शारदा जी अचरज और गर्व से अपनी बहू को देख रही थीं। वह बोलीं, “कमला जी, सच कहूँ तो मुझे भी आज ही पता चला कि मेरी बहू के भीतर इतना बड़ा हुनर छिपा है। इसने तो कभी जिक्र ही नहीं किया।”
उस रात जब सब मेहमान चले गए और घर के लोग आँगन में बैठे थे, शारदा जी ने सिया को अपने पास बुलाया। उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “सिया बेटा, इतना सुंदर गाती हो, फिर कभी बताया क्यों नहीं? क्या तुम्हें आगे सीखने का मन नहीं करता?”
“स्वरंजलि संगीत अकादमी”—सुनहरे अक्षरों से लिखा यह चमकता हुआ बोर्ड जब क्रेन की मदद से घर की तीसरी मंजिल की छत पर लगाया जा रहा था, तो नीचे आँगन में खड़ी सिया की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। तपती दोपहर की धूप में भी उसे एक अजीब सी शीतलता का अहसास हो रहा था। मजदूरों को निर्देश देते हुए और सारा सामान व्यवस्थित करवाते हुए वह सुबह से पसीने में तरबतर हो चुकी थी, लेकिन चेहरे की रौनक ऐसी थी मानो उसे दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो। बोर्ड लगने के बाद उसने सबसे पहले पास खड़ी अपनी सासू माँ, शारदा जी के चरण स्पर्श किए। शारदा जी ने बड़े स्नेह से उसे गले लगाते हुए उसके माथे को चूम लिया और कहा, “आज मेरी बेटी की सालों की तपस्या सफल हो गई।”
सारा काम निपटाकर जब मजदूर चले गए, तो सिया अपने कमरे में आई। ठंडे पानी से नहाने के बाद उसने पंखा चलाया और बिस्तर पर लेट गई। थकान से चूर शरीर जैसे ही गद्दे से लगा, उसकी आँखें मुँद गईं, लेकिन मन की आँखें खुल गईं। कमरे की छत को निहारते हुए उसके होंठों पर एक धीमी सी मुस्कान तैर गई और वह वक्त की पगडंडियों पर चलते हुए आज से पच्चीस साल पीछे, अपने मायके के शहर प्रयागराज की उन तंग गलियों और बड़े से पुश्तैनी मकान में पहुँच गई।
“खबरदार जो इस घर में दोबारा सितार या हारमोनियम का नाम भी लिया! क्या अब ठाकुर हरिशंकर सिंह की बेटियां समाज के सामने बैठकर राग अलापेंगी? गाना-बजाना करके खानदान की नाक कटवाएंगी?”
पिताजी की वह गरजती हुई आवाज आज भी सिया के कानों में किसी हथौड़े की तरह गूँज उठी। सिया तब महज सोलह साल की थी। दरवाजे की ओट में छिपकर वह अपनी माँ सावित्री जी को पिताजी की डांट खाते हुए देख रही थी। हरिशंकर जी का पूरे मोहल्ले में बड़ा दबदबा था। उनकी मूँछों की ऐंठन और कड़क आवाज से घर के परिंदे भी सहम जाते थे। उनका मानना था कि शरीफ और इज्जतदार घरों की लड़कियों का काम सिर्फ चौका-बर्तन सीखना, सिलाई-कढ़ाई करना और समय आने पर किसी अच्छे घर में ब्याह कर चले जाना होता है। उनके शब्दकोश में लड़कियों के लिए ‘कला’, ‘संगीत’ या ‘सपने’ जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं थी।
“तुमने ही इस लड़की को सिर पर चढ़ा रखा है सावित्री!” हरिशंकर जी ने अपनी पत्नी को घूरते हुए कहा था, “चार भाइयों के बाद सबसे छोटी है, तो क्या इसका मतलब यह है कि यह घर की मर्यादा ही भूल जाएगी? अगर समाज में किसी को पता चला कि हमारी बेटी गाने-बजाने का शौक रखती है, तो कौन शरीफ आदमी इसके हाथ पीले करेगा? कल से इसका स्कूल के किसी भी कार्यक्रम में भाग लेना बंद! इसे रसोई के काम सिखाओ, ससुराल में रोटियां बेलनी पड़ेंगी, तानपुरा नहीं बजाना पड़ेगा।”
