँ हर मोड़ पर खनक रही थीं, लेकिन दिल की धड़कनें किसी अनजाने डर से लगातार तेज हो रही थीं। बगल की सीट पर उसका जीवनसाथी अनिमेष बैठा था, जो अपनी शेरवानी के बटन सहलाते हुए थकी हुई लेकिन बेहद सौम्य मुस्कान के साथ खिड़की के बाहर देख रहा था।
बचपन से ही तन्वी ने सुना था कि शादी के बाद विदा होकर जब लड़की ससुराल जाती है, तो उसके स्वागत के लिए दरवाजे पर चावल का कलश रखा होता है, कुमकुम भरी थाली होती है, सास दरवाजे पर आरती उतारकर अपनी नई बहू का गृह प्रवेश कराती है, और ननदें नेग माँगने के लिए अड़ जाती हैं। माँ ने भी विदा करते वक्त कान में यही समझाया था कि ससुराल की उस पहली चौखट को मंदिर समझना, दायाँ पैर अंदर रखकर प्रवेश करना और अपनी सास के चरणों में झुक जाना। तन्वी के मन में अपनी उस नई दुनिया, उस घर की दहलीज को लेकर न जाने कितने ही रंगीन चित्र उकेरे हुए थे। वह मन ही मन अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी और सोच रही थी कि घर पहुँचते ही सबसे पहले अपनी सास जानकी जी के पाँव छूकर उनका आशीर्वाद लेगी।
गाड़ी लगभग आधे घंटे तक दौड़ती रही। तन्वी ने गौर किया कि रास्ता किसी शांत रिहायशी इलाके की बजाय शहर के एक बेहद पॉश और आधुनिक इलाके की तरफ मुड़ रहा था। अचानक गाड़ी की रफ्तार धीमी हुई और वह एक आलीशान गगनचुंबी होटल के भव्य पोर्च में जाकर रुक गई।
कार का दरवाजा एक वर्दीधारी दरबान ने खोला। तन्वी का माथा ठनका। उसने हैरान होकर चारों तरफ देखा। संगमरमर के ऊँचे खंभे, काँच के बड़े-बड़े दरवाजे, और रिसेप्शन पर जगमगाते झूमर। यह कोई घर नहीं था। यह शहर का एक बेहद महंगा और नामी लक्जरी होटल था।
तन्वी के दिल में एक गहरा धक्का लगा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। विदाई के आँसू जो अभी सूखे भी नहीं थे, फिर से आँखों के कोरों पर तैरने लगे। एक पल के लिए उसके मन में काले बादलों की तरह ढेरों नकारात्मक विचार उमड़ पड़े। क्या ससुराल वालों ने मुझे अपने घर के लायक भी नहीं समझा? क्या जानकी जी मुझे अपने आँगन में कदम रखने की इजाजत भी नहीं देना चाहतीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि शादी के रीति-रिवाजों में मेरे मायके वालों से कोई ऐसी भूल हो गई हो जिससे नाराज होकर उन्होंने मुझे घर में घुसने से ही मना कर दिया? समाज में तो लोग यही कहते हैं कि सास कभी माँ नहीं बन सकती, क्या यह उसी कड़वी हकीकत की शुरुआत है? मन में उठते इस तूफान ने तन्वी का गला रुंध दिया।
