मैंने और अनुराग ने तय कर लिया था कि चाहे राहुल-मोनिका हमें कितना भी भला-बुरा कहें, हम चाची का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। हम उनके लिए वह सहारा बन गए थे, जो डूबते हुए इंसान को एक तिनका देता है। लेकिन सच तो यह था कि वह तिनका सिर्फ संबल था; तैरने की असली ताकत तो कल्याणी चाची के अपने भीतर थी।
एक दिन अचानक चाची की तबीयत बहुत बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार था और वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। उन्होंने गले की सारी ताकत बटोरकर अपने पोते-पोती को आवाज दी, “अरे चिंटू… बेटा जरा एक गिलास पानी दे जा… गुडिया, सुनती है बेटा?”
सफेद चादर से ढके उस वीरान से कमरे में धूप की एक पतली सी लकीर खिड़की की जाली चीरकर फर्श पर गिर रही थी। गंगाधर जी के जाने को आज पूरे बारह दिन बीत चुके थे। कल उनकी तेरहवीं थी और आज शांति पाठ के नाम पर घर के आंगन में सन्नाटा पसरा हुआ था। कल्याणी देवी दीवार से पीठ टिकाए शून्य में ताक रही थीं। उनके हाथों की कांपती उंगलियां अपनी सफेद सूती साड़ी के पल्लू को बार-बार कसकर पकड़ लेतीं, मानो उसी सूत के सहारे बची-खुची जिंदगी को थामे रखने की कोशिश कर रही हों।
कानपुर की उस पुरानी, शांत कॉलोनी में बना वह दोमंजिला पुश्तैनी मकान गंगाधर जी ने अपनी पूरी जवानी निचोड़कर खड़ा किया था। सिंचाई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए थे। ईमानदारी की कमाई से ईंट-ईंट जोड़कर बनाया गया यह आशियाना कभी खुशियों का मंदिर हुआ करता था, लेकिन आज वही मकान कल्याणी देवी के लिए एक घुटन भरी कालकोठरी बन चुका था।
कहने को तो उसी घर के ऊपरी माले पर उनका इकलौता बेटा राहुल, बहू मोनिका और दो किशोर पोते-पोती रहते थे। देखने वालों को लगता कि भरा-पूरा परिवार है, लेकिन हकीकत यह थी कि उस छत के नीचे मां-बाप के हिस्से सिर्फ अपमान, तिरस्कार और नफरत ही आई थी। राहुल और मोनिका ने कभी माता-पिता को माता-पिता समझा ही नहीं। जब पौधे की जड़ों में ही जहर घुल जाए, तो शाखाओं से मिठास की उम्मीद कैसे की जा सकती थी? बच्चे भी अपने माता-पिता के नक्शेकदम पर चलकर अपने दादा-दादी को फालतू सामान की तरह देखने लगे थे।
गंगाधर जी जब तक जीवित थे, उन्होंने इस अपमान के घूंट को चुपचाप पीया। लेकिन बहू-बेटे की ज्यादतियां हर दिन सीमाएं लांघती थीं। कभी जब बुजुर्ग दम्पति शाम को किसी काम से बाहर निकलते, तो मोनिका चुपके से नीचे आकर उनके कमरे का पंखा या लाइट तोड़ देती, कभी फर्श पर गंदा पानी फैला देती। बाथरूम से साबुन, बाल्टी और जरूरी सामान गायब कर देना तो रोज का नियम था। वे दोनों बुजुर्ग अलग चूल्हा जलाते थे, क्योंकि ऊपर के रसोईघर से उन्हें साफ कह दिया गया था कि उनका खाना वहां नहीं बनेगा। हद तो तब हो गई जब एक दिन कल्याणी देवी ने दाल बनाई और मंदिर में दीया जलाने चली गईं। पीछे से मोनिका ने रसोई में जाकर उस दाल में कोई बदबूदार कीटनाशक पाउडर मिला दिया।
जब कल्याणी देवी थाली लगाने लगीं, तो गंगाधर जी ने दाल की गंध सूंघते ही उनका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने धीरे से कहा था, “कल्याणी, इसे मत छूना। इसमें कुछ मिलाया गया है। हमारी सांसे अब इन पर भारी पड़ रही हैं।” गंगाधर जी चुपचाप उस पूरी दाल को ले जाकर बाहर गटर में बहा आए थे। उस रात दोनों बुजुर्ग बिना कुछ खाए, घूंट-घूंट पानी पीकर भूखे पेट सो गए थे।
ये सारी बातें मुझे कैसे पता? मेरा नाम शालिनी है। मैं उसी गली में ठीक सामने वाले मकान में रहती हूं। कल्याणी देवी अक्सर सुबह जब पास के पार्क या शिव मंदिर की ओर कांपते कदमों से निकलती थीं, तो मैं जानबूझकर उनके साथ हो लेती थी। वे मेरा हाथ थाम लेतीं और उनकी पथराई आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ता। वे अपने दिल का सारा गुबार मुझसे कह देती थीं। सच कहूं तो एक पड़ोसी होने के नाते मेरे हाथ बंधे थे। जब अपने ही औलाद जल्लाद बन जाए, तो कोई बाहरी इंसान उनके निजी मामले में कितना दखल दे सकता है?
