जानते हो विहान, मेरे सारे संदेह तब धुल गए जब मैंने अनुराधा की आंखों में तुम्हारे लिए छलकती हुई पवित्रता को देखा। अगर उसके मन में कोई चोर होता, कोई अपराधबोध होता, तो वह तुम्हारा जिक्र मुझसे छुपाती। लेकिन उसने जिस निडरता, जिस बेबाकी और जिस आत्मसम्मान के साथ अपने अतीत के इस हिस्से को मेरे सामने रखा, उसने मेरे दिल में अनुराधा के लिए इज्जत को सौ गुना बढ़ा दिया। उसने मुझे समझाया कि जीवन में हर लगाव का मतलब पा लेना नहीं होता, और हर परवाह के पीछे कोई स्वार्थ नहीं होता।”
अनुराधा रसोई में अदरक वाली चाय का पानी चढ़ाकर अपने गीले हाथों को आंचल से पोंछ ही रही थी कि अचानक डोरबेल की तीखी आवाज ने घर की शांति को भंग किया।
“लगता है कूरियर वाला होगा, सिद्धार्थ ने कोई किताब मंगाई होगी,” खुद से बड़बड़ाते हुए अनुराधा ने अपने बालों की बिखरी लटों को कान के पीछे समेटा और दरवाजे की तरफ बढ़ी।
चटखनी गिराकर जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने खड़े शख्स को देखकर उसके हाथ दरवाजे के हैंडल पर ही जम गए। सामने नीली शर्ट और खाकी ट्राउजर पहने, कंधे पर एक लैपटॉप बैग टांगे एक सौम्य और आकर्षक व्यक्तित्व वाला युवक खड़ा था। आंखों पर बारीक फ्रेम का चश्मा और होंठों पर वही पुरानी, शांत और निश्छल मुस्कान। अनुराधा की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। वह कुछ बोलने के लिए होंठ हिलाती, उससे पहले ही उस युवक ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ते हुए कहा, “नमस्ते… मैं विहान। और अगर मेरी याददाश्त मुझे धोखा नहीं दे रही, तो आप अनुराधा ही हैं, है ना?”
‘विहान’—यह नाम सुनते ही जैसे समय का पहिया उल्टा घूम गया। अनुराधा के चेहरे पर अचानक आई घबराहट, खुशी और संकोच के मिले-जुले भाव साफ पढ़े जा सकते थे। उसने तुरंत खुद को संभाला और शिष्टाचार निभाते हुए दरवाजे से एक तरफ हटकर कहा, “अरे विहान! तुम… यहाँ? अंदर आओ न, दरवाजे पर क्यों खड़े हो?”
विहान मुस्कुराता हुआ अंदर आया और ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठ गया। अनुराधा भी सामने वाली कुर्सी पर बैठी तो जरूर, लेकिन उसका मन इस वक्त पुणे के इस फ्लैट में नहीं, बल्कि आज से पंद्रह साल पीछे देहरादून की उन ठंडी वादियों और देवदार के पेड़ों से घिरी कॉलोनी में पहुंच चुका था।
यादों की परतें एक-एक कर खुलने लगीं। देहरादून की उस सरकारी कॉलोनी में अनुराधा के पिता एक साधारण क्लर्क थे, जबकि कॉलोनी के ठीक सामने वाले बड़े बंगले में विहान का परिवार रहता था। विहान के पिता शहर के जाने-माने सर्जन थे। पैसे, रुतबे और रहन-सहन में जमीन-आसमान का फर्क था, लेकिन बचपन की दोस्ती इन दुनियावी हिसाब-किताब से कहां वाकिफ होती है!
