अफवाहों की आंधी

चित्रा ने आगे बढ़कर उंगली दिखाते हुए कहा, “तमाशा हम नहीं कर रहे कामिनी, तमाशा तो तुमने बनाया है शराफत का! सुबह मंदिर के बाहर खड़ी होकर बड़ा रोना रो रही थी न कि सिया किसी के साथ भाग गई? ये क्यों नहीं बताया कि तुम्हारे अपने सपूत ने सिया को अगवा किया था? अपने बेटे के काले कारनामों पर पर्दा डालने के लिए एक मासूम लड़की के चरित्र पर दाग लगा दिया तुमने? शर्म नहीं आई तुम्हें एक मां होकर दूसरी मां की कोख को बदनाम करते हुए?”

 चित्रा ने पल्लू संभालते हुए दरवाजा खोला तो सामने पड़ोस में रहने वाली सरला खड़ी थी। सरला की आंखों में एक अजीब सी चमक थी और सांसें तेजी से चल रही थीं, जैसे वह कोई बहुत बड़ा खजाना लूटकर लाई हो।

“अरे चित्रा बहन, तुम अभी तक रसोई में ही उलझी हो? बाहर दुनिया में क्या भूचाल आ गया है, तुम्हें कुछ खबर भी है या नहीं?” सरला ने अंदर कदम रखते ही अपनी आवाज को रहस्यमयी बनाते हुए पूछा।

चित्रा ने गैस की आंच धीमी की और हाथ पोंछते हुए बोली, “अरे ऐसा क्या हो गया सरला? सुबह-सुबह कौन सा भूचाल आ गया? सब ठीक तो है न?”

सरला ने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उसकी बात सुन न ले, और फिर सोफे पर बैठते हुए चटकारे लेकर बोली, “अरे वो अपने सी-ब्लॉक के कोने वाले मकान में जो गायत्री बहन और केशव भाईसाहब रहते हैं न? उनकी वो लाडली बेटी… क्या नाम है उसका… हां, सिया! सुना है कल रात से गायब है। घर छोड़कर भाग गई है किसी के साथ!”

चित्रा ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया और आंखें फैलाकर बोली, “हाय राम! क्या सच कह रही हो सरला? अरे गायत्री बहन तो अपनी सिया की तारीफ करते नहीं थकती थीं। जब देखो तब ‘मेरी सिया ने कॉलेज में टॉप किया’, ‘मेरी सिया तो आईएएस बनेगी’, ‘मेरी बेटी तो गाय जैसी सीधी है’… यही सब सुनाती रहती थीं। हमें तो ऐसे देखती थीं जैसे हमारे बच्चे तो कुछ हैं ही नहीं। अब कहां गए उनके वो ऊंचे संस्कार? डुबो दिया न लाडली ने पूरे खानदान का नाम!”

सरला ने हंसते हुए ताली बजाई और कहा, “और नहीं तो क्या चित्रा बहन! बड़े घर की बड़ी बातें। जितनी सीधी दिखती थी, उतनी ही तेज निकली। परसों से ही घर पर नहीं है। गायत्री बहन ने तो घर का दरवाजा ही बंद कर रखा है, किसी से मिल ही नहीं रही हैं। अरे भाई, जब बेटी ने मुंह दिखाने लायक छोड़ा ही नहीं, तो बाहर कैसे निकलेंगी!”

