रस की मिठास

 “मां, आज अगर मैं रसोई में जाकर भाभी का हाथ नहीं बंटाती, तो शायद यह मिठाई ना बनती। लेकिन जब हम दोनों ने मिलकर इसे बनाया, तो यह और भी मीठी हो गई। बहू कोई मशीन नहीं होती मां, वह भी इंसान है। उसे नुक्स निकालने वाली सास की नहीं, एक ऐसी मां की ज़रूरत होती है जो कहे—’कोई बात नहीं बहू, तू थक गई है, ला थोड़ा मैं कर देती हूं।’ जब आप बहू को बेटी मानेंगी, तभी तो वह आपको दिल से मां कह पाएगी।”

 विवाह को अभी महज छह महीने ही तो बीते थे, लेकिन इस घर की हर सुबह उसके लिए एक नई अग्निपरीक्षा जैसी साबित होती थी। एम.ए. की पढ़ाई पूरी करके जब वह इस प्रतिष्ठित परिवार में ब्याह कर आई थी, तो उसने सोचा था कि प्यार और सम्मान से वह सबका दिल जीत लेगी। मगर उसकी सास, कल्याणी देवी, पुराने ढर्रे और कठोर अनुशासन की पक्की मिसाल थीं। उनके लिए आदर्श बहू की परिभाषा वही थी जो दशकों पहले उनके ज़माने में गढ़ी गई थी—पलकें झुकी हुई, ज़बान बंद और हर फरमाइश पलक झपकते ही पूरी।

“अरे अनघा! कितनी देर लगाएगी री? मौसी जी आए आधा घंटा बीत गया, तेरी वो अदरक वाली चाय अभी तक चूल्हे पर ही खौल रही है क्या?” बैठक से कल्याणी देवी की तीखी और रौबदार आवाज सीधे रसोई तक तैरती हुई आई।

अनघा के हाथ कांप उठे। उसने तुरंत ट्रे सजाई—गरमा-गरम चाय, बेसन के मट्ठे और नमकीन पारे। चेहरे पर बनावटी सहजता लाते हुए वह बैठक में पहुंची और झुककर मौसी जी के पैर छुए।

“जी मम्मी जी, बस छान ही रही थी। मौसी जी, लीजिए चाय,” अनघा ने धीमी आवाज में कहा।

कल्याणी देवी ने चाय की चुस्की लेते ही माथे पर बल डाल लिए और मौसी जी की तरफ मुखातिब होकर व्यंग्य से बोलीं, “क्या कहें जीजी! आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों के ढब ही न्यारे हैं। सिर पर पल्लू भले ही रख लें, पर हाथों में वो फुरती कहां जो हमारे ज़माने में होती थी। हमारी सास तो बस खांस भर देती थीं और हम समझ जाते थे कि उन्हें क्या चाहिए। और आज देखो, चार किताबें क्या रट लीं, अपने आगे किसी को कुछ समझती ही नहीं। ढंग से दस मिनट में नाश्ता परोसना नहीं आता, बात करेंगे बड़े-बड़े उसूलों की!”

मौसी जी ने मुस्कुराकर बस सिर हिला दिया, पर अनघा के सीने में ये शब्द तीर की तरह चुभ गए। वह चुपचाप नजरें नीची किए रसोई में लौट आई। उसकी आंखों के कोरों से दो बूंद आंसू छलक कर सिंक में गिर पड़े। उसने तो मौसी जी के आने के ठीक पंद्रह मिनट के भीतर सब कुछ तैयार कर दिया था, फिर भी हर बात में कमी निकालना, बात-बात पर उसके मायके के संस्कारों को कटघरे में खड़ा करना कल्याणी देवी की आदत बन चुकी थी। अनघा के पति, मयंक, एक समझदार इंसान थे, पर मां के सामने उनकी भी आवाज मद्धम पड़ जाती थी। वह अक्सर अनघा को समझाते, “मां का दिल बुरा नहीं है अनघा, बस उनका मिज़ाज थोड़ा पुराना है। धीरे-धीरे सब समझ जाएंगी।” अनघा इसी तसल्ली के सहारे हर दिन अपनी सहनशीलता की सीमा को बढ़ाती जा रही थी।

दो दिन बाद घर में एक विशेष हलचल होने वाली थी। कल्याणी देवी की इकलौती लाडली बेटी, नलिनी, अपने ससुराल से मायके आने वाली थी और उसके साथ उसके पति, यानी घर के दामाद जी, देवाशीष भी आ रहे थे। पूरे परिवार के लिए यह किसी उत्सव से कम नहीं था।

