मोबाइल की स्क्रीन पर छोटे भाई कार्तिक का नाम चमकते देख मालिनी की उंगलियां कुछ पल के लिए ठिठक गईं। पूरे आठ महीने बाद आज उस नंबर से कॉल आया था। मालिनी ने रसोई की गैस धीमी की, आंचल से हाथ पोंछे और धड़कते दिल से फोन उठाया। इससे पहले कि वह ‘हैलो’ कहती, उधर से कार्तिक की सपाट और रूखी आवाज सुनाई दी, “दीदी, इस महीने की पंचमी को बाबूजी की पहली बरसी और श्राद्ध है। पंडित जी ने कहा है कि पहला पितृपक्ष है, तो सारे रीति-रिवाज विधि-विधान से होने चाहिए। बाबूजी की आत्मा को तभी शांति मिलेगी जब उनकी सबसे लाड़ली बेटी आकर हाथ से तर्पण के बाद का भोज परोसेगी। आखिर तुम पर तो उनका कुछ ज्यादा ही मोह था न, इसलिए सोचा तुम्हें सूचना दे दूं, वरना तुम कहोगी कि भाइयों ने पूछा तक नहीं।”
कार्तिक के एक-एक शब्द में जो व्यंग्य और कड़वाहट घुली थी, उसने मालिनी के सीने में जैसे किसी ने गर्म सलाखें उतार दीं। फोन कट हो चुका था, लेकिन मालिनी के हाथ में मोबाइल अब भी कांप रहा था। क्या बाबूजी को इस दुनिया से गए पूरा एक साल बीत गया? समय कितनी तेजी से रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, पर कुछ जख्म ऐसे होते हैं जिन पर वक्त की धूल भी परत नहीं जमा पाती। कार्तिक ने फोन न्योता देने के लिए नहीं, बल्कि उसके पुराने घावों को फिर से कुरेदने और उन पर नमक छिड़कने के लिए किया था।
शाम को जब मालिनी के पति अनुराग बैंक से घर लौटे, तो उन्होंने देखा कि मालिनी बालकनी में गुमसुम बैठी शून्य में ताक रही है। चाय का प्याला मेज पर ठंडा हो चुका था। अनुराग ने पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखा, तो मालिनी ने बड़े अनमने और भारी मन से कार्तिक के फोन के बारे में बताया। अनुराग एक बेहद सुलझे हुए और संवेदनशील इंसान थे। उन्होंने मालिनी की आंखों में तैरती नमी को पढ़ा और स्नेह से कहा, “मालिनी, तुम्हें अपने भाइयों के लिए नहीं, बल्कि बाबूजी के लिए देहरादून जरूर जाना चाहिए। मैं अभी तुम्हारी ट्रेन की टिकट बुक कर देता हूँ। तुम कल ही जाने की तैयारी करो।”
अनुराग तो टिकट बुक करने अपने कमरे में चले गए, लेकिन मालिनी का मन अतीत की उन पगडंडियों पर भटकने लगा, जहां बाबूजी की मुस्कुराती हुई छवि थी। उसके बाबूजी, सूर्यकांत शर्मा, देहरादून के एक प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज में हिंदी साहित्य के प्रोफेसर थे। कितने शांत, सौम्य और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी थे वे। शहर की सड़कों पर जब वे निकलते, तो सैकड़ों छात्र झुककर उनके पांव छूते थे। सफेद खादी का धुला हुआ कुर्ता-पायजामा, आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा और चेहरे पर एक अलौकिक तेज—यही तो बाबूजी की पहचान थी। जिन्होंने हजारों भटके हुए युवाओं को जीवन की सही राह दिखाई, नैतिकता और संस्कारों का पाठ पढ़ाया, वही बाबूजी अपनी ही संतानों, यानी अपने दोनों बेटों—प्रशांत और कार्तिक को इंसानियत का पाठ पढ़ाने में न जाने कैसे चूक गए।