अनिमेष ने तन्वी की आँखों में फैली घबराहट और चेहरे पर छाई बेबसी को तुरंत भांप लिया। उसने बड़ी नजाकत से तन्वी के काँपते हाथों को अपने हाथों में थामा और नरमी से बोला, “तन्वी, घबराओ मत। मुझे पता है तुम्हारे मन में क्या चल रहा होगा। तुम सोच रही होगी कि हम घर क्यों नहीं गए और यहाँ क्यों आए हैं। चलो, अंदर चलकर आराम से बात करते हैं। तुम बहुत थक चुकी हो।”
तन्वी ने भारी मन से अपने भारी लहंगे को संभाला और अनिमेष के साथ होटल की लॉबी में कदम रखा। उसके कदम भारी पड़ रहे थे। वह चुपचाप लिफ्ट में चढ़ी। पाँचवीं मंजिल पर स्थित एक खूबसूरत सुइट के सामने आकर अनिमेष रुका और उसने कार्ड की से दरवाजा खोला। अंदर का नजारा किसी सपने जैसा था। कमरा बेहद विशाल, शांत और सुरुचिपूर्ण तरीके से सजा हुआ था। नरम गद्देदार बिस्तर पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछी हुई थीं, कमरे का तापमान सुखद था और हवा में चंदन और लैवेंडर की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही थी। साइड टेबल पर ताजे फलों की टोकरी और गरम केसरिया दूध का जग रखा हुआ था।
लेकिन तन्वी का दिल इन ऐशो-आराम से पूरी तरह बेगाना था। वह सोफे के एक कोने पर बैठ गई। उसका सिर भारी था, भारी गहने उसकी गर्दन को चुभ रहे थे, पर सबसे ज्यादा चुभन उसके अंतर्मन में हो रही थी। वह अपने आँसुओं को रोक नहीं पाई और उसकी आँखों से दो बूँदें छलक कर उसके लाल जोड़े पर गिर पड़ीं।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। अनिमेष ने दरवाजा खोला तो सामने उसकी माँ, जानकी जी खड़ी थीं। जानकी जी के चेहरे पर शादी की थकान की हल्की लकीरें थीं, लेकिन उनकी आँखों में वही चिरपरिचित ममता और वात्सल्य बह रहा था। उनके हाथ में एक खूबसूरत थाली थी जिसमें पूजा का दीया, रोली, चावल और कुछ मिठाइयाँ रखी थीं। पीछे उनकी छोटी ननद शालिनी भी हाथ में कुछ सादे, आरामदायक सूती कपड़े लिए मुस्कुराती हुई खड़ी थी।
जानकी जी को कमरे में दाखिल होते देख तन्वी हड़बड़ाकर उठने लगी, लेकिन जानकी जी ने तेजी से आगे बढ़कर उसके कंधे थाम लिए और उसे वापस सोफे पर बिठा दिया।
“अरे बैठो, बैठो मेरी बच्ची! उठने की कोई जरूरत नहीं है,” जानकी जी ने बेहद आत्मीयता से कहा और खुद नीचे कालीन पर तन्वी के कदमों के पास बैठने लगीं।
तन्वी घबरा गई, “माँ जी, यह आप क्या कर रही हैं? आप नीचे मत बैठिए।” उसने तुरंत झुककर उनके पाँव छूने की कोशिश की।
जानकी जी ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपने पास खींच लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “तन्वी, मैं जानती हूँ कि इस होटल के कमरे में कदम रखते ही तुम्हारे मन में क्या बीती होगी। तुमने सोचा होगा कि यह कैसी अभागी सास है जिसने अपनी बहू का स्वागत अपने घर की चौखट पर करने की बजाय उसे होटल में भेज दिया। सच कह रही हूँ न मैं?”
