अपनों की छांव

 आरव अवाक होकर उसे देखने लगा। मानसी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “आरव, मैं कितनी अंधी हो गई थी! तुम्हारे मम्मी-पापा और चंचल-महक ने तुम्हारी शादी के कितने सपने देखे होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि घर में बहू आएगी, भाभी आएगी, और कल को जब हमारे बच्चे होंगे तो वे उस आंगन में किलकारियां मारेंगे। दादा-दादी और बुआ बनने की कितनी उम्मीदें उन्होंने हमसे लगाई होंगी, और मैंने अपने झूठे अहंकार में एक ही झटके में उनके सारे सपने चकनाचूर कर दिए!

  तीन महीने पहले इस घर के इकलौते बेटे आरव की शादी बड़ी धूमधाम से मानसी के साथ हुई थी। आरव के पिता राजेंद्र जी और मां गायत्री देवी ने अपने इकलौते बेटे की शादी के न जाने कितने अरमान सजाए थे। घर में दो छोटी बेटियां थीं—चंचल और महक, जो अपनी नई भाभी के आने से फूले नहीं समा रही थीं। गायत्री देवी ने तो मानसी को पहले दिन से ही बहू नहीं, बल्कि अपनी तीसरी बेटी माना था। लेकिन इस हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को जैसे किसी की नजर लग गई थी, और वह नजर किसी बाहरी की नहीं, बल्कि मानसी की ही बड़ी बहन शिखा की थी।

शिखा की शादी भी देहरादून के ही एक दूसरे इलाके में हुई थी। वह खुद एक संयुक्त परिवार में रहती थी, जहां उसके सास-ससुर उसके बच्चों से लेकर घर की हर जिम्मेदारी संभालते थे। इसी वजह से शिखा के पास खाली समय की कोई कमी नहीं थी। मानसी की शादी के बाद से ही शिखा ने यह नियम बना लिया था कि वह हर दूसरे दिन दोपहर होते ही मानसी के ससुराल आ धमकती। फिर दोनों बहनें जो दोपहर को शॉपिंग, पार्लर और कैफे के नाम पर निकलतीं, तो सीधे रात को खाने के वक्त ही घर लौटतीं।

शुरू-शुरू में गायत्री देवी ने यह सोचकर कुछ नहीं कहा कि नई-नई शादी है, मायके से जुड़ाव रहता ही है। चंचल और महक भी अपनी भाभी के साथ वक्त बिताना चाहती थीं, उनके साथ बैठकर बातें करना चाहती थीं, लेकिन मानसी के पास अपनी ननदों या सास के लिए तो दूर, अपने पति आरव के लिए भी समय नहीं था। आरव जब शाम को थका-हारा ऑफिस से लौटता, तो उसे अपनी नई-नवेली पत्नी घर पर मिलती ही नहीं थी। रात को जब मानसी लौटती, तो थकान का बहाना बनाकर सो जाती।

एक दिन जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तो गायत्री देवी ने बहुत ही शांत और स्नेहभरे स्वर में मानसी को अपने पास बिठाया। उस वक्त दोपहर के दो बज रहे थे और मानसी फिर से शिखा के साथ बाहर जाने के लिए तैयार खड़ी थी।

गायत्री देवी ने प्यार से मानसी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बहू, एक बात कहूं? बुरा मत मानना बेटा, लेकिन क्या यह अच्छा लगता है कि तुम्हारी दीदी हर दूसरे दिन यहां आ जाती हैं और तुम दोनों दोपहर की निकली हुई सीधे रात को घर लौटती हो? मानसी बेटा, अभी तुम्हारी नई-नई शादी हुई है। यह समय तो तुम्हें आरव के साथ बिताना चाहिए। तुम दोनों साथ में घूमो-फिरो, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को समझो। शादी के शुरुआती दिन तो पति-पत्नी के रिश्ते की नींव होते हैं। इसके अलावा घर में चंचल और महक भी हैं, वे तुमसे कितना प्यार करती हैं। लेकिन तुम अपना सारा समय अपनी बहन के साथ बाहर घूमने में ही निकाल देती हो।”

