संस्कारों का इम्तिहान

“यही तमीज़ सिखाई थी हमने तुम्हें विश्वनाथ? घर की चौखट पर तुम्हारी दोनों विवाहित बहनें भूखी-प्यासी बैठी रहीं और तुम ससुराल के हुक्म बजाने में मशगूल रहे! और तुम बहू, क्या तुम्हारे मायके में यही सीख मिली थी कि ससुराल आते ही बेटे को उसके अपने ख़ून से ही बेगाना कर दो?”

बैठक का सन्नाटा हरबंस लाल जी की गरजती आवाज़ से काँप उठा। उनके चेहरे की तनी हुई नसें साफ़ बता रही थीं कि भीतर सुलगता ग़ुस्सा किस क़दर बेकाबू हो चुका था।

“पिताजी, एक बार मेरी बात तो सुन लीजिए… दरअसल ससुर जी की अचानक…” विश्वनाथ ने अपनी बात पूरी करने की कोशिश की ही थी कि पास खड़ी रश्मि ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। रश्मि की भीगी आँखें कह रही थीं कि इस तपते माहौल में सच कहना भी आग में घी डालने जैसा होगा।

माँ कमला देवी ने भी थरथराते होंठों से पति को शांत करने की कोशिश की, “ज़रा ठहरिए जी, पहले बच्चे की बात सुन तो लीजिए कि आख़िर माजरा क्या है…”

पर हरबंस लाल जी किसी की सुनने की मनःस्थिति में नहीं थे। हाथ में थामी छड़ी को ज़मीन पर ज़ोर से पटकते हुए वे बोले, “कुछ सुनने को बाकी नहीं बचा कमला! जिस औलाद को अपनी छाती का गर्व समझा, उसने आज पूरे ख़ानदान के सामने मेरी पगड़ी मिट्टी में मिला दी।”

हरबंस लाल जी डाक विभाग के एक अत्यंत निष्ठावान और कड़े अनुशासन वाले सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उनका पूरा जीवन कायदों, उसूलों और समाज की मर्यादाओं के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। बड़ी बेटी रोहिणी और मंझली बेटी रागिनी के जन्म के कई वर्षों बाद जब विश्वनाथ का जन्म हुआ, तो हरबंस जी को लगा जैसे उनकी हर तपस्या फलित हो गई हो। विश्वनाथ बचपन से ही गंभीर, धीर और आज्ञाकारी स्वभाव का था। मोहल्ले के अन्य लड़कों की तरह न तो वह खेल-कूद में हुड़दंग मचाता और न ही किसी से वाद-विवाद करता। उसका पूरा ध्यान सिर्फ़ किताबों और अपने माता-पिता की सेवा में रहता था। सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूना उसकी रोज़मर्रा की आदत थी, जिसे देखकर पूरा मोहल्ला उसकी मिसालें देता था।

समय बीतता गया और हरबंस जी ने अपनी पेंशन की पाई-पाई जोड़कर अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। बड़ी बेटी रोहिणी का विवाह उन्होंने प्रयागराज के एक प्रतिष्ठित बैंक प्रबंधक के सुपुत्र से बड़े सम्मान के साथ तय किया और उसे विदा किया। इसके दो वर्ष बाद मंझली बेटी रागिनी, जो स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी थी, उसके लिए एक अच्छे व्यापारी परिवार से रिश्ता आया। हरबंस जी ने अपनी सीमित जमापूँजी की परवाह किए बिना दोनों बेटियों की शादियाँ अपनी हैसियत से बढ़कर कीं। अब उनके जीवन का एक ही ध्येय शेष था—विश्वनाथ का अपने पैरों पर खड़ा होना।

विश्वनाथ का बचपन से सपना था कि वह भारतीय वन सेवा अथवा लोक सेवा में जाकर पर्यावरण और समाज के लिए कुछ सार्थक करे। पहले प्रयास में उसने प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण की, परंतु मुख्य परीक्षा में कुछ अंकों से चूक गया। पिता के चेहरे पर छाई मायूसी देखकर उसने उसी रात उनके पैर छूकर कहा था, “पिताजी, आप बस अपना आशीर्वाद बनाए रखिए, अगली बार इस घर के बाहर अफ़सर की गाड़ी ही रुकेगी।” और विश्वनाथ ने अपने कहे को सच कर दिखाया। अगले ही प्रयास में उसने प्रांतीय लोक सेवा आयोग में शीर्ष स्थान हासिल किया और उप-ज़िलाधिकारी (एसडीएम) के पद पर चयनित हुआ।

