दूध वाली चाय – श्वेता अग्रवाल

ऑफिस से लौटते ही नियति ने घर का लॉक खोला और सीधे किचन की ओर बढ़ गई। फ्रिज खोलकर दूध का भगौना निकाला और एक बड़ा कप दूध भरकर चाय के बर्तन में डाल दिया। फिर छटांक भर पानी, चीनी, कुटी हुई इलायची और अदरक डालकर चाय को खौलाने लगी। देखते ही देखते दूध वाली चाय की सोंधी महक पूरी रसोई में फैलने लगी। चाय को खौलते देख और उसकी खुशबू को महसूस करते ही नियति अपने बचपन में पहुँच गई।

“मम्मा, क्या बना रही हो?”

“चाय बना रही हूँ तुम्हारे पापा और मेरे लिए।”

“मुझे भी पीनी है।”

“नहीं, छोटे बच्चे चाय नहीं पीते।”

“मम्मा थोड़ी सी… प्लीज़!”

उसे यूँ मचलते देख माँ हँस पड़ी थीं और एक कटोरी में थोड़ी सी चाय निकाल कर दे दी थी। बस, उस दिन जो उसने चाय का घूँट भरा, तो उसकी दीवानी ही हो गई। 

तब माँ उसे खुश करने के  लिए दूध में पत्ती डालकर देने लगी और तब से मम्मा की वह दूध वाली चाय उसकी फेवरेट हो गई। कभी मूड खराब होता तो चाय, खुश होती तो चाय, कभी थकी तो चाय। बस एक चुस्की लेते ही वो फ्रेश जाती। नियति के लिए चाय का मतलब था—कड़क, खालिस दूध से बनी गाढ़ी चाय। लिकर, ग्रीन टी या हर्बल टी पीकर उसे तृप्ति नहीं होती थी। भले एक ही घूँट पीती, पर पीती खालिस दूध की कड़क चाय ही।

वक्त का पहिया घूमा, वह बच्ची से बड़ी हो गई, लेकिन दूध वाली चाय का यह नशा नहीं छूटा बल्कि वह तो इसकी और भी ज्यादा दीवानी हो गई।

सब कुछ हँसी-खुशी चल रहा था कि अचानक उनके खुशहाल परिवार पर वज्रपात हो गया। पापा एक रात जो सोए, तो फिर कभी जागे ही नहीं। एक झटके में सब कुछ बिखर गया। तब नियति ने आगे बढ़कर अपनी मां और छोटे भाई-बहन को संभाला। हाथ पीले होने की उम्र में उसने अपने हाथों में घर की पूरी जिम्मेवारी थाम ली थी। ग्रेजुएट नियति को अनुकंपा के आधार पर पापा के दफ़्तर में नौकरी मिल गई।

ज़िंदगी अभी पटरी पर लौट ही रही थी कि कुछ समय बाद माँ भी अचानक चल बसीं। अब नियति भाई-बहन के लिए सिर्फ़ बड़ी बहन नहीं, माँ और बाप दोनों बन गई। उसने अपने सारे शौक, अपने फर्ज  पर कुर्बान कर दिए। बस एक शौक ना छोड़ पाई—दूध वाली चाय!

सच तो यह था कि यह चाय अब सिर्फ़ आदत नहीं, उसके  संघर्ष की साथी ही बन चुकी थी। जब भी दुनिया से लड़ते-लड़ते वह थकती या टूटती, तब वही खालिस दूध वाली कड़क चाय की चुस्की उसे नए उत्साह और हिम्मत से भर देती।

उसकी सालों की तपस्या रंग ला रही थी। धीरे-धीरे सब सही हो रहा था। बहन की अच्छी जगह शादी हो गई थी। निलय भी नौकरी करने लग गया था। एक दिन जब निलय ने  प्यारी सी धृति को लाकर उसके सामने खड़ा किया, तो उसने बिना एक पल गंवाए भाई की पसंद को गले से लगा लिया था।

अचानक चाय के खौलने की आवाज़ से नियति का ध्यान टूटा। उसने चाय कप में छानी और चुस्की लेते हुए लिविंग रूम की ओर देखने लगी। 

धृति के घर आने के बाद नियति घर और निलय के प्रति बहुत हद तक निश्चित हो चुकी थी। निलय ने धृति को पहले ही  नियति के चाय के शौक के बारे में बता दिया था। धृति भी नियति के ऑफिस से आने पर उसकी पसंद वाली कड़क खालिस दूध की चाय बनाकर तैयार रखती। निलय का भी प्रमोशन हो चुका था। घर में खुशहाली थी, सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।