सिया ने अपनी सिसकियों को अपनी हथेली से दबा लिया था। उस दौर में मध्यमवर्गीय और रूढ़िवादी परिवारों में घर की इज्जत बड़ी नाजुक चीज हुआ करती थी, जो बेटियों के जरा से खुलकर हँसने, गुनगुनाने या अपने सपनों की बात करने भर से ही खतरे में पड़ जाती थी। सिया चार बड़े भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी और भाई अपने-अपने काम में लग गए थे। सिया के भीतर बचपन से ही संगीत के प्रति एक अनोखा लगाव था। जब भी घर में रेडियो पर कोई पुराना शास्त्रीय गीत या भजन बजता, तो वह रसोई के कोने में बैठकर बर्तनों की थाप पर ही सुर मिलाने लगती थी। उसकी आवाज में एक ऐसी कशिश थी कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाए।
उसी साल स्कूल के वार्षिक समारोह में सिया ने बिना घर पर बताए एक शास्त्रीय गायन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। जब उसने मंच पर आँखें बंद करके राग यमन छेड़ा, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था। उसे प्रथम पुरस्कार में एक छोटी सी चाँदी की ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र मिला था। स्कूल की संगीत शिक्षिका ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा था, “सिया, तुम्हारे गले में साक्षात माँ सरस्वती का वास है। तुम किसी अच्छे गुरु से विधिवत शास्त्रीय संगीत और सितार बजाना सीखो। आगे चलकर तुम एक बहुत बड़ी कलाकार बन सकती हो या किसी बड़े संस्थान में संगीत सिखा सकती हो।”
सहेलियों और शिक्षिकाओं की तारीफों ने सिया के नन्हे सपनों को पंख दे दिए थे। वह ट्रॉफी छुपाकर घर लाई थी और बड़ी उम्मीद से अपनी माँ को दिखाते हुए बोली थी, “माँ, देखो न, मुझे पहला इनाम मिला है। टीचर जी कह रही थीं कि अगर मैं संगीत विद्यालय में दाखिला ले लूँ, तो बहुत आगे जा सकती हूँ। माँ, आप बाबूजी से बात करो न, बस एक बार उन्हें मना लो। मैं घर का सारा काम भी करूँगी, बस शाम को एक घंटे संगीत सीखने जाने दो।”
माँ सावित्री जी अपनी बेटी की आँखों में चमकते उस सपने को देख तो रही थीं, लेकिन वह अपने पति के कठोर स्वभाव से भी भली-भांति परिचित थीं। फिर भी, बेटी की जिद और उसकी प्रतिभा को देखकर माँ का दिल पसीज गया। उन्होंने हिम्मत जुटाकर रात के खाने के बाद हरिशंकर जी से बात छेड़ी थी, जिसका नतीजा वही हुआ जिसका डर था। हरिशंकर जी ने न केवल साफ इनकार कर दिया, बल्कि सिया की वह छोटी सी ट्रॉफी भी उठाकर स्टोर रूम के कबाड़ में फेंक दी।
उस रात सिया खूब रोई थी। उसके सारे अरमानों पर एक झटके में पानी फिर गया था। लेकिन कहते हैं न, सच्ची लगन को बेड़ियों में जकड़ा नहीं जा सकता। सिया ने बाहर जाकर सीखने की जिद तो छोड़ दी, लेकिन जब भी दोपहर में बाबूजी काम पर चले जाते और माँ आराम कर रही होतीं, वह छत के कोने वाले कमरे में जाकर धीमी आवाज में रियाज किया करती थी। हवा के झोंके और चिड़ियों की चहचहाहट ही उसके श्रोता होते थे।