विहान अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। बेहद मेधावी, शांत और थोड़ा अंतर्मुखी। शाम होते ही कॉलोनी के सारे बच्चे बैडमिंटन खेलने या साइकिल चलाने इकट्ठा होते थे। अनुराधा को आज भी वह मंजर साफ याद था—जब भी साइकिल रेस होती या फिर ‘पिट्ठू’ का खेल होता, विहान हमेशा किसी न किसी बहाने से अनुराधा को अपनी टीम में रखता। पिट्ठू के खेल में जब विरोधी टीम के बच्चे तेज गेंद मारकर अनुराधा को आउट करने की कोशिश करते, तो विहान ढाल बनकर आगे आ जाता और गेंद अपने पीठ पर झेल लेता।
एक बार की बात तो अनुराधा के जहन में पत्थर की लकीर की तरह छपी थी। आठवीं कक्षा की गर्मियों की छुट्टियां थीं। कॉलोनी के पीछे वाले बगीचे में कच्ची कैरियां तोड़ने के चक्कर में माली काका ने बच्चों को दौड़ा लिया था। सारे बच्चे भाग निकले, लेकिन अनुराधा की चप्पल टूट गई और वह वहीं गिर पड़ी। माली काका की डांट के डर से वह रोने ही वाली थी कि विहान भागते-भागते वापस मुड़ा। उसने न सिर्फ अनुराधा को उठाया, बल्कि माली काका के सामने हाथ जोड़कर सारा इल्जाम अपने सिर ले लिया और अपनी जेबखर्च के पैसे देकर काका का गुस्सा शांत किया। फिर अपनी साइकिल पर बिठाकर अनुराधा को उसके घर के गेट तक छोड़ा।
अनुराधा कभी समझ नहीं पाई थी कि पूरी कॉलोनी में इतनी लड़कियां और दोस्त होने के बावजूद विहान की नजरें हमेशा उसकी सुरक्षा को लेकर इतनी सतर्क क्यों रहती थीं। न विहान ने कभी कुछ कहा, न अनुराधा ने कभी पूछा। बस एक अनकहा सा विश्वास था, एक कोमल सी भावना थी जो दोनों के दिलों में चुपचाप सांस ले रही थी। जब भी विहान आस-पास होता, अनुराधा को लगता जैसे कोई अदृश्य सुरक्षा कवच उसके चारों ओर लिपटा हुआ है।
लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, बचपन की मासूमियत पर समाज की मर्यादाओं और पारिवारिक हैसियत की परतें चढ़ने लगीं। दसवीं कक्षा में आते-आते अनुराधा की मां ने उसे टोकना शुरू कर दिया था, “अन्नू, अब तू बड़ी हो गई है। बड़े लोगों के लड़कों से ज्यादा घुलना-मिलना ठीक नहीं होता। लोग सौ बातें बनाते हैं।”
धीरे-धीरे अनुराधा का घर से बाहर निकलना कम हो गया। उधर विहान भी ग्यारहवीं में साइंस लेकर अपनी पढ़ाई और कोचिंग में व्यस्त हो गया। अब मुलाकातें सिर्फ छत से या स्कूल जाते वक्त रास्ते में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देने तक सीमित रह गई थीं। फिर एक दिन सुबह उठने पर पता चला कि विहान के पिता ने दिल्ली में अपना बड़ा अस्पताल खोल लिया है और उनका पूरा परिवार हमेशा के लिए देहरादून छोड़कर जा चुका है।
उस दिन अनुराधा ने अपनी छत के कोने में बैठकर घंटों आंसू बहाए थे। न कोई फोन नंबर था, न कोई पता, और न ही उस दौर में सोशल मीडिया का कोई चलन। एक कहानी शुरू होने से पहले ही अधूरी छूट गई थी।
“अनुराधा जी? कहां खो गईं आप?” विहान की खनकती हुई आवाज ने अनुराधा की तंद्रा भंग की।
अनुराधा ने झेंपते हुए अपने गालों को छुआ, गनीमत थी कि आंखों की नमी पलकों से बाहर नहीं आई थी। “कहीं नहीं… बस यूं ही पुरानी बातें याद आ गईं। तुम बैठो, मैं पानी और चाय लेकर आती हूं। वैसे, आज अचानक इतने सालों बाद यहां का रास्ता कैसे भूल गए?” अनुराधा ने सहज होने की पूरी कोशिश करते हुए पूछा।
“मैं पिछले महीने ही कंपनी के काम से पुणे शिफ्ट हुआ हूं। कल बैंक में तुम्हारे पापा के एक पुराने कलीग शर्मा अंकल मिल गए। उन्हीं से बातों-बातों में पता चला कि तुम भी इसी शहर में हो और इसी सोसाइटी में रहती हो। बस, खुद को रोक नहीं पाया और चला आया,” विहान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
अनुराधा मुस्कुराती हुई रसोई में गई। वहां चाय छानते हुए उसने बेडरूम का दरवाजा खटखटाया और अपने पति सिद्धार्थ को आवाज दी, “सिद्धार्थ, जरा बाहर आइए न, देखिए कौन आया है।”
कुछ ही पलों में अनुराधा हाथों में चाय और नाश्ते की ट्रे लिए बाहर आई, और उसके पीछे-पीछे सिद्धार्थ भी ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। अनुराधा ने ट्रे मेज पर रखते हुए बड़े गर्व और सहजता से परिचय कराया, “सिद्धार्थ, ये विहान है… देहरादून वाला मेरा वही बचपन का दोस्त, और विहान, ये मेरे पति सिद्धार्थ हैं, यहां एक आईटी फर्म में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं।”
‘विहान’ नाम सुनते ही सिद्धार्थ के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान खिल उठी। उसने आगे बढ़कर विहान से सिर्फ हाथ ही नहीं मिलाया, बल्कि उसे गर्मजोशी से गले लगा लिया।
“अरे भाई विहान! आखिर आज तुम्हारे दर्शन हो ही गए। सच कहूं तो अनुराधा के मुंह से तुम्हारा नाम इतनी बार सुना है कि मुझे लगता ही नहीं कि मैं तुमसे पहली बार मिल रहा हूं। ऐसा लगता है जैसे तुम हमारे ही घर के कोई सदस्य हो जो बस कहीं बाहर गए हुए थे,” सिद्धार्थ की आवाज में गजब का अपनापन था।
विहान थोड़ा संकोच में पड़ गया, “अच्छा? अनुराधा ने मेरे बारे में क्या बताया?”
सिद्धार्थ सोफे पर बैठते हुए हंस पड़ा और माहौल को हल्का बनाते हुए बोला, “क्या नहीं बताया ये पूछो भाई! जब भी देहरादून का जिक्र होता है, या बारिश में कागज की नाव बनाने की बात आती है, या फिर साइकिल की चेन उतरने का किस्सा होता है—हर कहानी का हीरो विहान ही होता है। तुम्हारी बातें करते वक्त अनुराधा की आंखों में जो चमक, जो सुकून और जो गर्व दिखता है न, वो मैंने किसी और दोस्त के जिक्र पर कभी नहीं देखा।”
अनुराधा ने कृत्रिम गुस्से से सिद्धार्थ की तरफ देखते हुए कहा, “बस भी कीजिए सिद्धार्थ, आप तो शुरू ही हो जाते हैं। चाय ठंडी हो रही है, विहान चाय लो।”
सिद्धार्थ ने चाय का कप उठाते हुए अपनी चुटकी जारी रखी, “देख रहे हो विहान? कैसे मेरी बात काट रही है। मैं तो अक्सर इसे छेड़ता रहता हूं कि अन्नू, तुम बड़ी मतलबी हो! बचपन में तुम्हारे इतने सारे दोस्त थे—नेहा, गौरव, पिंकी… लेकिन तुम्हें सबसे ज्यादा याद विहान की ही आती है। क्योंकि वो तुम्हारा सारा होमवर्क कर देता था, तुम्हें खेल में आउट होने से बचाता था और तुम्हारी हर गलती अपने सिर ले लेता था। कहीं तुम्हारी ये दोस्ती विशुद्ध रूप से स्वार्थ और मतलब पर तो नहीं टिकी थी?”
