अरे ओ वैशाली , वैशाली रे वैशाली कहां मर गई रे जुबान में ताला लगा लिया क्या ?
तुझसे कितनी बार बोला जब मैं घर आऊं तो सज-संवर कर दरवाजे पर मेरा इंतजार करती मिला कर ।
वैशाली ने शराबी पति की आवाज सुनकर हड़बड़ा कर प्रैस जो वो सुबह स्कूल जाने के लिए बच्चों की यूनिफार्म तैयार कर रही थी एक तरफ रखी और लड़खड़ाते पति को सहारा देकर घर के भीतर ले जाने लगी । लेकिन ये क्या ? पति माधव ने बदले में एक करारा सा झापड़ वैशाली के गाल पर जड़ दिया।
कर्मजली नासपीटी, अनपढ़ बदजात औरत भद्दी गालियो की बौछार करता रहा और फिर शराबी वही पति वहीं बिस्तर पर ढेर हो खराटें लेने लग गया।
वैशाली ने उसको सही से बिस्तर पर डाला, थप्पड़ से चरमराते अपने गालो को सहलाती हुई पास ही पड़ी कुर्सी पर बैठ गई आज सुबह से ही मन बहुत व्याकुल सा था उसका, कल करवा चौथ का ब्रत आज सुबह ही पति माधव से पैसे मांगे थे पूजा सामग्री वगैरह के लिए दस खुशामते एक सौ का नोट उसकी तरफ फैंककर गालियां बकता पति काम पर चला गया।
अब भला एक सौ के नौट में क्या आने वाला था ? ख्वाहिशों की दबिश, सुकून की दो रोटी के लिए तरसती भूखी प्यासी ही वैशाली कुर्सी पर सर टिकाये अपनी पुरानी यादों में खो गई आज उसका मन पहले ही भारी सा था यादों के झरोखे उसको पीछे उड़ा देना चाहते थे। ख्यालों में डूबी वैशाली कब सुबह हुई उसे पता ही नहीं चला। माधव का नशा उतरा वो बिस्तर से उठा और उसने चाय मांगी वैशाली ने चाय दी लेकिन घर में चीनी न होने के कारण चाय में मीठा कम होने की वजह से क्रोधित माधव ने गर्म चाय वैशाली के ऊपर फैक दी । ये चाय है या गरम पानी माधव गुर्राते हुए बोला –
गर्म चाय से झुलसी वैशाली बोली चीनी के लिए कहा था ले आना कहां से डालती मीठा जितनी चीनी थी उतनी डाल तो दी मैंने।
माधव ने दो थप्पड़ जडे वैशाली के फिर एक तरफ धकेल बड़बड़ाते हुए घर से बाहर चला गया।
असहनीय पीड़ाओं से गुजरते वैशाली ने मावव को छोड़ने का फैसला कर लिया। अपना व बच्चों का जरूरी सामान समेटा और घर से निकल पड़ी। और तो कोई ठोर ठिकाना नहीं था उसके पास दुखियारी बेसहारा वैशाली शराबी पति का घर छोड़ अपनी माँ के घर लौट आती है। अब उसके सामने दो समस्या पति से तालाक लेना और बच्चों के पालन पोषण सुकून की दो रोटी की सोचना और फिर वो सबसे पहले अपनी माँ की सहायता से कोर्ट में माधव से तलाक की अर्जी दे देती है।
महिला वकील को अपनी व्यथा अपनी दर्द भरी कहानी सुनाते उसकी आँखें आँसूओं से तरबतर होने लगती है। वो रो रोकर अपनी आपबीती सुनाती है।
सोलह वर्ष की बाली उमर की थी जब मैं माधव के प्रेम में पड़ गई अक्सर आते जाते राह में दिख जाता और उसके सौन्दर्य की तारीफ का गुणगान कर दिया करता । नासमझ मैं उसके प्रेम जाल में फंसती चली गई। और उसको मुकाम पर पहुंचाने में माधव की दोनों बहनें सर्वोपरि रही। वो मेरी सुन्दरता पर मोहित मुझको साज सब्ज दिखा झुटे बहकावे में रख फंसाने की मंशा से माधव का दिलोजान से गुणगान करती रहीं। मैं भी उनके बहकावे में आकर उनकी बातें सब कुछ सत्य मानकर माधव की तरफ खिंचती चली गई।
मेरा पति माधव एक शराबी इंसान छोटी सी नौकरी करता लेकिन बहनों ने बढ़ा-चढ़ाकर इस तरह से मुझको दिखाया कि वैशाली अपने को खुशनसीब समझने लगी । माधव किराये के छोटे से कमरे में रहता लेकिन बहनों ने अपना मकान दिखा कहां ये सब माधव का ही है। भोली भाली वैशाली एक दिन आव देखा न तांव माधव के प्रेम में अंधी उसके साथ विवाह की जिद पर उतारू हो गई । पिता तो बचपन में ही खो चुकी थी । माँ और छोटे भाई बहन थे । मां को भी माधव में कोई कमी नजर नहीं आई तो उसने अपनी हैसियत के मुताबिक वैशाली का विवाह माधव से करवा दिया । दो चार दिन बहन के घर में रहने के बाद माधव उसको अंधेरे गलियों के किराए के मकान में ले आया। वो शराब का आदी शाम को काम से लौटता तो शराब पीकर ही घर में प्रवेश करता पहले छोटी छोटी बात पर झगड़ता बहस करता और फिर धीरे धीरे मुझसे मारपीट पर भी उतारू होने लगा ।