जब चयन का समाचार आया, तो हरबंस जी की आँखों से छलके आँसू उनकी सारी उम्र की थकान धो गए थे। उस शाम क्लब और बाज़ार में जितने भी परिचित मिले, सबने हरबंस जी को घेर लिया था। सब यही कह रहे थे, “हरबंस भाई, बेटे ने आपका नाम अमर कर दिया। इतने बड़े पद पर पहुँचकर भी जो लड़का माता-पिता के चरण स्पर्श किए बिना घर से बाहर कदम नहीं रखता, उसके संस्कार ही उसकी असली ताक़त हैं।”

कुछ समय बाद, विश्वनाथ का विवाह एक सुलझे और संस्कारी परिवार की सुशिक्षित कन्या रश्मि से संपन्न हुआ। रश्मि ने आते ही घर के हर कोने को अपनी ममता और सलीके से सँवार दिया। सास-ससुर की दवाइयों के समय से लेकर घर के खान-पान तक, उसने सब कुछ बड़ी आत्मीयता से सँभाल लिया था। हरबंस जी को लगने लगा था कि उनका परिवार आदर्श गृहस्थी का सबसे सुंदर उदाहरण बन चुका है।

परंतु भाग्य कभी-कभी मनुष्य के गहरे विश्वास की कठिन परीक्षा लेता है।

सावन के महीने में हरबंस जी की दोनों बेटियाँ, रोहिणी और रागिनी, अपने मायके आई हुई थीं। पूरे घर में उत्सव जैसा वातावरण था। विश्वनाथ ने भी अपनी बहनों के लिए कई उपहार लाकर रखे थे। रविवार का दिन था और दोपहर के भोजन पर सभी के साथ बैठने की तैयारी थी। कमला देवी ने बेटियों की पसंद के पकवान बनाए थे और हरबंस जी इंतज़ार कर रहे थे कि पूरा परिवार एक साथ बैठकर हँसे-बोले।

उसी सुबह क़रीब दस बजे विश्वनाथ के पास उसके ससुराल से एक घबराया हुआ फ़ोन आया। रश्मि के पिता, जो नगर के दूसरे छोर पर अकेले रहते थे, अचानक सीने में तीव्र दर्द उठने के कारण गिर पड़े थे। रश्मि का छोटा भाई किसी काम से दूर गया हुआ था और घर में सिर्फ़ उसकी वृद्ध माँ थीं। फ़ोन पर ससुर जी की बिगड़ती हालत सुनकर विश्वनाथ एक पल के लिए भी नहीं रुका। उसने रश्मि से कहा कि वह तुरंत तैयार हो।

विश्वनाथ जब कमरे से बाहर निकला, तो हरबंस जी बैठक में अफ़सर मित्रों से फ़ोन पर बात कर रहे थे। विश्वनाथ ने जल्दी में अपनी माँ से केवल इतना कहा, “माँ, हम बेहद ज़रूरी काम से आधे घंटे के लिए बाहर जा रहे हैं, आप लोग खाना शुरू कीजिए।” हड़बड़ाहट में वह यह बताना भूल गया कि मामला कितना नाज़ुक था, क्योंकि उसे डर था कि कहीं दिल के मरीज़ उसके अपने पिता भी घबरा न जाएँ।

लेकिन वह आधा घंटा कब चार घंटों में बदल गया, इसका अंदाज़ा विश्वनाथ को भी नहीं रहा। अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने बताया कि ससुर जी को गंभीर दिल का दौरा पड़ा है और तुरंत आपातकालीन शल्य-चिकित्सा (एंजियोप्लास्टी) की आवश्यकता है। विश्वनाथ ने बिना एक क्षण गँवाए काग़ज़ी औपचारिकताएँ पूरी कीं, रक्त का प्रबंध किया और डॉक्टरों के साथ आईसीयू के बाहर खड़ा रहा। तनाव और आपाधापी में उसका फ़ोन गाड़ी में ही छूट गया था और रश्मि का फ़ोन अस्पताल के बेसमेंट में नेटवर्क न होने के कारण बंद आ रहा था।