“पर ये खबर तुम्हें दी किसने? और भला वो किसके साथ भागी होगी?” चित्रा की उत्सुकता अब सातवें आसमान पर थी।

“अरे, पीछे वाली गली में जो गजेंद्र बाबू रहते हैं न, उनकी पत्नी कामिनी भाभी आज सुबह मंदिर के बाहर मिली थीं। वही बता रही थीं कि सिया का किसी आवारा लड़के के साथ चक्कर चल रहा था। कल शाम को किसी ने उसे शहर के बाहर हाईवे की तरफ किसी गाड़ी में जाते देखा है। कामिनी भाभी तो बड़ा अफसोस जता रही थीं कि बेचारे केशव भाईसाहब तो समाज में सिर उठाने लायक नहीं रहे,” सरला ने पूरे विश्वास के साथ अपनी बात रखी।

चित्रा के मन में अब उस टूटे हुए परिवार का तमाशा देखने की प्रबल इच्छा जाग उठी। उसने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोली, “चल सरला, हम भी चलकर देखते हैं। पड़ोसी होने के नाते हमारा भी तो फर्ज बनता है कि दुख की इस घड़ी में उनके घर जाएं। इसी बहाने थोड़ा पता भी चल जाएगा कि आखिर असल माजरा क्या है और लड़का कौन है। गायत्री बहन का उतरा हुआ चेहरा देखने लायक होगा आज!”

दोनों सहेलियां चेहरे पर नकली दुख और मन में असीम आनंद लिए गायत्री के घर की तरफ चल पड़ीं। रास्ते में उन्हें दो-चार और औरतें मिलीं, जिन्हें उन्होंने इशारों-इशारों में ही यह ‘ताजा खबर’ सुना दी। देखते ही देखते दबी जुबान में पूरी गली में सिया के चरित्र का पोस्टमार्टम होने लगा।

गायत्री के घर के बाहर सन्नाटा पसरा था। लोहे का मुख्य फाटक बंद था। चित्रा ने आगे बढ़कर जोर-जोर से कुंडी खटखटाई। दो-तीन मिनट बाद दरवाजा खुला। सामने सिया के पिता केशव जी खड़े थे। एक ही रात में जैसे उनकी उम्र दस साल बढ़ गई थी। आंखें सूजी हुई थीं, बाल बिखरे थे और कंधे झुके हुए थे।

“नमस्ते भाईसाहब… वो हम जरा गायत्री बहन से मिलने आए थे। सब कुशल मंगल तो है न? सुबह से घर का दरवाजा बंद देखा तो चिंता हो गई,” सरला ने अपनी आवाज में शहद और हमदर्दी घोलते हुए कहा।

केशव जी ने एक गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर दर्द और बेबसी साफ झलक रही थी। वे बस इतना ही बोल पाए, “हां… गायत्री अंदर ही है। आ जाइए आप लोग।”

वे बिना कुछ और कहे साइड हट गए। चित्रा और सरला ने एक-दूसरे को कुटिल मुस्कान के साथ देखा, मानो कह रही हों कि ‘देखा, बात एकदम पक्की है, तभी तो भाईसाहब नजरें नहीं मिला पा रहे।’

दोनों जैसे ही बैठक पार करके अंदर के आंगन में पहुंचीं, उनके बढ़ते कदम वहीं ठिठक गए। दोनों की आंखें फटी की फटी रह गईं और चेहरे की वो कुटिल मुस्कान अचानक हवा हो गई।

आंगन के कोने में रखे तख्त पर सिया अधलेटी अवस्था में बैठी थी। उसके सिर पर सफेद पट्टी बंधी थी, जिस पर खून के धब्बे अब सूखकर काले पड़ चुके थे। उसके बाएं हाथ में प्लास्टर चढ़ा था और दाहिने गाल पर गहरे खरोंच के निशान थे। उसकी मां गायत्री पास ही बैठकर अपने कांपते हाथों से उसे दलिया खिलाने की कोशिश कर रही थी, और सिया की आंखों से बिना रुके आंसू बह रहे थे।

चित्रा और सरला को तो जैसे सांप सूंघ गया। जिस लड़की के भाग जाने की खबर पर वे ताली पीट रही थीं, वह तो उनके सामने लहूलुहान हालत में बैठी थी।

“हे भगवान! गायत्री बहन… ये सब क्या है? सिया को इतनी चोट कैसे लगी? क्या कोई एक्सीडेंट हो गया है?” चित्रा के मुंह से घबराहट में शब्द निकले।

