स्वाभिमान की दहलीज

 जब कनक बदहवास होकर अपने मायके लौटी और भाई-भाभी को सच बताया, तो नीलिमा ने अपनी गलती मानने के बजाय सारा दोष किस्मत पर मढ़ दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। चंद हफ्तों बाद जब कनक को उल्टियां होने लगीं और डॉक्टर ने पुष्टि की कि वह गर्भवती है, तो कनक के मन में अपने आने वाले बच्चे को लेकर एक उम्मीद जागी थी कि शायद वह इस नन्ही सी जान के सहारे अपनी जिंदगी दोबारा संवार लेगी।

शाम के सात बज चुके थे और कनक दिनभर बुटीक में सिलाई-कढ़ाई का काम निपटाकर थके कदमों से घर लौटी थी। उसके बदन का एक-एक जोड़ दर्द से कराह रहा था, पर जैसे ही उसने मुख्य दरवाजे पर दस्तक दी, दरवाजा उसकी भाभी नीलिमा ने खोला। नीलिमा के चेहरे पर वही चिरपरिचित बेरुखी थी, जो पिछले दो सालों से कनक की नियति बन चुकी थी। नीलिमा ने हाथ में लगा पर्स ठीक करते हुए तीखे स्वर में कहा, “अरे कनक, तुम आ गईं? अच्छा सुनो, मैं और तुम्हारे भैया आज रात मॉल जा रहे हैं और डिनर भी किसी अच्छे रेस्टोरेंट में ही करेंगे। तुम्हारे लिए रसोई में कोई खाना नहीं बना है, अपना खुद कुछ बना लेना। और हां, गोलू कमरे में सो रहा है, उसकी नींद कच्ची है, जरा ख्याल रखना। हम आधी रात तक ही लौट पाएंगे।”

कनक ने एक थकी हुई सांस भीतर खींचते हुए धीमे से सिर हिलाया, “जी भाभी।”

पास ही खड़े उसके बड़े भाई आकाश ने एक पल के लिए अपनी नजरें चुराईं। शायद उसके भीतर का सोया हुआ भाई कुछ पलों के लिए जागा, तो उसने धीरे से कहा, “कनक, अगर तुम कहो तो मैं लौटते वक्त तुम्हारे लिए कुछ पैक करवा लूँ?”

इससे पहले कि कनक कुछ कह पाती, नीलिमा ने तुनककर आकाश का हाथ खींचा, “अरे आप भी न, हम दो-तीन घंटे बाद लौटेंगे। तब तक क्या यह भूखी बैठी रहेगी? हाथ-पैर सलामत हैं, दो रोटियां खुद सेंक लेगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। चलिए अब, देर हो रही है।”

आकाश ने अपनी पत्नी की बात पर बिना कोई प्रतिवाद किए सिर झुका लिया और कार की चाबी घुमाते हुए बाहर निकल गया। कनक दरवाजे की चौखट पर खड़ी उनकी गाड़ी की लाल बत्तियों को अंधेरे में ओझल होते देखती रही। उसके दिल में एक गहरी टीस उठी। यह कोई आज की बात नहीं थी। जब से कनक का वैवाहिक जीवन तबाह हुआ था और वह इस घर में दोबारा लौटी थी, तब से हर हफ्ते, हर दिन का यही दस्तूर बन चुका था। नीलिमा दिनभर घर पर रहकर भी कनक के लिए एक निवाला तक नहीं छोड़ती थी, और सगा भाई, जो कभी कनक की एक छींक पर पूरा घर सिर पर उठा लेता था, अब अपनी पत्नी के इशारों पर नाचने वाली बेजान मूरत बन चुका था।

कनक ने भारी मन से अपने जूते उतारे, हाथ-मुंह धोया और रसोई में जाकर दो सूखी रोटियां और थोड़ी सी दाल तैयार की। भूख तो जैसे मर चुकी थी, फिर भी जीने की मजबूरी में उसने चंद कौर गले से नीचे उतारे। बर्तन समेटकर जैसे ही वह अपने छोटे से कमरे में सोने के लिए गई, तभी बगल के कमरे से तीन साल के गोलू के रोने की तीखी आवाज गूंज उठी।

कनक तुरंत भागकर उस कमरे में गई। गोलू डरकर उठ बैठा था और पसीने से भीगा हुआ जोर-जोर से बिलख रहा था। कनक ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया, पीठ थपथपाई, पानी पिलाने की कोशिश की, मगर बच्चे का रोना बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था। शायद उसे हल्का बुखार भी था। आधा घंटा बीत गया, कनक की बाहें दर्द से सुन्न पड़ने लगीं। जब गोलू किसी भी तरह शांत नहीं हुआ, तो घबराकर कनक ने अपने भाई आकाश का नंबर मिलाया।

फोन की घंटी बजी और आकाश ने उठाया, “हाँ कनक, क्या हुआ?”