शाम को कल्याणी देवी रसोई में दाखिल हुईं और अनघा के हाथ में सामान की एक लंबी फेहरिस्त थमाते हुए कड़े स्वर में बोलीं, “सुन अनघा, परसों नलिनी और दामाद जी आ रहे हैं। देवाशीष बाबू का मिजाज़ तो तू जानती ही है, बड़े खानदान के हैं और खाने-पीने के बेहद शौकीन हैं। खाने में कोई कोर-कसर नहीं रहनी चाहिए। मटर पनीर, दाल मखनी, कचौड़ियां, पुलाव सब वक्त पर तैयार मिले। और हां, सबसे ज़रूरी बात—दामाद जी को खोए की रसमलाई और रसगुल्ले से ज़्यादा गरमा-गरम गुलाब जामुन पसंद हैं। हलवाई से नहीं मंगाना, घर के बने शुद्ध मावे के गुलाब जामुन ही उन्हें भाते हैं। तो खाने के बाद के लिए वह ज़रूर बनने चाहिए। समझ गई ना?”

अनघा ने सिर झुकाकर कहा, “जी मम्मी जी, मैं सब बना दूंगी।”

परसों की सुबह सूरज उगने से पहले ही अनघा के लिए एक इम्तिहान बनकर आई। कल्याणी देवी ने सुबह-सुबह ही काम की गति देखने के लिए रसोई के चक्कर लगाने शुरू कर दिए थे। अनघा सुबह पांच बजे से चूल्हे के सामने खड़ी थी। उसने पनीर की सब्जी दम पर चढ़ाई, कचौड़ियों के लिए दाल की पिठ्ठी भूनकर आटा गूंथा, सलाद काटा, रायता बनाया और कई तरह की चटनियां पीसीं। घर के बाकी काम, मेहमानों के कमरे की चादरें बदलना, बैठक की सजावट—सब कुछ अनघा की उंगलियों के इशारे पर हो रहा था। पसीने से तरबतर अनघा बस घड़ी की सुइयों को देख रही थी।

दोपहर के बारह बजे दरवाजे पर गाड़ी रुकी। नलिनी और देवाशीष का आगमन हुआ। घर में हंसी-ठहाकों की बहार आ गई। कल्याणी देवी अपने दामाद के स्वागत में आरती की थाली सजाए खड़ी थीं और अपनी बेटी को गले लगाकर जैसे निहाल हो गई थीं। देवाशीष का आदर-सत्कार पूरे ठाठ से हुआ।

अनघा ने मुस्कुराते हुए नलिनी का स्वागत किया। नलिनी स्वभाव से बहुत सुलझी हुई, समझदार और संवेदनशील लड़की थी। उसने तुरंत अपनी भाभी के थके हुए चेहरे और माथे की लकीरों को भांप लिया। उसने अनघा का हाथ दबाकर फुसफुसाते हुए कहा, “भाभी, आप इतनी परेशान क्यों लग रही हैं? सब ठीक है ना?”

अनघा ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “हां नलिनी, बस खाने की तैयारी कर रही थी।”

दोपहर के डेढ़ बजे सब लोग डाइनिंग टेबल पर भोजन के लिए बैठे। मयंक, देवाशीष, ससुर जी और कल्याणी देवी कुर्सियों पर विराजमान थे, जबकि अनघा एक-एक करके गरमा-गरम कचौड़ियां और पूड़ियां परोस रही थी। खाने की हर व्यंजन की देवाशीष ने दिल खोलकर तारीफ की। “वाह सासू मां! मटर पनीर का स्वाद तो लाजवाब है और कचौड़ियां तो बिल्कुल खस्ता बनी हैं। मज़ा आ गया!”

कल्याणी देवी गर्व से फूलकर कुप्पा हो गईं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे दामाद जी, हमारे घर में अन्नपूर्णा का वास है। आप बस मन भरकर खाइए। और ठहरिए, अभी तो मुख्य आकर्षण बाकी है। मुझे याद है आपको खाने के बाद मीठे में क्या पसंद है। अरे अनघा! ज़रा दामाद जी के लिए वो गरमा-गरम गुलाब जामुन तो ले आ, जो सुबह से बनवा कर रखे हैं।”

कल्याणी देवी के मुंह से “गुलाब जामुन” शब्द निकलते ही अनघा के पैरों तले मानो पूरी ज़मीन खिसक गई।