शायद इस चूक की नींव आज से बारह साल पहले तभी पड़ गई थी, जब माँ शारदा को किडनी की गंभीर बीमारी ने घेर लिया था। बड़े भाई प्रशांत चंडीगढ़ में एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थे और उनके बच्चे भी बड़े हो रहे थे। मालिनी की शादी को भी छह साल हो चुके थे और वह कानपुर में अपने भरे-पूरे ससुराल में रच-बस गई थी। उस वक्त छोटे भाई कार्तिक की नई-नई शादी हुई थी और उसकी पत्नी मानसी घर में आई ही थी। माँ को शायद अंदर से आभास हो गया था कि अब उनके पास वक्त बहुत कम है।
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए माँ ने एक दिन अपनी तिजोरी की चाबी मंगवाई और तीनों बच्चों को पास बिठाया। अपनी कांपती हुई हथेलियों से बाबूजी का हाथ थामकर उन्होंने दोनों बेटों और बहुओं से वचन लिया था कि उनके जाने के बाद बाबूजी को कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने देंगे। उसी दिन माँ ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी और सोने-चांदी के सारे पुश्तैनी गहने दोनों बहुओं के आंचल में डाल दिए थे। उन्हें लगा था कि गहनों और संपत्ति से बेटों और बहुओं का दिल जीत लेंगी तो वे बाबूजी को पलकों पर बिठाकर रखेंगे, पर माँ यह भूल गईं कि लालच की कोई सीमा नहीं होती। अपने जीते-जी सब कुछ बेटों के नाम कर देने की वह भूल, बाबूजी के बुढ़ापे पर सबसे बड़ी कुल्हाड़ी साबित हुई।
माँ के पास सोने के दो बेहद खूबसूरत जड़ाऊ कंगन थे, जिनमें छोटे-छोटे माणिक जड़े हुए थे। बचपन में जब भी माँ किसी तीज-त्योहार पर वे कंगन पहनतीं, मालिनी मचलकर कहती, “माँ, ये कंगन मुझे दे दो न, मैं बड़े होकर पहनूंगी।” माँ हंसकर उसके गाल पर हल्की सी चपत लगातीं और कहतीं, “हां मेरी लाड़ो, तेरी विदाई के वक्त तुझे ही दूंगी।” लेकिन जब मालिनी की शादी हुई, तब बड़े भैया के मकान के लिए पैसों की जरूरत थी, तो मालिनी ने खुद ही मना कर दिया था कि उसे फालतू गहने नहीं चाहिए।
माँ के जाने के बाद, जब तेरहवीं की रस्में पूरी हो गईं और मालिनी वापस अपने ससुराल कानपुर लौटने लगी, तो बाबूजी ने उसे अपने कमरे में अकेले बुलाया। उन्होंने अपनी अलमारी के एक गुप्त दराज से लाल मखमली डिब्बी निकाली और मालिनी की हथेली पर रख दी। उसमें माँ के वही जड़ाऊ कंगन थे। बाबूजी का गला रुंध गया था, आंखें डबडबा आई थीं। उन्होंने कांपते स्वर में कहा था, “बेटा, तुम्हारी माँ ने अस्पताल जाने से पहले ये कंगन मेरे पास छुपाकर रखवा दिए थे। कहा था कि मेरी बिटिया ने शादी में भी कुछ नहीं मांगा, ये कंगन मेरे प्यार और आशीर्वाद की निशानी हैं, इसे मेरी लाड़ो को ही देना। मना मत करना बेटा, वरना तुम्हारी माँ की आत्मा को कष्ट होगा।” मालिनी उस दिन बाबूजी के सीने से लगकर फूट-फूटकर रोई थी। उसे क्या पता था कि माँ के आशीर्वाद के ये दो कंगन, भविष्य में उसके और उसके मायके के बीच एक अभेद्य दीवार खड़ी कर देंगे।
वक्त अपनी रफ्तार से भागता रहा। मालिनी का ससुराल बहुत बड़ा था। सास-ससुर, दो देवर, देवरानियां और फिर बच्चों की परवरिश—गृहस्थी के इस चक्रव्यूह में वह ऐसी उलझी कि चाहकर भी देहरादून के चक्कर कम ही लग पाते। हां, हर दूसरे-तीसरे दिन बाबूजी से फोन पर बात जरूर हो जाती थी। बाबूजी हमेशा यही कहते, “मैं यहां बिल्कुल ठाठ से हूँ बेटा, कार्तिक और मानसी बहुत ख्याल रखते हैं। कभी-कभी मन बदलता है तो चंडीगढ़ प्रशांत के पास चला जाता हूँ। तुम अपनी गृहस्थी में ध्यान दो, मेरी चिंता बिल्कुल मत करो।” बाबूजी की आवाज में एक संतोष होता था, और मालिनी निश्चिंत हो जाती कि चलो, प्रोफेसर साहब की अच्छी-खासी पेंशन आती है, अपना खुद का बनाया इतना बड़ा मकान है, दोनों भाई उन्हें फूलों की तरह रखते होंगे।
यह बाबूजी के जाने से ठीक छह महीने पहले की बात है। बाबूजी कुछ महीने चंडीगढ़ में बड़े भैया प्रशांत के पास रहकर वापस देहरादून लौटे थे। न जाने क्यों, पिछले कुछ दिनों से मालिनी को फोन पर बाबूजी की आवाज बहुत धीमी और थकी हुई सी लगती थी। उसका मन बहुत बेचैन हुआ तो उसने अनुराग से कहकर अचानक देहरादून जाने का कार्यक्रम बना लिया। उसने सोचा, अचानक पहुंचकर बाबूजी और कार्तिक को सरप्राइज देगी।
सुबह के दस बजे जब उसने अपने मायके के लोहे के गेट को खोला, तो आंगन का सूनापन देखकर उसे कुछ अजीब सा लगा। बाबूजी के लगाए हुए गुलाब और मोगरे के गमले सूख चुके थे। उसने डोरबेल बजाई। कार्तिक अपने लैपटॉप पर घर से ही दफ्तर का काम कर रहा था। दरवाजा खोलते ही मालिनी को सामने देख उसके चेहरे पर खुशी की एक रेखा भी नहीं उभरी, बल्कि माथे पर बल पड़ गए। उसने बड़े बेरुखे अंदाज में कहा, “अरे दीदी, तुम? आने से पहले एक फोन तो कर दिया होता, ऐसे अचानक कौन आता है?”
तभी रसोई से कार्तिक की पत्नी मानसी हाथ पोंछते हुए बाहर निकली। उसने भी मुंह बनाते हुए शिकायती लहजे में कहा, “वही तो दीदी, कम से कम बता तो देतीं। घर में सौ काम होते हैं, अब अचानक मेहमान आ जाएं तो सारा रूटीन बिगड़ जाता है।”
मालिनी का मन पहले ही स्वागत से कसैला हो गया। उसने अपना बैग सोफे पर रखते हुए अपनी नजरें चारों तरफ घुमाईं। बैठक के बगल वाला वह बड़ा कमरा, जो बाबूजी का अध्ययन कक्ष और शयनकक्ष हुआ करता था, वहां अब महंगे पर्दे लगे थे और अंदर कार्तिक के बच्चों के खिलौने और बड़ा सा टीवी दिख रहा था। मालिनी ने हैरानी से पूछा, “कार्तिक, बाबूजी कहां हैं? अपने कमरे में नहीं दिख रहे?”
मानसी ने पल्लू संभालते हुए लापरवाही से जवाब दिया, “अरे दीदी, बाबूजी अब इस कमरे में नहीं रहते। यहां बच्चों का शोरगुल बहुत होता था और उनकी पढ़ाई में भी डिस्टर्ब होता था, तो हमने बाबूजी का सामान पीछे आंगन के कोने वाले कमरे में शिफ्ट कर दिया है। वहां उन्हें शांति रहती है।”
“पीछे कोने वाले कमरे में? लेकिन वो तो पुराना स्टोर रूम और सर्वेंट क्वार्टर था न!” मालिनी के मुंह से अचानक निकल गया, पर मानसी अनसुना कर रसोई में चली गई।
मालिनी के कदम भारी हो गए। वह तेज कदमों से पीछे के गलियारे की तरफ बढ़ी। जैसे ही उसने उस कोने वाले कमरे का अधखुला दरवाजा धकेला, भीतर का दृश्य देखकर उसकी रूह कांप उठी। कमरे में सीलन और दवाइयों की अजीब सी दुर्गंध भरी हुई थी। छत के कोनों में मकड़ी के बड़े-बड़े जाले लटक रहे थे। एक पुरानी लोहे की चारपाई पर मैली, चिकट और जगह-जगह से उधड़ी हुई चादर बिछी थी। ऊपर जो मच्छरदानी टंगी थी, उसमें अनगिनत छेद थे। और उस चारपाई पर, एक बेहद कमजोर, हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए उसके बाबूजी लेटे हुए थे।
उनकी बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी, धंसी हुई आंखें और कलाई की ढीली पड़ चुकी चमड़ी उनकी उम्र को दस साल और बढ़ा रही थी। छाती पर गीता की एक पुरानी किताब खुली पड़ी थी और चश्मा नाक पर तिरछा अटका हुआ था। क्या ये वही सूर्यकांत प्रोफेसर थे, जिनके कपड़ों से कभी चंदन की भीनी खुशबू आती थी? चंडीगढ़ से लौटे अभी महीना भर ही तो हुआ था, फिर यह हाल कैसे हो गया? मालिनी ने अपने मुंह पर हाथ रखकर अपनी सिसकी रोकी, पर आंखों से आंसुओं का बांध टूट गया।
वह दौड़कर चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ गई और बाबूजी के सीने से लिपटकर रो पड़ी। बाबूजी ने घबराकर आंखें खोलीं। धुंधली नजरों से जब उन्होंने मालिनी को पहचाना, तो उनके सूखे होठों पर एक कांपती हुई मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपने कांपते हाथों से मालिनी के सिर पर हाथ फेरा, “अरे… मेरी मालिनी बिटिया! तुम कब आई बेटा? रो क्यों रही हो पगली, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।” बाबूजी अब भी अपने बेटों की नालायकी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे।
मालिनी वहां एक हफ्ता रुकी, और उस एक हफ्ते में उसने जो देखा, उसने उसके भीतर के सारे भ्रम तोड़ दिए। बाबूजी की पेंशन की पूरी रकम कार्तिक अपने खाते में ट्रांसफर कर लेता था। सुबह के नाश्ते में बाबूजी को सिर्फ दो सूखे टोस्ट और फीकी चाय दी जाती थी। दोपहर में दो ठंडी रोटियां और पानी वाली दाल। न सुबह बादाम-अखरोट, न दोपहर को कोई मौसमी फल, और न ही रात को हल्दी वाला दूध, जो बाबूजी की सालों पुरानी आदत थी।
तीसरे दिन जब मालिनी से रहा नहीं गया, तो उसने डाइनिंग टेबल पर कार्तिक से पूछ ही लिया, “कार्तिक, बाबूजी को न फल दिए जाते हैं, न दूध, न ही ढंग का पौष्टिक खाना। तुम लोग उनके साथ ऐसा क्यों कर रहे हो? देखा है वो कितने कमजोर हो गए हैं?”
कार्तिक ने मोबाइल से नजरें हटाए बिना बड़ा रटा-रटाया जवाब दिया, “दीदी, तुम्हें तो बस कमियां निकालनी आती हैं। चंडीगढ़ में जब बाबूजी भैया के पास थे, तो उनका पेट बहुत खराब रहने लगा था। हमने बड़े डॉक्टर और डाइटिशियन से सलाह लेकर ही उनका यह डाइट चार्ट बनवाया है। बुढ़ापे में भारी खाना, दूध और मीठे फल मना किए गए हैं।”
मालिनी का खून खौल उठा। उसने तल्ख आवाज में कहा, “यह कौन सा डाइटिशियन है कार्तिक, जो बिना किसी शुगर या गंभीर बीमारी के एक बुजुर्ग का दूध, फल और ताजा खाना बंद करवा देता है? और क्या उसी डाइटिशियन ने यह भी कहा था कि बाबूजी को उनके उस हवादार कमरे से निकालकर सीलन भरे स्टोर रूम में पटक दिया जाए? जिस कमरे को बाबूजी ने अपने रिटायरमेंट के पैसों से इतने शौक से बनवाया था, जहां उनकी सैकड़ों किताबों की अलमारी थी, माँ की बड़ी सी तस्वीर थी, वहां तुमने अपने बच्चों का प्ले-रूम बना दिया?”
अभी कार्तिक कुछ बोलता, उससे पहले ही मानसी कमर पर हाथ रखकर रसोई से बाहर निकल आई। आज दोपहर को मालिनी बाबूजी की पसंद की मूंग की दाल का हलवा और पनीर की नरम सब्जी बनाने के लिए रसोई में जाने ही वाली थी कि मानसी दरवाजे के बीचों-बीच अड़कर खड़ी हो गई।
मानसी ने जहर बुझे शब्दों में चीखते हुए कहा, “बस कीजिए दीदी! जब से आई हैं, हमारे सिर पर सवार हो गई हैं। अगर बाबूजी पर इतना ही प्यार और मोह उमड़ रहा है न, तो अपनी गठरी में बांधकर ले जाइए उन्हें अपने साथ कानपुर! यहां अपनी रसोई में मैं ये हलवा-पूरी नहीं बनने दूंगी। आज आप उन्हें ये सब गरिष्ठ खाना खिलाकर अपनी वाहवाही लूट लेंगी और कल को उनका हाजमा बिगड़ गया और बिस्तर पर गंदगी कर दी, तो क्या आप कानपुर से उनका गुह-मूत साफ करने आएंगी? करना तो मुझे ही पड़ेगा न!”
मानसी के इतने गंदे और नीच शब्दों को सुनकर मालिनी सन्न रह गई। उसने उम्मीद भरी नजरों से अपने छोटे भाई कार्तिक की तरफ देखा कि शायद वह अपनी पत्नी को डांटेगा, लेकिन कार्तिक ने जो कहा, उसने मालिनी की आत्मा को छलनी कर दिया।
कार्तिक कुर्सी से उठते हुए बोला, “मानसी कुछ गलत नहीं कह रही है दीदी। यहाँ आकर हुक्म चलाना बहुत आसान है। माँ ने अपने दोनों बेटों और बहुओं से छुपाकर वो लाखों के जड़ाऊ कंगन चुपके से तुम्हारी झोली में डाल दिए थे, तब तो तुमने एक बार भी हम भाइयों से नहीं पूछा! जब माँ के सबसे कीमती गहने पर तुम्हारा हक था, तो बाबूजी की जिम्मेदारी भी थोड़ी तुम उठाओ न। सिर्फ ज्ञान देने के लिए मायके मत आया करो।”
मालिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह अवाक, पत्थर की मूरत बनी अपने ही सगे भाई का चेहरा देखती रही। आज अपने ही पिता के बनाए घर में, जहां उसका बचपन बीता था, उसकी यह हैसियत हो गई थी कि वह अपने भूखे पिता को अपनी पसंद का दो निवाला बनाकर भी नहीं खिला सकती थी! पूरा मकान, जमीन-जायदाद, माँ के सारे गहने और बाबूजी की हर महीने की पेंशन हड़पने के बाद भी, माँ के दिए उन दो कंगनों की कसक इन लोगों के दिल में इस कदर जहर बनकर भरी हुई थी!
तभी पीछे के गलियारे से लाठी की ‘ठक-ठक’ की आवाज आई। बाबूजी दरवाजे की चौखट का सहारा लिए खड़े थे। उन्होंने सब कुछ सुन लिया था। एक स्वाभिमानी पिता के लिए इससे बड़ी मौत और क्या हो सकती थी कि उसकी संतानें उसकी सेवा को बोझ समझकर उसकी लाचारी का तमाशा बना रही थीं। बाबूजी की आंखों से दो बड़े-बड़े आंसू लुढ़ककर उनकी सफेद दाढ़ी में समा गए। वह बिना एक शब्द बोले वापस अपने अंधेरे कमरे में लौट गए।
उस रात मालिनी ने फैसला कर लिया था कि वह बाबूजी को इस नर्क में छोड़कर नहीं जाएगी। उसने अनुराग को फोन किया और सारी बात बताई। अनुराग ने तुरंत कहा कि वह कल ही गाड़ी लेकर देहरादून आ रहे हैं और बाबूजी को ससम्मान अपने साथ कानपुर ले जाएंगे। मालिनी ने जब यह बात बाबूजी को बताई और उनके पैरों में बैठकर चलने की जिद की, तो बाबूजी ने उसके सिर पर हाथ रखकर बड़े शांत स्वर में मना कर दिया था, “नहीं मेरी बच्ची, हमारे समाज की रीत बड़ी कठोर है। तुम्हारे ससुराल में सब बहुत अच्छे हैं, पर बेटी के घर जाकर रहना मेरे स्वाभिमान को गवारा नहीं। इसी घर की मिट्टी में तुम्हारी माँ की यादें हैं, मैं अपनी अंतिम सांस भी इसी छत के नीचे लूंगा।” मालिनी रोती-बिलखती वापस लौट आई थी, और उसके ठीक पांच महीने बाद बाबूजी ने नींद में ही इस स्वार्थी दुनिया को अलविदा कह दिया था। उस वक्त भी दोनों भाइयों ने दुनिया को दिखाने के लिए बड़ा आडंबर किया था।
ट्रेन की सीटी की आवाज से मालिनी वर्तमान में लौटी। आज पंचमी थी, बाबूजी के श्राद्ध का दिन। देहरादून के उसी पुश्तैनी घर के आंगन में बड़ा सा शामियाना लगा था। बड़े भैया प्रशांत और भाभी भी चंडीगढ़ से आए हुए थे। मुहल्ले के गणमान्य लोग, बाबूजी के पुराने सहकर्मी और रिश्तेदार कुर्सियों पर बैठे थे। पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे। प्रशांत और कार्तिक सफेद धोती-कुर्ता पहने बड़े आज्ञाकारी बेटों का स्वांग रच रहे थे।
पूजा समाप्त होने के बाद जब ब्राह्मण भोज और रिश्तेदारों के खाने की बारी आई, तो बड़े भाई प्रशांत ने सबके सामने अपनी छवि चमकाने के लिए ऊंची आवाज में कहा, “अरे हमारी मालिनी तो बाबूजी की जान थी। बाबूजी ने और माँ ने भी अपनी सबसे कीमती अमानत, वो खानदानी जड़ाऊ कंगन हमारी लाड़ली बहन को ही तो दिए थे। मालिनी, आओ अपने हाथों से पंडित जी को खीर परोसो।”
प्रशांत की बात पर मानसी और बड़ी भाभी ने एक-दूसरे को देखकर कुटिल मुस्कान फेंकी, जैसे वे आज भी समाज के सामने यह जताना चाह रहे हों कि बेटी तो मायके से समेटकर ही ले गई है।
मालिनी की सहनशक्ति का बांध आज टूट गया। उसने खीर का कटोरा वहीं मेज पर रख दिया। उसके चेहरे पर न अब आंसू थे, न ही किसी प्रकार की बेबसी। उसकी आंखों में आज अपने पिता के जैसा ही एक अडिग तेज था। उसने अपने पर्स की चेन खोली और उसमें से वही लाल मखमली डिब्बी निकाली।
आंगन के ठीक बीच में, जहां बाबूजी की माला चढ़ी हुई बड़ी सी तस्वीर रखी थी, मालिनी वहां जाकर खड़ी हो गई। उसने डिब्बी खोली और दोनों चमचमाते सोने के कंगन निकालकर पूजा की थाली में रख दिए। पूरे पंडाल में अचानक सन्नाटा पसर गया।
मालिनी ने शांत, किंतु इतनी बुलंद आवाज में बोलना शुरू किया कि कोने-कोने में बैठे हर इंसान के कानों तक उसकी बात साफ पहुंची, “भैया, आपने बिल्कुल सही कहा। माँ के ये दो कंगन पिछले बारह सालों से आप दोनों भाइयों और भाभियों की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहे थे न? इसी एक कंगन की कीमत वसूलने के लिए आप लोगों ने मेरे स्वाभिमानी बाबूजी को उनके ही बनाए कमरे से निकालकर गंदे स्टोर रूम में डाल दिया था। इसी कंगन के ताने मारकर मानसी ने मुझे अपनी रसोई में घुसने से रोका था, ताकि मैं अपने बीमार पिता को दो चम्मच हलवा न खिला सकूं! आप लोगों को लगता था कि माँ ने मुझे कंगन देकर आप लोगों के साथ अन्याय किया, जबकि माँ के सारे गहने, बाबूजी की लाखों की एफडी, हर महीने की पेंशन और यह करोड़ों का मकान आप दोनों ने आपस में बांट लिया, फिर भी आपके मन का लालच नहीं भरा!”
