आँगन की पराई गौरेया

 “ पल्लवी के पैरों में जैसे आज पंख लग गए थे। अपनी भारी सिल्क की साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे वह कभी हलवाई के पास भागती, तो कभी मंडप की सजावट देखती। आखिर उसके इकलौते छोटे भाई कार्तिक की शादी जो थी! पिता के गुजर जाने के बाद पल्लवी और उसकी माँ शारदा जी ने ही कार्तिक को बड़े लाड़-प्यार से पाला था। पल्लवी की कोई बहन नहीं थी, इसलिए जब से कार्तिक का रिश्ता नेहा से तय हुआ था, पल्लवी ने मन ही मन अनगिनत सपने बुन लिए थे। उसे लगता था कि घर में भाभी नहीं, बल्कि उसकी अपनी एक सहेली, एक छोटी बहन आ रही है, जिसके साथ वह अपने दिल की हर बात बाँट सकेगी।

बारात में पल्लवी ने ढोल की थाप पर इतना नाचा कि उसके पैरों में छाले पड़ गए, पर चेहरे की मुस्कान एक पल को भी फीकी नहीं पड़ी। अगले दिन जब डोली विदा होकर घर आई और नेहा ने गृह-प्रवेश किया, तो पल्लवी ने ही आगे बढ़कर उसकी आरती उतारी और नज़र भी उतारी। घर आँगन मेहमानों से खचाखच भरा था। मुँह-दिखाई की रस्म चल रही थी। मोहल्ले और रिश्तेदारी की औरतें बारी-बारी से आकर घूँघट उठातीं, शगुन देतीं और तरह-तरह की बातें करतीं।

दोपहर ढलते-ढलते पल्लवी ने देखा कि भारी लहंगे और गहनों के बोझ से नेहा का चेहरा कुम्हला गया है। उसने तुरंत अपनी माँ से कहा, “माँ, अब बस करो। बाकियों से कल मिलवा देना। देखो, नेहा कितनी थक गई है।” यह कहकर पल्लवी बड़े प्यार से नेहा का हाथ पकड़कर उसे उसके कमरे में ले गई।

“भाभी, आप ये भारी दुपट्टा और गहने उतार कर थोड़ी देर कमर सीधी कर लो। मैं आपके लिए अदरक वाली कड़क चाय बनाकर लाती हूँ, सारी थकान उतर जाएगी,” पल्लवी ने नेहा के माथे से पसीना पोंछते हुए अपनेपन से कहा।

अभी पल्लवी नेहा के गहने उतरवाने में मदद कर ही रही थी कि पल्लवी का चार साल का बेटा आरव अपनी तोतली ज़ुबान में ‘मामी-मामी’ चिल्लाता हुआ कमरे में दौड़ा चला आया। बच्चे के हाथ में मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा था। वह उत्साह में उछलकर सीधे बिस्तर पर चढ़ा और नेहा की गोद में बैठने की कोशिश करने लगा ताकि नई मामी को मिठाई खिला सके।

तभी नेहा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने एक झटके में आरव को अपनी बांह से पीछे धकेला और कर्कश आवाज़ में बोली, “अरे! ये क्या बदतमीजी है? दूर हटाओ इसे! देखा नहीं कितनी महंगी कांजीवरम की साड़ी पहनी है मैंने? इसके गंदे हाथों से मेरी साड़ी खराब हो जाएगी। मुझे बच्चों का यूँ चिपकना बिल्कुल पसंद नहीं है!”

अचानक लगे धक्के से नन्हा आरव सहम गया और उसकी आँखों में आँसू भर आए। पल्लवी तो जैसे सन्न रह गई। उसका कलेजा मुँह को आ गया। उसने तुरंत आगे बढ़कर आरव को अपनी गोद में उठा लिया और सीने से लगा लिया। उसे नेहा का यह व्यवहार तीर की तरह चुभा, लेकिन फिर उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया कि शायद नेहा सुबह से भूखी-प्यासी और थकी हुई है, ऊपर से नए माहौल की घबराहट में चिड़चिड़ा गई होगी। पल्लवी बिना कुछ कहे चुपचाप बच्चे को लेकर कमरे से बाहर निकल गई।