गायत्री ने अपनी भीगी हुई आंखें उठाकर उन दोनों की तरफ देखा। उनकी आंखों में दुख के साथ-साथ एक अजीब सा तेज और गर्व भी था। उन्होंने सिया के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “एक्सीडेंट नहीं हुआ है चित्रा बहन, मेरी बेटी शेरनी की तरह मौत और दरिंदगी के मुंह से अपनी आबरू बचाकर वापस लौटी है। मेरी सिया ने आज मेरा और अपने पिता का सिर झुकने नहीं दिया, बल्कि गर्व से ऊंचा कर दिया है।”

मां के ये शब्द सुनते ही सिया फूट-फूटकर रो पड़ी और अपनी मां के गले लग गई। केशव जी भी वहीं दरवाजे के पास दीवार के सहारे खड़े होकर अपनी आंखें पोंछने लगे।

सरला और चित्रा को अपने किए पर काटो तो खून नहीं। उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे क्या बोलें। गायत्री ने सिया को शांत कराया और उसे सहारा देकर अंदर कमरे में लिटा दिया। जब वह बाहर आईं, तो चित्रा से रहा नहीं गया। उसने हाथ जोड़कर धीमी आवाज में पूछा, “बहन, हमें माफ करना, पर सच में हुआ क्या है? मोहल्ले में तो लोग पता नहीं क्या-क्या अनाप-शनाप बातें बना रहे हैं…”

गायत्री ने अपने आंसू पोंछे और उनकी आवाज में एक कठोरता आ गई। वह बोलीं, “जानती हूं चित्रा बहन, कौन क्या बातें बना रहा है। पीछे गली के गजेंद्र बाबू की पत्नी कामिनी ने ही पूरी कॉलोनी में यह जहर फैलाया है न कि मेरी सिया किसी लड़के के साथ भाग गई है?”

सरला और चित्रा के चेहरे का रंग उड़ गया। दोनों ने नजरें झुका लीं।

गायत्री ने आगे बताना शुरू किया, “सच तो यह है कि गजेंद्र बाबू का वो नालायक और आवारा बेटा विक्की पिछले दो महीनों से मेरी सिया को परेशान कर रहा था। सिया जब भी कोचिंग जाती, वह उसका पीछा करता, उस पर दोस्ती करने का दबाव बनाता। सिया ने उसे कई बार डांटा और साफ मना कर दिया। हमने सोचा था कि लड़का समझ जाएगा, बात बढ़ाने से क्या फायदा। लेकिन हमारी वही चुप्पी हमारी बेटी पर भारी पड़ गई।”

गायत्री का गला रुंध गया, पर उन्होंने खुद को संभाला और बोलीं, “कल शाम जब सिया कोचिंग से लौट रही थी, तो अंधेरे का फायदा उठाकर विक्की और उसके दो दोस्तों ने अपनी कार से सिया को अगवा कर लिया। उन्होंने सिया के मुंह पर कपड़ा बांध दिया और उसे शहर के बाहर एक सुनसान पुरानी फैक्ट्री में ले गए। विक्की अपनी अमीरी के नशे में चूर होकर मेरी बेटी की जिंदगी तबाह करना चाहता था। लेकिन मेरी बेटी डरी नहीं। जब विक्की ने उसके करीब आने की कोशिश की, तो सिया ने पास पड़े लोहे के एक टुकड़े से उसके सिर पर वार किया और वहां से भाग निकली। अंधेरे में भागते हुए वह पहली मंजिल की टूटी हुई सीढ़ियों से नीचे गिर पड़ी, जिससे उसका हाथ टूट गया और सिर फट गया। फिर भी वह हिम्मत करके लहूलुहान हालत में मुख्य सड़क तक रेंगते हुए पहुंची। वहां एक भले ऑटो वाले भाई ने उसे देखा और अस्पताल पहुंचाया। हम पूरी रात अस्पताल और पुलिस थाने में थे, और इधर विक्की की मां कामिनी ने अपने बेटे के जघन्य अपराध को छुपाने के लिए मोहल्ले में मेरी ही बेटी के चरित्र पर कीचड़ उछाल दिया, ताकि अगर सिया वापस आकर कुछ कहे भी, तो समाज उसे ही झूठा और चरित्रहीन समझे!”