इधर, घर पर दोपहर के दो बज चुके थे। दोनों बहनें अपने भाई का इंतज़ार करते-करते थक चुकी थीं। हरबंस जी के स्वाभिमान को यह बात तीर की तरह चुभने लगी। पड़ोस के एक सज्जन ने बातों-ही-बातों में कह दिया, “हरबंस जी, अभी आपके साहबज़ादे को किसी बड़े निजी अस्पताल के पास अपनी ससुराल की गाड़ी से उतरते देखा था, लगता है नई ससुराल की ख़ातिरदारी में व्यस्त हैं।”

बस, यही वह चिंगारी थी जिसने हरबंस जी के भीतर क्रोध की ज्वाला भड़का दी। उन्हें लगा कि जिस बेटे को उन्होंने संस्कारों का मुकुट पहनाया था, वह अपनी सगी बहनों के आने पर उन्हें छोड़कर ससुराल की आवभगत में लगा हुआ है।

शाम को क़रीब पाँच बजे, जब ससुर जी की हालत ख़तरे से बाहर हो गई और रश्मि का भाई भी अस्पताल पहुँच गया, तब विश्वनाथ थके हुए कदमों और पसीने से तर-बतर कुर्ते के साथ रश्मि को लेकर घर लौटा। जैसे ही दोनों ने देहरी लांघी, हरबंस जी के कटु शब्दों की बौछार ने उनका स्वागत किया।

हरबंस जी ने न केवल विश्वनाथ के संस्कारों पर सवाल उठाए, बल्कि रश्मि के परिवार को भी स्वार्थी और बेटे को भटकाने वाला कह डाला। रश्मि का सिर शर्म और दुख से झुक गया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर उसने एक शब्द भी पलटकर नहीं कहा। विश्वनाथ ने जब समझाने का प्रयास किया, तो रश्मि ने उसका हाथ पकड़कर मौन रहने का इशारा कर दिया, क्योंकि वह जानती थी कि इस समय पिता का क्रोध किसी भी तर्क को सुनने के लिए तैयार नहीं था।

“अगर तुम्हें अपने ससुराल का ही इतना मोह था, तो इस घर में लौटने की क्या ज़रूरत थी? अपनी बहनों का यह अपमान मैं जीते जी बर्दाश्त नहीं करूँगा!” हरबंस जी यह कहकर अपने कमरे में चले गए और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया।

कमला देवी और दोनों बहनें भी स्तब्ध खड़ी थीं। माहौल में एक भारी, दमघोंटू सन्नाटा पसर गया। उस रात घर में किसी ने अन्न का एक दाना भी नहीं चखा। विश्वनाथ पूरी रात अपनी बैठक में बैठा रहा। उसने एक बार भी अपने पिता के प्रति मन में कड़वाहट नहीं आने दी। वह समझ रहा था कि पिता का क्रोध वास्तव में उनकी उस गहरी अपेक्षा और मान से उपजा था, जिसे वे समाज के सामने गर्व से ओढ़े रहते थे।

अगली सुबह का सूरज एक नई उम्मीद लेकर आया। सुबह के क़रीब आठ बजे घर की घंटी बजी। दरवाज़ा कमला देवी ने खोला। सामने रश्मि के छोटे भाई के साथ शहर के विख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर माथुर खड़े थे, जो संयोगवश हरबंस जी के पुराने परिचित भी थे।

हरबंस जी भी आवाज़ सुनकर बाहर बैठक में आ गए। उनके चेहरे पर अब भी कल की तल्ख़ी मौजूद थी।

डॉक्टर माथुर ने आगे बढ़कर हरबंस जी के कंधे पर हाथ रखा और भावुक स्वर में बोले, “हरबंस भाई, सचमुच धन्य हैं आप, और धन्य हैं आपके दिए हुए संस्कार! कल अगर आपका बेटा विश्वनाथ ऐन वक़्त पर अपने ससुर को अपनी बाँहों में उठाकर अस्पताल न लाता और अपने रसूख़ की परवाह किए बिना ख़ुद स्ट्रेचर खींचकर आईसीयू तक न दौड़ता, तो कल एक बेकसूर इंसान की जान चली जाती। उसने न केवल समय पर फ़ैसला लिया, बल्कि ख़ुद रक्तदान करके एक बुज़ुर्ग की ज़िंदगी बचाई। मुझे जब पता चला कि वह आपका बेटा है, तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया कि आज के दौर में भी ऐसे कर्तव्यनिष्ठ बेटे मौजूद हैं जो पराए माता-पिता को भी अपने जन्मदाताओं जितना ही मान देते हैं।”