वैशाली क्या करती ? अच्छे से समझ गई थी वो गलत इंसान के हाथ फंस चुकी है। माधव के पास न मकान न जमीन, न कोई जायदाद एक छोटी सी नौकरी जिसका आधा पैसा वो अपने शराब के शौक में उड़ा दिया करता। समय बीतता गया नरक ज़िन्दगी जीते जीते न चाहते हुए भी मैं तीन बच्चों की माँ भी बन गई। जब माधव का अत्याचार असहनीय हो गया तो मैंने उसका घर छोड़ दिया। मैने पढाई लिखाई दुबारा शुरू की माँ मेरे बच्चों को सम्भाल लेती।
महिला वकील ने वैशाली को न्याय दिलाने के लिए कोर्ट में केस दायर कर दिया मगर वहां भी वैशाली सफल नहीं हो सकी । नसैडी पति ने उल्टे ही वैशाली पर चरित्र हीनता का आरोप लगाते हुए केस दायर किया। अब केस लम्बा और अधिक पैसे की बरबादी न्याय मिलने की उम्मीद न के बराबर वैशाली बिना तालाक लिए ही वापस आ गई और अपने को मजबूत बनाने में प्रयत्नशीलता कर सफल रही । कोर्ट का विचार छोड़कर अपने बच्चों के पालन पोषण पर ध्यान लगाने में लगी रही ।
वैशाली ब्यूटीशियन का कोर्स कर अपनी माँ के घर पर ही काम खोल कार्य शुरू कर दिया। पहले तो उसका काम धीरे चला जिससे उसके बच्चों का पालन पोषण हो जाता था। दो रोटी चैन से खा लेते लेकिन धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई उसका काम खूब चल गया। विवाह शादी में दुल्हन सजाने, मैहंदी के काम में उसे अच्छे पैसे मिलने लगे। धीरे-धीरे उसके बच्चे भी बड़े हो गये और परिस्थिति को भांप अपने पैरों पर खड़े हो उसको मजबूत बनाने में पीछे नहीं रहे।
वैशाली अब किसी के आगे हाथ पसारने वाली नहीं बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत हो चुकी थी। जिसका परिणाम उसमें आत्मविश्वास और स्वाभिमान झलकने लगा ।
विभिन्न कम्पनियों के लिए पैकिंग का काम कर अधिक धन अर्जित करने लगी । उसकी एक बेटी विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह भी अच्छे घर में योग्य लडके से कर दिया। इस बार वो सतर्क थी अपने समान गलती नहीं करना चाहती थी । उसकी दूसरी लड़की उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही और बेटा भी पढ़ाई-लिखाई के साथ साथ हस्तकला में निपुण क्राफ्ट का काम मेला प्रदर्शनी में लगा अच्छा खासा धन अर्जित करने लगा । एक समय था वह रूपए पैसों के लिए मोहताज शराबी पति के आगे हाथ फैलाती लेकिन आज वैशाली इतनी मजबूत बन गई हजारों रूपए उसके पर्स में रखें रहते। अनेक बार तन्हाइयों के पल में सोचती अगर उसने नसैडी पति को छोड़ने का फैसला न लिया होता तो आज उसी अंधेरी गलियों के कमरे में पड़ी सड़ रही होती। पति की गालियां खा रही होती ।
और उसके बच्चों का क्या होता ? सोच सोच कर भी उसकी रूह कांप जाती है। क्या वो इतने लायक बन पाते जितने आज है ? शराबी पिता के बच्चे समाज में इसी नामकरण से शोभित किये जाते । औरत कभी कमजोर नहीं रही कमजोर रहती है परिस्थितियां, बेड़ियां जो उसके पैरों में डाल दी जाती है। बेड़ियां कभी सामाजिक कभी संस्कारों की कभी रीति-रिवाजों की जो उसको कमजोर बना देतीं है। एक महिला चाहे तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी बखूबी निभा सकती है। सारे समाज से लड़ सकती है। बस उसको साथ चाहिए होता है पति का जो सम्मान से दो रोटी सुकून की खिला सके । और जब वो सुकून की रोटी की जगह धिक्कार अपमान गालियां परोसी जाने लगती है तो वैशाली जैसी महिलाएं बगावत पर उतारू हो जाती है। और फिर जब बच्चों का ख्याल हो तो एक औरत उनके लिए चन्डी का रूप धारण करने में भी नहीं कतराती। उनके पास माधव जैसे पति को छोड़कर अपने बच्चों का भविष्य बनाना ही मकसद रह जाता है। ताकि उन बच्चों के नसीब में वो अधिकार से सुकून की दो रोटी लिख सके ।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया