मां के आंचल की छांव

ग्यारह साल की बच्ची की इस सीधी और सच्ची बात से बैठक में कुछ पलों के लिए सन्नाटा पसर गया। गजेंद्र जी का चेहरा थोड़ा फीका पड़ गया, उन्होंने बात संभालते हुए कहा, “अरे नहीं बेटा, मैं गिना थोड़े ही रहा हूं! मैं तो तुम्हारे पापा को बता रहा था कि हमारी बिटिया हमारे पास कितनी खुश थी। तुम खुश रहो, इसीलिए तो हम सब मंगवाते थे।”

आर्या ने धीरे से अपनी मम्मी का हाथ थामा और बोली, “फूफा जी, आपका घर बहुत सुंदर है और आप सबने मुझे बहुत प्यार किया, पीहू भी बहुत अच्छी है… लेकिन अपना घर तो अपना ही होता है न!”

मई की तपती दोपहर में जब प्रयागराज की सड़कों पर लू के थपेड़े चल रहे थे, तब ग्यारह साल की आर्या अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी कैलेंडर की तारीखें गिन रही थी। स्कूल बंद हुए पूरे दस दिन बीत चुके थे। उसके बड़े भाई रोहन ने तो दोस्तों के साथ क्रिकेट की टीम बना ली थी और सुबह-शाम मैदान में पसीना बहाता था, लेकिन आर्या का मन घर की चारदीवारी में उचाट होने लगा था। उसकी मम्मी नीलिमा जी ने कई बार कहा कि इस बार झांसी चलते हैं, मामा जी के घर। लेकिन आर्या ने साफ मना कर दिया। मामा के बच्चे बड़े हो गए थे, वे दिन-भर अपने मोबाइल और कोचिंग में व्यस्त रहते थे, वहां आर्या किसके साथ खेलती?

आर्या का दिल तो कानपुर जाने के लिए मचल रहा था, जहां उसकी बड़ी बुआ सविता जी रहती थीं। बुआ के घर जाने का सबसे बड़ा आकर्षण कोई और नहीं, बल्कि बुआ के बेटे प्रतीक भैया और कामिनी भाभी की डेढ़ साल की नन्ही सी गुड़िया ‘पीहू’ थी। पिछले साल जब भैया-भाभी प्रयागराज आए थे, तब पीहू घुटनों के बल चलती थी। अब तो वह तोतली जुबान में बोलने भी लगी थी और छोटे-छोटे कदमों से पूरे घर में दौड़ लगाती थी। वीडियो कॉल पर जब भी पीहू अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आर्या को देखकर हाथ हिलाती, तो आर्या का मन करता कि वह अभी उड़कर कानपुर पहुंच जाए और उस नन्ही परी को अपनी गोद में उठा ले।

आर्या ने वैसे भी बुआ के घर कभी दो-तीन दिन से ज्यादा समय नहीं बिताया था। जब भी पापा आलोक जी किसी काम से कानपुर जाते, आर्या को साथ ले जाते और तीसरे दिन वापस ले आते। उस थोड़े से समय में बुआ और फूफा जी का लाड़-प्यार इतना अधिक होता कि आर्या को लगता जैसे वह किसी राजकुमारी की तरह वहां गई हो। इसलिए इस बार उसने जिद पकड़ ली थी कि वह कानपुर जाएगी और कम से कम एक हफ्ता पीहू के साथ खेलेगी।

एक शाम डाइनिंग टेबल पर जब आलोक जी ने बताया कि फूफा जी यानी गजेंद्र जी किसी व्यापारिक काम से प्रयागराज आ रहे हैं और लौटते वक्त आर्या को अपने साथ कानपुर ले जाएंगे, तो आर्या की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने तुरंत अपनी अलमारी खोली और अपनी सबसे अच्छी फ्रॉक, पीहू के लिए खरीदे गए छोटे-छोटे खिलौने और रंग-बिरंगी क्लिप्स अपने बैग में समेटने लगी। नीलिमा जी मुस्कुराते हुए अपनी बेटी की यह हड़बड़ी देख रही थीं। उन्होंने आर्या के बैग में चुपके से कुछ हाजमे की गोलियां और उसकी पसंद के भुने हुए मखाने का डिब्बा भी रख दिया, क्योंकि एक मां का दिल जानता है कि बच्चा बाहर जाकर अपनी आदतें तुरंत नहीं बदल पाता।