शादी के तीन दिन बाद कार्तिक और नेहा घूमने के लिए शिमला चले गए। पूरा घर खाली हो गया था, लेकिन शादी का समेटने वाला काम पहाड़ जैसा पड़ा था। शारदा जी की उम्र हो चली थी और घुटनों के दर्द की वजह से उनसे ज्यादा चला-फिरा नहीं जाता था। पल्लवी के पति विकास बेहद सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने पल्लवी से खुद कहा था कि वह एक हफ्ता रुककर माँ के सारे काम निपटा दे, घर के बर्तन-कपड़े व्यवस्थित कर दे, फिर आराम से लौट आए।

पीछे से पल्लवी ने अकेले ही पूरे घर की धुलाई की, हलवाई के बर्तन गिनवाकर वापस भेजे, रिश्तेदारों के लेन-देन का हिसाब लिखा और माँ के लिए अचार-मुरब्बे तक बनाकर रख दिए। वह मन ही मन सोच रही थी कि जब कार्तिक और नेहा शिमला से लौटेंगे, तब तक घर एकदम साफ-सुथरा हो चुका होगा। फिर वह नेहा के साथ बैठकर सुकून से बातें करेगी, उसकी पसंद-नापसंद जानेगी और दो-चार दिन उसके हाथ का खाना खाकर खुशी-खुशी अपने ससुराल मेरठ लौट जाएगी।

आठवें दिन सुबह-सुबह कार्तिक और नेहा वापस लौटे। पल्लवी ने उनके स्वागत के लिए सुबह से ही उनकी पसंद के आलू के पराठे और खीर बना रखी थी। जैसे ही कार्तिक नहाने गया, पल्लवी चाय की ट्रे लेकर नेहा के कमरे में पहुँची। नेहा अपना सूटकेस खोल रही थी। पल्लवी को देखते ही उसके माथे पर बल पड़ गए।

चाय का कप पकड़ते हुए नेहा ने एक तिरछी नज़र पल्लवी पर डाली और तंज कसते हुए बोली, “अरे पल्लवी दीदी, आप अभी तक यहीं हैं? मुझे लगा था आप तो कब की मेरठ जा चुकी होंगी। विकास जीजाजी अकेले कैसे रह रहे हैं? भई, हमारे मायके में तो शादी के अगले ही दिन बेटियाँ अपने ससुराल चली जाती हैं। शादीशुदा लड़की का इतने दिनों तक मायके में डेरा जमाए रखना अच्छा थोड़ी लगता है, लोग क्या कहेंगे?”

नेहा के शब्द सुनकर पल्लवी के हाथ से ट्रे छूटते-छूटते बची। जिस घर के आँगन में उसने घुटनों के बल चलना सीखा, जिस घर की एक-एक ईंट में उसके पिता की यादें बसी थीं, आज उसी घर में उसका रुकना ‘डेरा जमाना’ हो गया था? पल्लवी की आँखों में नमी तैर गई, पर उसने गले के भीतर ही अपने आँसुओं का घूँट पी लिया। चेहरे पर एक फीकी मुस्कान लाकर वह बोली, “भाभी, यह मेरा मायका है, कोई सराय नहीं। माँ अकेली थीं और शादी का इतना काम फैला था कि उनके बस की बात नहीं थी। बस, आज सब सिमट गया है। अब आप आ गई हैं, तो घर और माँ की जिम्मेदारी आपकी।”

इतना कहकर पल्लवी ने बात बदलने के लिए कहा, “अच्छा सुनो, शाम को आपके मायके से आपके मम्मी-पापा और भाई पगफेरे की रस्म के लिए आने वाले हैं। आप सफर से थकी हुई लग रही हो, थोड़ा चेहरा धोकर हल्का सा श्रृंगार कर लो और कोई अच्छी सी नई साड़ी पहन लो, उन्हें देखकर अच्छा लगेगा।”

नेहा ने तुरंत मुँह बिचकाया और बेरुखी से बोली, “इसकी कोई ज़रूरत नहीं है दीदी। मेरे मम्मी-पापा ने मुझे बचपन से देखा है, वो कोई बाहर के लोग नहीं हैं जो मुझे बिना मेकअप के पहचानेंगे नहीं। मैं जैसी हूँ, वैसी ही ठीक हूँ। आप मुझे ये रीति-रिवाज मत सिखाइए।”