गायत्री देवी ने एक गहरी सांस ली और आगे कहा, “बेटा, शिखा तो तुमसे बड़ी है, शादीशुदा है और खुद एक भरे-पूरे ससुराल में रहती है। क्या वह तुम्हें यह सलाह नहीं देती कि नई गृहस्थी को कैसे संभाला जाता है? उसे तो खुद समझना चाहिए कि अपनी छोटी बहन के नए घर में इस तरह रोज-रोज आकर हस्तक्षेप न करे। उसके पास इतना फालतू समय कहां से आ जाता है? बेटा, मैं तुम्हारी मां जैसी हूं, इसलिए समझा रही हूं। मायके का जरूरत से ज्यादा दखल अक्सर अच्छी-भली गृहस्थी में दरार डाल देता है। कहना मेरा फर्ज था, बाकी तुम खुद समझदार हो।”

गायत्री देवी की बातें जितनी सच्ची और सुलझी हुई थीं, मानसी को वे उतनी ही कड़वी लगीं। शिखा ने पहले ही उसके दिमाग में यह जहर घोल रखा था कि ससुराल वाले हमेशा बहू को दबाकर रखना चाहते हैं। गायत्री देवी ने अपनी बात खत्म ही की थी कि तभी आरव ऑफिस की किसी जरूरी फाइल के सिलसिले में अचानक दोपहर को ही घर आ गया। आरव को देखते ही मानसी की आंखों में आंसू आ गए—पछतावे के नहीं, बल्कि गुस्से और अहंकार के।

उसने तुरंत अपना पर्स सोफे पर पटका और आरव के सामने जाकर ऊंची आवाज में बोली, “आरव! आज तुम मुझे साफ-साफ बता दो, क्या इस घर में मेरा कोई अस्तित्व, कोई हक नहीं है? क्या मैं अपनी मर्जी से अपनी सगी बहन से मिल भी नहीं सकती? तुम्हारी मम्मी को मेरी दीदी के यहां आने से इतनी आपत्ति क्यों है? कभी कहती हैं यहां मत जाओ, कभी कहती हैं ऐसे मत रहो! मैं तंग आ चुकी हूं इन सब पाबंदियों से! मुझे तुम्हारे परिवार के साथ घुट-घुट कर नहीं जीना है। अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो, तो हमें अभी के अभी अलग घर लेना होगा!”

अचानक हुए इस तमाशे से आरव सन्न रह गया। राजेंद्र जी भी अपने कमरे से बाहर आ गए। सबने मिलकर मानसी को बहुत समझाने की कोशिश की। राजेंद्र जी ने हाथ जोड़कर कहा कि बेटी, यह तुम्हारा ही घर है, हमने तो बस तुम्हारे भले के लिए कहा था। चंचल और महक भी भाभी का हाथ पकड़कर रोने लगीं कि भाभी, हमें छोड़कर मत जाओ। आरव ने भी मानसी को अकेले में समझाया कि मम्मी का इरादा गलत नहीं था, वे तो बस हमारे रिश्ते की बेहतरी चाहती हैं। लेकिन मानसी के सिर पर तो अपनी ‘आज़ादी’ का भूत सवार था। उसे लग रहा था कि सास-ससुर के साथ रहकर वह कभी अपनी मर्जी की मालकिन नहीं बन पाएगी। उधर जब उसने फोन पर शिखा को यह बात बताई, तो शिखा ने आग में घी डालते हुए कहा, “बिल्कुल सही किया मानसी! अभी से दबकर रहेगी तो पूरी जिंदगी नौकरानी बनकर रहना पड़ेगा। तुरंत अलग हो जा, तभी चैन से जी पाएगी!”

बहन की इस शह ने मानसी के इरादों को और पक्का कर दिया। उसने आरव को साफ अल्टीमेटम दे दिया कि या तो वह उसके साथ अलग चले, या फिर वह मायके जा रही है। आरव अपनी नई-नवेली शादी को टूटने से बचाना चाहता था। अपने माता-पिता के आंसुओं और बहनों की सिसकियों के बीच, भारी मन से आरव ने शहर के दूसरे कोने में एक दो कमरों का फ्लैट किराए पर ले लिया और मानसी के साथ वहां शिफ्ट हो गया।

नए घर में आकर शुरुआती पंद्रह-बीस दिन मानसी को स्वर्ग जैसे लगे। न कोई सुबह जल्दी उठने की टेंशन, न सास के सवाल, न ननदों की चहचहाहट। जब मन किया सोई, जब मन किया उठी, और जब मन किया शिखा के साथ मॉल और रेस्टोरेंट में पैसे उड़ाए। उसे लग रहा था कि उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली है। लेकिन वह यह भूल गई थी कि जिस आज़ादी पर वह इतना इतरा रही है, वह अपनों के दिलों को तोड़कर खरीदी गई थी। उधर आरव अंदर ही अंदर घुटने लगा था। अपने माता-पिता को इस उम्र में अकेला छोड़ आने का अपराधबोध उसे हर पल खाता रहता था। वह चुपचाप और गुमसुम रहने लगा था, लेकिन मानसी को अपनी मस्ती में आरव की इस उदासी का अहसास ही नहीं हुआ।

कहते हैं न, वक्त सबसे बड़ा गुरु होता है। अलग होने के करीब डेढ़ महीने बाद मानसी को अचानक चक्कर आने लगे और तबीयत बिगड़ने लगी। जब आरव उसे डॉक्टर के पास ले गया, तो जांच के बाद पता चला कि मानसी गर्भवती है। यह खबर सुनकर दोनों बहुत खुश हुए। आरव की आंखों में एक चमक आ गई, उसने सोचा कि शायद इस बच्चे के आने से दूरियां मिट जाएंगी। लेकिन खुशियों के साथ ही एक बड़ी चुनौती भी सामने खड़ी थी।

तीसरा महीना लगते ही मानसी को कुछ शारीरिक जटिलताएं (कॉम्प्लिकेशन्स) शुरू हो गईं। जब वे डॉक्टर के पास गए, तो डॉक्टर ने सख्त हिदायत देते हुए कहा, “देखिए मिस्टर आरव, मानसी की हालत थोड़ी नाजुक है। इन्हें कम से कम अगले पांच-छह महीनों तक कंप्लीट बेड रेस्ट की जरूरत है। झुकना, भारी काम करना या बाहर घूमना-फिरना पूरी तरह बंद। इन्हें इस वक्त चौबीसों घंटे किसी ऐसे इंसान की देखभाल चाहिए जो इनके खाने-पीने से लेकर दवाई तक का पूरा ध्यान रख सके।”

डॉक्टर की बात सुनकर मानसी का चेहरा उतर गया। बाहर घूमना-फिरना तो बंद हुआ ही, अब घर के काम और अपनी देखभाल की चिंता सताने लगी। आरव की नौकरी ऐसी थी कि वह सुबह नौ बजे निकलता तो रात को आठ बजे ही लौट पाता था। नए प्रोजेक्ट की वजह से उसे छुट्टी मिलना भी नामुमकिन था।

लेकिन मानसी को ज्यादा चिंता नहीं हुई। उसे अपनी बड़ी बहन शिखा पर पूरा भरोसा था। घर लौटते ही उसने बिस्तर पर लेटे-लेटे तुरंत शिखा को फोन लगाया और अपनी प्रेग्नेंसी व बेड रेस्ट की बात बताते हुए बड़े अधिकार से कहा, “शिखा दीदी, अब तो मेरी सारी उम्मीदें आप पर ही टिकी हैं। डॉक्टर ने बिल्कुल उठने से मना किया है और आरव को ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल सकती। दीदी, आज शाम से ही आप मेरे पास आ जाइए, अब अगले कुछ महीने आपको ही मेरा और मेरे आने वाले बच्चे का पूरा ध्यान रखना होगा। मुझे आपकी बहुत जरूरत है।”

