ठोकरों के बाद मिली परछाईं

 सम्मान के साथ सिया को अपनी जीवनसंगिनी बनाने के लिए तैयार हूँ। मेरे माता-पिता भी सिया को बहुत पसंद करते हैं और वे मेरे फैसले के साथ हैं।”

अक्षत की बात सुनकर श्रीकांत जी अवाक रह गए। उन्होंने अक्षत की आँखों में देखा, जहाँ सिया के लिए सिर्फ सच्चा सम्मान और अपार प्रेम झलक रहा था। एक पढ़े-लिखे, संस्कारी लड़के का यह बड़प्पन देखकर श्रीकांत जी के भीतर का सारा गुस्सा और समाज का डर बर्फ की तरह पिघल गया। उनकी आँखों के कोने भीग गए और उन्होंने आगे बढ़कर अक्षत के कंधे पर हाथ रख दिया।

  सिया की सूजी हुई आँखें बार-बार दरवाजे की कुंडी को ताक रही थीं, इस झूठी उम्मीद में कि शायद अब भी विक्रांत लौट आएगा। लेकिन सच तो यह था कि विक्रांत को गए हुए पूरे तीन महीने बीत चुके थे और उसका फोन नंबर भी अब बंद बताने लगा था।

सिया कभी अपने माता-पिता की आँखों का तारा हुआ करती थी। उसके पिता श्रीकांत जी देहरादून के एक सरकारी स्कूल में सम्माननीय शिक्षक थे और माँ शारदा देवी एक बेहद धार्मिक और ममतामयी गृहिणी थीं। श्रीकांत जी ने अपनी इकलौती बेटी को बड़े नाजों से पाला था। उनकी बस एक ही ख्वाहिश थी कि सिया पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो और समाज में उनका नाम रोशन करे। लेकिन कॉलेज के दूसरे साल में ही सिया की जिंदगी में विक्रांत नाम का एक ऐसा तूफान आया, जिसने उसकी सोचने-समझने की शक्ति ही छीन ली।

विक्रांत दिखने में बेहद आकर्षक था, महंगी बाइक पर घूमता था और बड़ी-बड़ी बातें करने में माहिर था। पढ़ाई-लिखाई से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। कॉलेज की लड़कियों को अपने जाल में फंसाना और फिर उनका इस्तेमाल करके छोड़ देना ही उसका शगल था। सिया उसकी मीठी-मीठी बातों, झूठे तोहफों और चांद-तारे तोड़ लाने के खोखले वादों में इस कदर अंधी हो गई कि उसे अपने-पराए का भेद ही भूल गया। विक्रांत धीरे-धीरे सिया से कभी अपनी बाइक की किश्त भरने के लिए, तो कभी दोस्तों के साथ पार्टी करने के लिए पैसे ऐंठने लगा। सिया अपनी ट्यूशन फीस और माँ से झूठ बोलकर लिए गए पैसे विक्रांत पर लुटाती रही।

उसी कॉलेज में सिया और विक्रांत के बैच में अक्षत भी पढ़ता था। अक्षत स्वभाव से बेहद शांत, गंभीर और पढ़ाई में अव्वल रहने वाला लड़का था। वह सिया का बहुत अच्छा दोस्त था और मन ही मन उसे बेहद चाहता था, लेकिन उसने कभी अपनी भावनाओं को दोस्ती की मर्यादा लांघने नहीं दी। अक्षत विक्रांत की असलियत अच्छी तरह जानता था। उसने कई बार सिया को अकेले में समझाया था, “सिया, विक्रांत सही इंसान नहीं है। वह सिर्फ तुम्हारे भोलेपन और पैसों का फायदा उठा रहा है। अपना करियर मत बर्बाद करो।”

लेकिन सिया पर तो विक्रांत के नाम की पट्टी बंधी थी। उसने उल्टा अक्षत को ही फटकार दिया, “तुम जलते हो विक्रांत से क्योंकि वह तुमसे ज्यादा स्मार्ट है। मेरे और उसके बीच में बोलने की कोशिश मत करना।” अक्षत चुप रह गया, पर उसके दिल में सिया के भविष्य को लेकर एक गहरा डर बैठ गया था।