सिद्धार्थ की इस बात पर विहान ठहाका लगाकर हंस पड़ा और अनुराधा के गाल शर्म से गुलाबी हो गए। घर का माहौल, जो कुछ देर पहले अतीत के बोझ से थोड़ा गंभीर हो रहा था, अचानक बेहद खुशनुमा और सहज हो गया।
चाय की चुस्कियों के बीच सिद्धार्थ के चेहरे के भाव धीरे-धीरे शांत और गंभीर हो गए। उसने कप मेज पर रखा और बहुत ही संजीदगी से विहान की आंखों में देखते हुए कहा, “मजाक अपनी जगह है विहान भाई, लेकिन आज तुम सामने बैठे हो तो अपने दिल की एक बात जरूर कहना चाहूंगा। हमारी शादी के शुरुआती दिनों में जब अनुराधा ने मुझे तुम्हारे बारे में बताना शुरू किया था, तो एक सामान्य पति की तरह मेरे मन में भी कई सवाल उठे थे। मुझे लगा था कि कहीं ये किशोरावस्था का वह पहला आकर्षण तो नहीं जिसे लोग पहला प्यार कहते हैं? या फिर शायद तुम दोनों के बीच कोई ऐसी भावना थी जो उस उम्र की नासमझी और पारिवारिक बंदिशों के चलते कभी जुबान पर आ ही न सकी हो।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा पसर गया। अनुराधा की धड़कनें तेज हो गईं, उसने नजरें झुका लीं। विहान भी अपलक सिद्धार्थ को देख रहा था।
सिद्धार्थ ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “लेकिन जानते हो विहान, मेरे सारे संदेह तब धुल गए जब मैंने अनुराधा की आंखों में तुम्हारे लिए छलकती हुई पवित्रता को देखा। अगर उसके मन में कोई चोर होता, कोई अपराधबोध होता, तो वह तुम्हारा जिक्र मुझसे छुपाती। लेकिन उसने जिस निडरता, जिस बेबाकी और जिस आत्मसम्मान के साथ अपने अतीत के इस हिस्से को मेरे सामने रखा, उसने मेरे दिल में अनुराधा के लिए इज्जत को सौ गुना बढ़ा दिया। उसने मुझे समझाया कि जीवन में हर लगाव का मतलब पा लेना नहीं होता, और हर परवाह के पीछे कोई स्वार्थ नहीं होता।”
सिद्धार्थ ने उठकर विहान के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, “समाज की दिक्कत यह है विहान, कि वह स्त्री और पुरुष के हर रिश्ते को या तो भाई-बहन के खांचे में फिट करना चाहता है, या फिर प्रेमी-प्रेमिका के। लेकिन इन दोनों से परे भी एक रिश्ता होता है—रूहानी सम्मान और निस्वार्थ परवाह का रिश्ता। तुम दोनों का रिश्ता बिल्कुल वैसा ही है—एकदम पाक, साफ और किसी भी नाम या लेबल का मोहताज नहीं। मैं तुम दोनों के इस बेनाम रिश्ते का तहे दिल से सम्मान करता हूं, और मुझे खुशी है कि अनुराधा के बचपन में तुम्हारे जैसा एक दोस्त था।”
सिद्धार्थ के इन शब्दों ने जैसे हवा में घुलकर पूरे कमरे को महका दिया। विहान की आंखें भर आईं। उसने सिद्धार्थ के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और रुंधे गले से कहा, “सिद्धार्थ भाई, देहरादून छोड़ते वक्त मेरे मन में हमेशा एक कसक थी कि पता नहीं अनुराधा को जीवन में वैसा सम्मान और सुरक्षा मिलेगी या नहीं, जैसी वह हकदार है। आज आपसे मिलकर मेरे दिल का वह आखिरी बोझ भी उतर गया। अनुराधा वाकई बहुत खुशनसीब है जो उसे आपके जैसा सुलझा हुआ और बड़े दिल वाला जीवनसाथी मिला।”
दूसरी तरफ खड़ी अनुराधा की आंखों से खुशी और गर्व के आंसू छलक पड़े। एक स्त्री के लिए इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है कि उसका जीवनसाथी न केवल उसके वर्तमान को अपनाए, बल्कि उसके अतीत की पवित्र स्मृतियों को भी पूरे मान-सम्मान के साथ अपने हृदय में स्थान दे। आज सिद्धार्थ का कद अनुराधा की नजरों में आसमान से भी ऊंचा हो गया था।
उस शाम पुणे के उस घर में सिर्फ तीन लोग नहीं बैठे थे, बल्कि वहां विश्वास, सम्मान और दोस्ती की एक नई इबारत लिखी जा रही थी—जो यह साबित कर रही थी कि कुछ रिश्ते बेनाम होकर भी दुनिया के हर नाम से बड़े होते हैं।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा दोस्त रहा है जिसके साथ आपका रिश्ता किसी नाम का मोहताज नहीं था? और क्या आज के दौर में पति-पत्नी के बीच सिद्धार्थ और अनुराधा जैसी पारदर्शिता और समझ होना जरूरी है? अपनी राय और अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
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मूल लेखिका : संध्या त्रिपाठी