अगले दिन गजेंद्र फूफा जी के साथ आर्या कानपुर पहुंच गई। बुआ का घर बड़ा और बेहद सलीके से सजा हुआ था। दरवाजे पर कदम रखते ही नन्ही पीहू ने जब ठुमकते हुए आकर आर्या के पैरों को पकड़ लिया, तो आर्या का सारा सफर का थकान छूमंतर हो गया। शुरुआती चार-पांच दिन तो पंख लगाकर उड़ गए। सुबह से शाम तक आर्या और पीहू की खिलखिलाहट से सविता बुआ का आंगन गूंजता रहता। कामिनी भाभी को भी बड़ी राहत मिल गई थी; पीहू आर्या के साथ इतनी मगन रहती कि भाभी आराम से रसोई और घर के बाकी काम निपटा लेतीं।

आर्या स्वभाव से बेहद शांत और संकोची बच्ची थी। घर में वह भले ही नखरे दिखाए, लेकिन बुआ के घर वह एकदम आज्ञाकारी बन गई थी। खाने की मेज पर जो भी परोसा जाता, वह चुपचाप खा लेती। उसे टिंडे और लौकी की सब्जी बिल्कुल पसंद नहीं थी, प्रयागराज में तो नीलिमा जी उसके लिए अलग से आलू का भरता या दही-पराठा बना देती थीं, लेकिन यहां संकोच के मारे वह बिना कुछ कहे लौकी की सब्जी भी निगल लेती। गजेंद्र फूफा जी उसका बहुत ध्यान रखते थे। वे शाम को दफ्तर से लौटते तो कभी उसके लिए रबड़ी-फालूदा लाते, कभी समोसे-चाट, तो कभी शहर की मशहूर बेकरी से चॉकलेट पेस्ट्री।

कानपुर शहर में ही आर्या की छोटी बुआ रंजना जी और उसके नाना-नानी का घर भी था, जो सविता बुआ के मोहल्ले से महज पंद्रह-बीस मिनट की दूरी पर था। आर्या ने मन ही मन सोचा था कि दो-तीन दिन बड़ी बुआ के पास रहने के बाद वह नाना जी के बगीचे के आम खाने जाएगी और फिर छोटी बुआ के बच्चों के साथ लूडो खेलेगी। लेकिन गजेंद्र फूफा जी का स्वभाव थोड़ा अलग था। उनके भीतर अपने बड़प्पन और अधिकार की एक अजीब सी भावना थी। उनका मानना था कि जब वे खुद प्रयागराज जाकर आर्या को अपने घर लाए हैं, तो आर्या पर सिर्फ उनके परिवार का हक है।

छठे दिन शाम को जब आर्या छत पर पीहू को टहला रही थी, तब छोटी बुआ के पति यानी मनोज फूफा जी घर आए। वे आर्या के लिए उसकी पसंद की मिठाई भी लाए थे। बैठक में चाय पीते हुए मनोज जी ने बड़े स्नेह से कहा, “भाई साहब, आर्या को आए लगभग हफ्ता होने को है, रंजना ने आज इसके मनपसंद छोले-भटूरे बनाए हैं। आप कहें तो मैं इसे दो दिन के लिए अपने घर ले जाऊं? वहां से यह अपने नाना जी से भी मिल आएगी।”