यह पूरी दास्तान सुनकर सरला और चित्रा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें अपने आप से घिन आने लगी। वे दोनों भी तो बिना सच जाने एक मासूम और बहादुर लड़की के दुख का तमाशा देखने आई थीं।

सरला की आंखों से पछतावे के आंसू बह निकले। उसने आगे बढ़कर गायत्री के दोनों हाथ पकड़ लिए और रोते हुए बोली, “मुझे माफ कर दो गायत्री बहन! मैं बहुत बड़ी पापी हूं। मैंने भी कामिनी की बातों में आकर तुम्हारी फूल सी बच्ची के बारे में बुरा सोचा। हम औरतें ही औरतों की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती हैं। बिना सच जाने किसी की इज्जत की धज्जियां उड़ाना हमारे लिए बस टाइमपास होता है। पर अब और नहीं! तुम्हारी बेटी ने अकेले उन दरिंदों से लड़ाई लड़ी है, अब उसके सम्मान की लड़ाई हम सब मिलकर लड़ेंगे।”

चित्रा के भीतर भी जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा था। उसने अपने आंसू पोंछे और कड़क आवाज में कहा, “सरला बिल्कुल ठीक कह रही है। कामिनी ने क्या सोचा था कि वह अपने गुंडे बेटे को घर में छुपा लेगी और एक शरीफ लड़की को बदनाम करके बच जाएगी? गायत्री बहन, आप सिया का ध्यान रखो। आज उस कामिनी और उसके परिवार को हम बताएंगे कि एक बेटी की इज्जत क्या होती है!”

सरला और चित्रा जब गायत्री के घर से बाहर निकलीं, तो उनके कदमों में तमाशा देखने की चंचलता नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ एक चट्टानी इरादा था। उन्होंने गली के बाहर खड़ी उन सभी औरतों को इकट्ठा किया जिन्हें थोड़ी देर पहले उन्होंने ही अफवाह सुनाई थी।

सरला ने सबके सामने हाथ जोड़कर ऊंची आवाज में कहा, “बहनो! आज सुबह मैंने जो कुछ भी सिया के बारे में कहा, वह सब एक बहुत बड़ा झूठ था, एक पाप था। सिया कहीं भागी नहीं है, बल्कि गजेंद्र बाबू के बेटे विक्की ने उसका अपहरण किया था और वह बहादुर बच्ची अपनी इज्जत बचाकर, अपने हाथ-पैर तुड़वाकर घर लौटी है। और उस विक्की की मां कामिनी ने अपने बेटे को बचाने के लिए सिया को बदनाम करने की साजिश रची है। आज अगर हम चुप रहे, तो कल हमारी बेटियां भी सुरक्षित नहीं रहेंगी!”

सच्चाई सुनते ही मोहल्ले की सभी औरतों और पुरुषों में आक्रोश की लहर दौड़ गई। शर्म और गुस्से से भरे दर्जनों लोग सरला और चित्रा के नेतृत्व में गजेंद्र बाबू के आलीशान मकान के बाहर जमा हो गए।

“कामिनी! बाहर निकलो! अपने दरिंदे बेटे को बाहर निकालो!” सरला ने गेट पीटते हुए दहाड़ लगाई।

भीड़ का शोर सुनकर कामिनी और गजेंद्र बाबू घबराते हुए बालकनी में आए। कामिनी ने अभी भी अकड़ दिखाते हुए कहा, “ये क्या बदतमीजी है? सुबह-सुबह हमारे घर के बाहर तमाशा क्यों कर रही हो तुम सब?”