मानसी को लगा था कि जिस बहन के साथ वह रोज घंटों बिताती थी, वह यह सुनते ही दौड़ी चली आएगी। लेकिन फोन के दूसरी तरफ कुछ पल की खामोशी छा गई। फिर शिखा की बेहद रूखी और बदली हुई आवाज सुनाई दी, “अरे मानसी, यह तू कैसी बच्चों जैसी बातें कर रही है? मैं तेरे घर आकर कैसे रह सकती हूं? मेरे अपने घर में भी तो पचास काम रहते हैं भाई!”

मानसी ने हैरानी से कहा, “पर दीदी, आप पहले भी तो रोज घंटों मेरे साथ रहती थीं, तब तो आपके घर में कोई काम नहीं होता था?”

शिखा ने तुरंत पल्ला झाड़ते हुए कहा, “देख मानसी, तब की बात और थी! तब तू नई-नई शादी होकर आई थी, तुझे थोड़ा घुमाना-फिराना था तो मैं टाइम निकाल लेती थी। अब इसका मतलब यह थोड़ी है कि मैं अपनी गृहस्थी छोड़कर तेरे घर नर्सिंग का काम करने बैठ जाऊं! मेरा भी पति है, बच्चे हैं, सास-ससुर हैं। और वैसे भी, अब तू खुद मां बनने वाली है, कोई छोटी बच्ची नहीं है। अपना ध्यान तुझे खुद ही रखना पड़ेगा। इसमें मैं क्या कर सकती हूं? और तुझे तो अच्छी तरह पता है कि मैंने आज तक अपने बच्चों की भी इतनी जिम्मेदारी अकेले नहीं उठाई, मेरे घर में तो मेरी सास और ननद ने ही मेरी सारी डिलीवरी और बच्चों का काम संभाला था। मुझे ये सब सेवा-पानी करना नहीं आता। तू कोई मेड (नौकरानी) रख ले, मुझे बार-बार फोन मत करना, अभी मैं अपनी सास के साथ रिश्तेदारी में जा रही हूं।”

इतना कहकर शिखा ने फोन काट दिया। मानसी के हाथ से फोन छूटकर बिस्तर पर गिर गया। उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। आज उसके सामने अपनी ही सगी बहन का असली चेहरा आ गया था! जिस बहन के कहने पर उसने अपने देवता जैसे सास-ससुर और प्यारी ननदों को ठुकराया था, उसने मुसीबत आते ही कैसे एक झटके में किनारा कर लिया!

अकेले कमरे की चारदीवारी में लेटी मानसी को आज पहली बार अपनी गलती का गहरा अहसास हो रहा था। उसने सोचा—शिखा दीदी खुद तो अपने ससुराल वालों के साथ रहती हैं, अपनी सास के आंचल की छांव में अपने बच्चों को पाल रही हैं, अपने सारे फर्ज और सुख वहां भोग रही हैं, लेकिन मुझे अलग होते वक्त उन्होंने एक बार भी नहीं रोका! बल्कि मुझे उकसाया कि मैं अपना घर तोड़ लूं!