तन्वी ने नजरें झुका लीं। उसकी खामोशी ही उसकी हामी थी।
जानकी जी ने एक गहरी सांस ली और उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में समेटते हुए बहुत धीमे, ममतामयी स्वर में समझाना शुरू किया, “बेटा, हमारा पुराना पुश्तैनी मकान बहुत छोटा है। कुल तीन छोटे-छोटे कमरे हैं। शादी में गाँव से इतने सारे रिश्तेदार, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ और छोटे बच्चे आए हुए हैं कि घर के हर कोने में बिस्तर लगे हैं। बरामदे से लेकर आँगन तक पैर रखने की जगह नहीं है। सुबह से लेकर देर रात तक घर में शोरगुल, हँसी-मजाक और रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहेगा।”
जानकी जी ने तन्वी के थके हुए चेहरे को देखा और आगे कहा, “जब मेरी शादी हुई थी तन्वी, पैंतीस साल पहले, मुझे आज भी वह दिन याद है। मैं अठारह घंटे के भारी सफर और शादी की रस्मों के बाद जब ससुराल पहुँची थी, तो घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था। उस भरे-पूरे घर में न मुझे साँस लेने की फुरसत थी, न सिर का पल्लू गिराने की आजादी। भारी बनारसी साड़ी और भारी आभूषणों के बोझ तले मेरा दम घुट रहा था, सिर दर्द से फटा जा रहा था, लेकिन ‘लोग क्या कहेंगे’ और ‘खानदान की रीत’ के नाम पर मुझे लगातार मुस्कुराते हुए हर रिश्तेदार के पाँव छूने पड़ रहे थे। कमरे के बाहर हर वक्त किसी न किसी की आहट रहती थी। उस रात मैं चैन से रो भी नहीं पाई थी, सो भी नहीं पाई थी। थकान के मारे मेरे बदन का एक-एक अंग टूट रहा था।”
कमरे में पूरी तरह सन्नाटा था। अनिमेष और शालिनी भी चुपचाप अपनी माँ की बातें सुन रहे थे।
जानकी जी की आँखें हल्की सी नम हो गईं। वे तन्वी की ठुड्डी को छूते हुए बोलीं, “उस दिन मैंने अपने मन में एक गांठ बाँध ली थी कि जब मेरे बेटे की शादी होगी और मेरे घर बहू आएगी, तो मैं अपनी उस पुरानी पीड़ा को परंपरा का नाम देकर अपनी बहू पर नहीं थोपूँगी। बहू कोई सजावट का सामान नहीं होती जिसे चौबीसों घंटे मेहमानों की नुमाइश के लिए खड़ा रखा जाए। वह भी एक हाड़-मांस की इंसान है, जो अपने माँ-बाप, अपना बचपन, अपनी सहेलियों को छोड़कर एक बिल्कुल अजनबी दुनिया में आती है। उसका मन पहले ही बिछोह के दर्द से छलनी होता है, उस पर से चौबीस घंटे की शारीरिक थकान।”
जानकी जी ने तन्वी के सिर से भारी चुनरी को धीरे से हटाते हुए कहा, “हमारा घर छोटा है बेटा, वहाँ इस वक्त न तुम्हें कोई निजता मिलती, न तुम सुकून से साँस ले पातीं। बार-बार घूँघट खींचना पड़ता, रिश्तेदारों की नजरें तुम्हारे हर उठने-बैठने का आंकलन करतीं। इसलिए मैंने अनिमेष से कहकर यह सुइट दो दिनों के लिए बुक कराया। यहाँ तुम आराम से अपने यह भारी कपड़े उतारो, सादे कपड़े पहनो, गर्म पानी से नहाओ, पेट भरकर खाना खाओ और बिना किसी पहरे या संकोच के चैन की नींद सो जाओ। घर की दहलीज तो तुम्हारी ही है बेटा, वह कहीं भागी नहीं जा रही। दो दिन बाद जब सारे मेहमान विदा हो जाएँगे, घर खाली और शांत हो जाएगा, तब हम पूरे मान-सम्मान, बाजे-गाजे और रीति-रिवाज के साथ तुम्हारा गृह प्रवेश अपने उस छोटे से घर में करवाएँगे।”