गजेंद्र जी ने चाय की चुस्की लेते हुए बड़े ही रौबदार किंतु मीठे स्वर में जवाब दिया, “अरे मनोज बाबू, कैसी बात करते हैं आप! आर्या को हम आलोक भाई साहब से कहकर अपने घर की रौनक बढ़ाने लाए हैं। पीहू तो इसके बिना एक पल नहीं रहती। अब जब हम लाए हैं, तो यह हमारे ही आंगन में रहेगी। अगली छुट्टियों में जब आप खुद प्रयागराज जाकर इसे लाएंगे, तब शौक से अपने घर रखिएगा।”

मनोज जी इस जवाब से थोड़ा सकपका गए, लेकिन बड़े ननदोई का मान रखते हुए मुस्कुराकर चुप हो गए। आर्या को तो छत से नीचे बुलाया तक नहीं गया। उसे पता भी नहीं चला कि उसके छोटे फूफा जी उसे लेने आए थे और खाली हाथ लौट गए। इसी तरह दो दिन बाद जब नाना जी ने फोन किया, तो सविता बुआ ने कह दिया कि बच्चे तो मॉल घूमने गए हैं और आर्या का यहां से हिलने का मन ही नहीं है।

धीरे-धीरे दस दिन बीत गए। अब आर्या के बाल-मन पर उस औपचारिक माहौल की थकान हावी होने लगी थी। कहने को तो उसे हर शाम बाहर घुमाने ले जाया जाता—कभी गंगा बैराज की हवा खिलाने, कभी बड़े से शॉपिंग मॉल में, तो कभी महंगे रेस्तरां में डोसा और पिज़्ज़ा खिलाने। लेकिन आर्या को अब अपने घर की, अपनी मम्मी के पल्लू की और अपने छोटे से कमरे की बेतरतीब आजादी की याद सताने लगी थी।

यहां बुआ के घर में हर चीज का एक कड़ा नियम था। सुबह ठीक सात बजे उठना पड़ता था, क्योंकि फूफा जी का मानना था कि देर तक सोने से आलस आता है। अपने घर में तो छुट्टियों के दिनों में आर्या नौ बजे तक बिस्तर में करवटें बदलती रहती थी और नीलिमा जी आकर प्यार से उसके माथे को चूमकर जगाती थीं। यहां सोफे के कुशन जरा से तिरछे हो जाएं तो कामिनी भाभी तुरंत उन्हें सीधा करने लगतीं, जिससे आर्या को डर लगता कि कहीं उसके बैठने से चादर में सिलवटें न पड़ जाएं।

सबसे बड़ी बात थी ‘अधिकार’ और ‘संकोच’ का अंतर। अपने घर में जब उसे दोपहर में भूख लगती, तो वह बेधड़क रसोई में घुस जाती, फ्रिज खोलकर मलाई निकालती, चीनी डालकर खा लेती और अगर हाथ से कांच का गिलास छूटकर टूट भी जाता, तो मम्मी से दो मीठी डांट सुनकर बात खत्म हो जाती। किसी तरह का अपराधबोध मन में नहीं रहता था। लेकिन यहां? यहां अगर प्यास भी लगती, तो वह संकोच में सोचती कि किससे पानी मांगूं। प्रयागराज में मम्मी हर रात उसके पीछे गिलास लेकर दौड़ती थीं और जबरदस्ती हल्दी या बादाम वाला दूध पिलाती थीं, जिसे पीते वक्त आर्या मुंह बनाती थी। और यहां कानपुर में? पहले दिन बुआ ने दूध दिया तो उसमें मलाई की मोटी परत देखकर आर्या से पिया नहीं गया। उसने धीरे से कहा कि उसे रात में दूध पीने की आदत नहीं है। बस, उसके बाद दस दिनों तक किसी ने उसे दोबारा दूध के लिए नहीं पूछा। आर्या को रात में बिस्तर पर लेटे हुए कभी-कभी भूख महसूस होती, तो उसे मम्मी का वह जबरदस्ती दूध पिलाना याद आता और उसकी आंखें नम हो जातीं। उसे समझ आ रहा था कि मम्मी की डांट में जो फिक्र थी, वह फूफा जी के महंगे पिज़्ज़ा में कहीं नहीं है।