डॉक्टर के एक-एक शब्द हरबंस जी के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रहे थे। उनके पैर मानो ज़मीन में धँस गए।

रश्मि का भाई आगे बढ़ा और हाथ जोड़कर बोला, “बाबूजी, दीदी और जीजाजी कल जिस हड़बड़ाहट में निकले, वह मेरे पिताजी की ज़िंदगी और मौत का सवाल था। जीजाजी ने हमें बार-बार कहा कि वे घर जाकर सब बता देंगे, पर अस्पताल की उलझनों ने उन्हें पल भर की भी मोहलत नहीं दी। अगर हमारी वजह से आपके घर में कोई कष्ट हुआ हो, तो मुझे क्षमा कर दीजिए।”

हरबंस जी की आँखें धीरे-धीरे मुड़ीं। सामने विश्वनाथ खड़ा था—वही शांत, वही मर्यादित बेटा, जिसके चेहरे पर पिता के कल के कठोर शब्दों के लिए रत्ती भर भी मैल या शिकायत नहीं थी। पास ही खड़ी रश्मि अपनी सासू माँ के आँसू पोंछ रही थी। दोनों बहनें, रोहिणी और रागिनी, अपने भाई के त्याग को देखकर ग्लानि से भर उठी थीं।

हरबंस जी की छड़ी हाथ से छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ी। उनके बनाए सारे अनुशासन और अहं की दीवारें आंसुओं के सैलाब में ढह गईं। वे डगमगाते कदमों से आगे बढ़े और विश्वनाथ को अपनी बाहों में भींच लिया। एक पिता का सीना हिचकियों से काँप रहा था।

“मुझे माफ़ कर दे मेरे बच्चे… मुझे माफ़ कर दे! मैं उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी तेरे विशाल हृदय को नहीं समझ सका। मैंने सिर्फ़ अपने झूठे मान को देखा, पर तूने दो परिवारों के धर्म को निभाया। तूने साबित कर दिया कि संस्कार केवल चरण छूने में नहीं, बल्कि वक़्त आने पर किसी गिरते हुए को सहारा देने में होते हैं।”

विश्वनाथ ने तुरंत झुककर पिता के चरण थाम लिए और धीमे स्वर में कहा, “पिताजी, आप मेरे आदर्श हैं। अगर आपने मुझे बचपन से दूसरों की पीड़ा समझना न सिखाया होता, तो शायद मैं कल वह फ़र्ज़ कभी नहीं निभा पाता। आपकी डाँट में भी आपका प्यार था, भला एक बेटा अपने पिता से कभी नाराज़ हो सकता है?”

हरबंस जी ने रश्मि के सिर पर हाथ रखा और रुंधे हुए गले से बोले, “बेटी, तूने कल अपने मौन से इस घर की मर्यादा को बचा लिया। तेरे धैर्य ने आज मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है।”

उस दिन दोपहर की मेज़ पर जब पूरा परिवार एक साथ बैठा, तो भोजन का स्वाद किसी अमृत से कम नहीं था। रोहिणी और रागिनी ने अपने हाथों से अपने भाई और भाभी को निवाला खिलाया। ग़लतफ़हमी की जो काली घटा छाई थी, वह आपसी समझ, क्षमा और सच्चे संस्कारों की धूप में पूरी तरह छँट चुकी थी। घर की दीवारें एक बार फिर आत्मीयता की हँसी से गूँज रही थीं, यह साबित करते हुए कि जहाँ संस्कारों की जड़ें गहरी होती हैं, वहाँ ग़लतफ़हमियों के तूफ़ान रिश्तों को गिरा नहीं सकते, बल्कि और मज़बूत कर जाते हैं।

जीवन में कई बार हम बिना सच्चाई जाने अपनों पर ही उँगलियाँ उठा देते हैं और क्षणिक ग़लतफ़हमी में वर्षों के विश्वास को दांव पर लगा देते हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी परिस्थिति में आपका मौन ही रिश्तों को टूटने से बचा गया हो? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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