अपनी जड़ों की छाँव

 बेटों और बहुओं का इतना आग्रह देखकर गायत्री देवी भी भावुक हो गईं। उन्हें लगा कि शायद अब शरीर ढल रहा है, तो बच्चों की छत्रछाया में रहना ही ठीक रहेगा। जाने से पहले उन्होंने अपने घर के सारे गमले ऋचा को सौंप दिए, चौकीदार बहादुर को एक साल की बख्शीश एडवांस में दे दी ताकि वह घर की देखभाल करता रहे, और भारी मन से पुणे के लिए रवाना हो गईं। मोहल्ले के लोगों ने नम आँखों से उन्हें विदा किया था, क्योंकि सबको लगा था कि अब शायद गायत्री देवी कभी वापस लौटकर स्थायी रूप से यहाँ नहीं रहेंगी।

  बगल वाली छत पर कपड़े सुखा रही ऋचा के हाथ अचानक थम गए। उसकी नज़रें सामने वाले घर की खिड़की पर टिक गईं, जो पिछले छह महीनों से बंद पड़ी थी। आज उस खिड़की के पल्ले खुले थे और अंदर से चंदन की अगरबत्ती का हल्का धुआँ बाहर आ रहा था। साथ ही, धीमी आवाज में रेडियो पर पुराने भक्ति गीत बजने की मधुर ध्वनि हवा में घुल रही थी। ऋचा के चेहरे पर हैरानी और खुशी के भाव एक साथ तैर गए। उसने कपड़ों की बाल्टी वहीं छोड़ी और दुपट्टा संभालते हुए तेजी से सीढ़ियाँ उतरकर नीचे भागी।

सामने वाले मकान का मुख्य द्वार अधखुला था। ऋचा ने जैसे ही दरवाजा धकेल कर अंदर कदम रखा, आँगन में तुलसी के चौरे के पास खड़ी साठ वर्षीया गायत्री देवी मुस्कुराती हुई मुड़ीं। उनके चेहरे पर सफर की हल्की थकान जरूर थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सा सुकून चमक रहा था।

“अरे अम्मा! आप कब आईं? आपने तो फोन पर भी नहीं बताया कि आप वापस आ रही हैं,” ऋचा ने आगे बढ़कर उनके पैर छूते हुए कहा।

गायत्री देवी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “बस बिटिया, आज सुबह की ही ट्रेन से उतरी हूँ। सोचा तुझे सुबह-सुबह क्या परेशान करूँ, जब उठेगी तो खुद ही देख लेगी। आ, बैठ, तेरे लिए भी अदरक वाली चाय बनाती हूँ।”

गायत्री देवी पिछले बारह सालों से इस मकान में अकेली रह रही थीं। उनके पति, श्रीकांत शर्मा, डाक विभाग में एक बड़े पद पर कार्यरत थे। बारह साल पहले अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था। श्रीकांत जी ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और मेहनत से देहरादून की इस शांत कॉलोनी में यह छोटा सा, पर बेहद खूबसूरत घर बनवाया था। उनके तीन बच्चे थे। बड़ी बेटी मानसी शादी के बाद चंडीगढ़ में बस गई थी। बड़ा बेटा प्रतीक पुणे की एक बड़ी आईटी कंपनी में इंजीनियर था, और छोटा बेटा निखिल बेंगलुरु में एक बैंक में मैनेजर था।

श्रीकांत जी के जाने के बाद, दोनों बेटों ने बहुत जोर दिया था कि गायत्री देवी उनके साथ चलकर रहें। बच्चों के कहने पर वह बारी-बारी से पुणे और बेंगलुरु गई भी थीं, लेकिन कभी दो महीने तो कभी तीन महीने से ज्यादा कहीं टिक नहीं पाईं। उनके दोनों बेटे और दोनों बहुएँ—नेहा और श्रुति—उनका बहुत आदर करते थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, नौकर-चाकर थे, गाड़ियाँ थीं, फिर भी गायत्री देवी का मन वहाँ के बंद फ्लैटों में घुटने लगता था। वह अक्सर अपनी पड़ोसन ऋचा से कहती थीं, “बिटिया, पराये शहर और बच्चों के घर में मेहमान बनकर तो रहा जा सकता है, पर मालिक बनकर नहीं। अपना घर तो अपना ही होता है, जहाँ की दीवारें भी अपना सुख-दुख पहचानती हैं।”

देहरादून के इस घर में गायत्री देवी की अपनी एक अलग ही दुनिया थी, जिसका एक बंधा-बंधाया और बेहद खूबसूरत नियम था। वह हर रोज सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती थीं। नहा-धोकर जब वह पूजा घर में घंटी बजातीं, तो आस-पड़ोस के घरों को पता चल जाता कि सुबह हो गई है। उनके आँगन में हरसिंगार और मोगरे के पेड़ लगे थे, जिनकी खुशबू से पूरा मोहल्ला महकता था।

सुबह छह बजे जब गली में अखबार डालने वाला लड़का मोहन साइकिल की घंटी बजाता, तो गायत्री देवी उसके लिए चाय का एक गिलास और दो बिस्किट तैयार रखती थीं। मोहन भी उन्हें अपनी नानी की तरह मानता था। अगर कभी गायत्री देवी को बाजार से कुछ भारी सामान मंगवाना होता या बिजली-पानी का बिल जमा करना होता, तो मोहन बिना किसी हिचकिचाहट के दौड़कर उनका काम कर आता था। इसी तरह, मोहल्ले का चौकीदार बहादुर सिंह भी रात में गश्त लगाते समय उनके घर के ताले को दो बार चेक करता था।

गायत्री देवी केवल अपने तक सीमित रहने वाली महिला नहीं थीं। उनके मधुर स्वभाव और मददगार प्रवृत्ति ने पूरे मोहल्ले को उनका परिवार बना दिया था। सुबह सात बजे से आठ बजे तक वह पास के पार्क में अपनी हमउम्र महिलाओं के साथ टहलने जातीं और हँसी-ठहाकों के बीच हल्का-फुल्का प्राणायाम करतीं। घर लौटकर वह बड़े इत्मीनान से अपने लिए सादा भोजन बनातीं। दोपहर में जब उनकी कामवाली कमला बर्तन और झाड़ू-पोछा करने आती, तो गायत्री देवी उसके साथ बैठकर उसके घर-परिवार का हालचाल पूछतीं।

कमला की एक दस साल की बेटी थी, जो सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। दोपहर में काम खत्म होने के बाद गायत्री देवी उस बच्ची को एक घंटा अपने पास बिठाकर हिंदी और गणित पढ़ाती थीं। इतना ही नहीं, उन्हें अचार, पापड़ और बढ़ियाँ बनाने का बहुत शौक था। गर्मियों के दिनों में उनकी छत पर आम का अचार और मूंग की दाल की बढ़ियाँ सूखती थीं, जिनका स्वाद कॉलोनी के हर घर में पहुँचता था। ऋचा हो या पीछे वाली गली की मिसेज खन्ना, हर कोई गायत्री देवी से सिलाई-कढ़ाई और रसोई के नुस्खे सीखने आता था।

दो साल पहले एक बार कड़ाके की ठंड में गायत्री देवी को तेज बुखार आ गया था। उस दिन सुबह सात बजे तक जब उनके घर का मुख्य दरवाजा नहीं खुला और न ही अखबार अंदर गया, तो अखबार वाले मोहन को चिंता हुई। उसने तुरंत बगल के घर में रहने वाली ऋचा और उसके पति राजीव को आवाज दी। राजीव ने अपनी दूसरी चाबी से दरवाजा खोला तो देखा कि गायत्री देवी कंबल ओढ़े बुखार से तप रही थीं।

उस दिन पूरे मोहल्ले ने मिलकर जिस तरह गायत्री देवी की सेवा की, वह किसी सगे परिवार से कम नहीं थी। राजीव ने तुरंत कॉलोनी के डॉक्टर भार्गव को बुलाया। ऋचा ने तीन दिन तक अपने घर से ही उनके लिए मूंग की दाल का सूप और खिचड़ी बनाकर खिलाई। मिसेज खन्ना की कॉलेज जाने वाली बेटी तन्वी रात में अपना कंबल लेकर गायत्री देवी के कमरे में ही सोने आ जाती थी, ताकि रात-बिरात उन्हें पानी या दवाई की जरूरत हो तो वह दे सके। ठीक होने के बाद जब गायत्री देवी ने अपने बेटों को यह बात बताई, तो उन्हें भी इस बात का तसल्ली हुई कि माँ वहाँ अकेली नहीं हैं।

शाम का वक्त तो गायत्री देवी के आँगन में किसी उत्सव जैसा होता था। शाम की आरती के बाद वह बरामदे में अपनी बेंत की कुर्सी डालकर बैठ जाती थीं। धीरे-धीरे कॉलोनी के छोटे बच्चे उनके पास इकट्ठा होने लगते। ऋचा का पाँच साल का बेटा आरव तो जैसे उनकी परछाईं ही था। गायत्री देवी शाम को अपने लिए जो सूजी का हलवा या सब्जियों वाला दलिया बनातीं, उसमें एक हिस्सा आरव का भी होता था। वह अपनी कटोरी और चम्मच लेकर उनके घुटनों के पास बैठ जाता और गायत्री देवी से पंचतंत्र की कहानियाँ सुनते हुए पूरा दलिया चट कर जाता।

लेकिन पिछले साल जब गायत्री देवी के घुटनों में दर्द थोड़ा बढ़ गया और उसी दौरान देश भर में मौसमी बीमारियों का प्रकोप फैला, तो पुणे में बैठे उनके बड़े बेटे प्रतीक को बहुत चिंता हुई। उसने और निखिल ने आपस में बात की और देहरादून आकर माँ को मना लिया कि अब उम्र के इस पड़ाव में उन्हें बच्चों के पास ही रहना चाहिए।

बेटों और बहुओं का इतना आग्रह देखकर गायत्री देवी भी भावुक हो गईं। उन्हें लगा कि शायद अब शरीर ढल रहा है, तो बच्चों की छत्रछाया में रहना ही ठीक रहेगा। जाने से पहले उन्होंने अपने घर के सारे गमले ऋचा को सौंप दिए, चौकीदार बहादुर को एक साल की बख्शीश एडवांस में दे दी ताकि वह घर की देखभाल करता रहे, और भारी मन से पुणे के लिए रवाना हो गईं। मोहल्ले के लोगों ने नम आँखों से उन्हें विदा किया था, क्योंकि सबको लगा था कि अब शायद गायत्री देवी कभी वापस लौटकर स्थायी रूप से यहाँ नहीं रहेंगी।

लेकिन आज, सिर्फ छह महीने के भीतर ही गायत्री देवी को वापस अपने आँगन में देखकर ऋचा के मन में सैकड़ों सवाल उठ रहे थे। रसोई में चाय छानते हुए ऋचा से रहा नहीं गया और उसने झिझकते हुए पूछ ही लिया, “अम्मा, सच-सच बताइएगा… पुणे में भैया या भाभी से कोई अनबन हो गई क्या? आप तो कहकर गई थीं कि अब वहीं रहेंगी, फिर इतनी जल्दी अचानक वापस कैसे आ गईं?”

गायत्री देवी ने चाय के दो कप ट्रे में रखे और ऋचा का हाथ पकड़कर बरामदे में ले आईं। कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने एक लंबी, संतोष भरी सांस ली और मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे पगली, तू भी क्या सोचने लगी! मेरे प्रतीक और नेहा तो श्रवण कुमार जैसे हैं। उन्होंने मेरी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे कमरे में ही टीवी लगवा दिया था, नरम गद्दे थे, समय पर दवाई और खाना मिल जाता था। पोता-पोती भी स्कूल से आकर मेरे गले लग जाते थे। किसी ने मुझे एक तिरछी नज़र से भी नहीं देखा।”

“तो फिर? जब सब इतना अच्छा था, तो आप वहाँ से चली क्यों आईं?” ऋचा ने चाय का कप थामते हुए आश्चर्य से पूछा।

गायत्री देवी ने चाय की एक चुस्की ली और सामने आँगन में लगे हरसिंगार के पेड़ को निहारते हुए शांत स्वर में कहा, “बिटिया, प्यार और सम्मान अपनी जगह है, लेकिन एक उम्र के बाद इंसान की आदतें और उसकी दिनचर्या उसकी सांसों का हिस्सा बन जाती हैं। जब हम किसी पेड़ को बहुत बड़ा होने के बाद उसकी जमीन से उखाड़कर किसी महंगे गमले में लगाते हैं, तो उसे खाद-पानी तो भरपूर मिलता है, पर उसकी जड़ें फैल नहीं पातीं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।”