देखते ही देखते तीन साल बीत गए। सिया की पढ़ाई पूरी होते ही हरिशंकर जी ने देहरादून के एक प्रतिष्ठित परिवार में उसका रिश्ता तय कर दिया। सिया के पति अनुराग एक बैंक में अधिकारी थे और स्वभाव से बेहद शांत और सुलझे हुए इंसान थे। शादी की रस्मों के बीच सिया अपने मायके की दहलीज के साथ-साथ अपने संगीत के सपने को भी वहीं पीछे छोड़ आई। उसने मन ही मन मान लिया था कि अब एक अच्छी बहू और पत्नी बनना ही उसकी नियति है।
ससुराल का माहौल मायके से काफी अलग था, फिर भी सिया के मन में बचपन का वह डर इतना गहरा बैठा था कि उसने कभी किसी के सामने अपने संगीत के शौक का जिक्र तक नहीं किया। वह सुबह उठकर पूरे घर की देखभाल करती, सासू माँ शारदा जी की सेवा करती और अनुराग के दफ्तर जाने की तैयारी में लगी रहती। दो साल ऐसे ही गुजर गए। सिया के चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती, लेकिन जब कभी पड़ोस के किसी घर से हारमोनियम या किसी गीत की आवाज आती, तो उसके हाथ काम करते-करते अचानक रुक जाते और मन के किसी कोने में एक टीस सी उठती कि काश, वह भी अपनी इस अधूरी प्यास को बुझा पाती।
बदलाव की वह सुनहरी सुबह तब आई, जब सिया की ननद का रिश्ता तय हुआ। घर में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। हल्दी और मेहंदी के बाद जब महिला संगीत की शाम आई, तो मोहल्ले और रिश्तेदारी की तमाम महिलाएं इकट्ठा हुईं। ढोलक की थाप पर पारंपरिक गीत गाए जा रहे थे। तभी अनुराग की मौसी ने मजाक में कहा, “अरे भाई, आज तो हमारी बड़ी बहू सिया को भी कुछ सुनाना पड़ेगा! जब से शादी होकर आई है, हमने तो इसकी आवाज में एक भजन भी नहीं सुना।”
सिया पहले तो झिझकी। उसकी नजरें अपनी सासू माँ शारदा जी की तरफ उठीं। शारदा जी ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा, “हाँ सिया, आज तो खुशी का मौका है, झिझको मत, कोई अच्छा सा गीत सुना दो।”
सिया ने काँपते हाथों से ढोलक को थामा। उसने आँखें बंद कीं और अपनी कुलदेवी का ध्यान करके जब एक पारंपरिक लोकगीत को शास्त्रीय अंदाज में आलाप के साथ शुरू किया, तो आँगन में चल रही सारी फुसफुसाहट अचानक थम गई। उसकी आवाज की मिठास और सुरों के पक्केपन ने वहां मौजूद हर महिला को बांध लिया। उसने केवल गीत ही नहीं गाया, बल्कि बीच-बीच में सरगम के ऐसे तान लिए कि लोग दंग रह गए। जब गीत समाप्त हुआ, तो कुछ सेकंड के सन्नाटे के बाद पूरा आँगन तालियों से गूँज उठा।
पड़ोस में रहने वाली एक सेवानिवृत्त प्राचार्या, कमला जी ने आगे बढ़कर सिया की ठोड़ी छूते हुए शारदा जी से कहा, “शारदा बहन, आपकी बहू के गले में तो जादू है! इतना सधा हुआ सुर बिना सीखे नहीं आ सकता। क्या इसने मायके में संगीत की शिक्षा ली है? अगर इसे थोड़ा सा और तराशा जाए और यह विधिवत प्रशिक्षण ले ले, तो यह बड़े-बड़े कलाकारों को पीछे छोड़ सकती है। यहाँ तक कि खुद का संगीत विद्यालय भी चला सकती है।”
शारदा जी अचरज और गर्व से अपनी बहू को देख रही थीं। वह बोलीं, “कमला जी, सच कहूँ तो मुझे भी आज ही पता चला कि मेरी बहू के भीतर इतना बड़ा हुनर छिपा है। इसने तो कभी जिक्र ही नहीं किया।”
उस रात जब सब मेहमान चले गए और घर के लोग आँगन में बैठे थे, शारदा जी ने सिया को अपने पास बुलाया। उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “सिया बेटा, इतना सुंदर गाती हो, फिर कभी बताया क्यों नहीं? क्या तुम्हें आगे सीखने का मन नहीं करता?”