बारहवें दिन सब्र का बांध टूट गया। आर्या ने दोपहर में नीलिमा जी को फोन लगाया और बाथरूम के पास कोने में खड़े होकर धीमी आवाज में रुआंसी होकर बोली, “मम्मी, पापा को बोलो न कल मुझे लेने आ जाएं। मुझे अब यहां नहीं रहना, मुझे घर आना है।”

संयोग से गजेंद्र फूफा जी वहीं से गुजर रहे थे। उन्होंने यह बात सुन ली। वे तुरंत मुस्कुराते हुए आर्या के पास आए और उसके सिर पर हाथ रखकर बोले, “अरे आर्या बेटा, क्या हुआ? यहां कोई तकलीफ है क्या तुम्हें? बताओ, किसी ने कुछ कहा? प्रतीक और कामिनी तो तुम्हें पलकों पर बिठाए रखते हैं। कल ही तो तुम्हें वाटर पार्क और प्रदर्शनी घुमाकर लाए हैं, रोज शाम को तुम्हारी पसंद की आइसक्रीम आती है, फिर घर जाने की ऐसी क्या जल्दी है? अभी तो चार-पांच दिन और रहो आराम से!”

फूफा जी के इस सवाल में प्यार से ज्यादा अपने इंतजामों का बखान था। नन्ही आर्या भला क्या जवाब देती? वह यह तो नहीं कह सकती थी कि फूफा जी, आपकी आइसक्रीम बहुत मीठी है, पर मुझे अपनी मम्मी के हाथ की जली हुई रोटी और बिना नपा-तुला प्यार चाहिए। वह चुपचाप सिर झुकाकर वहां से हट गई।

लेकिन अगले दो दिनों में आर्या एकदम गुमसुम हो गई। अब उसका मन पीहू के साथ खेलने में भी नहीं लगता था। चौदहवें दिन उसने हिम्मत जुटाई और सुबह नाश्ते की मेज पर कहा, “बुआ जी, मेरी स्कूल की छुट्टियों का बहुत सारा होमवर्क और प्रोजेक्ट बाकी है। मैम ने कहा था कि फाइल समय पर जमा नहीं हुई तो नंबर कट जाएंगे। मेरे सारे कलर और चार्ट पेपर प्रयागराज में ही रखे हैं, इसलिए मुझे जाना पड़ेगा।”

आखिरकार पंद्रहवें दिन गजेंद्र फूफा जी और सविता बुआ खुद अपनी कार से आर्या को छोड़ने प्रयागराज आए। अपने घर का लोहे वाला गेट देखते ही आर्या के चेहरे पर जो चमक आई, वह पिछले पंद्रह दिनों में किसी शॉपिंग मॉल की रोशनी से नहीं आई थी। वह दौड़कर अंदर भागी और रसोई में खड़ी नीलिमा जी से लिपट गई।

बैठक में चाय-नाश्ते का दौर चला। आलोक जी और नीलिमा जी ने बुआ-फूफा का बहुत आभार व्यक्त किया। लेकिन बात ही बात में गजेंद्र फूफा जी का पुराना स्वभाव फिर सामने आ गया। वे सोफे पर टिककर बैठते हुए बोले, “भाई साहब, आपकी बिटिया का तो हमारे कानपुर में ऐसा मन लगा कि पूछिए मत! आने का नाम ही नहीं ले रही थी, वो तो होमवर्क का बहाना बन गया। हमने भी इसकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। जिस चीज पर इसने उंगली रखी, तुरंत हाजिर की। कभी पनीर टिक्का मंगाया, कभी स्पेशल कुल्फी, कभी डोसा तो कभी मॉल की सैर… हमारे घर में तो रोज किसी उत्सव जैसा माहौल रहा इसके लिए।”