पल्लवी के आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगा। उसने उस दिन एक शब्द भी नहीं कहा। शाम को नेहा के मायके वालों की खूब खातिरदारी करने के बाद, पल्लवी ने रात में ही अपना बैग पैक कर लिया। अगले दिन सुबह जब उसने जाने की बात कही, तो शारदा जी और कार्तिक ने उसे बहुत रोका, पर पल्लवी ने आरव के स्कूल और विकास के दफ्तर का बहाना बनाकर विदा ले ली।

उस दिन के बाद से पल्लवी के लिए उसके मायके के दरवाज़े जैसे छोटे पड़ने लगे। नेहा बहुत चतुर थी। जब कार्तिक सामने होता, तो वह पल्लवी के आगे-पीछे ‘दीदी-दीदी’ करती घूमती, उनके लिए फल काटती और खूब मीठी बातें करती। कार्तिक को लगता कि उसकी पत्नी उसकी बहन का कितना सम्मान करती है। लेकिन जैसे ही कार्तिक ऑफिस जाता और शारदा जी मंदिर या छत पर होतीं, नेहा के तेवर बदल जाते।

कभी वह आरव के खिलौने फैलाने पर ताने मारती, तो कभी रसोई में पल्लवी के चाय बनाने पर टोक देती कि “दीदी, आप तो चीनी-पत्ती का डिब्बा ही खाली कर देती हैं।” यहाँ तक कि जब पल्लवी मायके आती, तो नेहा जानबूझकर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती या सिरदर्द का बहाना बनाकर लेट जाती, ताकि सारा काम पल्लवी और बूढ़ी माँ को करना पड़े।

पल्लवी को अब अपने ही घर में परायेपन की घुटन महसूस होने लगी थी। वह कार्तिक का घर खराब नहीं करना चाहती थी और न ही अपनी बूढ़ी माँ को मानसिक तनाव देना चाहती थी। इसलिए उसने चुपचाप अपने कदम पीछे खींच लिए।

देखते ही देखते पाँच साल बीत गए। पहले जो पल्लवी महीने-दो महीने में एक बार माँ से मिलने दौड़ी चली आती थी, अब उसका आना साल में एकाध बार ही रह गया था। वह भी सुबह आती और शाम की गाड़ी पकड़कर वापस लौट जाती। शारदा जी जब भी फोन पर रोतीं कि “बिटिया, अब तो तू अपने घर का रास्ता ही भूल गई है, कभी दो-चार दिन रुकने के लिए आया कर,” तो पल्लवी अपनी रुलाई दबाकर हँसते हुए कह देती, “अरे माँ, अब आरव बड़ा हो गया है, उसकी ट्यूशन और स्कूल की छुट्टी नहीं हो पाती। फिर विकास को भी बाहर का खाना सूट नहीं करता। जब लंबी छुट्टियाँ पड़ेंगी, तो ज़रूर आऊँगी।”

माँ समझतीं कि बेटी गृहस्थी में उलझ गई है, पर पल्लवी का दिल जानता था कि उसका मायका अब उसका नहीं रहा था। उसने खुद को एक बिन बुलाए मेहमान की तरह समेट लिया था।

वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूम रहा था। पांच साल बाद नेहा के इकलौते छोटे भाई रोहन की शादी तय हुई। नेहा की खुशी का ठिकाना नहीं था। ठीक वैसे ही, जैसे पाँच साल पहले पल्लवी खुश थी। नेहा ने महीनों पहले से अपने भाई की शादी के लिए खरीदारी शुरू कर दी थी। वह शारदा जी को अपनी साड़ियाँ और गहने दिखाते हुए चहकती रहती, “माँ जी, देखना मैं रोहन की शादी में कितना नाचूँगी! मेरी नई भाभी आएगी तो मैं उसके साथ खूब रील बनाऊँगी, हम दोनों बिल्कुल बहनों की तरह रहेंगे। मैं तो पूरे पंद्रह दिन मायके में रहकर आऊँगी, अपनी भाभी के हाथ की चाय पीकर ही लौटूँगी।”

पल्लवी को जब यह पता चला, तो वह बस एक खामोश मुस्कान मुस्कुरा कर रह गई।

नेहा पूरे उत्साह के साथ अपने तीन साल के बेटे चिंटू को लेकर अपने मायके हरिद्वार गई। लेकिन पंद्रह दिन रुकने का वादा करके गई नेहा महज़ आठवें दिन ही वापस देहरादून लौट आई। जब उसने घर में कदम रखा, तो उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखें सूजी हुई थीं और वह एकदम गुमसुम थी। न कोई चहक थी, न नई भाभी के किस्से।

शारदा जी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ बहू? तबियत तो ठीक है न? तू तो पंद्रह दिन रुकने वाली थी, इतनी जल्दी कैसे आ गई? मायके में सब कुशल-मंगल तो है?”