सिया की आँखें भर आईं। उसने दबी जुबान में अपने मायके का माहौल और बाबूजी की सख्ती के बारे में बताया कि कैसे उसके सपने को खानदान की इज्जत के नाम पर कुचल दिया गया था। उसकी बात सुनकर अनुराग और शारदा जी दोनों ही भावुक हो गए।
शारदा जी ने सिया के आँसू पोंछते हुए दृढ़ स्वर में कहा, “बेटा, जो बीत गया सो बीत गया। कला तो ईश्वर का दिया हुआ वरदान है, इससे किसी खानदान की इज्जत कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। अगर तुम्हारे मन में आज भी संगीत सीखने की इच्छा है, तो मेरी तरफ से तुम्हें पूरी छूट है। कल ही अनुराग से कहो कि शहर के सबसे अच्छे संगीत महाविद्यालय में तुम्हारा दाखिला करवा दे।”
सिया को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने तुरंत सासू माँ के पैर छू लिए और भरभराए गले से बोली, “माँ जी, क्या सच में आप मुझे सीखने देंगी?”
“अरे पगली, इसमें पूछने की क्या बात है! मेरी बहू आगे बढ़ेगी तो मेरा ही तो सिर गर्व से ऊँचा होगा,” शारदा जी ने हँसते हुए कहा।
ननद की विदाई के ठीक एक हफ्ते बाद, अनुराग ने शहर के एक प्रतिष्ठित संगीत संस्थान में सिया का दाखिला शास्त्रीय गायन और सितार वादन के कोर्स में करवा दिया। घर के काम निपटाकर सिया रोज दोपहर को अपनी कक्षा में जाने लगी। चूँकि उसके भीतर बचपन से ही संगीत की समझ और लगन थी, इसलिए उसने बहुत जल्दी ही रागों की बारीकियों और सितार के तारों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। शारदा जी ने भी घर के कामों में उसका हाथ बंटाना शुरू कर दिया ताकि सिया को रियाज के लिए पर्याप्त समय मिल सके। डेढ़ साल के कड़े प्रशिक्षण के बाद, सिया ने प्रथम श्रेणी में अपनी संगीत की डिग्री पूरी कर ली।
एक शाम चाय के समय सिया ने बड़ी हिचकिचाहट के साथ अपनी सासू माँ से कहा, “माँ जी, अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं एक बात कहूँ? अब मेरी पढ़ाई पूरी हो गई है। मैं चाहती हूँ कि अपने घर की बैठक के पास वाले छोटे कमरे में शाम के वक्त मोहल्ले के बच्चों को संगीत सिखाना शुरू करूँ। इससे मेरा अभ्यास भी बना रहेगा, खाली समय का सही उपयोग होगा और मैं घर की आर्थिक जिम्मेदारी में भी थोड़ा सा योगदान दे सकूँगी।”
शारदा जी और अनुराग ने तुरंत हामी भर दी। अगले ही हफ्ते से सिया की संगीत कक्षा शुरू हो गई। शुरुआत में केवल पड़ोस की तीन-चार बच्चियां ही सीखने आईं। सिया उन्हें बड़े प्यार और धैर्य के साथ सिखाती थी। उसकी मेहनत और सिखाने के अनोखे तरीके की चर्चा धीरे-धीरे पूरे इलाके में फैलने लगी। देखते ही देखते छह महीने के भीतर छात्रों की संख्या तीन से बढ़कर पच्चीस हो गई। आलम यह हो गया कि उस छोटे से कमरे में बैठने की जगह कम पड़ने लगी। कुछ बच्चों को बाहर बरामदे में दरी बिछाकर बैठना पड़ता था।
एक दिन शाम को जब कक्षा खत्म हुई, तो शारदा जी ने देखा कि सिया पसीने से भीगी हुई है और सामान समेटने में उसे काफी दिक्कत हो रही है। उन्होंने सिया के पास जाकर कहा, “बेटा, अब तुम्हारा यह कमरा तुम्हारे हुनर के हिसाब से छोटा पड़ने लगा है। बच्चे भी बढ़ रहे हैं और वाद्य यंत्र रखने की जगह भी नहीं बचती।”