ऋचा ध्यान से उनकी बातें सुन रही थी। गायत्री देवी ने आगे कहा, “पुणे में प्रतीक का फ्लैट चौदहवीं मंजिल पर है। वहाँ से नीचे झांको तो इंसान चींटी जैसा दिखता है। मुझे तो आदत है सुबह साढ़े चार बजे उठकर आँगन की मिट्टी छूने की, चिड़ियों की चहचहाहट सुनने की और अपने हाथों से तुलसी में जल चढ़ाने की। वहाँ प्रतीक और नेहा रात को बारह-एक बजे तक अपने दफ्तर का काम खत्म करके सोते थे। अब अगर मैं सुबह पाँच बजे उठकर नहाऊँ या भजन बजाऊँ, तो उनकी नींद खराब होने का डर रहता था। वे मुझे कभी कुछ कहते नहीं थे, पर मैं खुद ही संकोच के मारे दबे पाँव अपने कमरे में बैठी रहती थी।”

“हाँ अम्मा, बड़े शहरों की लाइफस्टाइल तो ऐसी ही होती है,” ऋचा ने सहमति में सिर हिलाया।

“बिल्कुल बिटिया,” गायत्री देवी बोलीं, “और इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं है। आज के जमाने के हिसाब से उनका जीने का तरीका अलग है। वे सुबह नौ बजे उठते हैं, भागदौड़ में नाश्ता करते हैं और काम पर लग जाते हैं। उनके घर में शाम को कभी पास्ता बनता है, कभी नूडल्स, तो कभी बाहर से खाना आता है। नेहा मेरे लिए अलग से सादा खाना बनाती थी, पर मुझे देख-देखकर बुरा लगता था कि दफ्तर से थककर आने के बाद वह मेरे लिए अलग से रसोई में खड़ी है। कई बार मैं उसका काम कम करने के लिए कह देती कि आज मैं भी तुम लोगों जैसा ही खा लूँगी, पर फिर मेरा पेट खराब हो जाता।”

गायत्री देवी के चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान थी, जिसमें किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि जीवन की एक गहरी समझ थी। उन्होंने कहा, “हम बुजुर्ग अक्सर यही गलती करते हैं। हम अपनी साठ साल पुरानी आदतों को बच्चों के नए जमाने के घर में थोपना चाहते हैं, और जब तालमेल नहीं बैठता, तो हम दुखी हो जाते हैं या बहू-बेटों में कमियाँ निकालने लगते हैं। इससे रिश्तों में खटास आती है। वहाँ बालकनी में खड़े होकर मुझे न तो अखबार वाला मोहन दिखता था, न तेरी जैसी पड़ोसन, और न ही शाम को आरव की किलकारियाँ सुनाई देती थीं। चौदहवीं मंजिल के उस वातानुकूलित कमरे में बैठे-बैठे मुझे लगने लगा कि अगर मैं कुछ साल और ऐसे ही निष्क्रिय बैठी रही, तो शरीर से पहले मेरा मन बूढ़ा हो जाएगा।”

ऋचा की आँखों में गायत्री देवी के लिए सम्मान और बढ़ गया, लेकिन उसने अपनी चिंता जताते हुए कहा, “अम्मा, आपकी सारी बातें बिल्कुल सही हैं। यहाँ आपकी अपनी आजादी है, पर सोचिए, अब आपकी उम्र बढ़ रही है। भगवान न करे, कभी आधी रात को आपकी तबीयत ज्यादा बिगड़ जाए या कोई ऐसी बात हो जाए जब आपको तुरंत सहारे की जरूरत हो, तब क्या होगा? बच्चे पास होते हैं तो एक सुरक्षा तो रहती है न!”

ऋचा की बात सुनकर गायत्री देवी खिलखिलाकर हँस पड़ीं। उनकी हँसी में एक अजीब सी बेफिक्री थी। उन्होंने ऋचा के गाल को थपथपाते हुए कहा, “बिटिया, जिस एक बुरे दिन या अंतिम समय के डर से तू मुझे आगाह कर रही है, उस एक अनदेखे दिन के डर में मैं अपने आज के जीते-जागते, खुशहाल सालों को क्यों कैद कर दूँ? जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में है। कल क्या होगा, यह किसने देखा है? लेकिन जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, जब तक मेरी आँखों में रोशनी है, तब तक तो मैं अपनी शर्तों पर, अपने घर में, अपनी खुशी से जी सकती हूँ न!”

उन्होंने अपने पल्लू से आँख के कोने में आई खुशी की नमी को पोंछते हुए कहा, “और रही बात सहारे की, तो तेरे चाचाजी अपनी पेंशन के रूप में मुझे आत्मनिर्भर बनाकर गए हैं। इलाज के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है। और सबसे बड़ी बात, मैं यहाँ अकेली कहाँ हूँ? यह घर मैंने और तेरे चाचाजी ने एक-एक ईंट जोड़कर बनाया है, यहाँ के हर कोने में उनकी यादें हैं। और इस दरवाजे के बाहर तुम सब हो। मुझे पूरा भरोसा है कि अगर मुझे छींक भी आएगी, तो मेरे बेटों के पुणे और बेंगलुरु से उड़ान भरने से पहले मेरा यह देहरादून वाला परिवार मेरे सिरहाने खड़ा होगा।”

गायत्री देवी ने आगे बताया कि उन्होंने आने से पहले प्रतीक और नेहा को अपने पास बिठाकर बहुत प्यार से यह सारी बातें समझाईं। उन्होंने बच्चों से वादा किया कि वह साल में एक-दो बार उनके पास छुट्टियाँ मनाने जरूर आएंगी, और बच्चे भी गर्मियों की छुट्टियों में देहरादून आकर रहेंगे। जब बच्चों ने देखा कि माँ किसी नाराजगी से नहीं, बल्कि अपनी आत्मिक खुशी के लिए वापस जाना चाहती हैं, तो उन्होंने भी खुशी-खुशी उनकी टिकट करवा दी।

अभी दोनों की बातें चल ही रही थीं कि बाहर साइकिल की घंटी बजी। अखबार वाला मोहन गेट पर खड़ा होकर चहकते हुए बोला, “अरे दादी अम्मा! आप आ गईं! आज से फिर मुझे अदरक वाली चाय मिलेगी!”

उसके पीछे-पीछे ऋचा का छोटा बेटा आरव अपनी नींद से भरी आँखें मलता हुआ दौड़ता आया और सीधा गायत्री देवी की गोद में चढ़कर बोला, “दादी, आप मुझे छोड़कर क्यों चली गई थीं? अब मैं आपको कहीं नहीं जाने दूँगा, आज शाम को मेरे लिए हलवा बनाना!”

थोड़ी ही देर में मिसेज खन्ना, कामवाली कमला और चौकीदार बहादुर सिंह भी आँगन में जमा हो गए। कोई उनके पैर छू रहा था, तो कोई उनके आने की खुशी में अपने घर से ताजे फूल ला रहा था। सूना पड़ा ‘गुलमोहर विला’ एक बार फिर कहकहों और अपनत्व की गर्माहट से चहक उठा था।

गायत्री देवी ने आरव को सीने से लगाते हुए ऋचा की तरफ देखा। उनकी आँखों में एक विजेता का संतोष था। उन्होंने साबित कर दिया था कि बुढ़ापे का मतलब केवल बच्चों पर आश्रित होकर अपनी पहचान खो देना नहीं है। यदि स्वास्थ्य और परिस्थितियाँ साथ दें, तो अपनी जड़ों से जुड़े रहकर, अपने स्वाभिमान और अपनी आजादी के साथ जीना भी जीवन का एक बेहद खूबसूरत और सकारात्मक अध्याय हो सकता है। इससे न केवल बुजुर्गों का मन प्रसन्न रहता है, बल्कि दूर रहने वाले बच्चों के साथ भी उनके रिश्ते की मिठास और गरिमा हमेशा बनी रहती है।

दोस्तों, गायत्री देवी के इस फैसले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि जो बुजुर्ग अपने बच्चों से दूर अपने घर में अकेले रहते हैं, वे हमेशा मजबूर और दुखी नहीं होते, बल्कि अपनी मर्जी और खुशी से अपनी जिंदगी जी रहे होते हैं? क्या एक उम्र के बाद अपना घर और अपनी आजादी छोड़ना वाकई मुश्किल होता है? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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मधु वशिष्ठ

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