और अब जब गंगाधर जी का साया भी कल्याणी देवी के सिर से उठ चुका था, तो उनका अकेलापन किसी भयानक खाई की तरह गहरा हो गया था।
शांति पाठ की उस शाम जब रिश्तेदार औपचारिकता निभाकर जा चुके थे, मैं कल्याणी चाची से मिलने उनके नीचे वाले कमरे में गई। वे बिस्तर के कोने पर सिमटी बैठी थीं। मुझे देखते ही उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और फफक पड़ीं।
“शालिनी बेटा… अब मैं इस घर में कैसे जिऊंगी? आज राहुल आया था। कह रहा था कि पिताजी की पेंशन अब बंद हो जाएगी, अगर मैं कुछ कागजों पर दस्तखत कर दूं तो वह पेंशन सीधे उसके खाते में ट्रांसफर करवा लेगा। कह रहा था कि आप इस बुढ़ापे में बैंक के धक्के क्यों खाएंगी, मैं हर महीने आपको नकद लाकर दे दिया करूंगा। बेटा, क्या सच में ऐसा होता है?”
उनकी मासूमियत और बेबसी देखकर मेरा कलेजा कांप गया। मैं अच्छी तरह समझती थी कि राहुल की नीयत क्या है। वह अपनी मां को बेसहारा बनाकर उनकी पारिवारिक पेंशन पूरी तरह हड़पना चाहता था। अगर कल्याणी चाची के हाथ से वह आखिरी आर्थिक सहारा भी छिन जाता, तो ये लोग उन्हें दो वक्त की सूखी रोटी के लिए भी मोहताज कर देते।
मैंने उनका हाथ थामकर दृढ़ता से कहा, “चाची, किसी भी कागज पर दस्तखत मत कीजिएगा। चाहे कुछ भी हो जाए। पेंशन आपके नाम पर आएगी और आपके ही खाते में रहेगी।”
उस रात मैंने अपने पति अनुराग से पूरी बात कही। अनुराग एक बैंक में ही कार्यरत थे, इसलिए उन्होंने तय किया कि वे चाची का हक किसी भी कीमत पर छिनने नहीं देंगे। अगले ही दिन से अनुराग ने सरकारी दफ्तरों और बैंक के चक्कर काटने शुरू कर दिए। कागजी कार्रवाई पूरी करवाई गई, मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर पारिवारिक पेंशन के तमाम दस्तावेज तैयार किए गए। अनुराग और मैं चाची को अपनी गाड़ी में बैठाकर बैंक ले गए। वहां उनका एकल खाता खुलवाया गया, पेंशन उनके खाते में चालू करवाई गई और अनुराग ने धैर्यपूर्वक चाची को सिखाया कि बैंक जाकर चेक या निकासी पर्ची से पैसे कैसे निकाले जाते हैं। जब पहली बार कल्याणी चाची के हाथ में उनकी अपनी पेंशन की पासबुक आई, तो उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद अपने स्वाभिमान को फिर से पहचान लेने की चमक।
घर के अंदर का माहौल हालांकि बदस्तूर जहरीला बना रहा। राहुल और मोनिका को जब पता चला कि पेंशन की रकम उनके हाथ से फिसल गई है, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे दोनों कल्याणी चाची को हर दिन गालियां देते, ताने मारते। यहां तक कि एक दिन जब मैं चाची को दवा देने उनके घर के दरवाजे पर पहुंची, तो राहुल ने मुझ पर भी चिल्लाना शुरू कर दिया, “आप लोग हमारे घर के मामले में टांग अड़ाना बंद कीजिए! यह हमारे परिवार की बात है, ज्यादा हमदर्दी दिखाने की जरूरत नहीं है।”
उसकी बदतमीजी सुनकर मेरा खून खौल उठा, लेकिन मैंने खुद को संभाला। मैंने सिर्फ इतना कहा, “किसी बुजुर्ग को बेसहारा समझकर सताना अपराध है राहुल, और एक पड़ोसी होने के नाते इंसानियत निभाना मेरा फर्ज है।”
मैंने और अनुराग ने तय कर लिया था कि चाहे राहुल-मोनिका हमें कितना भी भला-बुरा कहें, हम चाची का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। हम उनके लिए वह सहारा बन गए थे, जो डूबते हुए इंसान को एक तिनका देता है। लेकिन सच तो यह था कि वह तिनका सिर्फ संबल था; तैरने की असली ताकत तो कल्याणी चाची के अपने भीतर थी।
एक दिन अचानक चाची की तबीयत बहुत बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार था और वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। उन्होंने गले की सारी ताकत बटोरकर अपने पोते-पोती को आवाज दी, “अरे चिंटू… बेटा जरा एक गिलास पानी दे जा… गुडिया, सुनती है बेटा?”