अनघा का दिल एक पल के लिए जैसे धड़कना ही भूल गया। उसका चेहरा फक पड़ गया। सुबह के काम के अंधाधुंध दबाव में, मसालों और कचौड़ियों की आपाधापी के बीच, वह मावे के गुलाब जामुन बनाना पूरी तरह भूल चुकी थी! मावा फ्रिज के एक कोने में वैसा का वैसा ही रखा रह गया था। अनघा के गले में कांटों सा सूखापन महसूस होने लगा। अगर वह अभी जाकर कल्याणी देवी को सच बता देती कि वह गुलाब जामुन बनाना भूल गई है, तो पूरे परिवार और दामाद के सामने कल्याणी देवी आगबबूला हो जातीं। उसके मायके, उसकी परवरिश और उसकी योग्यता पर तानों की ऐसी बौछार होती कि वह शर्म से पानी-पानी हो जाती।

घबराए कदमों से अनघा रसोई की ओर भागी। रसोई में पहुंचकर उसने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसकी सांसें फूल रही थीं। वह रसोई के चक्कर काटने लगी—अब क्या करे? क्या दुकान से मंगवाए? पर इतनी जल्दी दुकान से लाना नामुमकिन था, और सास तो घर के बने ताजे गुलाब जामुन का बखान कर चुकी थीं। आंखों से लाचारी के आंसू बहने लगे।

तभी पीछे से किसी ने अनघा के कंधे पर बहुत नरमी से हाथ रखा।

अनघा ने पलटकर देखा तो सामने नलिनी खड़ी थी।

“क्या बात है भाभी? आप इतनी बदहवास क्यों हैं? आप रो रही हैं?” नलिनी ने चिंता से पूछा।

अनघा की हिचकियां बंध गईं। उसने कांपती आवाज में कहा, “नलिनी… मुझसे बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। सुबह इतने सारे काम थे कि मैं… मैं दामाद जी के लिए गुलाब जामुन बनाना भूल गई। मावा वैसे ही फ्रिज में रखा है। अब मम्मी जी सबको कह चुकी हैं… अगर उन्हें पता चला तो वे मुझे कभी माफ नहीं करेंगी। दामाद जी के सामने मेरी वजह से घर की नाक कट जाएगी।”

नलिनी ने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ लिया। उसने देखा कि उसकी भाभी सिर्फ एक गलती की वजह से नहीं, बल्कि अपनी सास के डर और तानों के खौफ से कांप रही थी। नलिनी ने एक पल सोचा और फिर अनघा के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछते हुए मुस्कुराई।

“भाभी, आप शांत हो जाइए। जब तक नलिनी यहां है, अपनी भाभी की आंख में आंसू नहीं आने देगी। आप ज़रा भी घबराइए मत,” नलिनी ने दृढ़ता से कहा।

नलिनी फौरन डाइनिंग हॉल की तरफ गई, जहां देवाशीष हाथ धोने की तैयारी कर रहे थे। नलिनी ने लाड़ भरे अंदाज़ में कहा, “अरे मां! इतनी जल्दी क्या है गुलाब जामुन की? देवाशीष जी को खाने के तुरंत बाद मीठा खाने की आदत नहीं है। हम सब पहले हाथ धोकर आराम से बैठक के सोफे पर बैठते हैं, बातें करेंगे और फिर गरमा-गरम गुलाब जामुन का आनंद लेंगे। भाभी को भी थोड़ा सांस लेने दीजिए।”

कल्याणी देवी ने बेटी की बात मान ली, “हां-हां, जैसी तुम्हारी मर्जी। दामाद जी, चलिए बैठक में बैठते हैं।”

जैसे ही सब लोग बैठक की ओर बढ़े, नलिनी दौड़कर रसोई में आ गई। उसने तुरंत अनघा से कहा, “भाभी, खोया निकालिए और मैदा कहां है? चाशनी का पतीला चढ़ाइए!”

अनघा ने चौंककर देखा, “नलिनी, इसमें तो बहुत वक्त लगेगा…”

“नहीं भाभी, हम दोनों मिलकर करेंगे तो चुटकियों में हो जाएगा। आप चाशनी में इलायची और केसर डालिए, मैं मावा और छेना मसलती हूं,” नलिनी ने अपनी चूड़ियां ऊपर चढ़ाते हुए कहा।

