संभालने की डोर

“अरे मीनाक्षी बहू! ज़रा इधर तो आना बेटा, देखो बाज़ार से तुम्हारे पसंद की केसर-पिस्ता कुल्फी लाया हूँ। फ्रिज में रख दो और रात के खाने के बाद सबको परोस देना,” मुकुंद जी ने हॉल में कदम रखते ही आवाज़ लगाई।

रसोई से हाथ पोंछते हुए बड़ी बहू मीनाक्षी तुरंत बाहर आई। “अरे बाबूजी, आप भी ना! इस उम्र में इतनी दूर पैदल जाकर मिठाई लाने की क्या ज़रूरत थी? नितिन या रोहन को कह देते, वे ले आते। चलिए, लाइए इधर दीजिए, मैं अभी रख देती हूँ।” मीनाक्षी ने आदर से डिब्बा थाम लिया और मुस्कराते हुए वापस रसोई की ओर बढ़ गई।

उसी हॉल के कोने में रखे दीवान पर अंजलि बैठी थी। अंजलि, मुकुंद बाबू की इकलौती बेटी, जो शादी के तीन साल बाद पूरे छह महीने के अंतराल पर अपने मायके आई हुई थी। अभी आए हुए उसे मुश्किल से दो ही दिन हुए थे। सामने घटे इस छोटे से दृश्य ने अंजलि के दिल में एक हल्की सी टीस पैदा कर दी। उसने अपनी हथेलियों को कसकर भींच लिया।

अंजलि के मन में एक अजीब सी खटास घुलने लगी। वह सोचने लगी कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है? बचपन से लेकर विदाई के दिन तक इस घर की धुरी वही हुआ करती थी। पापा दफ्तर से लौटते ही सबसे पहले आवाज़ लगाते थे—’अंजू बेटा, देख तेरे लिए क्या लाया हूँ!’ और आज? वह सामने बैठी थी, उसकी आँखें अपने पिता का दीदार कर रही थीं, मगर पिता की नज़रें और आवाज़ सीधे बहू के लिए उठीं। क्या शादी के बाद मायके में बेटी की अहमियत सिर्फ एक औपचारिक मेहमान जितनी रह जाती है? क्या अब वह इस घर की अंदरूनी व्यवस्था का हिस्सा नहीं रही?

उसे अपनी स्वर्गीय माँ जानकी देवी की याद हो आई। तीन साल पहले माँ अचानक शांत हो गई थीं, उस आघात से यह परिवार बिखरते-बिखरते बचा था। माँ के जीते जी भी अंजलि को अक्सर यह अहसास कराया जाता था कि उसे संयम सीखना चाहिए। जब भी कभी भाभी से किसी बात पर अनबन होती, तो माँ हमेशा अंजलि को ही समझाती थीं—’बेटी, तू पराए घर जाएगी, तुझे सामंजस्य बिठाना आना चाहिए। बहू तो अपना घर छोड़कर हमारे यहाँ आई है, उसे अपनापन देना हमारा फर्ज है।’ तब अंजलि को माँ की बातें पक्षपाती लगती थीं। उसे लगता था कि माँ शायद बहुओं को खुश रखने के लिए बेटी के अधिकारों की बलि चढ़ा देती हैं। और आज माँ के जाने के बाद भी, पापा वही ढर्रा अपना रहे थे।

“दीदी, आप इतनी शांत क्यों बैठी हैं? चलिए, मैं आपके लिए अदरक वाली चाय बना लाती हूँ। कुल्फी तो रात को खाएँगे, तब तक चाय की चुस्की लेते हैं,” मीनाक्षी ने रसोई की चौखट से झांकते हुए बड़े अपनेपन से कहा।

अंजलि ने अपने चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान ओढ़ने की कोशिश की और कहा, “नहीं भाभी, रहने दीजिए। मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही, सिर में भारीपन है। चाय पीने की इच्छा नहीं है।”

मीनाक्षी उसके पास आई और उसके माथे को छूते हुए बोली, “अरे, सफर की थकान होगी दीदी। आप आराम कीजिए, मैं तुलसी और अदरक का काढ़ा बना देती हूँ, तुरंत आराम मिलेगा। बाबूजी भी कह रहे थे कि अंजलि बिटिया काफी दिनों बाद आई है, उसे कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।” इतना कहकर मीनाक्षी फिर अपने काम में जुट गई।