मगर वक्त के साथ हवा बदलने लगी।  निलय के प्रमोशन के साथ ही धृति के व्यवहार में भी बदलाव आने लगा था।

एक शाम जब नियति थकी-हारी ऑफिस से आई, तो हॉल सूना था। न धृति का अता-पता था, न टेबल पर चाय की प्याली। 

“धृति! कहाँ हो तुम?” नियति ने आवाज़ दी।

कमरे से आवाज़ आई, “दीदी, अंदर हूँ।”

 “क्या हुआ? तबीयत ठीक है न तुम्हारी?” नियति ने चिंतित होते हुए पूछा।

धृति ने करवट बदलते हुए कहा, “हाँ दीदी, बस थोड़ी सुस्ती लग रही है। अभी आधे घंटे में ये (निलय) आ जाएँगे, तब हम दोनों की ग्रीन टी के साथ आपकी चाय भी बना दूँगी।”

“अरे कोई बात नहीं, तुम आराम करो, मैं खुद बना लेती हूँ,” नियति ने सहजता से कहा और किचन में चली गई।

किचन में डिब्बे टटोलने के बाद उसने पूछा, “धृति, चायपत्ती कहाँ रखी है?”

“दीदी, वो तो खत्म हो गई। कामवाली आएगी तो मँगवा लूँगी।”

‘अब वो कब आएगी और कब लाएगी?”

सोच कर वह खुद ही दुकान से पत्ती खरीद लाई और चाय बना कर पीने लगी। लेकिन इसके बाद यह रोज़ का सिलसिला बन गया। कभी धृति वॉक का बहाना बनाती, कभी सोने का, तो कभी सामान खत्म होने का। 

नियति कभी भी इन बातों को दिल पर नहीं लेती थी—’बच्ची है, थक जाती होगी’। 

 एक दिन बहुत समय के बाद वो तीनों रात में साथ बैठे मूवी देख रहे थे। निलय ने अंगड़ाई लेते हुए कहा, “धृति, चाय पीने की इच्छा हो रही है।”

चाय का नाम सुनते ही नियति का चेहरा भी खिल उठा। पर उसे झटका तब लगा जब धृति सिर्फ दो कप ग्रीन टी लेकर लौटी और 

नियति की तरफ देख कर बोली “सॉरी दीदी, दूध खत्म हो गया है और आपको तो बिना दूध की चाय भाती नहीं है ना!”

यह सुनकर नियति ने मुस्कुराते हुए कहा “कोई बात नहीं… दूध खत्म हो गया तो तुम क्या करोगी? चलो तुम लोग मूवी इंजॉय करो। मैं सोने जा रही हूँ।”

रात में करीब एक बजे प्यास लगने पर नियति की नींद खुली। उसने पानी पीने के लिए बोतल उठाई तो वो खाली थी। वह बोतल भरने के लिए  रूम से निकली तो निलय के रूम से ज़ोर-ज़ोर से बात करने की आवाज़ें आ रही थीं। रात के सन्नाटे में न चाहते हुए नियति के कानों में उनकी आवाज़ें पड़ गईं। 

“धृति, ये तुमने अच्छा नहीं किया। दूध होते हुए तुमने दीदी के लिए चाय नहीं बनाई।”

“तो और क्या करती?” धृति की आवाज़ में तीखापन था, “सारा दूध उनकी चाय में ही डाल दूँ? क्या हम दोनों को दूध नहीं चाहिए? दिन में न जाने कितने कप चाय गटक जाती हैं, वो भी खालिस दूध की। एक-डेढ़ किलो दूध तो सिर्फ उनकी चाय में लग जाता है। …हम दोनों जितना दूध नहीं पीते, उससे ज़्यादा तो ये अकेले चाय में पी जाती हैं।” 

“”धृति, ये तुम कैसी बातें कर रही हो?”