इधर जब घर में शारदा देवी को सिया और विक्रांत के बारे में भनक लगी, तो उन्होंने सिया को बहुत समझाया। माँ ने अपने आँचल का वास्ता दिया, पिता की समाज में बनी प्रतिष्ठा की दुहाई दी, लेकिन सिया के सिर पर तो इश्क का भूत सवार था। और फिर एक काली रात वह भी आई, जब सिया ने विक्रांत के बहकावे में आकर अपनी अलमारी से माँ के रखे कुछ गहने और नकदी निकाली और अपने माता-पिता को जीते-जी मारकर घर से भाग गई।

जाने से पहले उसने एक कागज पर बस इतना लिखा था कि वह अपनी मर्जी से जा रही है और उसे ढूंढने की कोशिश न की जाए। उस सुबह जब श्रीकांत जी ने वह खत पढ़ा, तो वह वहीं जमीन पर बैठ गए। मोहल्ले भर में थू-थू हुई। जिस शिक्षक ने हजारों बच्चों को संस्कार सिखाए थे, आज उन्हीं की बेटी ने उनकी पगड़ी चौराहे पर उछाल दी थी। श्रीकांत जी ने उसी दिन अपने दिल पर पत्थर रखकर ऐलान कर दिया था कि उनके लिए सिया मर चुकी है।

शुरुआती कुछ महीने विक्रांत ने सिया के लाए पैसों और गहनों से खूब ऐश की। दोनों ने झूठी कसमें खाईं और साथ जीने-मरने के वादे किए। लेकिन जैसे ही सिया के पास के सारे पैसे और गहने खत्म हुए, विक्रांत के तेवर बदलने लगे। बात-बात पर झगड़ा करना, सिया को ताने मारना और कई-कई दिनों तक घर न आना उसकी आदत बन गई। और फिर एक दिन, जब मकान मालिक किराए के लिए तगादा कर रहा था, विक्रांत अपना सारा सामान समेटकर सिया को अकेला छोड़कर रफूचक्कर हो गया।

सिया के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी, इसलिए कोई ढंग की नौकरी मिलना भी नामुमकिन था। उसने एक-दो जगह छोटे-मोटे काम की तलाश की, लेकिन बिना डिग्री और अनुभव के किसी ने काम नहीं दिया। मकान मालिक रोज दरवाजे पर आकर भला-बुरा कहता था। भूख, अकेलेपन और पश्चाताप की आग ने सिया को अंदर से खोखला कर दिया था। वह माता-पिता के पास किस मुंह से जाती? उसने तो खुद अपने हाथों से अपने पीछे के सारे दरवाजे बंद कर लिए थे।

आज जब भूख और कमजोरी से उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा, तो उसे कांपते हाथों से अपना फोन उठाया। कांटेक्ट लिस्ट में उसे सिर्फ एक ही नाम नजर आया, जिस पर वह इस बुरे वक्त में भी थोड़ा सा भरोसा कर सकती थी—अक्षत। काफी हिम्मत जुटाकर उसने अक्षत को फोन मिलाया।

दूसरी तरफ से शांत और सधी हुई आवाज आई, “हेलो, सिया? कैसी हो तुम? कहाँ हो?”

बस, इतना सुनना था कि सिया के सब्र का बांध टूट गया। वह फोन पर ही फूट-फूटकर रोने लगी। हिचकियों के बीच उसने अक्षत को अपनी बर्बादी की सारी दास्तान सुना दी और अपना पता बताकर मदद की गुहार लगाई। अक्षत ने बिना एक पल गंवाए कहा, “तुम रोना बंद करो सिया, मैं अभी आ रहा हूँ।”

शाम के धुंधलके में जब अक्षत उस तंग गली के मकान में पहुँचा, तो सिया की हालत देखकर उसका कलेजा मुंह को आ गया। कभी गुलाब की तरह खिली रहने वाली सिया आज पीली पड़ चुकी थी, आँखें अंदर धंस गई थीं और शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। अक्षत को देखते ही सिया उठी और कुछ बोलने की कोशिश करने लगी, लेकिन तभी उसे जोर का चक्कर आया और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

अक्षत घबरा गया। उसने तुरंत सिया के चेहरे पर पानी के छींटे मारे और पड़ोसियों की मदद से उसे कार में डालकर नजदीकी अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने सिया की जांच की और अक्षत को केबिन में बुलाकर कहा, “देखिए, मरीज की हालत बहुत नाजुक है। शरीर में हीमोग्लोबिन बहुत कम हो गया है और भयंकर कुपोषण के लक्षण हैं। साथ ही मानसिक तनाव भी बहुत ज्यादा है। हमने अभी ग्लूकोज चढ़ाया है, लेकिन इन्हें अगले कुछ महीनों तक बहुत अच्छी देखभाल, पौष्टिक आहार और पारिवारिक माहौल की सख्त जरूरत है, वरना कुछ भी हो सकता है।”