फूफा जी बड़े गर्व से एक-एक खाने की चीज और घुमाने की जगहों के नाम गिना रहे थे, मानो वे स्नेह का कोई हिसाब-किताब प्रस्तुत कर रहे हों। पास बैठी आर्या से अब रहा नहीं गया। बच्चों का मन तो आईने की तरह साफ होता है, उन्हें कूटनीति नहीं आती। वह मासूमियत से मगर बेहद स्पष्ट स्वर में बोल पड़ी, “फूफा जी, पापा तो मुझे लेने पहले ही आने वाले थे, पर आपने ही पापा को फोन पर मना कर दिया था कि आप खुद छोड़ने आएंगे। और फूफा जी, आप ये सब क्यों गिना रहे हैं कि आपने मुझे क्या-क्या खिलाया? वो पिज़्ज़ा, डोसा और आइसक्रीम तो सिर्फ मेरे लिए नहीं आती थी, घर के सारे लोग मिलकर खाते थे। प्रतीक भैया और भाभी का मन होता था तो वे मंगवाते थे, मैं तो बस उनके साथ थोड़ा सा खा लेती थी।”

ग्यारह साल की बच्ची की इस सीधी और सच्ची बात से बैठक में कुछ पलों के लिए सन्नाटा पसर गया। गजेंद्र जी का चेहरा थोड़ा फीका पड़ गया, उन्होंने बात संभालते हुए कहा, “अरे नहीं बेटा, मैं गिना थोड़े ही रहा हूं! मैं तो तुम्हारे पापा को बता रहा था कि हमारी बिटिया हमारे पास कितनी खुश थी। तुम खुश रहो, इसीलिए तो हम सब मंगवाते थे।”

आर्या ने धीरे से अपनी मम्मी का हाथ थामा और बोली, “फूफा जी, आपका घर बहुत सुंदर है और आप सबने मुझे बहुत प्यार किया, पीहू भी बहुत अच्छी है… लेकिन अपना घर तो अपना ही होता है न!”

नीलिमा जी ने स्थिति की नजाकत को समझते हुए तुरंत बात बदली और मिठाई की प्लेट आगे बढ़ाते हुए माहौल को हल्का किया। शाम को जब बुआ और फूफा जी वापस कानपुर के लिए रवाना हो गए, तो घर में एक अजीब सी शांति और सुकून फैल गया।

रात के खाने के बाद आर्या अपने कमरे में न जाकर मम्मी-पापा के कमरे में आ गई। उसने आज अपनी सबसे पुरानी और ढीली-ढाली सूती टी-शर्ट पहनी थी, जिसे पहनने में उसे किसी के सामने संकोच नहीं था। वह बिस्तर पर लेटी नीलिमा जी की गोद में अपना सिर रखकर पसर गई और गहरी सांस लेते हुए बोली, “मम्मी… सच में अपने घर जैसी जगह पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यहां कम से कम अपनी सांस तो खुलकर ले सकते हैं। वहां तो हर वक्त लगता था जैसे कोई हम पर एहसान कर रहा हो—यह खिलाया, वहां घुमाया! मुझे तो आपका बनाया हुआ सादा दाल-चावल ही सबसे अच्छा लगता है।”

नीलिमा जी ने आर्या के उलझे हुए बालों में उंगलियां फिराते हुए मुस्कुराकर पूछा, “अच्छा? इतनी बड़ी बातें सीख गई मेरी लाडो? तो क्या अब कभी अपनी बुआ के घर और पीहू से मिलने नहीं जाओगी?”