नेहा ने नज़रें चुराते हुए बस इतना कहा, “हाँ माँ जी, सब ठीक है। बस चिंटू को यहाँ की आदत है न, तो वहाँ उसका मन नहीं लग रहा था, इसलिए चली आई।” यह कहकर वह अपने कमरे में गई और दरवाज़ा बंद करके फूट-फूटकर रोने लगी।

दरअसल, हरिद्वार में जो कुछ हुआ था, उसने नेहा के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी थी। शादी के दो दिन बाद ही जब नेहा के बेटे चिंटू ने खेलते-खेलते अपनी नई मामी तनु के ड्रेसिंग टेबल से लिपस्टिक उठा ली थी, तो तनु ने सबके सामने चिंटू के हाथ से लिपस्टिक छीनी और नेहा को सुनाते हुए कहा था, “दीदी, अपने बच्चे को थोड़ा संभाल कर रखिए, मेरी सारी महंगी चीज़ें बर्बाद कर देगा।”

इतना ही नहीं, चौथे दिन जब नेहा अपनी माँ के पास बैठकर पुरानी बातें कर रही थी, तो तनु ने रसोई से ही तेज़ आवाज़ में अपनी सास से कहा, “मम्मी जी, दीदी कब वापस जा रही हैं? मेरे मायके से लोग आने वाले हैं और मुझे उनका कमरा गेस्ट रूम की तरह सेट करना है। वैसे भी शादी तो निपट गई, अब ननद का मायके में ज्यादा दिन रुकना अच्छा नहीं लगता।”

जब नेहा ने अपने भाई रोहन से इस बात का ज़िक्र करना चाहा, तो देखा कि रोहन के सामने तनु एकदम भोली बन जाती थी। नेहा की माँ भी अपने बेटे की नई-नवेली गृहस्थी के डर से अपनी बेटी के पक्ष में एक शब्द नहीं बोल सकीं। नेहा को उस रात अपने मायके का बिस्तर काँटों जैसा चुभा। उसे लगा जैसे किसी ने उसे उसके ही घर से बेदखल कर दिया हो।

अगले कुछ महीनों में नेहा एक-दो बार अपने मायके गई, लेकिन तनु के तीखे व्यवहार और उपेक्षा ने उसे इतना तोड़ दिया कि वह सुबह जाती और दोपहर का खाना खाए बिना ही वापस लौट आती।

सर्दियों की एक दोपहर नेहा छत पर धूप में बैठी मटर छील रही थी। अचानक उसकी नज़र सामने की मुंडेर पर बैठी एक गौरेया पर पड़ी, जिसे दूसरी चिड़िया चोंच मारकर दाने के पास से भगा रही थी। नेहा की आँखों के सामने अचानक पाँच साल पुराना वह दृश्य घूम गया—जब उसने नन्हे आरव को धक्का दिया था, जब उसने पल्लवी से कहा था कि ‘अभी तक आप गईं नहीं?’, जब उसने पल्लवी को उसके ही मायके में पराया कर दिया था।

आज जब खुद पर बीती, जब खुद ‘ननद’ बनकर मायके की दहलीज़ पर खड़ी हुई, तब उसे एहसास हुआ कि पल्लवी दीदी ने इन पाँच सालों में अपने सीने में कितना बड़ा पत्थर दबाकर रखा होगा! नेहा की आँखों से पछतावे के गर्म आँसू झर-झर बहने लगे। उसने देखा कि पल्लवी ने तो फिर भी कभी कार्तिक या माँ जी से उसकी शिकायत नहीं की, चुपचाप खुद को दूर कर लिया ताकि भाई का घर बसा रहे।

कुछ ही दिनों में रक्षाबंधन का त्यौहार आने वाला था। पिछले तीन सालों से पल्लवी राखी पर नहीं आ रही थी, वह कुरियर से राखी भेज देती थी। इस बार रक्षाबंधन से दो दिन पहले नेहा ने हिम्मत जुटाई और पल्लवी को फोन लगाया।

दूसरी तरफ से पल्लवी की शांत आवाज़ आई, “हेलो, हाँ नेहा बोलो, सब ठीक है न? माँ की तबियत तो ठीक है?”