“तो और क्या बोलूँ? कोई प्राइवेसी नहीं है इस घर में। हर काम में उनकी दखलअंदाजी रहती है। मेरा बस चले तो मैं ये उनके मुंह पर बोल दूॅं। पर उनके पैसों के लिए झेलना पड़ रहा है। हमारी कार की ईएमआई तक तो  वे दे रही हैं।”

“धृति, प्लीज़… कुछ ज़्यादा मत बोलो।”

” अच्छा ठीक है। अब छोड़ो ये बातें और दूध पीकर देखो, मैंने इसमें बादाम और केसर भी डाले हैं।” धृति हंसते हुए बोली।

यह बातें सुनकर नियति के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वो बिना पानी लिए, अपने भारी कदमों को घसीटते हुए कमरे में लौट आई। तकिए में मुँह दबाकर अपनी मां की फोटो को सीने से लगाकर वह देर तक सिसकती रही। त्याग का यह सिला मिलेगा, उसने कभी सोचा भी न था। मगर जैसे-जैसे रात ढलती गई, उसके आँसू सूखते गए।

सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की से कमरे में आई, तो नियति एक नए संकल्प के साथ उठी। उसकी आँखों में अब नमी नहीं, गज़ब का आत्मविश्वास था। 

तैयार होकर वह सीधे बाहर निकली और पास की दुकान से दूध की थैली, चायपत्ती और चीनी खरीद लाई।

किचन में उसने अपने लिए वही पुरानी कड़क, खालिस दूध वाली चाय बनाई। वह बालकनी में खड़े होकर सुकून से पहली चुस्की ले ही रही थी कि निलय और धृति भी कमरे से बाहर निकले।

नियति को चाय पीते देख निलय  बोला, “अरे दीदी! आप इतनी जल्दी जाग गईं?”

नियति ने चेहरे पर एक शांत मुस्कान लाते हुए कहा, “हाँ निलय, जाग तो गई हूँ… लेकिन जल्दी नहीं, बहुत देर से जागी हूँ। खैर, जब जागो तभी सवेरा।”

“दीदी, ये कैसी पहेलियाँ बुझा रही हैं आप?” निलय ने असहज होकर पूछा।

​लेकिन नियति ने उसके किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना बैग उठाया और बिना कुछ कहे दफ्तर के लिए निकल गई। निलय और धृति एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए।

रात के 8 बज गए थे लेकिन नियति अभी तक घर नहीं पहुंची थी और उसका फोन भी बंद आ रहा था। निलय और धृति बेचैनी से उसका इंतज़ार कर रहे थे। 

तभी बेल बजने की आवाज़ आते ही निलय ने राहत की सांस लेते हुए दरवाज़ा खोला, लेकिन सामने का नज़ारा देखकर उसके होश उड़ गए।

बाहर नियति के साथ पिकअप वैन के दो कर्मचारी खड़े थे।

नियति ने सीधे अपने कमरे की ओर इशारा किया, “भैया, इस कमरे में जो भी  सामान है, सब गाड़ी में चढ़ा दीजिए।”  

“दीदी! ये सब क्या हो रहा है? आप इतनी देर से आईं और ये सामान कहाँ जा रहा है?” निलय बदहवास होकर चिल्लाया।  

नियति ने शांत स्वर में कहा, “मैं कंपनी वाले फ्लैट में शिफ्ट हो रही हूँ, निलय।”

“ये क्या कह रही हैं आप? क्या बोल रही हैं दीदी आप? आप तो बोलती थीं कि आप हम लोगों को छोड़कर कभी भी उस फ्लैट में नहीं जाएँगी। मैं आपके बगैर अकेले कैसे रहूँगा?” निलय की आवाज़ काँप रही थी।

नियति ने ठहरकर अपने भाई की आँखों में देखा—

“अकेले कहाँ हो, धृति है तुम्हारे साथ। धृति, निलय का ध्यान रखना और हाँ, अब मेरी चाय में पड़ने वाले दूध का हिसाब छोड़कर निलय की कार के ई.एम.आई. का हिसाब रखना शुरू कर दो। अब मेरे लिए तुम लोगों के खर्चे उठाना संभव नहीं है। मेरी सैलरी अब इस खाते में नहीं आएगी।”

धृति का चेहरा फक पड़ गया। “दीदी… मेरा वो मतलब नहीं था… मुझे माफ़…”

मगर नियति अब उस चौखट को पार कर चुकी थी। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

वह अपने उस नए आशियाने की ओर बढ़ चली, जहाॅं वह पूरे आत्मसम्मान के साथ अपनी कड़क दूध वाली चाय पी सकती थी। जहां उसे अपनी छोटी सी जरूरत के लिए दूसरों के मोहताज रहने की जरूरत ना थी। 

धन्यवाद 

शीर्षक- दूध वाली चाय 

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता-#आत्मसम्मान 

लेखिका- श्वेता अग्रवाल, धनबाद, झारखंड

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