“भैया, आप लोग कहाँ हैं? गोलू बहुत तेज रो रहा है और उसका बदन भी तप रहा है। वह बिल्कुल चुप नहीं हो रहा, प्लीज आप जल्दी घर आ जाइए…” कनक की आवाज में घबराहट थी।

तभी फोन के उस पार से झपटकर फोन छीनने की आवाज आई और नीलिमा की कर्कश आवाज गूंजी, “कनक, तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? हम अभी-अभी तो पिक्चर हॉल में बैठे हैं। ज़रा सा बच्चा संभालना भारी पड़ रहा है तुम्हें? मुफ्त की रोटियां तोड़ती हो और एक भतीजा तुमसे संभाला नहीं जाता! अगर तुम्हारा अपना बच्चा होता, तो क्या उसे भी ऐसे ही छोड़कर किसी और पर डाल देती?”

और इसके साथ ही फोन कट गया। कॉल कटने की आवाज के बाद कमरे में पसरा सन्नाटा कनक के कानों में सीसे की तरह पिघलकर उतर गया।

‘अगर तुम्हारा अपना बच्चा होता…’ यह वाक्य कनक के दिल पर खंजर की तरह लगा। उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। कनक ने रोते हुए गोलू को अपनी बाहों में कस लिया और फर्श पर बैठ गई। उसका मन अतीत के उस काले पन्ने की ओर खिंचता चला गया, जिसे वह भूलने की लाख कोशिश करती थी, मगर यह परिवार उसे हर दिन उसी आग में धकेलता था।

“मेरा बच्चा… मेरा बच्चा तो तुम दोनों ने इस दुनिया में सांस लेने तक नहीं दिया…” कनक सिसक-सिसक कर बुदबुदाने लगी।

वह भयानक मंजर उसकी आंखों के सामने घूम गया। माता-पिता के अचानक एक सड़क हादसे में गुजर जाने के बाद कनक पूरी तरह अपने भाई आकाश पर आश्रित हो गई थी। तब नीलिमा ने आकाश के कान भरने शुरू किए कि कनक की शादी जल्द से जल्द कर दी जाए ताकि घर की जिम्मेदारी खत्म हो। नीलिमा ने अपने एक दूर के रिश्तेदार, निशांत का रिश्ता कनक के लिए ढूंढा। निशांत लंदन में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था और उसका परिवार चंडीगढ़ में रहता था।

जब आकाश ने थोड़ी हिचकिचाहट दिखाई कि लड़के के बारे में पूरी तहकीकात कर लेनी चाहिए, तो नीलिमा ने अपनी चालाकियों का जाल बिछाया था, “अरे आप अपनी बहन का भला नहीं चाहते क्या? लड़का लंदन में सेटल है, लाखों की कमाई है। मेरी मौसी के खास जानकार हैं, कोई कमी नहीं है। जल्दी में हैं क्योंकि उनकी छुट्टियां खत्म होने वाली हैं। अगर यह मौका हाथ से निकल गया तो कनक के लिए इतना अच्छा घर कभी नहीं मिलेगा।”

भाई ने अपनी पत्नी के झूठे दावों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया। बिना किसी गहरी छानबीन के, जल्दबाजी में मंगनी हुई और एक हफ्ते के भीतर कनक की शादी निशांत से कर दी गई। शादी के महज पंद्रह दिन बाद निशांत यह कहकर लंदन लौट गया कि वह जल्द ही कनक का वीजा लगवाकर उसे अपने पास बुला लेगा।

मगर कनक के सपनों का महल बहुत जल्द ताश के पत्तों की तरह ढह गया। शादी के दो महीने बाद ससुराल में रहते हुए जब कनक के हाथ कुछ पुराने दस्तावेज और निशांत का लैपटॉप लगा, तो सच्चाई सामने आई। निशांत ने लंदन में पहले ही एक ब्रिटिश महिला से शादी कर रखी थी और वह केवल अपने बूढ़े मां-बाप का दिल रखने और यहां से कुछ पुश्तैनी संपत्ति के मसले सुलझाने के लिए भारत आकर दूसरी शादी का नाटक कर गया था। उसका कनक को विदेश ले जाने का कोई इरादा ही नहीं था।

जब कनक बदहवास होकर अपने मायके लौटी और भाई-भाभी को सच बताया, तो नीलिमा ने अपनी गलती मानने के बजाय सारा दोष किस्मत पर मढ़ दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। चंद हफ्तों बाद जब कनक को उल्टियां होने लगीं और डॉक्टर ने पुष्टि की कि वह गर्भवती है, तो कनक के मन में अपने आने वाले बच्चे को लेकर एक उम्मीद जागी थी कि शायद वह इस नन्ही सी जान के सहारे अपनी जिंदगी दोबारा संवार लेगी।

लेकिन नीलिमा के मन में कुछ और ही षड्यंत्र चल रहा था। नीलिमा ने आकाश को भड़काया, “अगर यह बच्चा पैदा हो गया, तो कनक का सारा जीवन बर्बाद हो जाएगा। समाज में क्या मुंह दिखाएंगे? और फिर बिन ब्याही जैसी हालत में तलाकशुदा औरत को बच्चे के साथ कौन अपनाएगा? इसकी दूसरी शादी कभी नहीं हो पाएगी। हमारे ऊपर ताउम्र इसका और इसके बच्चे का बोझ रहेगा। बेहतर यही है कि इसका गर्भपात करवा दिया जाए और कानूनी तौर पर तलाक ले लिया जाए।”

कनक ने रो-रोकर अपने भाई के पैर पकड़े थे, “भैया, यह मेरे जिगर का टुकड़ा है। मैं कोई दूसरी शादी नहीं करूंगी। मैं खुद मजदूरी कर लूंगी, अपना और अपने बच्चे का पेट पाल लूंगी, बस मेरे बच्चे को मत मारो।”

लेकिन आकाश अपनी पत्नी के खौफ और उसकी चालाकियों के आगे पूरी तरह अंधा हो चुका था। उसने अपनी सगी बहन की चीखों को अनसुना कर दिया। नीलिमा और आकाश ने मिलकर दबाव बनाया और जबरन कनक का अबॉर्शन करवा दिया गया। उस दिन कनक का सिर्फ गर्भपात नहीं हुआ था, उसके भीतर उस भाई के प्रति सारा प्यार, आदर और विश्वास भी हमेशा के लिए मर चुका था।

तलाक के कागजों पर दस्तखत होने के बाद कनक ने तय किया कि वह इस घर में किसी का मुफ्त अहसान नहीं लेगी। उसने पास के ही एक प्रसिद्ध लेडीज बुटीक और फैशन डिजाइनिंग सेंटर में कटिंग और सिलाई का काम शुरू कर दिया। दिनभर कड़ी मेहनत करके वह जो पैसे कमाती, उसमें से आधा हिस्सा राशन के नाम पर भाभी के हाथ में रख देती। फिर भी घर का सारा झाड़ू-पोछा, बर्तन और गोलू की देखभाल की जिम्मेदारी कनक के कमजोर कंधों पर ही रहती। भाभी को मुफ्त की नौकरानी मिल गई थी और भाई को लगता था कि उसने अपनी बहन को सिर छुपाने की छत देकर उस पर बहुत बड़ा उपकार कर दिया है।

“आह…” कनक के सीने से एक दर्द भरी आह निकली। रोते-रोते गोलू अब उसकी गोद में सो चुका था। कनक ने धीरे से बच्चे को बिस्तर पर लिटाया और उसकी चादर ठीक की। ठीक उसी समय मुख्य दरवाजे की घंटी बजी और ताले में चाबी घूमने की आवाज आई।