मीनाक्षी का यह सहज और सरल व्यवहार अंजलि को भीतर ही भीतर और बेचैन कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी उपेक्षा पर गुस्सा करे या भाभी की इस आत्मीयता के आगे चुप रह जाए।

शाम ढल चुकी थी और छत पर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मुकुंद बाबू हर शाम की तरह छत पर लगे गमलों में पानी देने के बाद कुर्सी डालकर वहीं बैठ गए थे। उन्होंने नीचे से अंजलि को चुपचाप सीढ़ियाँ चढ़ते देखा। एक पिता की नज़रें अपनी संतान के मन के भीतर छिपे बादलों को भांपने में कभी चूकती नहीं हैं। अंजलि का बुझा हुआ चेहरा और दिनभर की खामोशी मुकुंद बाबू से छिपी नहीं थी।

“आओ अंजू, बैठो यहाँ,” मुकुंद बाबू ने पास रखी दूसरी बेंट की कुर्सी की ओर इशारा करते हुए स्नेह से कहा।

अंजलि बिना कुछ बोले कुर्सी पर बैठ गई। सामने शहर की बत्तियाँ टिमटिमाने लगी थीं। थोड़ी देर तक दोनों के बीच केवल हवा की सरसराहट की आवाज़ थी।

“समीर (दामाद) से बात हुई तुम्हारी? सब ठीक है ना वहाँ? उसने कहा था कि परसों तुम्हें लेने आएगा,” मुकुंद बाबू ने सहजता से बातचीत की शुरुआत की।

“हाँ पापा, बात हुई थी। सब ठीक हैं,” अंजलि ने बेहद संक्षिप्त उत्तर दिया। उसकी आवाज़ में छिपा सूखापन साफ झलक रहा था।

मुकुंद बाबू ने एक गहरी सांस ली, चश्मा उतारकर अपनी जेब में रखा और अंजलि के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “मेरी गुड़िया आज मुझसे कुछ नाराज़ लग रही है। क्या बात है बेटा? कोई ऐसी बात जो अपने इस बूढ़े पिता से साझा नहीं कर सकती?”

पिता के इस स्पर्श ने अंजलि के भीतर जमा हुए बांध को तोड़ दिया। उसकी आँखें भर आईं। उसने नज़रें झुकाए हुए ही धीमी आवाज़ में कहा, “पापा, क्या माँ के जाने के बाद आपका यह घर पूरी तरह बदल गया है? या फिर सिर्फ मेरे लिए ही सब कुछ बदल गया है?”

मुकुंद बाबू मुस्कुराए, उनके चेहरे पर कोई घबराहट या आश्चर्य नहीं था। उन्होंने पूछा, “ऐसा क्यों लगा मेरी बच्ची को?”

“पापा, जब आप शाम को कुल्फी लेकर आए, मैं आपके ठीक सामने बैठी थी। आपने मुझे देखा भी, लेकिन डिब्बा भाभी को पकड़ाया। घर का कोई राशन मंगाना हो, पड़ोस में किसी के यहाँ जाना हो, आप हर बात की सलाह भाभी से करते हैं। बचपन से मैंने देखा है कि आप हर खुशी, हर चीज़ पहले मुझे सौंपते थे। क्या बेटी शादी के बाद इतनी बेगानी हो जाती है कि पिता के घर में भी उसे महसूस करना पड़े कि अब उसका हक छिन चुका है?” अंजलि के शब्द आंसुओं के साथ बह निकले।

मुकुंद बाबू ने अंजलि का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आँखों में असीम वात्सल्य और जीवन के अनुभवों की गहराई थी।

“अंजू, आज जो तूने पूछा है, उसका जवाब देना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। मुझे खुशी है कि तूने यह बात अपने मन में दबाकर रखने के बजाय मुझसे कह दी,” मुकुंद बाबू ने शांत स्वर में कहना शुरू किया।

