अहसास का अंकुर

 शशांक की आँखों से आंसू बह निकले। उसके भीतर का अहंकार, उसका झूठा पुरुषत्व और संकीर्ण सोच ताश के पत्तों की तरह ढह गए। उसने मन ही मन सोचा—अगर एक अजनबी नौजवान मुझे अपने पिता का दर्जा दे सकता है क्योंकि मैंने उसे संवारा, तो जिस बच्चे को मेरी मल्लिका अपने खून-पसीने से नौ महीने कोख में सींचेगी, जिसे मैं अपने हाथों से खिलाऊंगा, वह मेरा कैसे नहीं होगा? मैं कितना स्वार्थी और क्रूर हो गया था। अपनी शारीरिक अक्षमता की सजा मैं उस मल्लिका को दे रहा था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के इतना प्यार दिया। मल्लिका का मातृत्व सुख छीनने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।

चंडीगढ़ के एक सुप्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज के विशाल प्रांगण में गुलमोहर के लाल फूलों की चादर बिछी हुई थी। उसी पेड़ की घनी छांव के नीचे अक्सर दो चेहरे किताबों में खोए नजर आते—शशांक और मल्लिका। शशांक जहाँ वास्तुकला यानी आर्किटेक्चर का छात्र था और अपनी रेखाओं व नक्शों में सपनों के महल तराशता था, वहीं मल्लिका ललित कला विभाग में अपनी तूलिका से कैनवास पर रंगों की नई दुनिया रचती थी। दोनों की रचनात्मकता कब एक-दूसरे के मन के तारों को छू गई, यह बात वे खुद भी ठीक से नहीं समझ पाए। धीरे-धीरे दोस्ती ने गहरा रूप लिया और वह प्रेम में बदल गई। पढ़ाई पूरी होने के बाद मल्लिका ने शहर के एक प्रतिष्ठित डिजाइन संस्थान में व्याख्याता के पद पर कार्यभार संभाला, जबकि शशांक ने एक बड़ी निर्माण कंपनी में बतौर सीनियर आर्किटेक्ट अपनी पहचान बनाई।

दोनों के परिवारों के बीच कोई पर्दा या अड़चन नहीं थी। जब उन्होंने अपनी भावनाएँ अपने-अपने माता-पिता के सामने रखीं, तो दोनों ही घरों में खुशियों की शहनाइयां गूंज उठीं। बड़े ही आदर और स्नेह के साथ दोनों का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद का जीवन किसी सुरीले संगीत की तरह बह रहा था। मल्लिका घर को सुरुचिपूर्ण ढंग से संवारती, और शशांक हर शाम दफ्तर से लौटते समय मल्लिका के चेहरे की मुस्कान देखने के लिए बेचैन रहता। दोनों एक-दूसरे की छोटी-छोटी आदतों को समझते, उनका मान रखते और जिंदगी के हर मोड़ पर एक मजबूत संबल बनकर खड़े रहते।

मल्लिका को बच्चों से स्वाभाविक लगाव था। उसके संस्थान में जब भी कोई छात्र अपनी कलाकृति में उलझता, वह मातृत्व भरे वात्सल्य से उसका हाथ थाम लेती। घर की बालकनी में लगे पौधों को पानी देते हुए या पास के पार्क में खेलते नन्हें बच्चों को निहारते हुए उसकी आँखें अक्सर किसी अनकहे सपने में खो जाती थीं। शादी के पाँच बरस बीत चुके थे। दोनों का करियर स्थिर था, घर में किसी भौतिक सुख की कोई कमी नहीं थी। अब दोनों के दिलों में एक साझा अरमान करवटें लेने लगा था—अपने आंगन में गूंजने वाली किसी नन्हीं किलकारी का अरमान।

एक दिन शाम की चाय पीते हुए मल्लिका ने शशांक के कंधे पर सिर टिकाया और कहा, “शशांक, हमारा यह सुंदर घर अब किसी नन्हें मेहमान के कदमों की आहट मांग रहा है। मुझे लगता है कि अब हमें अपने परिवार को पूरा करना चाहिए।” शशांक ने उसके माथे को चूमा और मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने मेरे दिल की बात छीन ली, मल्लिका। मैं भी चाहता हूँ कि हमारे घर में कोई नन्हा फरिश्ता दौड़े।”