रात के बारह बज रहे थे। कनक ने अपने दुपट्टे से अपने आंसुओं को पोंछा। आज उसके भीतर वर्षों से जमा हुआ घूंट-घूंट कर जीने वाला डर अचानक गायब हो चुका था। उसकी रगों में अपमान की जगह एक अजीब सी ठंडी दृढ़ता बह रही थी। उसने खुद को संभाला और कमरे से बाहर निकलकर ड्राइंग रूम में आई।

दरवाजा खोलते ही नीलिमा अंदर आई और चिढ़ते हुए पर्स सोफे पर पटक कर बोली, “क्या कनक, तुम भी ना! बार-बार फोन करके पूरा मूड खराब कर दिया। मूवी का इंटरवल भी ढंग से नहीं देख पाए हम। अब बताओ, क्या हुआ तुम्हारे लाडले को? सो ही तो रहा है आराम से!”

आकाश भी पीछे-पीछे जूते उतारते हुए चुपचाप खड़ा था।

कनक ने एक गहरी सांस ली। उसकी नजरें नीलिमा से हटकर सीधे अपने भाई आकाश के चेहरे पर टिक गईं। कनक की आवाज में कोई कंपन नहीं था, बिल्कुल शांत और सपाट स्वर में उसने कहा, “भैया, कल सुबह मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ। मैंने बुटीक के पास ही अपने लिए एक छोटा सा कमरा किराए पर देख लिया है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। आकाश की आंखें फटी की फटी रह गईं। नीलिमा भी अवाक रह गई। उसे उम्मीद नहीं थी कि जिस लड़की को उसने हमेशा पैरों तले दबाकर रखा, वह कभी सिर उठाकर यह फैसला ले सकती है।

नीलिमा का रंग उड़ गया, क्योंकि अगर कनक चली जाती तो घर के सारे काम और बच्चे की जिम्मेदारी फिर से उसी के सिर पर आ जाती, साथ ही कनक की कमाई का हिस्सा भी छिन जाता। नीलिमा तुरंत मीठी बनते हुए बोली, “अरे कनक! यह तुम क्या कह रही हो? हमने तो बस यूं ही गुस्से में कह दिया था। अपने ही घर से कोई ऐसे जाता है क्या? समाज क्या कहेगा कि हमने अपनी बहन को निकाल दिया? आकाश, समझाइए ना इसे!”

आकाश आगे बढ़ा, “कनक, तू पागल हो गई है क्या? अकेली लड़की बाहर कैसे रहेगी? यहां तुझे क्या कमी है?”

कनक ने पहली बार अपने भाई की आंखों में आंखें डालकर कहा, “कमी सिर्फ एक चीज की है भैया—इंसान समझे जाने की। आपने और भाभी ने मुझे सिर्फ एक बेजुबान कठपुतली समझा, जिसकी डोर आप जब चाहे अपने स्वार्थ के लिए खींचते रहे। मेरे सपनों का कत्ल किया, मेरे अजन्मे बच्चे की जान ली, और बदले में मुझे सिर्फ जिल्लत और बेबसी दी। अब और नहीं। मैं अब अपनी जिंदगी की डोर अपने हाथों में रखना चाहती हूँ।”

अगली ही सुबह, कनक ने अपने कुछ जरूरी कपड़े, अपनी सिलाई की मशीन और जरूरी दस्तावेज एक सूटकेस में समेटे और उस घर की दहलीज को हमेशा के लिए पार कर गई। नीलिमा और आकाश चौखट पर खड़े उसे देखते ही रह गए, मगर कनक ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कनक ने शहर के एक शांत इलाके में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। वह दिन में बुटीक में काम करती और शाम को अपने कमरे में महिलाओं के कपड़ों की डिजाइनिंग का काम लेती। कनक के हाथों में हुनर था और उसके स्वभाव में ईमानदारी। बहुत जल्द उसके बनाए कपड़ों की मांग बढ़ने लगी।

उस बुटीक में अक्सर एक संभ्रांत और दयालु महिला, श्रीमती शारदा जी, आया करती थीं। शारदा जी एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं। वह कनक के काम, उसकी शालीनता और उसके शांत चेहरे के पीछे छिपे गहरे दर्द को भांप चुकी थीं। धीरे-धीरे बातों-बातों में शारदा जी ने कनक के जीवन की पूरी सच्चाई जान ली। कनक ने भी बिना कुछ छिपाए अपनी पिछली जिंदगी की हर सच्चाई उनके सामने रख दी।