“बेटा, जब तेरी माँ इस दुनिया से गई, तो यह घर एक खाली मकान बन चुका था। मैं एक टूटा हुआ इंसान था, जिसकी उम्र ढल रही थी और जिसके सामने एक लंबा अकेलापन खड़ा था। उस समय मेरे सामने दो रास्ते थे। पहला रास्ता यह था कि मैं घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग बनकर अपने कमरे में बैठ जाऊं, बात-बात पर अपने अधिकार जताऊं, ‘मैं इस घर का मालिक हूँ’ इस गुरूर में जिऊं और यह उम्मीद करूं कि सब आकर मेरे आगे-पीछे घूमें। अगर मैं ऐसा करता, तो शायद कुछ ही महीनों में मैं इस भरे-पूरे परिवार के बीच भी सबसे अकेला इंसान बन जाता।”

अंजलि खामोशी से पिता की ओर देखने लगी।

मुकुंद बाबू आगे बोले, “दूसरा रास्ता वह था जो तेरी माँ ने मुझे अपने पूरे जीवन में सिखाया था—’संतुलन और सौंपने की कला’। बेटा, यह घर अब अगली पीढ़ी का है। नितिन और मीनाक्षी इस घर की रीढ़ हैं। मीनाक्षी अपना सब कुछ छोड़कर इस चौखट के भीतर आई है। अगर मैं इस उम्र में भी चाबियों का गुच्छा अपनी मुट्ठी में दबाए रखता, हर छोटी बात पर अपनी सत्ता दिखाता, तो क्या वह इस घर को अपना समझ पाती? जब मैं बाज़ार से कोई चीज़ लाकर सीधे बहू के हाथ में देता हूँ, तो मैं सिर्फ एक डिब्बा नहीं सौंपता, मैं उसे यह भरोसा सौंपता हूँ कि ‘तू इस घर की अन्नपूर्णा है, यह घर तेरा है और तू ही इसकी सर्वेसर्वा है’।”

मुकुंद बाबू की बातें अंजलि के दिल की गहराइयों को छू रही थीं।

“और रही बात तेरी, मेरी बच्ची,” मुकुंद बाबू का स्वर और अधिक कोमल हो गया, “तू मेरी बेटी है, मेरा अंश है। तेरा हक मेरे दिल पर उस दिन भी था, आज भी है और मेरी आखिरी सांस तक रहेगा। लेकिन बेटा, तू अब इस घर में कुछ दिनों के लिए एक मेहमान की तरह आती है, सुकून तलाशने आती है। अगर मैं तेरे आते ही सारा ध्यान सिर्फ तुझ पर केंद्रित कर दूँ, हर फैसले में तुझे आगे रखूँ और बहुओं को किनारे कर दूँ, तो अनजाने में ही सही, उनके मन में एक असुरक्षा का भाव पैदा होगा। उन्हें लगेगा कि जब बेटी आती है, तो उनका वजूद गौण हो जाता है। और सोच, तेरे वापस ससुराल चले जाने के बाद, मुझे पानी का घूंट देने, मेरी दवाइयों का वक्त याद रखने और इस घर को सहेजने के लिए तो इन्हीं बहुओं के सहारे रहना है ना?”

अंजलि ने सिहर कर पिता की ओर देखा। पिता के इस यथार्थवादी दृष्टिकोण ने उसके सोचने के पूरे नज़रिए को हिलाकर रख दिया था।

“बेटा, रिश्तों में सबसे बड़ा जहर होता है—अधिकार का अहंकार,” मुकुंद बाबू ने गंभीरता से समझाया। “बुजुर्गों का गुरूर अक्सर परिवारों को बिखेर देता है। कई माँ-बाप सोचते हैं कि हमने जन्म दिया है, इसलिए बच्चे हमारे अनुसार ही चलें। वे यह भूल जाते हैं कि जैसे-जैसे पौधे बड़े होते हैं, जड़ों को अपनी पकड़ ज़मीन में गहरी करनी होती है, डालियों को टोकना बंद करना होता है। मैंने अपना हक मीनाक्षी और नितिन को खुशी-खुशी सौंप दिया, ताकि उनका अपनापन मुझे बिना मांगे मिल सके। आज अगर मुझे आधी रात को भी छींक आ जाए, तो मीनाक्षी गरम पानी लेकर हाजिर हो जाती है। यह सेवा किसी डर या दबाव से नहीं आती बेटा, यह उस सम्मान से आती है जो मैंने उसे इस घर की मालकिन बनाकर दिया है।”