प्रशांत और कार्तिक के चेहरे का रंग उड़ गया। कार्तिक ने घबराकर कहा, “दीदी, ये क्या तमाशा कर रही हो? मेहमान बैठे हैं सब…”
मालिनी ने हाथ उठाकर उसे बीच में ही रोक दिया, “तमाशा मैं नहीं कार्तिक, तमाशा तुम लोगों ने बाबूजी के बुढ़ापे का बनाया था। उस वक्त मैं चुप रह गई थी क्योंकि बाबूजी ने मुझे अपनी कसम देकर रोक दिया था। वे अपने बेटों की बदनामी नहीं चाहते थे। लेकिन आज बाबूजी नहीं हैं, और आज मैं इस झूठे कर्ज से मुक्त होना चाहती हूँ।”
मालिनी ने अपने पर्स से एक सरकारी फाइल निकाली और वहां बैठे बाबूजी के पुराने वकील और दोस्त, वर्मा चाचा के हाथों में थमा दी। मालिनी ने गर्व से सिर उठाकर कहा, “पांच महीने पहले जब मैं यहां से रोते हुए वापस कानपुर गई थी, उसके ठीक एक हफ्ते बाद बाबूजी ने खुद देहरादून के डाकघर से मेरे पास एक रजिस्टर्ड लिफाफा और अपने हाथों से लिखी वसीयत भेजी थी। उन्हें पता चल गया था कि उनके बेटे केवल उनकी संपत्ति के सगे हैं, उनके नहीं। यह देहरादून का मकान पैतृक नहीं, बाबूजी की खुद की कमाई का था। बाबूजी ने अपनी अंतिम वसीयत में इस मकान का आधा हिस्सा और अपनी बची हुई जमा-पूंजी मेरे नाम कर दी थी, ताकि उनके जाने के बाद उनके बेटों को यह अहसास हो सके कि जिस बेटी को वे पराया समझते थे, पिता की नजरों में असली वारिस वही थी।”
यह सुनते ही प्रशांत, कार्तिक और दोनों बहुओं के पैरों तले जमीन खिसक गई। मानसी का मुंह खुला का खुला रह गया। समाज के लोगों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई और सबकी नजरों में दोनों भाइयों के लिए घृणा साफ दिखाई देने लगी।
मालिनी ने थाली में रखे सोने के कंगन उठाए और कार्तिक के कदमों के पास रख दिए। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे न तब आप लोगों की दौलत की भूख थी, और न आज है। ये रहे माँ के वो कंगन, इन्हें रख लीजिए और अपनी तिजोरी में बंद कर लीजिए, शायद इससे आप लोगों की आत्मा को शांति मिल जाए। और रही बात इस मकान के मेरे आधे हिस्से और बाबूजी की जमा-पूंजी की… तो वर्मा चाचा, मैंने कागजात तैयार करवा दिए हैं। बाबूजी के हिस्से की उस पूरी रकम और संपत्ति से देहरादून में एक ‘सूर्यकांत शर्मा स्मृति वृद्धाश्रम और पुस्तकालय’ बनाया जाएगा। वहां उन बुजुर्ग माता-पिता को पूरे सम्मान, ताजे फल, दूध और प्यार के साथ रखा जाएगा, जिन्हें उनके अपने पढ़े-लिखे बेटे स्टोर रूम में छोड़ देते हैं। बाबूजी का असली श्राद्ध और तर्पण यही होगा!”
पंडाल में बैठे बाबूजी के पुराने सहकर्मियों और मोहल्ले के बुजुर्गों की आंखें भर आईं। वर्मा चाचा ने आगे बढ़कर मालिनी के सिर पर हाथ रखा और रुंधे गले से बोले, “बेटा, आज सूर्यकांत जी की आत्मा जहां भी होगी, अपनी इस बेटी पर गर्व कर रही होगी। बेटियां कभी पराई नहीं होतीं, पराई तो वो औलादें हो जाती हैं जो स्वार्थ में अंधी होकर अपने ही जड़ों को काट देती हैं।”
प्रशांत और कार्तिक सिर झुकाए अपराधियों की तरह खड़े थे। उनके पास अपनी ही बहन से नजरें मिलाने का साहस भी नहीं बचा था। मालिनी ने बाबूजी की तस्वीर को प्रणाम किया, अपने पति अनुराग का हाथ थामा और बिना पीछे मुड़े उस आंगन से बाहर निकल गई। आज उसके मन पर कोई बोझ नहीं था, बल्कि अपने पिता के स्वाभिमान को अमर कर देने का एक गहरा सुकून था।
दोस्तों, मालिनी ने अपने स्वार्थी भाइयों को सबक सिखाने और अपने पिता को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए जो कदम उठाया, क्या वह सही था? क्या वाकई आज के समाज में माता-पिता को अपनी सारी संपत्ति जीते-जी बच्चों के नाम कर देनी चाहिए, या अपने स्वाभिमान और सुरक्षा के लिए अपने पास रखनी चाहिए? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : वीणा सिंह