अगले ही हफ्ते मल्लिका शहर की एक विख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वंदना के पास परामर्श के लिए गई। डॉ. वंदना ने मल्लिका की तमाम जांचें करवाईं। रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य आई। डॉ. वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा, “मल्लिका जी, आप पूरी तरह स्वस्थ हैं और मातृत्व के लिए आपका शरीर पूरी तरह तैयार है। लेकिन जैसा कि आज के समय में नियम है, बेहतर होगा कि एक बार शशांक जी का भी रूटीन फर्टिलिटी टेस्ट करवा लिया जाए।”

मल्लिका ने घर लौटकर जब यह बात शशांक को बताई, तो शशांक ठहाका लगाकर हंस पड़ा। उसने कहा, “अरे मल्लिका, तुम भी कैसी बातें करती हो! मैं हर सुबह दस किलोमीटर दौड़ता हूँ, जिम जाता हूँ, बिल्कुल चुस्त-दुरुस्त हूँ। मुझमें क्या कमी हो सकती है? यह सब तो व्यर्थ की औपचारिकता है।” लेकिन मल्लिका के सहज आग्रह और प्यार भरी मनुहार के आगे उसने हामी भर दी।

कुछ दिनों बाद रिपोर्ट आई। वह रिपोर्ट किसी अनपेक्षित तूफान की तरह उनके हँसते-खेलते संसार पर गिरी। रिपोर्ट का निष्कर्ष चौंकाने वाला और कठोर था। शशांक में एक गंभीर जैविक अक्षमता थी, जिसके चलते वह कभी भी पिता नहीं बन सकता था। डॉक्टर ने साफ शब्दों में कह दिया था कि किसी भी पारंपरिक दवा या उपचार से यह जैविक अवरोध दूर नहीं हो सकता।

उस शाम जब शशांक क्लिनिक से बाहर निकला, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। वह घर लौटा, पर वह पहले वाला शशांक नहीं था। जिस घर में हर शाम हंसी के फव्वारे छूटते थे, वहां अब एक दमघोंटू सन्नाटा पसर गया। शशांक खुद को एक अपराधी की तरह महसूस करने लगा। उसका पुरुषोचित स्वाभिमान भीतर ही भीतर लहूलुहान हो रहा था। उसने मल्लिका से नजरें चुरानी शुरू कर दीं। वह देर रात तक दफ्तर में रुकने लगा, बहाने बनाकर जल्दी सो जाता और खाने की मेज पर भी केवल औपचारिकता निभाता।

मल्लिका उसके इस मानसिक द्वंद्व को समझ रही थी। उसने कई बार शशांक का हाथ थामकर उसे ढांढस बंधाने की कोशिश की, “शशांक, यह किसी की गलती नहीं है। हम दोनों साथ हैं, यही सबसे बड़ी बात है।”

लेकिन यह खामोशी जब हफ्तों तक नहीं टूटी, तो एक रात मल्लिका ने सीधे तौर पर बात करने का निश्चय किया। उसने शशांक को अपने सामने बैठाया और कहा, “शशांक, कब तक हम इस सन्नाटे को ढोते रहेंगे? जिंदगी रुकने का नाम नहीं है। हमें कोई रास्ता निकालना होगा।”

शशांक ने नजरें झुकाए हुए बेहद बुझे स्वर में कहा, “मल्लिका, जब विधाता ने ही मेरी झोली खाली कर दी है, तो हम क्या कर सकते हैं? अगर तुम चाहो तो हम किसी अनाथालय से कोई बच्चा गोद ले सकते हैं। कम से कम हमारे घर का सूनापन तो दूर होगा।”

मल्लिका ने गहरी सांस ली और शशांक की आँखों में देखते हुए कहा, “शशांक, किसी बच्चे को अपनाना बहुत नेक काम है, लेकिन मेरे भीतर एक स्त्री का शरीर और उसका मन है। मैं नवसृजन के उस दिव्य अनुभव को जीना चाहती हूँ। मैं नौ महीने तक अपने गर्भ में एक जीवन को स्पंदित होते महसूस करना चाहती हूँ। मैं उस प्रसव पीड़ा को सहकर अपने अस्तित्व को पूर्णता देना चाहती हूँ।”

शशांक ने चौंककर पूछा, “पर यह कैसे संभव है?”