अगले बीस मिनट तक रसोई में एक चमत्कार जैसा माहौल था। नंद और भाभी, दोनों एक-दूसरे के हाथ से हाथ मिलाकर काम कर रही थीं। नलिनी ने मावे को अपनी हथेलियों से इतनी नफासत से मसला कि वह बिल्कुल मक्खन जैसा मुलायम हो गया। अनघा ने दूसरी तरफ मध्यम आंच पर चाशनी तैयार कर दी और कढ़ाई में शुद्ध घी चढ़ा दिया। दोनों ने मिलकर तेजी से गोल-गोल, बिना किसी दरार के, सुंदर गुलाब जामुन बांटे।

घी में जब वे भूरे सुनहरे होकर तैरने लगे, तो उनकी सोंधी खुशबू ने रसोई को महका दिया। तले हुए गुलाब जामुनों को तुरंत गरम चाशनी में डुबो दिया गया। चाशनी ने रस को सोखना शुरू किया और वे खिलकर बड़े हो गए। अनघा के चेहरे पर जो रंगत उड़ी हुई थी, वह धीरे-धीरे विश्वास में बदलने लगी। उसने नलिनी की तरफ देखा, उसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे।

“नलिनी… अगर आज तुम ना होती तो…” अनघा का गला भर आया।

नलिनी ने अनघा के हाथ पर अपना हाथ रखा और बोली, “भाभी, यह घर जितना मां का है, उतना ही आपका भी है। आप सुबह पांच बजे से हमारे लिए खट रही हैं, अगर इंसान से एक चीज़ छूट भी गई तो इसमें इतना डरने की क्या बात है? रिश्ते गलतियां ढूंढने के लिए नहीं, एक-दूसरे का हाथ थामने के लिए होते हैं। चलिए, अब ये सजे हुए कटोरे लेकर बाहर चलते हैं।”

थोड़ी ही देर बाद, अनघा चांदी के सुंदर कटोरों में भाप छोड़ते, केसरिया चाशनी में डूबे गुलाब जामुन लेकर बैठक में पहुंची। ऊपर से पिस्ते और बादाम की कतरन सजी हुई थी।

कल्याणी देवी ने इतराते हुए कहा, “लीजिए दामाद जी, चखिए हमारे घर के गुलाब जामुन।”

देवाशीष ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में रखा, उनके चेहरे पर तृप्ति की मुस्कान छा गई। “अरे वाह! क्या कमाल का स्वाद है। इतने मुलायम और रसीले गुलाब जामुन मैंने आज तक नहीं खाए। बिल्कुल मुंह में घुल गए! सासू मां, आपकी बहू के हाथों में तो वाकई जादू है।”

कल्याणी देवी ने अपनी बड़ाई समझकर गर्व से सीना तान लिया, “देखा दामाद जी, मैंने कहा था ना! हमारे घर का सलीका ही अलग है।”

तभी नलिनी सोफे से उठी और अपनी मां के पास जाकर बैठ गई। उसने कल्याणी देवी का हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत ही शांत, गंभीर लेकिन आदरपूर्ण स्वर में बोली, “मां, आज आपको एक सच बताना है।”

सब लोग चौंक गए। कल्याणी देवी ने पूछा, “कैसा सच बिटिया?”

नलिनी ने मुस्कुराते हुए अनघा की तरफ देखा, जो सहमी हुई खड़ी थी। नलिनी बोली, “मां, ये जो गुलाब जामुन दामाद जी इतनी तारीफ से खा रहे हैं ना, ये अभी बीस मिनट पहले बने हैं। सुबह से भाभी इतने सारे काम अकेले कर रही थीं कि उनकी तबियत ढीली होने के बावजूद वे आपकी दी हुई पूरी लिस्ट बनाती रहीं। इस भागदौड़ में वे गुलाब जामुन बनाना भूल गई थीं। और जब आपने डाइनिंग टेबल पर आवाज़ दी, तो भाभी रसोई में खड़ी डर के मारे कांप रही थीं और रो रही थीं।”

कल्याणी देवी के चेहरे का रंग बदलने लगा, “क्या? भूल गई थी?”

“हां मां, भूल गई थीं,” नलिनी ने बात काटते हुए बड़े प्यार से समझाया, “और वो इसलिए नहीं रो रही थीं कि काम बढ़ गया, बल्कि इसलिए रो रही थीं कि अगर मां जी को पता चला तो वे फिर उनके संस्कारों और मायके पर ताना मारेंगी। मां, जब मैं ससुराल गई थी, तो आपने मुझे विदा करते वक्त क्या सिखाया था? यही ना कि ससुराल में सबको अपना समझना, सास को अपनी मां मानना। तो क्या यह बात बहू पर लागू नहीं होती? भाभी भी तो किसी की लाडली बेटी हैं। सुबह पांच बजे से वे हमारे लिए पकवान बना रही थीं, अगर एक चीज़ छूट गई, तो क्या उनका सारा समर्पण शून्य हो गया? अगर बहू को अपनी ही सास से अपनी भूल स्वीकार करने में इतना खौफ लगे कि उसके हाथ कांपने लगें, तो सोचिए कमी बहू में है या हमारे अपनत्व में?”

नलिनी की बातें बैठक में सन्नाटा खींच लाईं। देवाशीष, मयंक और ससुर जी सब खामोश होकर सुन रहे थे।

नलिनी ने आगे कहा, “मां, आज अगर मैं रसोई में जाकर भाभी का हाथ नहीं बंटाती, तो शायद यह मिठाई ना बनती। लेकिन जब हम दोनों ने मिलकर इसे बनाया, तो यह और भी मीठी हो गई। बहू कोई मशीन नहीं होती मां, वह भी इंसान है। उसे नुक्स निकालने वाली सास की नहीं, एक ऐसी मां की ज़रूरत होती है जो कहे—’कोई बात नहीं बहू, तू थक गई है, ला थोड़ा मैं कर देती हूं।’ जब आप बहू को बेटी मानेंगी, तभी तो वह आपको दिल से मां कह पाएगी।”

नलिनी के एक-एक शब्द ने कल्याणी देवी के भीतर वर्षों से जमी अहंकार और रूढ़िवादिता की बर्फ को पिघला दिया। उन्होंने अपनी बहू की तरफ देखा, जो सिर झुकाए, भीगी पलकों के साथ खड़ी थी। उसके हाथों में अब भी चूल्हे की गर्मी के निशान थे। कल्याणी देवी को अपनी सास का वह ज़माना याद आ गया जब वे खुद इसी तरह भयभीत रहा करती थीं। उन्हें अहसास हुआ कि जाने-अनजाने वे वही कड़वाहट अपनी बहू को लौटा रही थीं जो कभी उन्हें मिली थी।

कल्याणी देवी धीरे से सोफे से उठीं। उनके कदम अनघा की तरफ बढ़े। अनघा डर के मारे एक कदम पीछे हटने लगी, लेकिन कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर उसके दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए।

“मुझे माफ कर दे बहू…” कल्याणी देवी की आवाज भर्रा गई। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

अनघा ने चौंककर अपनी सास की तरफ देखा।

कल्याणी देवी ने अनघा के सिर पर ममता से हाथ फेरते हुए कहा, “मेरी बेटी ने आज मेरी आंखें खोल दीं। मैं हमेशा तेरे काम में कमियां ढूंढती रही, कभी यह नहीं देखा कि तू सुबह से रात तक इस परिवार को संवारने में कितनी थक जाती है। मैंने तुझे हमेशा बहू की नजर से परखा, कभी बेटी का प्यार नहीं दिया। मुझे आज समझ आया कि संस्कारों का मतलब सिर्फ रस्मों को निभाना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मान और भावनाओं की रक्षा करना है। आज से तू इस घर में डरेगी नहीं, हक से रहेगी।”

अनघा के सब्र का बांध टूट गया और वह फूट-फूट कर कल्याणी देवी के गले लग गई। सास और बहू के आंसुओं ने बरसों की दूरी को कुछ ही पलों में धो दिया।

बैठक का माहौल आंसुओं से भीगा हुआ था, लेकिन चेहरों पर सुकून की मुस्कान थी। देवाशीष ने मुस्कुराते हुए कटोरी से एक और गुलाब जामुन उठाया और कहा, “सासू मां, अब समझ आया कि इस मिठाई में इतना स्वाद क्यों है! इसमें सिर्फ मावा और चीनी नहीं, बल्कि ननद-भाभी का प्यार और एक मां की ममता का रस भी घुला हुआ है।”

पूरा घर ठहाकों और खुशियों से गूंज उठा। रसोई की वह दहलीज, जो कभी डर और संकोच की दीवार हुआ करती थी, आज प्रेम और विश्वास का पुल बन चुकी थी।

क्या हमारे समाज में आज भी बहुओं से बिना थके एक ‘परफेक्ट मशीन’ बनने की उम्मीद की जाती है? क्या एक छोटी सी भूल पर उसे कटघरे में खड़ा करने के बजाय, एक बेटी की तरह गले लगाना ज्यादा खूबसूरत नहीं होता? इस कहानी में नलिनी और कल्याणी देवी के बदलते रिश्ते पर आपकी क्या राय है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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