अगले कुछ दिन मानसी के लिए किसी सजा से कम नहीं थे। आरव सुबह उठकर बेचारा अधपका खाना बनाता, मानसी को दवा देता और भागते हुए ऑफिस जाता। दिन भर मानसी उस खाली फ्लैट में अकेली पड़ी रहती। कभी पानी का गिलास लेने के लिए भी उठना पड़ता तो पेट में दर्द होने लगता। जिस आज़ादी के सुख के लिए उसने नया घर बसाया था, आज वही घर उसे एक जेल लगने लगा था। वह आज़ाद नहीं हुई थी, बल्कि अकेलेपन और बेबसी की बेड़ियों में जकड़ गई थी।

उसे बार-बार अपनी सास गायत्री देवी की याद आने लगी। जब उसे एक बार मामूली सा बुखार आया था, तो गायत्री देवी ने पूरी रात जागकर उसके माथे पर ठंडी पट्टियां रखी थीं। चंचल और महक ने उसके पैरों में तेल की मालिश की थी और ससुर जी खुद अपने हाथों से उसके लिए सूप बनाकर लाए थे। आज जब उसे सच में अपनों की जरूरत थी, तो उसके पास कोई नहीं था। और यह अकेलापन किसी और ने नहीं, बल्कि उसके अपने अहंकार ने उसे दिया था।

मानसी ने देखा कि आरव दिन-ब-दिन सूखता जा रहा है। ऑफिस का तनाव, घर का काम और ऊपर से माता-पिता से दूर रहने का गम—आरव की हंसी कहीं खो गई थी। उस शाम जब आरव ऑफिस से लौटा और चुपचाप रसोई में जाकर बर्तन धोने लगा, तो मानसी से रहा नहीं गया। वह धीरे-धीरे कदम रखती हुई रसोई के दरवाजे पर पहुंची और सिसक-सिसक कर रोने लगी।

आरव घबराकर उसके पास आया और उसे सहारा देते हुए बोला, “मानसी, तुम क्यों उठीं? कुछ चाहिए था तो मुझे आवाज दे देतीं।”

मानसी ने आरव के दोनों हाथ पकड़ लिए और रोते हुए बोली, “आरव, मुझे मेरा घर चाहिए… मुझे अपने मम्मी-पापा के पास वापस जाना है! मुझे मेरी गलती समझ में आ गई है आरव, मैं बहुत बड़ी गुनहगार हूं!”

आरव अवाक होकर उसे देखने लगा। मानसी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “आरव, मैं कितनी अंधी हो गई थी! तुम्हारे मम्मी-पापा और चंचल-महक ने तुम्हारी शादी के कितने सपने देखे होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि घर में बहू आएगी, भाभी आएगी, और कल को जब हमारे बच्चे होंगे तो वे उस आंगन में किलकारियां मारेंगे। दादा-दादी और बुआ बनने की कितनी उम्मीदें उन्होंने हमसे लगाई होंगी, और मैंने अपने झूठे अहंकार में एक ही झटके में उनके सारे सपने चकनाचूर कर दिए! पता नहीं मम्मी जी ने अपने आने वाले पोते-पोती के लिए मन में क्या-क्या अरमान सजाए होंगे, और मैंने उनसे उनका वह सबसे बड़ा हक ही छीन लिया! मैं उस घर की इकलौती बहू थी आरव, फिर भी मैं अपने फर्ज को कैसे भूल गई? झूठी आज़ादी के पीछे भागते-भागते मैं अपनों के प्यार से ही दूर हो गई। आरव, क्या तुम मुझे माफ करोगे? क्या तुम मुझे हमारे घर वापस ले चलोगे?”

पत्नी के मुंह से ये शब्द सुनकर आरव की आंखों से भी बांध टूट गया। वह तो जैसे पिछले दो महीनों से इसी पल के इंतजार में जी रहा था। उसने मानसी को कसकर अपने गले से लगा लिया और बोला, “मानसी, सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। मम्मी-पापा का दिल बहुत बड़ा है, चलो कल ही हम अपने घर चलते हैं।”

अगले ही दिन सुबह आरव ने सारा सामान पैक किया और मानसी को लेकर अपने माता-पिता के घर ‘आशीर्वाद’ पहुंच गया। दरवाजे की घंटी बजी और जब राजेंद्र जी ने दरवाजा खोला, तो सामने आरव और मानसी को देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। आवाज सुनकर गायत्री देवी, चंचल और महक भी बाहर दौड़ी चली आईं।