आर्या ने मम्मी के पेट से मुंह छिपाते हुए कहा, “जाऊंगी मम्मी, पर सिर्फ दो दिन के लिए! जब मेहमान बनकर रहो तो दो दिन ही अच्छे लगते हैं। पंद्रह दिन तो मजबूरी जैसा लगने लगता है, जहां न अपनी मर्जी से सो सको, न जाग सको और न ही खुलकर कुछ मांग सको।”

तभी दरवाजे के पास खड़ा रोहन, जो चुपचाप दोनों की बातें सुन रहा था, हंसते हुए अंदर आया और आर्या की चोटी खींचते हुए बोला, “हां-हां, बड़ी आई घर की याद करने वाली! मम्मी, आपको पता है, जब यह वहां मॉल में घूम रही थी तब तो बड़े मजे से फोटो भिजवा रही थी, और आखिरी के पांच दिनों में इसने दिन में चार-चार बार फोन करके मेरा भी दिमाग चाट लिया था कि भैया पापा को भेजो!”

आर्या ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए तकिया उठाकर रोहन की तरफ फेंका, “मम्मी, देखो न भैया को! आते ही मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया!”

आलोक जी भी कमरे में आ गए और अपने दोनों बच्चों की इस नोकझोंक को देखकर खिलखिला पड़े। नीलिमा जी ने आर्या का माथा चूमते हुए कहा, “रोहन सच ही तो कह रहा है। लेकिन मेरी गुड़िया, तुझे एक बात बताऊं? तेरे बिना यह घर भी काटने को दौड़ता था। रोहन तो अपने दोस्तों में व्यस्त रहता था, मैं जब दोपहर में अकेली बैठती थी तो तेरी पायल की छम-छम और तेरी सौ फरमाइशें बहुत याद आती थीं। इसीलिए मैं भी तुझे रोज फोन लगाती थी। पर बेटा, जीवन में एक बात हमेशा याद रखना—बुआ और फूफा जी बुरे नहीं हैं। हर इंसान के प्यार जताने का तरीका अलग होता है। फूफा जी को लगता है कि अच्छी चीजें खिलाना और घुमाना ही सबसे बड़ा प्यार है, और वे चाहते थे कि उनकी इस मेहनत की तारीफ हो। हमें किसी के स्वभाव की कमी देखने के बजाय उनके पीछे की भावना को समझना चाहिए। उन्होंने पंद्रह दिन तुम्हारी जिम्मेदारी उठाई, तुम्हें सुरक्षित रखा, इसके लिए हमारे मन में हमेशा उनके प्रति आदर होना चाहिए। बस, यह अनुभव हमें सिखाता है कि रिश्तों की मिठास बनी रहे, इसके लिए थोड़ी दूरी और अपनी सीमाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। अपना घर हमें जड़ें देता है, और रिश्तेदार हमें समाज में घुलना-मिलना सिखाते हैं।”

मम्मी की इस गहरी और सुलझी हुई बात ने आर्या के मन से फूफा जी के प्रति जो थोड़ी बहुत कड़वाहट आ गई थी, उसे तुरंत धो दिया। उसने मुस्कुराते हुए हामी भरी। तभी नीलिमा जी उठीं और रसोई से केसर-बादाम वाले गर्म दूध का बड़ा सा गिलास लाकर आर्या के हाथ में थमा दिया। आज आर्या ने न तो मुंह बनाया और न ही कोई बहाना किया; वह एक ही सांस में पूरा गिलास गटक गई, क्योंकि उस दूध में किसी औपचारिकता का दिखावा नहीं, बल्कि मां के निस्वार्थ अधिकार का अमृत घुला हुआ था। आर्या के लौट आने से प्रयागराज का वह छोटा सा घर एक बार फिर चहक उठा था।

बचपन में हम सब कभी न कभी गर्मियों की छुट्टियों में किसी रिश्तेदार के यहां जरूर गए हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी रिश्तेदार के घर के पकवानों और सुख-सुविधाओं के बावजूद आपको अपने घर की सूखी रोटी और मां के आंचल की याद सताने लगी हो? आपकी नजर में फूफा जी का व्यवहार सही था या नन्ही आर्या की बात? अपने बचपन की ऐसी ही कोई खट्टी-मीठी याद या अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ जरूर साझा करें!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

अमिता कुचया

error: Content is protected !!