अक्षत ने अस्पताल का सारा बिल चुकाया, सिया के लिए सारी दवाइयां खरीदीं और रात में जब सिया को होश आया, तो उसे लेकर वापस उसके कमरे पर आया। रास्ते से उसने सिया के लिए गर्म सूप और दलिया भी ले लिया था। कमरे में आकर अक्षत ने अपने हाथों से सिया को सूप पिलाया। सिया की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

वह कांपती आवाज में बोली, “अक्षत, मैंने तुम्हारी हर बात को अनसुना किया, तुम्हारा अपमान किया, फिर भी तुम आज मेरे लिए भगवान बनकर आए। अगर आज तुम न होते, तो शायद मेरी लाश ही इस कमरे से निकलती।”

अक्षत ने बेहद संजीदगी से कहा, “ऐसी बातें मत करो सिया। दोस्ती में कोई हिसाब-किताब नहीं होता। तुमने जो किया वह नादानी थी, लेकिन अब खुद को सजा देना बंद करो।”

सिया के मन के किसी कोने में यह एहसास बहुत गहरा हो गया था कि अक्षत उससे सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि बेइंतहा और निस्वार्थ मोहब्बत करता है। एक ऐसा प्यार, जो बदले में कुछ नहीं मांगता, सिर्फ देना जानता है। वह जिस विक्रांत के पीछे भागी थी, वह तो महज एक मृगतृष्णा थी, असली हीरा तो उसने कभी पहचाना ही नहीं।

थोड़ी देर की खामोशी के बाद अक्षत ने कहा, “सिया, इस हालत में तुम यहाँ अकेली नहीं रह सकतीं। तुम्हें किसी अपने के साथ की जरूरत है। तुम्हें अपने घर वापस जाना चाहिए।”

घर का नाम सुनते ही सिया सिहर उठी। वह रुआंसी होकर बोली, “यह तुम क्या कह रहे हो अक्षत? मैं किस मुंह से जाऊंगी वहां? पापा ने तो मेरी तरफ देखना भी पाप समझा है और माँ… माँ का तो मैंने वो विश्वास तोड़ा है, जिसकी कोई माफी नहीं है। मैंने उनके गहने चुराए, उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी। वे मुझे चौखट पर कदम भी नहीं रखने देंगे।”

अक्षत ने सिया की तरफ देखते हुए धीमे से मुस्कुराकर कहा, “सिया, तुम शायद भूल रही हो कि वे तुम्हारे माता-पिता हैं। इंसान से गलती होती है, लेकिन जब औलाद तकलीफ में होती है, तो सबसे ज्यादा दर्द माँ-बाप को ही होता है। और जहाँ तक तुम्हारी माँ की बात है, तो दुनिया का एक अटल सच याद रखना—माँ कभी अपने बच्चों से नफरत नहीं कर सकती। वह गुस्सा हो सकती है, थोड़ी देर के लिए मुंह मोड़ सकती है, लेकिन जब अपने बच्चे को टूटा हुआ देखती है, तो उसका कलेजा फट जाता है। तुम कल सुबह तैयार रहना, मैं खुद तुम्हें तुम्हारे घर लेकर चलूंगा। अब आराम करो।”

अक्षत के जाने के बाद सिया रात भर जागती रही। वह सोचती रही कि क्या वाकई इस स्वार्थी दुनिया में अक्षत जैसा कोई इंसान हो सकता है, जो बिना किसी उम्मीद के किसी की बिखरी जिंदगी को समेटने में लगा हो?