मुकुंद बाबू ने अंजलि के आंसू पोंछते हुए कहा, “तेरी माँ हमेशा कहती थी कि बेटी को विदा करने के बाद माता-पिता को अपनी सीमाओं को समझ लेना चाहिए। यदि हम संतुलन नहीं बनाएंगे, तो दो पीढ़ियों के बीच सिर्फ खाई और कड़वाहट रह जाएगी। मैं नहीं चाहता कि मेरे किसी भी व्यवहार से इस घर की शांति भंग हो। तू इस घर का गौरव है अंजू, लेकिन मीनाक्षी इस घर की वर्तमान नींव है। नींव को मजबूत रखना ही इमारत को टिकाए रखता है।”

अंजलि निशब्द थी। उसके मन में चल रहा सारा तूफान अब पूरी तरह शांत हो चुका था। जिस व्यवहार को वह अपनी उपेक्षा समझ रही थी, वह वास्तव में उसके पिता की दूरदर्शिता, त्याग और घर को एक सूत्र में पिरोए रखने का अद्भुत संतुलन था। वह अपनी संकीर्ण सोच पर लज्जित महसूस करने लगी।

तभी सीढ़ियों पर कदमों की आहट हुई। मीनाक्षी हाथ में ट्रे लिए ऊपर आ रही थी। ट्रे में दो कप भाप उड़ाती हुई चाय और एक कटोरी में वही केसर-पिस्ता कुल्फी रखी थी।

“अरे बाबूजी, आप दोनों यहाँ ठंडी हवा में बैठे हैं! दीदी, आपका सिर दर्द कैसा है अब? मुझे लगा शायद चाय से बेहतर कुल्फी का यह मीठा स्वाद आपको ताज़गी देगा, इसलिए मैं आपके हिस्से की कुल्फी पहले ही ले आई। और बाबूजी, आपकी बिना शक्कर वाली अदरक की चाय भी तैयार है,” मीनाक्षी ने बड़े लाड़ से ट्रे मेज पर रखते हुए कहा।

अंजलि ने मीनाक्षी की ओर देखा। उसकी आँखों में कोई बनावट नहीं थी, सिर्फ शुद्ध आदर और प्रेम था। अंजलि की आँखें फिर से भर आईं, लेकिन इस बार वे आंसू दुख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे।

अंजलि ने आगे बढ़कर मीनाक्षी का हाथ पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, सच कहूँ तो मेरा सिर दर्द तो पापा की बातों से ही आधा ठीक हो गया था, और अब आपकी इस कुल्फी ने बाकी कसर भी पूरी कर दी। आप सच में बहुत अच्छी हैं भाभी, इस घर को और पापा को इतने प्यार से संभालने के लिए शुक्रिया।”

मीनाक्षी सकपका गई और फिर हंसते हुए बोली, “अरे दीदी, आप भी कैसी बातें कर रही हैं! यह मेरा अपना घर है और बाबूजी मेरे भी तो पिता ही हैं।”

मुकुंद बाबू ने दोनों को देखा और उनके चेहरे पर एक असीम संतोष की चमक दौड़ गई। शाम का अंधेरा अब गहरा चुका था, लेकिन सदाशिव सदन की छत पर रिश्तों की जो रोशनी बिखरी थी, वह किसी भी अँधेरे को मात देने के लिए काफी थी। पीढ़ियों के बीच का अंतर किसी टकराव का कारण नहीं बना, बल्कि समझदारी और अहंकार के त्याग ने उस घर को स्वर्ग बना दिया था।

क्या हमारे समाज में आज भी बुजुर्गों और नई पीढ़ी के बीच का तनाव सिर्फ इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि कोई भी अपने अधिकारों और अहंकार को छोड़ने को तैयार नहीं है? आपकी इस बारे में क्या राय है—क्या रिश्तों को बचाए रखने के लिए बड़ों द्वारा अपनी बागडोर नई पीढ़ी को सौंप देना ही सही समझदारी है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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