“अमित, क्या तुमने बाबूजी को बता दिया कि हम लोग कल ही कोठी पर शिफ्ट हो रहे हैं? मुझे मालूम है, वो कभी मना नहीं करेंगे।” तान्या ने ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने बालों को सलीके से संवारते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा आत्मविश्वास था, ऐसा आत्मविश्वास जो सिर्फ दौलतमंद घरों की लाडली बेटियों में ही देखने को मिलता है।
अमित जो दफ्तर जाने के लिए अपनी टाई की गांठ बांध रहा था, आईने में तान्या के चेहरे को देखते हुए झिझक कर बोला, “तान्या… माँ कह रही थीं कि शादी के बाद दामाद का ससुराल में जाकर बस जाना न तो समाज की नज़रों में अच्छा माना जाता है और न ही हमारे आत्मसम्मान के लिए ठीक है। तुम जानती हो न, हमारे यहाँ इन बातों को किस तरह देखा जाता है।”
तान्या ने हाथ में पकड़ा हेयरब्रश मेज़ पर रखते हुए तिनककर कहा, “ओह अमित! माँ जी को तो मैं अपने तरीके से समझा लूँगी। बात आत्मसम्मान की नहीं, बल्कि सुकून से जीने की है। मैं अभी डैड को फोन कर देती हूँ कि हम कल सुबह ही आ रहे हैं। मैं सारा ज़रूरी सामान लेकर गाड़ी से निकल जाऊँगी और तुम शाम को ऑफिस खत्म करके सीधे वहीं आ जाना। रोज़-रोज़ की इस किचकिच और बजट के जोड़-तोड़ से तो मुक्ति मिलेगी।” इतना कहकर उसने अपना महंगा स्मार्टफोन उठाया और अपने पिता का नंबर मिलाने लगी।
अमित बेबसी से उसे देखता रह गया। वह जानता था कि एक बार तान्या जो ठान लेती थी, उसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक ही पूरा करती थी।
अमित एक बेहद साधारण और संस्कारी मध्यवर्गीय परिवार का बेटा था। उसके पिता, पंडित विद्याधर पाठक, एक सरकारी कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर रह चुके थे और अब सेवानिवृत्त होकर सादा जीवन बिता रहे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कभी बहुत मजबूत नहीं रही थी, लेकिन विद्याधर जी ने अपनी ईमानदारी और सीमित आमदनी में भी अपने दोनों बच्चों को उच्च संस्कार और बेहतरीन शिक्षा दी थी। बड़ी बेटी अंजलि का विवाह उन्होंने एक संभ्रांत और समझदार परिवार में अपनी हैसियत के अनुसार कर दिया था। अंजलि अपने ससुराल में खुशहाल थी।
अमित बचपन से ही मेधावी था। उसने राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और पुणे के एक प्रतिष्ठित संस्थान से कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की। वहीं कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात कुणाल से हुई थी, जो उसका गहरा मित्र बन गया। दोनों एक ही हॉस्टल में रहते थे और सुख-दुख के साथी थे। एक दिन किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में अमित कुणाल के घर गया हुआ था। वहीं उसकी पहली मुलाकात कुणाल की चचेरी बहन तान्या से हुई।
तान्या शहर के विख्यात रियल एस्टेट कारोबारी हरिश्चंद्र सिंघानिया की सबसे छोटी और चहेती बेटी थी। रूप-रंग में अप्सरा जैसी, लेकिन स्वभाव से थोड़ी ज़िद्दी और आज़ाद ख्यालों वाली। पहली ही मुलाकात में तान्या की चंचलता और बेबाक अंदाज़ ने अमित का दिल मोह लिया, जबकि तान्या को अमित की सादगी, गंभीर व्यक्तित्व और शांत स्वभाव ने गहराई से प्रभावित किया। मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा, फोन पर लंबी बातें होने लगीं और न जाने कब यह दोस्ती अटूट प्रेम में बदल गई।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी होते ही अमित को एक सॉफ्टवेयर कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। उसका पैकेज एक नए इंजीनियर के हिसाब से बहुत बढ़िया था, लेकिन सिंघानिया परिवार के ठाठ-बाट के आगे वह कुछ भी नहीं था। जब करियर थोड़ा स्थिर हुआ, तो तान्या ने सीधे अमित के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया।
अमित ने उस समय बहुत संजीदगी से कहा था, “तान्या, प्यार अपनी जगह है और ज़िंदगी की हकीकत अपनी जगह। तुम्हारा रहन-सहन, तुम्हारा लाइफस्टाइल और मेरे परिवार की सादगी… दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है। कभी-कभार किसी अच्छे कैफे में बैठकर कॉफी पीना और जीवन भर एक बजट में घर चलाना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। तुम मेरे सीमित साधनों में खुद को कैसे ढाल पाओगी?”