शालिनी आगे बढ़ी और उसने सादे कुर्ते-पायजामे का पैकेट तन्वी की गोद में रखते हुए हँसकर कहा, “भाभी, माँ ने आपके लिए खुद अपनी पसंद से यह सूती कपड़े खरीदे हैं ताकि आपको कोई परेशानी न हो। और हाँ, यहाँ कोई नहीं देख रहा कि आपने घूँघट लिया है या नहीं।”
तन्वी की आँखों से जो आँसू पहले भय और हीनभावना के कारण बह रहे थे, वे अब कृतज्ञता, आदर और असीम स्नेह के आँसू बनकर उसके गालों पर ढुलक गए। जिस रिश्ते को दुनिया अक्सर संशय और कड़वाहट के चश्मे से देखती है, उस रिश्ते का इतना संवेदनशील, परिपक्व और करुणामयी रूप उसने कभी सोचा भी नहीं था। उसकी सास ने सिर्फ एक बहू का स्वागत नहीं किया था, बल्कि एक माँ की तरह अपनी बेटी की थकान, उसकी निजता और उसके स्वाभिमान की रक्षा की थी।
तन्वी से रहा नहीं गया। वह सोफे से नीचे उतरी और बिना किसी औपचारिकता के उसने जानकी जी के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उनके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रो पड़ी। यह रोना किसी बिछोह का नहीं था, यह उस सुकून का रोना था जो किसी भटकती हुई नाव को अचानक एक सुरक्षित किनारे पर पहुँचने के बाद मिलता है।
जानकी जी ने तन्वी की पीठ को थपथपाया, उसका माथा चूमा और बेहद प्यार से कहा, “पगली, रोती क्यों है? सास हूँ तुम्हारी, कोई पराई थोड़े ही हूँ। जब तक मैं हूँ, तुम्हें इस घर में कभी अपनी पहचान या अपने सुकून से समझौता नहीं करना पड़ेगा। अब जल्दी से मुँह धो लो, शालिनी तुम्हारे गहने उतारने में मदद करेगी। फिर सब मिलकर खाना खाएँगे।”
कमरे का वातावरण एक पल में बदल गया। जो कमरा कुछ देर पहले तक एक अजनबी और ठंडा होटल लग रहा था, वह अब संसार के सबसे सुरक्षित और पवित्र मंदिर जैसा प्रतीत हो रहा था। तन्वी ने जब अपने भारी गहने और भारी जोड़े को उतारकर सादा सूती कुर्ता पहना, तो उसे लगा जैसे उसके शरीर के साथ-साथ उसकी आत्मा पर से भी सदियों पुराना बोझ उतर गया हो।
उस रात तन्वी ने गहरी और सुकून भरी नींद ली। उसके मन में अपने ससुराल के उस छोटे से घर के लिए जो संकोच था, वह पूरी तरह मिट चुका था। उसे समझ आ गया था कि घर ईंट-पत्थरों के आकार या कमरों की संख्या से बड़ा नहीं होता, घर बड़ा होता है उसमें रहने वाले लोगों के दिलों के आकार से। जिस घर की मुखिया की सोच इतनी विशाल और संवेदनशील हो, वह छोटा सा घर भी किसी राजमहल से कम नहीं हो सकता था।
दो दिन बाद जब तन्वी उस पुश्तैनी मकान की वास्तविक चौखट पर पहुँची, तो उसके चेहरे पर कोई बनावटी संकोच या थकान नहीं थी, बल्कि एक सच्चा आत्मविश्वास और गहरा आदर था। जब उसने कलश को अपने दाहिने पैर से गिराकर घर के भीतर कदम रखा, तो उसे लगा कि वह किसी पराए घर में नहीं, बल्कि अपने ही उस आँगन में आई है जहाँ उसे एक सास नहीं, बल्कि समझदार माँ मिली थी। रिश्तों की नींव जब ऐसी संवेदनशीलता और आपसी समझ पर रखी जाती है, तो वे जीवन भर प्रेम की छाँव देते हैं।
—
क्या आपको लगता है कि हमारे समाज में आज भी नई बहुओं से परंपराओं के नाम पर अत्यधिक अपेक्षाएं रखकर उनकी शारीरिक और मानसिक थकान को नजरअंदाज कर दिया जाता है? क्या हर सास को जानकी जी की तरह संवेदनशील सोच अपनानी चाहिए? इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .
लेखिका : गरिमा चौधरी