बगल के कमरे में टीवी तेज आवाज में चल रहा था। उन बच्चों ने आवाज सुनी, लेकिन दरवाजा बंद कर लिया। कोई पानी लेकर नहीं आया। उस दोपहर जब मैं हालचाल लेने पहुंची, तो चाची पसीने से तर-बतर, फर्श पर रेंगते हुए पानी के मटके तक जाने की कोशिश कर रही थीं। मैंने दौड़कर उन्हें उठाया, पानी पिलाया और डॉक्टर को बुलाकर दवा दिलवाई।
उस शाम जब चाची का बुखार उतरा, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनके चेहरे पर अब आंसुओं की लाचारी नहीं थी, बल्कि एक शांत, अडिग संकल्प था।
वे धीरे से बोलीं, “शालिनी, आज मुझे समझ आ गया कि इस दुनिया में अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है। इस घर की दीवारों में पत्थर बसते हैं, इंसान नहीं। अब मैं किसी को नहीं पुकारूंगी। प्यास लगेगी तो खुद उठकर पानी पिऊंगी, भूख लगेगी तो चाहे एक ही रोटी बने, अपने हाथों से सेकूंगी। जब तक इन रगों में जान है, मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगी।”
उस दिन के बाद कल्याणी चाची पूरी तरह बदल गईं। उन्होंने रोना बंद कर दिया। उन्होंने अपनी दिनचर्या नए सिरे से शुरू की। सुबह जल्दी उठना, पूजा-पाठ करना, अपने लिए सादा भोजन पकाना और शाम को कॉलोनी के मंदिर में जाकर बैठना। वे अपनी पेंशन से न सिर्फ अपनी दवाइयां और राशन लातीं, बल्कि महीने में एक बार अनाथालय के बच्चों के लिए फल और कॉपियां भी भिजवाती थीं। उनका वह छोटा सा कमरा अब गमगीन नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान का किला बन चुका था।
राहुल और मोनिका ने कई बार कोशिश की कि चाची टूट जाएं, लेकिन चाची ने उन दोनों को पूरी तरह अनदेखा करना शुरू कर दिया। वे उनके किसी ताने का जवाब नहीं देती थीं। उनका यह मौन और आत्मनिर्भरता ही उन स्वार्थी बच्चों के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा था। कॉलोनी के लोग जो पहले केवल तमाशा देखते थे, अब कल्याणी चाची की इस जीवटता और हिम्मत की मिसाल देने लगे थे।
लगभग तीन साल इसी तरह बीत गए। कल्याणी चाची ने अपनी जिंदगी की जंग पूरे गर्व, स्वाभिमान और शांति के साथ लड़ी। उन्होंने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया।
और फिर एक दिन, कार्तिक मास की एक शांत, उजली सुबह, जब मैं हमेशा की तरह उनके लिए चाय लेकर उनके कमरे में गई, तो देखा कि कल्याणी चाची अपने बिस्तर पर बिल्कुल शांत सोई हुई थीं। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, कोई दर्द नहीं था—बस एक गहरी, अलौकिक शांति थी। उन्होंने रात को अपने हाथ से बनाई खिचड़ी खाई थी, अपने हाथ से पानी पीया था और सोते-सोते ही ईश्वर के चरणों में विलीन हो गई थीं। वे किसी की मोहताज होकर नहीं, बल्कि एक विजेता की तरह इस संसार से विदा हुई थीं।
जब उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी, तो राहुल और मोनिका समाज को दिखाने के लिए घड़ियाली आंसू बहा रहे थे। लेकिन कॉलोनी का हर शख्स जानता था कि सच क्या है। मैंने और अनुराग ने जब हाथ जोड़कर चाची के पार्थिव शरीर को अंतिम प्रणाम किया, तो मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे, मगर दिल में उनके लिए असीम सम्मान था।
सचमुच, हमने तो बस एक छोटा सा तिनका बढ़ाया था, लेकिन उस तिनके के सहारे समंदर जैसी विकट परिस्थितियों को पार करने का हौसला और आत्मबल पूरी तरह कल्याणी चाची का अपना था। वे साबित कर गईं कि हालात चाहे कितने भी बेरहम क्यों न हों, अगर इंसान अपने भीतर का आत्मसम्मान न खोए, तो वह हर मुश्किल को जीतकर स्वाभिमान से जी सकता है।
क्या कल्याणी चाची का अपनी औलाद के आगे झुकने से इनकार करना और अकेले स्वाभिमान से जीना सही था? आज के समाज में बुजुर्गों के साथ होते ऐसे बर्ताव का असली जिम्मेदार आप किसे मानते हैं—संस्कारों की कमी या केवल स्वार्थ? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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