नेहा का गला भर आया। वह कुछ पल बोल ही नहीं पाई। फिर अपनी सिसकी दबाते हुए बोली, “दीदी… मैं बहुत बुरी हूँ न? मुझे माफ कर दीजिए दीदी।”

पल्लवी चौंक गई, “अरे! क्या हुआ नेहा? तुम रो क्यों रही हो? कार्तिक से कुछ कहा-सुनी हुई क्या?”

नेहा फूट-फूटकर रो पड़ी, “नहीं दीदी, कार्तिक से नहीं, आज मेरी लड़ाई मेरे अपने ही ज़मीर से हुई है। दीदी, इस बार राखी डाक से मत भेजिएगा। मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करती हूँ कि आप कल ही देहरादून आ जाइए। सिर्फ कार्तिक को ही नहीं, मुझे और माँ जी को भी आपकी बहुत ज़रूरत है। मैंने अपने घमंड और नासमझी में आपसे आपका मायका छीन लिया दीदी… आज जब मैं खुद अपने मायके में मेहमान बनी, तब मुझे समझ आया कि मैंने आपके साथ कितना बड़ा अन्याय किया है।”

फोन के इस पार पल्लवी की आँखों से भी आँसू बह निकले। पाँच सालों से जो बर्फ उसके दिल पर जमी थी, वह नेहा के सच्चे पछतावे की धूप से पिघलने लगी थी। पल्लवी को समझते देर नहीं लगी कि वक्त ने नेहा को आईना दिखा दिया है। उसने बड़े शांत और स्नेहभरे स्वर में कहा, “पगली, रो मत। सुबह की पहली बस पकड़कर आ रही हूँ। मेरे और आरव के लिए आलू के पराठे बनाकर रखना।”

रक्षाबंधन की सुबह जब पल्लवी ने देहरादून वाले घर की दहलीज़ पर कदम रखा, तो नेहा दौड़ती हुई आई और पल्लवी के पैरों में झुक गई। पल्लवी ने उसे तुरंत ऊपर उठाया और कसकर अपने गले से लगा लिया। दोनों ननद-भाभी की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर ये आँसू दर्द के नहीं, बल्कि एक नए और पवित्र रिश्ते की शुरुआत के थे। नेहा ने आगे बढ़कर आरव को गोद में उठा लिया और उसका माथा चूमते हुए अपने आँचल से उसका चेहरा पोंछा।

सामने खड़े कार्तिक और शारदा जी की आँखें इस दृश्य को देखकर तृप्त हो गईं। घर का वह आँगन, जो सालों से अपनी बेटी की खिलखिलाहट को तरस रहा था, आज फिर से महक उठा था। पल्लवी ने नेहा के आँसू पोंछते हुए उसके कान में धीरे से कहा, “नेहा, जब तेरा मन अपने मायके जाने को करे और वहाँ जाने की हिम्मत न हो, तो समझ लेना कि पल्लवी दीदी का मेरठ वाला घर तेरा दूसरा मायका है। वहाँ तुझे कभी कोई पराया नहीं कहेगा।” यह सुनकर नेहा एक बार फिर अपनी ननद के सीने से लग गई।

दोस्तों, ज़िन्दगी का चक्र बहुत गोल है। हर लड़की को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि रिश्ते कभी एकतरफा नहीं होते। जो लड़की आज किसी के घर में ‘भाभी’ बनकर अधिकार जता रही है, वही लड़की अपने पिता के घर में किसी की ‘ननद’ भी होती है। किसी भी बेटी के लिए उसका मायका सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं होता, बल्कि उसके बचपन की यादों की धरोहर और उसके स्वाभिमान का कोना होता है। आपकी थोड़ी सी बेरुखी किसी बेटी से उसके माता-पिता का आँगन छीन सकती है। इसलिए अपनी ननद के साथ वैसा ही स्नेह और सम्मान का व्यवहार करें, जैसा आप अपने मायके में अपनी भाभी से उम्मीद करती हैं।

आपके विचार से एक लड़की का अपने मायके पर शादी के बाद कितना अधिकार रहता है? क्या आपने भी अपने आस-पास पल्लवी और नेहा जैसा कोई रिश्ता देखा है? अपने दिल की बात नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, आपके विचार किसी के टूटते रिश्ते को जोड़ सकते हैं!

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 लेखक : मुकेश पटेल

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