मल्लिका ने सहज भाव से कहा, “आज का चिकित्सा विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है। हम आईवीएफ और डोनर की मदद ले सकते हैं। डॉक्टर वंदना से मेरी बात हुई थी। मेरे गर्भ में एक नया जीवन पल सकता है, जिसे हम दोनों मिलकर अपनी ममता और संस्कारों से सींचेंगे।”

मल्लिका की बात खत्म होते ही शशांक के चेहरे का रंग बदल गया। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। सदियों से पुरुषों के भीतर पैठी पितृसत्तात्मक सोच और उसका आहत अहम् अचानक ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा। वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और चिल्लाया, “क्या? तुम किसी गैर के अंश को अपनी कोख में पालोगी? और तुम यह उम्मीद करती हो कि मैं उस बच्चे को अपना नाम दूं और उसे अपना बेटा या बेटी कहूं? कभी नहीं! यह मेरे पुरुषार्थ का अपमान है। तुम अपनी कोख का सुख पाने के लिए मेरी मर्यादा को दांव पर लगाना चाहती हो?”

मल्लिका अवाक रह गई। उसने शांत स्वर में समझाने की कोशिश की, “शशांक, यह किसी गैर का नहीं, यह हमारा बच्चा होगा। जिसे मैं जन्म दूंगी, जिसे तुम पिता का साया दोगे। क्या केवल जैविक अंश ही रिश्ते तय करता है?”

लेकिन शशांक सुनने की स्थिति में नहीं था। उसने तल्खी से कहा, “अगर तुम्हें यही सब करना है, तो शायद हमारे रास्ते अलग होने का समय आ गया है। मैं इस रिश्ते के बोझ को अपने आत्मसम्मान की बलि देकर नहीं ढो सकता।”

उस रात के बाद घर का माहौल और भी जहरीला हो गया। बात अलगाव की दहलीज तक पहुँच चुकी थी। मल्लिका रात-रात भर अपने कमरे में तकिए में मुंह छिपाकर रोती। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह मां बनना चाहती थी, लेकिन शशांक की मर्दानगी की झूठी परिभाषा उस पर भारी पड़ रही थी।

दिन बीतते गए। शशांक की साइट पर काम तेजी से चल रहा था। वहां उसका एक कनिष्ठ सहायक था—तरुण। तरुण एक अत्यंत होनहार, मेहनती और संवेदनशील युवक था। शशांक ने पिछले दो वर्षों में तरुण को एक कुशल पेशेवर की तरह गढ़ा था। एक दिन दोपहर के समय तरुण दौड़ता हुआ शशांक के केबिन में आया। उसके हाथों में मिठाई का डिब्बा था और आँखों में कृतज्ञता के आंसू।

“सर! मेरा चयन दुबई के प्रतिष्ठित स्काईलाइन प्रोजेक्ट के चीफ आर्किटेक्ट के रूप में हो गया है,” तरुण ने उत्साह से कहा।

शशांक के चेहरे पर भी एक संतोष भरी मुस्कान आ गई, “बहुत बधाई हो, तरुण। यह तुम्हारी अपनी प्रतिभा का परिणाम है।”

तरुण ने झुककर शशांक के चरण स्पर्श किए और भरे गले से बोला, “नहीं सर, यह केवल मेरी प्रतिभा नहीं है। जब मैं इस शहर में आया था, तो मेरे पास न दिशा थी और न आत्मविश्वास। मेरे अपने पिता मुझे बचपन में ही छोड़कर चले गए थे, लेकिन इन दो सालों में आपने जिस तरह मेरी उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाया, डांटा भी और संभाला भी… सच कहूं सर, मुझे आप में हमेशा अपने पिता की छवि नजर आई। लोग कहते हैं कि पिता वह होता है जो खून का रिश्ता देता है, लेकिन मैं जानता हूँ कि पिता वह होता है जो अपनेपन की छांव देता है, जो किसी के वजूद को गढ़ता है। आपने मुझे गढ़ा है, इसलिए मेरे असली पिता आप ही हैं।”

तरुण के ये शब्द शशांक के कानों में नहीं, सीधे उसकी आत्मा में जाकर गूंज उठे। शशांक जड़वत खड़ा रह गया। उसने तरुण को गले लगाया, पर उसका अंतर्मन किसी भारी झटके से हिल चुका था। तरुण के कमरे से जाते ही शशांक अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उसके कानों में तरुण की पंक्तियाँ बार-बार गूंज रही थीं—”पिता वह नहीं जो केवल खून देता है, पिता वह होता है जो अपनेपन की छांव देता है।”