अगली सुबह अक्षत आया। उसने मकान मालिक का बकाया किराया चुकाकर कमरे का हिसाब खत्म किया और सिया का थोड़ा सा बचा सामान अपनी गाड़ी में रखकर उसे श्रीकांत जी के घर की तरफ ले चला। जैसे-जैसे घर करीब आ रहा था, सिया के दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। घर के बाहर गाड़ी रुकी। सिया के कदम ही नहीं उठ रहे थे। अक्षत ने उसका हौसला बढ़ाया और दोनों ने आंगन का गेट पार कर दरवाजे की घंटी बजाई।

दरवाजा श्रीकांत जी ने खोला। पिछले एक साल में श्रीकांत जी के बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और चेहरे की झुर्रियां उनके भीतर के दर्द को बयां कर रही थीं। सामने सिया को देखते ही उनके चेहरे के भाव अचानक कठोर हो गए। उनकी आँखों में पुराना अपमान और गुस्सा उतर आया।

वह कड़क आवाज में दहाड़े, “यहाँ क्यों आई है तू? क्या अभी कुछ और बाकी रह गया है हमारी इज्जत का तमाशा बनाने के लिए? जिस दिन तूने इस घर की दहलीज लांघी थी, उसी दिन हमने तेरा अंतिम संस्कार कर दिया था। निकल जा यहाँ से!”

पिता के ये शब्द सिया के सीने में तीर की तरह चुभे, लेकिन आज उसमें भागने की हिम्मत नहीं थी। वह रोते हुए वहीं चौखट पर घुटनों के बल बैठ गई और पिता के पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोली, “पापा, मुझे ठोकर मार लीजिए, मुझे जो सजा देनी है दे दीजिए, पर मुझे अपने चरणों से दूर मत कीजिए। मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया पापा। मैं अंधी हो गई थी। अब मैं समझ गई हूँ कि माता-पिता के साए के बिना यह दुनिया नोच खाती है। मुझे माफ कर दीजिए पापा, मैं कसम खाती हूँ, आज के बाद कभी आपकी और हमारे खानदान की इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगी।”

सिया की सिसकियां और श्रीकांत जी की ऊंची आवाज सुनकर रसोई से शारदा देवी बाहर दौड़ी चली आईं। दरवाजे पर अपनी फूल सी बेटी को सूखे पत्तों की तरह कांपते और रोते देख माँ का कलेजा मुंह को आ गया। वह सारे गिले-शिकवे, सारा गुस्सा एक पल में भूल गईं। शारदा देवी ने दौड़कर सिया को जमीन से उठाया और अपने सीने से कसकर चिपका लिया। माँ-बेटी दोनों फूट-फूटकर रोने लगीं।

शारदा देवी ने सिया का माथा चूमते हुए उसे अंदर ले लिया और अक्षत को भी हाथ जोड़कर अंदर आने का इशारा किया। बैठक में आकर अक्षत ने बहुत ही विनम्रता से श्रीकांत जी और शारदा देवी को सारी सच्चाई बताई। उसने बताया कि कैसे विक्रांत ने सिया को धोखा दिया, कैसे वह दाने-दाने को मोहताज हो गई थी और डॉक्टर ने उसकी जान को खतरा बताते हुए पूरी देखभाल करने की सलाह दी है।

सिया ने अपनी माँ के घुटनों पर सिर रख दिया और सिसकते हुए बोली, “माँ, मैंने आपका भरोसा तोड़ा। आपको लगता था आपकी बेटी कभी गलत राह पर नहीं जाएगी, पर मैंने आपको कहीं का नहीं छोड़ा। मुझे माफ कर दो माँ।”

शारदा देवी ने सिया के आँसू पोंछते हुए कहा, “चुप हो जा पगली। माँ कभी अपनी औलाद से बैर रख सकती है भला? हाँ, जब बच्चा गलत रास्ते पर जाता है तो माँ की आत्मा रोती जरूर है, पर उसकी ममता कभी नहीं मरती। सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। अब रोना धोना बंद कर और पुरानी बातों को एक बुरा सपना समझकर भूल जा।”

लेकिन श्रीकांत जी अभी भी कोने में मुंह फुलाए खड़े थे। समाज का डर अब भी उन्हें कचोट रहा था। उन्होंने तल्ख लहजे में अपनी पत्नी से कहा, “शारदा, तुम तो माँ हो, तुम्हारी ममता ने इसे तुरंत माफ कर दिया। मैं भी बाप हूँ, शायद अपने दिल पर पत्थर रखकर इसे घर में पनाह दे दूं। लेकिन इस समाज का क्या करोगी? चार लोग जब उंगली उठाएंगे तो क्या जवाब दोगी? इसके माथे पर जो कलंक लगा है, उसके बाद कौन शरीफ खानदान का लड़का इसका हाथ थामेगा? क्या पूरी जिंदगी यह ऐसे ही ताने सुनती रहेगी?”

कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसर गया। सिया ने शर्म से सिर झुका लिया। तभी अक्षत अपनी जगह से उठा और श्रीकांत जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

उसने बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “अंकल जी, समाज का काम सिर्फ बातें बनाना होता है, बुरे वक्त में समाज साथ देने नहीं आता, परिवार ही काम आता है। आज सिया को जमाने की परवाह की नहीं, आपके प्यार और आशीर्वाद की जरूरत है। और जहाँ तक इसकी शादी और भविष्य का सवाल है… अगर आप और आंटी मुझे इस काबिल समझें, तो मैं पूरे सम्मान के साथ सिया को अपनी जीवनसंगिनी बनाने के लिए तैयार हूँ। मेरे माता-पिता भी सिया को बहुत पसंद करते हैं और वे मेरे फैसले के साथ हैं।”

अक्षत की बात सुनकर श्रीकांत जी अवाक रह गए। उन्होंने अक्षत की आँखों में देखा, जहाँ सिया के लिए सिर्फ सच्चा सम्मान और अपार प्रेम झलक रहा था। एक पढ़े-लिखे, संस्कारी लड़के का यह बड़प्पन देखकर श्रीकांत जी के भीतर का सारा गुस्सा और समाज का डर बर्फ की तरह पिघल गया। उनकी आँखों के कोने भीग गए और उन्होंने आगे बढ़कर अक्षत के कंधे पर हाथ रख दिया।

घर के माहौल में फिर से धीरे-धीरे खुशियां लौटने लगीं। शारदा देवी की सेवा और माँ के हाथों के खाने से सिया की सेहत में तेजी से सुधार होने लगा। लेकिन सिया अब पहले वाली नादान लड़की नहीं रही थी। उसने ठान लिया था कि वह अपने माता-पिता का खोया हुआ गर्व उन्हें वापस लौटाएगी। अक्षत की मदद से उसने अपनी अधूरी पढ़ाई फिर से शुरू की। साथ ही घर के हर काम में माँ का हाथ बंटाना और पिता की छोटी से छोटी जरूरत का बिना कहे ध्यान रखना उसकी दिनचर्या बन गई थी। श्रीकांत जी भले ही शुरू में कम बोलते थे, लेकिन बेटी के इस बदले हुए रूप और सेवा भाव ने कुछ ही महीनों में उनका दिल पूरी तरह से जीत लिया।

दो साल देखते ही देखते बीत गए। सिया ने न सिर्फ अपनी ग्रेजुएशन प्रथम श्रेणी में पास की, बल्कि एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी भी हासिल कर ली। उधर अक्षत की भी एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत अच्छे पैकेज पर नौकरी लग गई।

एक शुभ मुहूर्त देखकर, दोनों परिवारों की रजामंदी और पूरे रीति-रिवाजों के साथ अक्षत और सिया का विवाह संपन्न हुआ। विदाई के वक्त श्रीकांत जी ने अपनी बेटी को गले लगाकर कहा, “बेटा, आज मुझे तुझ पर गर्व है। तूने अपनी गलती को सुधार कर यह साबित कर दिया कि ठोकर खाकर संभलने वाला इंसान और भी मजबूत बन जाता है।”

ससुराल में भी सिया ने अपने मधुर व्यवहार, संस्कारों और सेवा भाव से सबका दिल जीत लिया। अक्षत का निस्वार्थ प्रेम और साथ पाकर उसकी जिंदगी किसी खूबसूरत बगिया की तरह महक उठी थी। सिया ने अपनी समझदारी और समर्पण से न केवल अपना उजड़ा हुआ कल संवारा, बल्कि अपने माता-पिता और नए परिवार का अटूट विश्वास और सम्मान भी हासिल कर लिया।

दोस्तों, सिया की इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि जवानी के जोश में लिया गया एक गलत फैसला पूरी जिंदगी तबाह कर सकता है, लेकिन अगर इंसान को अपनी गलती का सच्चा एहसास हो जाए और परिवार का साथ मिले, तो वह फिर से एक नई और सम्मानजनक शुरुआत कर सकता है।

आपको इस कहानी में अक्षत का निस्वार्थ प्रेम और माँ-बाप का बड़प्पन कैसा लगा? क्या आज के जमाने में भी अक्षत जैसे सच्चे इंसान मिलते हैं? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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कमलेश आहूजा

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