मानसी ने आगे बढ़कर अपने सास-ससुर के चरण स्पर्श किए और फूट-फूट कर रोने लगी, “मम्मी जी, पापा जी, हो सके तो अपनी इस नादान बेटी को माफ कर दीजिए। मैं आपकी दी हुई सीख को समझ नहीं पाई और गुस्से में बहुत बड़ा पाप कर बैठी। मुझे अपने चरणों में वापस जगह दे दीजिए मम्मी जी।”

बहू के आंसू देखकर गायत्री देवी का ममता से भरा दिल तुरंत पिघल गया। उन्होंने झुककर मानसी को उठाया और जब आरव ने उन्हें बताया कि मानसी मां बनने वाली है, तो पूरे घर में जैसे खुशियों की लहर दौड़ गई। गायत्री देवी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।

उन्होंने मानसी के चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए कहा, “बस कर पगली, इस हालत में रोते नहीं हैं! बहू, हर मां-बाप की तरह हमने भी यही सपना देखा था कि हमारे बेटे की शादी होगी, घर में लक्ष्मी आएगी और कल को उसके बच्चे इस सूने आंगन में खेलेंगे। हमने तो तुम्हें कभी पराई बहू समझा ही नहीं था बेटा, हमेशा चंचल और महक की तरह अपनी बेटी ही माना था। पता नहीं हमारे ही प्यार में शायद कोई कमी रह गई थी जो तुम हमसे दूर चली गईं। लेकिन याद रखना मानसी, इस घर पर और हमारे दिलों पर तुम्हारा कल भी उतना ही हक था और आज भी उतना ही हक है। मुझे तो इस बात की सबसे बड़ी खुशी है कि तुम्हें सही वक्त पर अपने और पराये की पहचान हो गई।”

इतना कहकर गायत्री देवी ने मानसी को अपने सीने से लगा लिया। चंचल और महक तो खुशी के मारे उछल पड़ीं और अपनी भाभी के गाल चूमने लगीं। राजेंद्र जी ने भी मुस्कुराते हुए दोनों के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखा। दो महीने बाद आज उस घर की दीवारों ने फिर से पूरे परिवार के एक साथ हंसने के ठहाके सुने थे।

इसके बाद तो मानसी को जमीन पर पैर भी नहीं रखने दिया गया। गायत्री देवी ने उसकी एक मां से भी बढ़कर सेवा की। कभी उसके लिए केसर वाला दूध आता, तो कभी चंचल और महक उसके पास बैठकर उसे कहानियां सुनातीं ताकि उसका मन लगा रहे। सही समय आने पर मानसी ने एक बेहद प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। पोती के जन्म पर राजेंद्र जी और गायत्री देवी ने पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटीं।

आंगन में झूलती अपनी नन्ही सी गुड़िया को देखकर और परिवार के हर सदस्य के चेहरे पर छलकती असीम खुशी को महसूस करके मानसी का दिल भर आया। आज वह पूरी तरह समझ चुकी थी कि घर की खुशियों पर पूरे परिवार का हक होता है। वह तो अपनी नासमझी में अपने ही बच्चे से उसके दादा-दादी और बुआ का निश्छल प्यार छीनने जा रही थी। उसने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया कि सही समय पर उसकी आंखें खुल गईं, वरना झूठी आज़ादी के भ्रम में वह इतने प्यारे और अनमोल परिवार के सुख से हमेशा के लिए वंचित रह जाती।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि शादी के बाद लड़की के ससुराल में मायके वालों का जरूरत से ज्यादा दखल अक्सर बसे-बसाए घर को तोड़ने का काम करता है? मानसी की बड़ी बहन शिखा के व्यवहार और सास गायत्री देवी के बड़प्पन के बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें!

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