चित्रा ने आगे बढ़कर उंगली दिखाते हुए कहा, “तमाशा हम नहीं कर रहे कामिनी, तमाशा तो तुमने बनाया है शराफत का! सुबह मंदिर के बाहर खड़ी होकर बड़ा रोना रो रही थी न कि सिया किसी के साथ भाग गई? ये क्यों नहीं बताया कि तुम्हारे अपने सपूत ने सिया को अगवा किया था? अपने बेटे के काले कारनामों पर पर्दा डालने के लिए एक मासूम लड़की के चरित्र पर दाग लगा दिया तुमने? शर्म नहीं आई तुम्हें एक मां होकर दूसरी मां की कोख को बदनाम करते हुए?”

कामिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी, “नहीं… वो… तुम लोगों को कोई गलतफहमी हुई है… मेरा विक्की तो कल से अपने मामा के घर गया हुआ है…”

“झूठ मत बोलो!” भीड़ में से एक बुजुर्ग ने चिल्लाकर कहा, “अभी रात को ही मैंने तुम्हारे बेटे को सिर पर पट्टी बांधे पीछे के दरवाजे से घर में घुसते देखा है!”

इतने में ही पुलिस की दो गाड़ियां सायरन बजाती हुई गली में दाखिल हुईं। केशव जी की एफआईआर पर पुलिस की टीम पहले ही जांच कर रही थी और अब मोहल्ले के लोगों के घेराव ने पुलिस का काम और आसान कर दिया था। महिला पुलिसकर्मियों के साथ इंस्पेक्टर ने गजेंद्र बाबू के घर की तलाशी ली और स्टोर रूम में छुपे बैठे विक्की को कॉलर पकड़कर घसीटते हुए बाहर निकाला। उसके सिर पर सिया के किए वार का घाव साफ दिख रहा था, जो उसके जुर्म की गवाही दे रहा था।

अपराधी को छुपाने, सबूत मिटाने और पीड़िता की छवि खराब करने की साजिश रचने के जुर्म में पुलिस ने विक्की के साथ-साथ गजेंद्र बाबू और कामिनी को भी हिरासत में ले लिया। जिस कामिनी ने सुबह दूसरी की बेटी को बदनाम कर समाज में सिर झुकाने की बात कही थी, आज वह खुद अपना मुंह दुपट्टे से छुपाकर पुलिस की जीप में बैठ रही थी, और पूरा मोहल्ला उन पर थूक रहा था।

शाम को जब सरला और चित्रा मोहल्ले की अन्य महिलाओं के साथ फल और फूल लेकर सिया से मिलने पहुंचीं, तो माहौल पूरी तरह बदल चुका था। सरला ने सिया के माथे को चूमते हुए कहा, “बेटा, हमें माफ कर दे। तूने सिर्फ उन गुंडों को ही नहीं हराया, बल्कि हमारी जैसी औरतों की छोटी और सड़ी हुई मानसिकता को भी तमाचा मारा है। हमें तुझ पर गर्व है।”

सिया के मुरझाए हुए चेहरे पर कई घंटों बाद एक शांत और विजयी मुस्कान खिल उठी।

कुछ ही महीनों में सिया के घाव भर गए और उसने दोगुने उत्साह के साथ अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी। उस घटना ने केवल सिया को ही मजबूत नहीं बनाया था, बल्कि ‘सरस्वती विहार’ कॉलोनी की हर महिला को यह सिखा दिया था कि किसी भी बेटी के बारे में कोई भी राय बनाने से पहले सच जानना कितना जरूरी है। अब वहां की चौपालों पर बेटियों की बुराई नहीं, बल्कि सिया की बहादुरी की मिसालें दी जाती थीं।

क्या आपके आस-पास भी ऐसे लोग हैं जो बिना सच जाने दूसरों के घरों की बेटियों पर उंगली उठाते हैं? इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय है, और सरला व चित्रा के बदलाव को आप किस नजर से देखते हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें!

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