सिया ने लंबी सांस लेते हुए कहा, “हाँ माँ जी, मैं भी यही सोच रही थी, लेकिन बाहर कहीं किराए पर जगह लेना अभी मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होगा।”
शारदा जी मुस्कुराकर बोलीं, “तो बाहर जाने की जरूरत ही क्या है? हमारी सबसे ऊपर वाली छत पूरी खाली पड़ी है। मैंने और अनुराग ने बात की है, हम वहां एक बड़ा सा हॉल बनवा देते हैं। वहां हवा और रोशनी भी खूब आएगी और तुम्हारे छात्रों को भी कोई परेशानी नहीं होगी।”
सिया की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आए। वह दौड़कर अपनी सासू माँ के गले लग गई और बोली, “माँ जी, आप सास नहीं, मेरी असली माँ से भी बढ़कर हैं। आपने मेरे उन सपनों को जीना सिखाया जिन्हें मैं कब का दफना चुकी थी।”
हॉल के निर्माण का काम शुरू हुआ। सिया ने भी अपनी कक्षाओं से जो पैसे बचाकर रखे थे, वे अपनी सासू माँ के हाथ में रखते हुए कहा कि इस निर्माण में उसकी मेहनत की कमाई भी लगनी चाहिए। शारदा जी ने गर्व से उन पैसों को स्वीकार किया। कुछ ही महीनों में छत पर एक भव्य, हवादार और सुंदर हॉल बनकर तैयार हो गया, जिसकी दीवारों पर संगीत के महान कलाकारों की तस्वीरें लगाई गईं और फर्श पर सुंदर कालीन बिछाया गया।
आज उसी हॉल के बाहर “स्वरंजलि संगीत अकादमी” का बड़ा सा बोर्ड लग चुका था। अतीत की यादों से बाहर आते हुए सिया ने करवट बदली। शाम को अकादमी के उद्घाटन की पूजा थी, जिसमें सिया के मायके से उसके माता-पिता भी आने वाले थे।
शाम को जब हरिशंकर जी और सावित्री जी देहरादून पहुँचे और उन्होंने तीसरी मंजिल पर बने उस भव्य संगीत केंद्र और सिया के प्रति उसके ससुराल वालों का सम्मान देखा, तो हरिशंकर जी की आँखें शर्म और गर्व के मिले-जुले भाव से झुक गईं। जब मोहल्ले के गणमान्य लोग आकर हरिशंकर जी से कह रहे थे कि “ठाकुर साहब, आपकी बेटी ने तो हमारे पूरे क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया है, ऐसी गुणी बेटी पाकर तो आप धन्य हो गए,” तो हरिशंकर जी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। जिस संगीत को वह कभी खानदान की बदनामी समझते थे, आज उसी संगीत ने उनकी बेटी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया था और समाज में उन्हें वह सम्मान दिलाया था जो उनकी झूठी शान कभी नहीं दिला पाई थी।
पूजा के बाद जब सिया ने अपने बाबूजी के पैर छुए, तो हरिशंकर जी ने पहली बार अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखकर काँपती आवाज में कहा, “मुझे माफ कर दे बेटी, मैं तेरी उड़ान को समझ नहीं पाया था। आज तेरी सासू माँ ने मुझे सिखा दिया कि बेटियों के सपने घर की इज्जत कम नहीं करते, बल्कि उसमें चार चाँद लगाते हैं।”
सिया के चेहरे पर आज संतोष की वह मुस्कान थी, जो बरसों की खामोश मेहनत के बाद मिली थी। वह अब केवल एक बहू या बेटी नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान खुद गढ़ने वाली एक सफल और सम्मानित गुरु बन चुकी थी।
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