एक दिन शारदा जी ने कनक का हाथ अपने हाथों में लिया और बेहद ममता भरे स्वर में कहा, “कनक, बीता हुआ कल इंसान की तकदीर तय नहीं करता। तकदीर वो होती है जो हम अपने आत्मसम्मान से लिखते हैं। मेरा एक बेटा है, मानस। एक आईटी कंपनी में काम करता है। तीन साल पहले उसकी पत्नी एक गंभीर बीमारी के कारण चल बसी थी। उसका एक चार साल का बेटा है, आरव। मानस ने तब से खुद को काम और बेटे तक ही सीमित कर रखा है। मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों एक बार मिलो। अगर तुम दोनों को लगे कि तुम एक-दूसरे का सहारा बन सकते हो, तो मैं तुम्हें अपनी बहू बनाना चाहती हूँ।”

कनक पहले तो हिचकिचाई, मगर शारदा जी के स्नेह और सम्मान को देखकर उसने मानस से मिलने की सहमति दे दी।

रविवार को एक शांत कैफे में कनक और मानस की मुलाकात हुई। मानस बेहद सुलझा हुआ, गंभीर और संवेदनशील इंसान था। उसने कनक से कोई बनावटी बातें नहीं कीं। उसने सीधे शब्दों में कहा, “कनक जी, मेरी मां ने मुझे आपके बारे में सब बताया है। जिंदगी ने हम दोनों से बहुत कुछ छीना है। मैं आपके अतीत का कोई हिसाब नहीं चाहता, न ही मैं आपको किसी एहसान के तहत अपनाना चाहता हूँ। मुझे अपने बेटे के लिए एक ममतामयी मां और अपने लिए एक सच्ची जीवनसंगिनी चाहिए, जिसे मैं बराबरी का सम्मान दे सकूं। अगर आप तैयार हों, तो हम मिलकर एक नया आशियाना बना सकते हैं।”

मानस की सादगी, उसकी सच्चाई और आंखों में झलकता सम्मान कनक के दिल को छू गया। कनक को लगा कि बरसों बाद किसी ने उसे एक बोझ नहीं, बल्कि एक इंसान समझा है।

दोनों परिवारों की रजामंदी से, सादे तरीके से एक मंदिर में कनक और मानस का विवाह संपन्न हुआ। जब कनक ने मानस के घर में कदम रखा, तो छोटे से आरव ने दौड़कर उसकी उंगली पकड़ ली। कनक ने झुककर उस मासूम को सीने से लगा लिया। उस पल कनक की सूनी गोद जैसे भर गई थी। जिस ममता को उसके अपनों ने बेरहमी से छीन लिया था, नियति ने उसे आरव के रूप में दोबारा लौटा दिया था।

मानस ने कनक के हुनर को कभी दबने नहीं दिया, बल्कि उसने कनक को उसका खुद का एक नया बुटीक खुलवाकर दिया। आज कनक एक सफल व्यवसायी, एक सम्मानित पत्नी और एक लाडले बेटे की खुशहाल मां थी।

एक दिन जब कनक अपने आलीशान बुटीक में बैठी थी, तो उसने देखा कि बाहर सड़क से उसका भाई आकाश और भाभी नीलिमा सिर झुकाए गुजर रहे थे। कनक ने सुना था कि नीलिमा के फिजूलखर्चों और आपसी झगड़ों के कारण उनका घर कर्ज में डूब चुका था। कनक के मन में न तो उनके प्रति कोई नफरत बची थी और न ही कोई पश्चाताप। उसने सिर्फ आसमान की ओर देखा और ईश्वर का धन्यवाद किया कि उस रात उसने उस अपमान भरी दहलीज को लांघने का साहस जुटाया था। उसके अपने एक सही और साहसी निर्णय ने उसका पूरा जीवन हमेशा के लिए बदल दिया था।

दोस्तों, अक्सर औरतें परिवार और तथाकथित ‘रिश्तों की मर्यादा’ के नाम पर हर जुल्म, हर अपमान चुपचाप सहती रहती हैं। लेकिन क्या मजबूरी के नाम पर स्वाभिमान का सौदा करना सही है? क्या कनक का उस स्वार्थी परिवार को छोड़कर अपने दम पर जीने का फैसला सही था? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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