शशांक की आँखों से आंसू बह निकले। उसके भीतर का अहंकार, उसका झूठा पुरुषत्व और संकीर्ण सोच ताश के पत्तों की तरह ढह गए। उसने मन ही मन सोचा—अगर एक अजनबी नौजवान मुझे अपने पिता का दर्जा दे सकता है क्योंकि मैंने उसे संवारा, तो जिस बच्चे को मेरी मल्लिका अपने खून-पसीने से नौ महीने कोख में सींचेगी, जिसे मैं अपने हाथों से खिलाऊंगा, वह मेरा कैसे नहीं होगा? मैं कितना स्वार्थी और क्रूर हो गया था। अपनी शारीरिक अक्षमता की सजा मैं उस मल्लिका को दे रहा था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के इतना प्यार दिया। मल्लिका का मातृत्व सुख छीनने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।

शशांक ने अपनी गाड़ी निकाली और तेजी से घर की ओर दौड़ा दी। घर का दरवाजा खुला तो उसने देखा कि मल्लिका एक कोने में बैठी अपनी किसी अधूरी पेंटिंग को देख रही थी, जिसमें एक मां की गोद खाली थी।

शशांक सीधे जाकर मल्लिका के कदमों में बैठ गया। मल्लिका चौंक गई। शशांक ने उसके दोनों हाथ अपने आंसुओं से भीगे गालों पर रख लिए और रुंधे हुए कंठ से कहा, “मुझे माफ कर दो, मल्लिका। मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द नहीं देख पाया। पिता बनना केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है, वह तो एक अहसास है, एक जिम्मेदारी और समर्पण है। तुम उस नए जीवन को जन्म दोगी, और मैं उसे अपनी जान से ज्यादा प्यार दूंगा। वह सिर्फ और सिर्फ हमारा बच्चा होगा। चलो, हम कल ही डॉ. वंदना के पास चलते हैं।”

मल्लिका की आँखों से खुशी के आंसू बह निकले। उसने शशांक को उठाकर गले से लगा लिया। घर के भीतर महीनों से छाया हुआ घना कुहासा एक पल में छंट गया था।

अगले ही दिन दोनों डॉ. वंदना के क्लिनिक पहुंचे। आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श और आईवीएफ की प्रक्रिया विधिवत शुरू हुई। कुछ ही महीनों के भीतर मल्लिका की कोख में एक नन्हे जीवन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। पूरे नौ महीने शशांक ने मल्लिका की एक फूल की तरह देखभाल की। उसकी हर इच्छा, उसके हर मूड और उसकी सेहत का उसने पूरा ख्याल रखा।

अंततः वह शुभ दिन आया जब अस्पताल के लेबर रूम के बाहर शशांक बेचैनी से टहल रहा था। तभी नर्स ने बाहर आकर कहा, “बधाई हो, आपके घर नन्हीं परी आई है।”

शशांक जब कमरे के भीतर गया, तो मल्लिका की थकी हुई लेकिन अलौकिक मुस्कान के बीच एक बेहद सुंदर नन्हीं बच्ची लिपटी सो रही थी। शशांक ने कांपते हाथों से उस नन्हीं जान को अपनी गोद में उठाया। जैसे ही उस नन्ही सी हथेली ने शशांक की उंगली को छुआ, शशांक के रोम-रोम में वात्सल्य का अमृत बह निकला। उस क्षण कोई जैविक बंधन मायने नहीं रख रहा था; वहां केवल एक पिता और उसकी संतान का निश्छल रिश्ता था। उन्होंने अपनी उस नन्ही परी का नाम रखा—‘अनाहिता’, जिसका अर्थ होता है पवित्र और पावन।

दोनों के प्रेम और त्याग ने मिलकर एक नए जीवन को सींचा था, और आज उनका आंगन उस नन्हीं किलकारी से सचमुच महक उठा था।

पाठकों के लिए विचार:

पितृत्व केवल रक्त के संबंधों से तय होता है या फिर उस निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और संस्कारों से जो हम एक बच्चे को देते हैं? क्या शशांक का अपनी संकीर्ण सोच से बाहर निकलकर मल्लिका के मातृत्व का सम्मान करना सही निर्णय था? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : सुधा जैन

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