तान्या ने अमित के कंधों पर अपना हाथ रखते हुए भावुक होकर कहा था, “अमित, मुझे तुम्हारी दौलत से नहीं, तुमसे प्यार है। मुझे कोई महंगे शौक पूरे नहीं करने। मैं तुमसे कभी किसी चीज़ की फरमाइश नहीं करूँगी, बस तुम्हारा साथ चाहिए। तुम मुझ पर भरोसा तो रखो।”
अमित उसके प्यार में इस कदर डूबा था कि उसने हामी भर दी। उसने अपने माता-पिता से बात की। विद्याधर जी और उनकी पत्नी कल्याणी देवी जब पुणे आए और तान्या से मिले, तो उन्हें लड़की में कोई बुराई नज़र नहीं आई। पर माँ के दिल में एक खटका हमेशा था। उन्होंने अकेले में अमित से कहा था, “बेटा, लड़की बहुत संस्कारी और प्यारी है, लेकिन महलों की पली गुड़िया हमारी इस छोटी सी कुटिया में कैसे निभेगी? कभी-कभी हैसियत का फासला दिलों में दरारें पैदा कर देता है।”
अमित ने माँ को भरोसा दिलाया कि सब ठीक रहेगा। उधर जब तान्या ने अपने घर में अमित के बारे में बताया, तो उसके पिता हरिश्चंद्र जी तो बेटी की खुशी देखकर चुप रहे, लेकिन उसकी माँ मालती देवी ने घर सिर पर उठा लिया। उनका कहना था कि शहर के बड़े-बड़े उद्योगपति उनकी चौखट पर रिश्ते लेकर खड़े हैं और उनकी बेटी एक मामूली नौकरीपेशा लड़के से शादी करना चाहती है। तान्या के बड़े भाई रोहन और भाभी शिखा ने भी तान्या को समझाने की कोशिश की कि प्यार का नशा जब उतरेगा तब समझ आएगा कि पैसा क्या होता है। पर तान्या अपनी ज़िद पर अड़ी रही। उसने साफ कह दिया कि शादी करेगी तो सिर्फ अमित से, वरना कुंवारी रहेगी। अंततः हरिश्चंद्र जी ने अपनी लाडली के आगे घुटने टेक दिए और दोनों परिवारों की मौजूदगी में सादे लेकिन गरिमामय तरीके से दोनों का विवाह संपन्न हो गया।
शादी के शुरुआती कुछ हफ्ते तो सपनों की तरह गुज़रे। अमित ने पुणे के एक शांत इलाके में दो कमरों का एक प्यारा सा फ्लैट किराए पर लिया था। उसने अपनी हैसियत के हिसाब से घर में हर ज़रूरी सुविधा जुटाने की कोशिश की थी। लेकिन जैसे ही रोज़मर्रा की ज़िंदगी शुरू हुई, तान्या की पुरानी आदतें सामने आने लगीं।
महीने का राशन, बिजली-पानी का बिल, सब्ज़ियों के भाव और हर चीज़ का हिसाब रखना तान्या के बस की बात नहीं थी। उसे हर तीसरे दिन ऑनलाइन शॉपिंग से नए कपड़े, जूते और कॉस्मेटिक्स मंगाने की आदत थी। दोस्तों के साथ वीकेंड पर महंगे लाउंज में जाना, ब्रैंडेड कैफे में ब्रंच करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। एक दिन जब महीने के तीसरे हफ्ते में ही क्रेडिट कार्ड का बिल देखकर अमित ने चिंता जताई और कहा, “तान्या, हमें थोड़ा बजट देखकर चलना होगा। मेरी एक तय तनख्वाह है और हमें भविष्य के लिए बचत भी करनी है।”
तो तान्या ने बेपरवाही से हंसते हुए कहा, “ओह अमित, चिल करो! पैसों के लिए इतनी टेंशन कौन लेता है? तुम नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं, मैं डैड से ले लूँगी।”
और सचमुच वही हुआ। जब भी कोई बड़ा खर्च आता, तान्या अपनी माँ या पिता से पैसे मांग लेती। शुरुआत में अमित ने मना किया, पर तान्या के सामने उसकी एक न चली। धीरे-धीरे अमित के स्वाभिमान को ठेस पहुँचने लगी, लेकिन घर की शांति बनाए रखने के लिए वह घूंट पीकर रह जाता।
फिर एक दिन तान्या की माँ मालती देवी उनके फ्लैट पर आईं। फ्लैट का छोटा आकार, बालकनी में सूखते कपड़े और बिना किसी घरेलू नौकर के खुद काम करती तान्या को देखकर उनका पारा चढ़ गया। उन्होंने तुरंत कहा, “तान्या, तूने अपनी क्या हालत बना रखी है? हमारा इतना बड़ा बंगला कोरेगांव पार्क में खाली पड़ा है। नौकर-चाकर हाथ बांधे खड़े रहते हैं। तू और अमित यहाँ इस कबूतरखाने में क्यों सड़ रहे हो? तुम दोनों वहीं हमारे साथ आकर क्यों नहीं रहते?”
अमित ने विनम्रता से हाथ जोड़कर मना किया, “माँ जी, यह मेरा घर है। छोटा ज़रूर है, पर अपनी मेहनत का है। मैं ससुराल में जाकर नहीं रह सकता।”
जब अमित ने अपनी माँ कल्याणी देवी को फोन पर यह बात बताई, तो माँ ने भी दुख भरे स्वर में कहा, “बेटा, दामाद का ससुराल में जाकर रहना शास्त्रों और लोक-मर्यादा दोनों में अनुचित माना गया है। वहाँ भले ही तुम्हें सोने का निवाला मिले, पर तुम्हारी आज़ादी और सम्मान छिन जाएगा। अपनी गृहस्थी अपने दम पर ही संभाली जाती है।”
लेकिन तान्या ने किसी की नहीं सुनी। उसने रो-धोकर, खाना-पीना छोड़कर ऐसा हंगामा खड़ा किया कि अमित को अंततः झुकना पड़ा। अगले ही दिन तान्या ने अपनी गाड़ी में सामान भरा और अमित को लेकर अपने पिता के आलीशान बंगले ‘सिंघानिया विला’ में शिफ्ट हो गई।
शुरुआत के दिन तान्या के लिए किसी उत्सव जैसे थे। मायके की वही पुरानी सुख-सुविधाएं, नौकरों की फौज, सुबह का नाश्ता बिस्तर पर और शाम को दोस्तों के साथ शॉपिंग और पार्टियाँ। कभी प्रिया के घर महफिल जमती तो कभी रुचिका के साथ क्लबिंग। तान्या पूरी तरह से अपने पुराने ढर्रे में लौट चुकी थी।
ससुराल में शुरुआत में अमित का भी खूब आदर-सत्कार हुआ। हरिश्चंद्र जी दामाद का बहुत सम्मान करते थे। लेकिन कुछ ही हफ्तों में माहौल की हवा बदलने लगी। बंगले में रहते हुए अमित को हर पल यह अहसास कराया जाने लगा कि वह यहाँ एक बाहरी व्यक्ति है जो उनकी कृपा पर पल रहा है।
एक दिन तान्या की भाभी शिखा का छोटा भाई मयंक अमेरिका से छुट्टियों में आया हुआ था। रात के खाने की मेज़ पर पूरा परिवार जमा था। मेज़ पर तरह-तरह के लज़ीज़ व्यंजन सजे थे। डिनर के बाद जब मीठे में स्पेशल पिस्ता कुल्फी और गुलाब जामुन की प्लेट आई, तो अमित ने आगे बढ़कर कुल्फी की कटोरी उठानी चाही।
तभी भाभी शिखा ने फौरन अमित का हाथ रोकते हुए वह कटोरी अपने भाई की तरफ खिसका दी और मुस्कुराते हुए ताना मारा, “अरे अमित जी, ज़रा रुकिए। यह खास मलाई कुल्फी मयंक की पसंदीदा है और वह तो परसों अमेरिका वापस लौट जाएगा। आप तो यहीं घरजमाई बनकर हमारे साथ ही रहते हैं, आपके लिए तो बाज़ार से कल भी आ जाएगी, आप कल खा लीजिएगा।”
उस एक वाक्य ने अमित के कलेजे को छलनी कर दिया। डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा छा गया। हरिश्चंद्र जी ने शिखा को डांटना चाहा, पर शिखा ने बात को मज़ाक का रूप दे दिया। अमित ने अपनी थाली वहीं छोड़ दी और उठकर कमरे में चला गया।
जब उसने तान्या से कहा, “तान्या, तुमने सुना तुम्हारी भाभी ने क्या कहा? मेरा यहाँ एक-एक पल दम घुट रहा है। चलो, हम अपने पुराने फ्लैट में वापस चलते हैं।”
तान्या ने लापरवाही से अपनी मैगज़ीन पलटते हुए कहा, “अरे अमित, तुम भी ना! हर बात को दिल से लगा लेते हो। भाभी ने मज़ाक में कह दिया तो क्या पहाड़ टूट पड़ा? तुम इतनी छोटी-छोटी बातों को तूल क्यों देते हो? मुझे इस घर का आराम छोड़कर उस तंग फ्लैट में नहीं जाना।”
अगली सुबह अमित जब ऑफिस जाने के लिए सीढ़ियाँ उतर रहा था, तो उसने ड्रॉइंग रूम से भाभी शिखा की आवाज़ सुनी। वह अपने भाई मयंक से कह रही थी, “देखा तुमने मयंक, हमारे यहाँ दामाद जी मुफ्त की रोटियाँ तोड़ रहे हैं। पुणे में फ्लैट का किराया ही इतना महंगा है, ऊपर से इनकी तनख्वाह इतनी मामूली है कि तान्या के एक महीने के मेकअप का खर्च भी न चले। देखना, दो-चार महीनों में यह अपनी सारी जमा-पूंजी गंवाकर पूरी तरह हमारे ही टुकड़ों पर निर्भर हो जाएंगे।”
अमित के पाँव वहीं जम गए। उसका खून खौल उठा, लेकिन उसने अपने संस्कारों की लगाम नहीं छोड़ी। उसने कोई तमाशा नहीं किया। वह चुपचाप बाहर निकला और सीधे एक ब्रोकर के पास गया। उसने शाम तक अपने दफ्तर के नज़दीक एक छोटा लेकिन साफ-सुथरा एक कमरे और रसोई का फ्लैट देखा, एडवांस पैसे दिए और चाबी ले ली।
शाम को जब वह वापस सिंघानिया विला लौटा, तो उसने सीधे कमरे में जाकर अपना सूटकेस निकाला और अपने सारे कपड़े पैक करने लगा। तान्या यह देखकर घबरा गई, “अमित, यह क्या पागलपन है? तुम कहाँ जा रहे हो?”
अमित ने शांत लेकिन बहुत सख्त आवाज़ में कहा, “तान्या, मैंने अपना आत्मसम्मान गिरवी रखकर यहाँ रहना स्वीकार किया था ताकि तुम खुश रह सको। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। मैंने नया आशियाना ले लिया है। मैं अपने स्वाभिमान की रोटी खाने जा रहा हूँ। अगर तुम्हें मेरी पत्नी बनकर मेरे साथ चलना है, तो अभी चलो।”
तान्या के भीतर का अहंकार जाग उठा। उसने तमककर कहा, “मैं कहीं नहीं जाऊँगी! अगर तुम्हें जाना है तो तुम शौक से जा सकते हो। देखती हूँ तुम उस झोपड़ी में मेरे बिना कितने दिन रह पाते हो।”
अमित ने एक गहरी सांस ली, अपना सूटकेस उठाया और बिना पीछे मुड़े उस आलीशान बंगले के दरवाज़े से बाहर निकल गया।
अमित के जाने के बाद तान्या को लगा कि दो-चार दिन में अमित का गुस्सा ठंडा हो जाएगा और वह खुद उसे मनाने वापस आ जाएगा। दो दिन बीत गए, लेकिन अमित का न कोई फोन आया और न कोई संदेश।
तीसरे दिन दोपहर में तान्या के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर उसकी सास कल्याणी देवी का नाम चमक रहा था। तान्या ने भारी मन से फोन उठाया।
कल्याणी देवी ने बहुत ही ममतामयी और मीठी आवाज़ में कहा, “कैसी हो बहू? सब ठीक-ठाक है?” तान्या ने औपचारिक स्वर में कहा, “हाँ माँ जी, मैं ठीक हूँ।”
कल्याणी देवी ने एक गहरी सांस लेते हुए समझाया, “बेटी, मैं जानती हूँ कि तुम बहुत बड़े घर की बेटी हो और तुमने बचपन से कभी किसी चीज़ की कमी नहीं देखी। लेकिन एक बात मेरी हमेशा गांठ बांध लेना… मायका चाहे सोने का ही क्यों न हो, शादी के बाद बेटी वहाँ सिर्फ एक मेहमान होती है। घर चाहे छोटा हो, दाल-रोटी चाहे सादी हो, लेकिन जिस घर को पति-पत्नी अपनी मेहनत और पसीने से सींचते हैं, वही औरत का अपना असली साम्राज्य होता है। जब तक तुम उस घर की नींव नहीं बनोगी, तब तक तुम्हारी गृहस्थी कभी नहीं बस सकती। अमित तुमसे बहुत प्यार करता है, पर उसका स्वाभिमान उसका गहना है। जाकर अपना घर संभाल लो बेटी, पराए आशियाने में कभी अपनी पहचान नहीं बनती।”
तान्या ने माँ जी की बात को अनसुना करते हुए बस “हाँ, देखती हूँ माँ जी” कहकर फोन काट दिया। उसका अहंकार अभी भी सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
उसी शाम तान्या की बचपन की सबसे पक्की सहेली सिमरन का फोन आया। तान्या ने उससे मिलने की इच्छा जताई, पर सिमरन ने माफी मांगते हुए कहा, “सॉरी तान्या, आज मैं बिल्कुल नहीं मिल सकती। आज मेरे और वरुण के नए फ्लैट का गृह-प्रवेश है। छोटा सा फ्लैट है, पूरे पांच साल हमने एक-एक पैसा जोड़कर ईएमआई चुकाने का इंतज़ाम किया है। आज हम अपने उस प्यार के छोटे से घर में कदम रखने जा रहे हैं, मुझे बहुत काम है।”
सिमरन की आवाज़ में जो सच्चा गर्व और तृप्ति थी, उसने तान्या के दिल में एक हल्की सी हलचल ज़रूर पैदा की। उसे याद आया कि जब अमित ने पहली बार अपने किराए के फ्लैट की चाबी उसके हाथ में दी थी, तो अमित की आँखों में भी बिल्कुल ऐसा ही गर्व था। पर उसने उस गर्व को अपने पैसों की हनक से कुचल दिया था। फिर भी, उसने अपने मन को यह कहकर बहला लिया कि सिमरन मजबूरी में खुश हो रही है।
अगले दिन रविवार था। तान्या की बड़ी ननद (भाभी शिखा की ननद) अपनी बेटी आरोही के साथ मायके आई हुई थी। दोपहर के वक्त शिखा का सात साल का बेटा कबीर और आरोही लिविंग रूम में सोफे पर बैठकर अपने खिलौनों से खेल रहे थे।
तान्या बालकनी से निकलकर पानी पीने के लिए हॉल की तरफ आ रही थी कि बच्चों की आवाज़ें सुनकर उसके कदम ठिठक गए।
आरोही ने एक बड़ा सा टॉय-हाउस हाथ में लेते हुए कहा, “कबीर, यह पिंक वाला कमरा मेरा है और यह पूरा घर मेरा है, क्योंकि यह मेरे नाना जी का घर है!”
कबीर ने झटके से टॉय-हाउस अपनी तरफ खींच लिया और मुंह बनाकर बोला, “बिल्कुल नहीं! यह सिर्फ मेरा घर है, मेरे डैडी का घर है। तुम्हारी मम्मी की शादी हो गई है, इसलिए तुम यहाँ सिर्फ घूमने आई हो।”
आरोही मासूमियत से ज़िद करने लगी, “तो क्या हुआ? तान्या मौसी भी तो यहीं रहती हैं! जब तान्या मौसी का यह घर है, तो मेरी मम्मा और मेरा क्यों नहीं हो सकता?”
कबीर खिलखिलाकर हंसा और बच्चों वाली बेबाकी से बोला, “अरे बुद्धू! तुम्हें कुछ नहीं पता। तान्या बुआ का तो अपने पति से झगड़ा हो गया है, इसलिए वो यहाँ बैठी हैं। मम्मा कल दादी से कह रही थीं कि बुआ का जब अपने पति से पैचअप हो जाएगा, तो वो अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर अपने घर चली जाएँगी। यह उनका घर थोड़ी है, यह तो मेरे पापा का घर है!”
उन नन्हे बच्चों के ये शब्द किसी जलते हुए अंगारे की तरह तान्या के कानों में पड़े और सीधे उसकी आत्मा को झुलसा गए।
तान्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह दीवार का सहारा लेकर वहीं खड़ी रह गई। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। जो कड़वी हकीकत अमित, उसकी सास कल्याणी देवी और खुद उसकी अंतरात्मा उसे समझाने की कोशिश कर रही थी, वह आज उस सात साल के बच्चे ने एक झटके में उसके चेहरे पर दे मारी थी।
उसे समझ आ गया कि जिस आलीशान बंगले के घमंड में वह अपने पति के प्यार और आत्मसम्मान को ठुकरा रही थी, उस बंगले में अब उसकी हैसियत सिर्फ एक ‘बिन बुलाए मेहमान’ से ज़्यादा कुछ नहीं थी। भाभी की नज़रों में वह एक बोझ थी, जिसकी विदाई का इंतज़ार किया जा रहा था। शादी होते ही मायके की चौखट पर लड़की का हक खत्म हो जाता है और वह अपने ही घर में पराई हो जाती है।
तान्या की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। उसने अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और फूट-फूट कर रोई। उसके सामने अमित का वह शांत, प्यार भरा और स्वाभिमानी चेहरा घूमने लगा। उसने सोचा कि अमित ने उसके लिए क्या कुछ नहीं सहा। अपनी माँ की नाराज़गी झेली, ससुराल के ताने सहे, सिर्फ इसलिए कि उसकी पत्नी खुश रह सके। और उसने क्या किया? उसने उस इंसान के आत्मसम्मान को अपने झूठे अहंकार की वेदी पर चढ़ा दिया।
तान्या ने अब एक पल भी गंवाना ठीक नहीं समझा। उसने अपनी अलमारी खोली। इस बार उसने कोई डिज़ाइनर गाउन या महंगी ज्वेलरी नहीं उठाई, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की सादी साड़ियाँ, कुछ ज़रूरी कपड़े और अमित द्वारा शादी की पहली सालगिरह पर दिया गया वह साधारण सा मंगलसूत्र उठाया जिसे उसने कभी लॉकर में बंद कर दिया था। उसने अपना सारा सामान दो सूटकेसों में समेट लिया।
अगली सुबह सूरज की पहली किरण अभी खिड़की से झांक ही रही थी कि तान्या अपना सामान लेकर नीचे उतर आई। उसने अपनी माँ मालती देवी के कमरे के बाहर उनके फोन पर एक छोटा सा संदेश भेजा— “मम्मी, मैं अपने उस घर जा रही हूँ जहाँ मेरा असली वजूद है, जहाँ मेरा मान है। मुझे रोकने की कोशिश मत करना।”
हॉल में उसके पिता हरिश्चंद्र जी सुबह की चाय पी रहे थे। उन्होंने तान्या को सूटकेस के साथ देखा तो चौंके नहीं। उनके होठों पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। वे चुपचाप उठे, तान्या के सिर पर हाथ रखा और धीमे से बोले, “जीती रहो मेरी बच्ची। आज तूने साबित कर दिया कि तू सिर्फ दौलतमंद बाप की बेटी नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी परिवार की समझदार बहू भी है। जा, अपनी दुनिया खुद बना। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।”
माँ ने आवाज़ सुनकर रोकना चाहा, पर हरिश्चंद्र जी ने हाथ के इशारे से उन्हें वहीं रोक दिया, मानो कह रहे हों कि बेटी के जीवन के सबसे बड़े और सबसे सही फैसले के बीच में दीवार मत बनो।
सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। शहर के दूसरे छोर पर स्थित उस छोटी सी सोसायटी के एक फ्लैट की डोरबेल बजी।
अमित जो अभी-अभी सोकर उठा था और चाय के लिए पानी चढ़ा रहा था, हैरान हुआ कि इतनी सुबह कौन हो सकता है। उसने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने तान्या को दो सूटकेसों के साथ खड़े देखकर वह स्तब्ध रह गया।
“तान्या! तुम… इतनी सुबह? यहाँ सब ठीक तो है?” अमित ने घबराते हुए पूछा।
तान्या की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर एक अनोखी चमक और सुकून था। उसने अपने आँसू पोंछे और अमित को हल्के से पीछे धकेलते हुए अंदर कदम रखा और बोली, “अपने ही घर आने के लिए क्या अब मुझे किसी से इजाज़त लेनी पड़ेगी? यह मेरा घर है, मेरे पति का घर है, और मैं जब चाहूँ तब आ सकती हूँ।”
अमित अवाक होकर उसे देखता रहा।
तान्या ने दोनों सूटकेस एक कोने में रखे। उसने अपनी कलाई से सोने के भारी कंगन उतारे, पल्लू को कमर में खोंसा और बिना एक पल गंवाए सीधे रसोई की तरफ बढ़ गई। उसने चाय के उबलते पानी को देखा, अदरक कूटी और चाय में डाल दी। फिर उसने पूरे घर का मुआयना किया। बिखरी हुई किताबें सलीके से रखीं, सोफे की चादरें ठीक कीं और खिड़कियों के पर्दे खोल दिए ताकि सुबह की ताज़ा हवा और सूरज की सुनहरी किरणें पूरे घर को रोशन कर सकें।
उसके शरीर में गज़ब की फुर्ती और चेहरे पर एक ऐसा नूर था जो अमित ने पहले कभी नहीं देखा था। वह महलों की शहज़ादी नहीं, बल्कि अपने छोटे से साम्राज्य की स्वाभिमानी रानी लग रही थी।
अमित पीछे से आकर चुपचाप खड़ा हो गया। उसने तान्या के कंधे पर हाथ रखा, “तान्या, सचमुच… तुम यहाँ खुश रह पाओगी? यहाँ न नौकर हैं, न कोई ऐशो-आराम…”
तान्या घूमी और उसने अपना सिर अमित के सीने पर रख दिया। उसके आँसुओं ने अमित के कुर्ते को भिगो दिया। “अमित, मुझे माफ कर दो। मैं महलों की चकाचौंध में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे यह समझ ही नहीं आया कि सुख दीवारों की चमक में नहीं, बल्कि अपनों के सम्मान और प्यार में होता है। वहाँ उस बड़े बंगले में मैं नौकरों के बीच भी एक लाचार मेहमान थी, और यहाँ इस छोटे से कमरे में मैं तुम्हारी अर्धांगिनी और इस घर की मालकिन हूँ। मुझे अब किसी दौलत की ज़रूरत नहीं, बस तुम्हारा यह कंधा चाहिए।”
अमित ने प्यार से उसे अपनी बांहों में समेट लिया। दोनों के दिलों से बरसों का बोझ एक पल में उतर गया था।
शाम को दोनों ने मिलकर सादा खाना बनाया—दाल, चावल और सूखी सब्ज़ी। साथ बैठकर खाना खाया, बर्तनों को मिलकर धोया और फिर थक-हारकर जब तान्या सादे गद्दे वाले बिस्तर पर लेटी, तो उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर एक गहरी और सुकून भरी सांस ली। उसकी आत्मा जैसे तृप्त हो चुकी थी।
उसने मुस्कुराते हुए अमित की तरफ देखा और कहा, “सच है अमित… दुनिया चाहे कितनी भी खूबसूरत और बड़ी क्यों न हो, लेकिन अपना घर आखिरकार अपना ही होता है। यहाँ की आज़ादी और सुकून किसी जन्नत से कम नहीं।”
अमित ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा, “अभी कहाँ तान्या… अभी तो हमें मिलकर इस छोटे से घर को अपने सपनों के रंग से सजाना है, अपनी मेहनत से इसे सचमुच का स्वर्ग बनाना है।”
यह कहते हुए उसने कमरे की लाइट बंद कर दी। बाहर खिड़की से झांकता चाँद उस छोटे से कमरे में सो रहे दो दिलों को अपनी शीतल किरणों से आशीर्वाद दे रहा था, जहाँ अब कोई परायापन नहीं था, सिर्फ अपनापन और स्वाभिमान का बसेरा था।
दोस्तों, यह कहानी हमें जीवन का एक बहुत बड़ा और कड़वा सच सिखाती है कि शादी के बाद चाहे मायका कितना भी संपन्न और बड़ा क्यों न हो, एक बेटी की असली पहचान, उसका आत्मसम्मान और उसका स्वतंत्र अस्तित्व सिर्फ और सिर्फ उसके अपने घर और अपने पति के साथ ही सुरक्षित रहता है। पराए महलों की कृपा पर जीने से कहीं बेहतर है अपनी मेहनत से बनाई गई छोटी सी कुटिया में स्वाभिमान से जीना।
क्या आपको भी लगता है कि शादी के बाद बेटी को मायके के मोह और सुविधाओं को छोड़कर अपने पति के साथ मिलकर अपनी स्वतंत्र गृहस्थी बसानी चाहिए, या फिर मायके की मदद लेकर वहीं बस जाना सही है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता