राख में दबी उम्मीद

अस्पताल से घर आते ही उसने देवांग के कमरे में तूफान खड़ा कर दिया। बेड पर लाचार पड़े देवांग पर चीखते हुए वह बोली, “तुमने मुझे धोखा दिया! तुम्हें पहले से पता था कि तुम मरने वाले हो, इसीलिए तुमने मुझसे शादी करके मेरी पूरी जवानी और मेरी जिंदगी तबाह कर दी! तुम सब धोखेबाज हो!”

देवांग ने नम आंखों से अपनी पत्नी की ओर देखा और टूटी आवाज़ में कहा, “शिवानी… भगवान गवाह है, मुझे इस बीमारी का रत्ती भर भी अहसास नहीं था। अगर मुझे ज़रा भी आभास होता, तो मैं किसी की जिंदगी से क्यों खेलता? और वैसे भी, तुमसे शादी करके मुझे कौन सा सुख मिल गया था? आज जब मुझे सबसे ज्यादा तुम्हारे सहारे की जरूरत है, तुम मुझ पर जहर उगल रही हो?”

  शिक्षा विभाग से उप-निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए सदानंद जी अपने बगीचे में लगे चमेली के पौधों को सींच रहे थे। घर के भीतर से उनकी धर्मपत्नी मालती जी के गुनगुनाने की आवाज़ आ रही थी, जो शहर के प्रतिष्ठित कन्या महाविद्यालय में समाजशास्त्र की विभागाध्यक्ष रह चुकी थीं। दोनों के जीवन का एक ही केंद्र बिंदु था—उनका इकलौता बेटा देवांग। देवांग स्वभाव से गंभीर, मृदुभाषी और एक बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनी में वरिष्ठ विश्लेषक के पद पर कार्यरत था। सदानंद और मालती जी के दांपत्य में कभी कोई कमी नहीं रही, सिवाय एक टीस के—उन्हें हमेशा से एक बेटी की चाह थी। जब भी वे किसी पड़ोसी की बेटी की हंसी सुनते, मालती जी का मन भर आता। दोनों अक्सर एक-दूसरे से कहते कि भगवान ने बेटी नहीं दी तो क्या हुआ, जब देवांग के लिए बहू लाएंगे, तो उसे बहू नहीं, अपनी सगी बेटी बनाकर अपनी सारी हसरतें पूरी करेंगे।

समय बीता और देवांग के लिए एक अच्छे परिवार की लड़की शिवानी का रिश्ता आया। शिवानी दिखने में अत्यंत सुंदर, पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली थी। सदानंद जी और मालती जी ने बिना किसी दहेज की मांग के, केवल लड़की के संस्कारों पर विश्वास करते हुए पूरे धूमधाम से विवाह संपन्न कराया। गृहप्रवेश के दिन मालती जी ने शिवानी की आरती उतारते हुए उसकी पेशानी चूम ली और कहा था, “आज से तुम इस घर की बहू नहीं, हमारी वह बेटी हो जिसका इंतजार हमने बरसों किया है।” उस वक्त शिवानी मुस्कुराई थी, पर उस मुस्कान के पीछे छिपी कटुता को कोई भांप न सका।

विवाह के कुछ ही हफ्तों के भीतर शिवानी का वास्तविक रूप खुलकर सामने आने लगा। वह बात-बात पर चिढ़ने वाली, तुनकमिज़ाज और अहंकारी स्वभाव की निकली। उसे घर का कोई भी नियम या संस्कार गवारा न था। मालती जी सुबह उठकर चाय बनातीं और शिवानी के कमरे में ले जातीं, तो वह धन्यवाद कहने के बजाय मुंह बनाकर कह देती कि चाय का तापमान सही नहीं है। शुरू-शुरू में उसने देवांग को अपनी मीठी बातों और बनावटी आंसुओं के जाल में पूरी तरह उलझा लिया। वह रोज़ शाम को देवांग के घर लौटते ही सास-ससुर की झूठी शिकायतें शुरू कर देती—”तुम्हारी माँ मुझे ताने देती हैं, तुम्हारे पिता जी मुझे नौकरानी की तरह देखते हैं।” देवांग, जो अपनी पत्नी पर अंधा भरोसा करने लगा था, अक्सर माता-पिता पर बरस पड़ता। सदानंद जी चुपचाप सिर झुका लेते और मालती जी की आंखों से आंसू छलक पड़ते कि जिस बहू को बेटी समझा, उसने आते ही घर की नींव हिला दी।

पर झूठ की उम्र लंबी नहीं होती। धीरे-धीरे देवांग की आंखें खुलने लगीं। उसने देखा कि उसकी माँ दिन-रात शिवानी की पसंद का खाना बनाती हैं, उसके कपड़े संभालती हैं, जबकि शिवानी सोफे पर बैठकर मोबाइल में व्यस्त रहती है और छोटी-छोटी बातों पर पूरे घर में बखेड़ा खड़ा कर देती है। एक दिन देवांग ने अपनी आंखों से देखा कि शिवानी ने मालती जी के हाथ से पानी का गिलास झटक दिया क्योंकि गिलास कांच का नहीं, तांबे का था। उस दिन देवांग का भ्रम पूरी तरह टूट गया। जब देवांग ने एकांत में शिवानी को समझाने का प्रयास किया और कहा कि मेरे बूढ़े माता-पिता का सम्मान करो, तो शिवानी बिफर पड़ी।

अब शिवानी ने एक नया और खतरनाक पैंतरा अपनाया। जब भी घर में कोई उसकी मनमानी पर टोकता, वह सीधे कानून की धमकी देने लगती। “ज़्यादा सीधा बनने का नाटक मत करो! अगर किसी ने मुझे कुछ कहा, तो मैं सीधे महिला थाने जाऊंगी और तुम तीनों पर घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का ऐसा संगीन मुकदमा ठोकूंगी कि जिंदगी भर जेल की हवा खाते रहोगे!” यह धमकी किसी भी संभ्रांत परिवार की आत्मा को कंपा देने के लिए काफी थी। सदानंद जी, जिन्होंने जीवन भर अपनी साख और ईमानदारी कमाई थी, इस कलंक के डर से बिल्कुल मौन हो गए। घर का माहौल किसी दहकते अंगारे जैसा हो गया था, जहां हर सांस डर और घुटन के साए में ली जाती थी।

एक शाम बात सिर्फ इतनी सी थी कि देवांग ने शिवानी के देर रात तक दोस्तों के साथ बाहर रहने पर सवाल उठा दिया। शिवानी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने आव देखा न ताव, तुरंत फोन निकाला और 112 नंबर डायल कर दिया। दस मिनट में पुलिस की गाड़ी दरवाजे पर खड़ी थी। शिवानी बाल बिखेरकर रोने का नाटक करने लगी और पुलिस वालों से बोली, “ये लोग मुझे मारते-पीटते हैं, मुझे इन सबसे अपनी जान का खतरा है।” सदानंद जी हाथ जोड़कर खड़े थे, उनकी आंखों में अपने बुढ़ापे और प्रतिष्ठा की बर्बादी का खौफ साफ दिख रहा था। देवांग ने किसी तरह अपने कुछ रसूखदार परिचितों और हाथ-पैर जोड़कर उस दिन बात संभाली और पुलिस को विदा किया। लेकिन उस रात के बाद उस हंसते-खेलते घर की सारी खुशियां दफन हो गईं। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि शिवानी के सामने एक शब्द भी बोल सके।

दिन बीत रहे थे और घर में चुप्पी का पहरा था। इसी बीच देवांग के स्वास्थ्य में अजीब से बदलाव आने लगे। वह अक्सर थका हुआ रहने लगा, उसका वजन तेजी से गिरने लगा और कभी-कभी उसे सीने में तेज चुभन महसूस होती। एक दोपहर जब देवांग दफ्तर से लौटा, तो हॉल में कदम रखते ही उसका सिर भयानक रूप से चकराया, सांसें उखड़ने लगीं और वह बेसुध होकर फर्श पर गिर पड़ा। सदानंद जी और मालती जी बदहवास होकर दौड़े। शिवानी अपने कमरे से बाहर निकली, पर उसकी आंखों में कोई घबराहट नहीं, बल्कि केवल खीझ थी।

देवांग को तुरंत शहर के एक बड़े निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उसे फौरन आईसीयू में भर्ती किया और कई तरह की जांचें, बायोप्सी और सीटी स्कैन लिखे। दो दिन बाद जब रिपोर्ट आई, तो वरिष्ठ ओंकोलॉजिस्ट ने सदानंद जी, मालती जी और शिवानी को अपने केबिन में बुलाया। डॉक्टर के चेहरे की गंभीरता देखकर सदानंद जी का कलेजा कांप उठा।

डॉक्टर ने भारी आवाज़ में कहा, “सदानंद जी, बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि देवांग को लंग कैंसर (फेफड़ों का कैंसर) है, और यह बीमारी अपनी चौथी और अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी है। ट्यूमर अन्य अंगों में भी फैल चुका है।”

यह सुनते ही जैसे कमरे की छत सदानंद जी और मालती जी के सिर पर गिर पड़ी। मालती जी वहीं फर्श पर बैठकर दहाड़े मार-मारकर रोने लगीं। सदानंद जी दीवार का सहारा लेकर खुद को संभालने की नाकाम कोशिश कर रहे थे; उनकी आंखों के आगे उनका जवान, इकलौता बेटा चिता की राख बनता नज़र आ रहा था। डॉक्टर ने ढांढस बंधाते हुए कहा, “हम तुरंत कीमोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी शुरू करेंगे ताकि बीमारी की रफ्तार को रोका जा सके, बाकी सब ईश्वर के हाथ में है।”

पर उस कमरे में एक इंसान ऐसा भी था जिसके आंसू नहीं बहे। वह थी शिवानी। उसके चेहरे पर दुख का लेशमात्र भी नहीं था, बल्कि वहां एक उग्र आक्रोश था। अस्पताल से घर आते ही उसने देवांग के कमरे में तूफान खड़ा कर दिया। बेड पर लाचार पड़े देवांग पर चीखते हुए वह बोली, “तुमने मुझे धोखा दिया! तुम्हें पहले से पता था कि तुम मरने वाले हो, इसीलिए तुमने मुझसे शादी करके मेरी पूरी जवानी और मेरी जिंदगी तबाह कर दी! तुम सब धोखेबाज हो!”

देवांग ने नम आंखों से अपनी पत्नी की ओर देखा और टूटी आवाज़ में कहा, “शिवानी… भगवान गवाह है, मुझे इस बीमारी का रत्ती भर भी अहसास नहीं था। अगर मुझे ज़रा भी आभास होता, तो मैं किसी की जिंदगी से क्यों खेलता? और वैसे भी, तुमसे शादी करके मुझे कौन सा सुख मिल गया था? आज जब मुझे सबसे ज्यादा तुम्हारे सहारे की जरूरत है, तुम मुझ पर जहर उगल रही हो?”

बात यहीं खत्म नहीं हुई। शिवानी उस समय चार महीने के गर्भ से थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कसते हुए क्रूरता से कहा, “मैं किसी मरने वाले आदमी के बच्चे की माँ बनकर अपनी बची हुई जिंदगी विधवा के रूप में नहीं बिताने वाली। मैं कल ही डॉक्टर के पास जाकर इस बच्चे को गिरा दूंगी। मुझे इस मनहूस बच्चे से हमेशा के लिए छुटकारा चाहिए!”

यह सुनते ही मालती जी पागलों की तरह दौड़कर शिवानी के पैरों में गिर पड़ीं। उन्होंने अपनी साड़ी का आंचल पसार दिया और रोते हुए गिड़गिड़ाने लगीं, “शिवानी, मेरी बच्ची! ऐसा अनर्थ मत कर! यह हमारे देवांग का इकलौता अंश है, हमारे कुल का दीपक है! तू चाहे तो हमें जो सजा दे दे, पर इस मासूम जान को मत मार। हम तुझसे कभी कुछ नहीं मांगेंगे, बस यह बच्चा हमें दे दे, हम इसे अपनी जान देकर पालेंगे!” सदानंद जी भी हाथ जोड़े खड़े थे, जिनकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। पर शिवानी ने एक झटके से मालती जी को पीछे धकेल दिया और अपने कमरे का दरवाजा जोर से बंद कर लिया।

उस रात घर में मौत जैसा सन्नाटा था। एक तरफ देवांग दर्द से कराह रहा था और दूसरी तरफ एक माँ-बाप अपने अजन्मे पोते की जिंदगी की भीख मांग रहे थे। शिवानी अपने कमरे में बैठी थी। उसने अगली सुबह गर्भपात के लिए अस्पताल में बात कर ली थी। आधी रात को जब वह पानी पीने के लिए उठी, तो उसने देवांग के कमरे से धीमी आवाज़ें सुनीं। वह दरवाजे के पास ठिठक गई।

कमरे में देवांग अपनी माँ की गोद में सिर रखे सिसक रहा था। मालती जी उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए धीरे-धीरे लोरी जैसी प्रार्थना गा रही थीं। देवांग कह रहा था, “माँ, मुझे मरने का डर नहीं है। मुझे डर है कि मेरे जाने के बाद आपका और बापू का क्या होगा? मैं आप दोनों को कोई सुख नहीं दे पाया। काश! शिवानी उस बच्चे को दुनिया में आने देती… कम से कम आप दोनों के पास जीने की एक वजह तो रह जाती।” तभी सदानंद जी ने देवांग के माथे को चूमा और रुंधे गले से कहा, “बेटा, जब तक हमारी सांसें हैं, हम उस बच्चे के लिए हर अपमान सहेंगे। तू हौसला रख।”

शिवानी ने पहली बार उस कमरे में वह देखा जो उसने अपने मायके में कभी नहीं देखा था—निःस्वार्थ, अटूट और पवित्र प्रेम। उसके अपने परिवार में हमेशा नफा-नुकसान की बातें होती थीं, पर यहाँ एक बेटा मरते दम तक अपने माता-पिता की चिंता कर रहा था, और वे बूढ़े माता-पिता अपने अस्तित्व की अंतिम सांस तक अपने बेटे और उसके अजन्मे बच्चे को बचाने के लिए जूझ रहे थे। शिवानी के भीतर कुछ बहुत गहराई से चटक गया। उसने अपने पेट पर हाथ रखा। अचानक गर्भ में पल रहे उस नन्हें जीव ने एक हल्की सी हरकत की—शायद पहली बार। उस स्पंदन ने शिवानी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ा दी। वह अपने कमरे में लौट आई, पर उस रात वह सो नहीं सकी। उसका अहंकार, उसका गुस्सा, उसका लालच—सब कुछ उस अजन्मे बच्चे की धड़कन और उस बूढ़े जोड़े के असीम प्रेम के आगे बौना साबित हो रहा था।

अगली सुबह जब धूप आंगन में फैली, मालती जी और सदानंद जी लाल सूजी हुई आंखों के साथ शिवानी के कमरे के बाहर खड़े थे, मानो किसी अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हों। शिवानी तैयार होकर बाहर निकली। मालती जी ने फिर से हाथ जोड़ने चाहे, लेकिन इससे पहले कि वे झुकतीं, शिवानी ने आगे बढ़कर अपनी सास के हाथ थाम लिए।

शिवानी की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह घुटनों के बल बैठकर मालती जी के सीने से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दीजिए, माँ जी! मुझे माफ कर दीजिए, बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी अपने घमंड में। मैं भूल गई थी कि इंसानियत क्या होती है। मैं इस बच्चे को कुछ नहीं होने दूंगी। यह देवांग का अंश है, और यह इस दुनिया में आएगा। मैं इसे जन्म दूंगी!”

पूरा घर उन आंसुओं में जैसे धुल गया। सदानंद जी ने कांपते हाथों से शिवानी के सिर पर हाथ रख दिया। उस दिन से घर की दिशा ही बदल गई। जो शिवानी कल तक कलह की आग जलाती थी, आज वह सेवा और समर्पण की मूरत बन चुकी थी। उसने देवांग के इलाज की पूरी कमान अपने हाथों में ले ली। वह खुद डॉक्टरों से मिलती, देवांग की दवाइयों का समय तय करती, और मालती जी के साथ मिलकर पौष्टिक आहार तैयार करती।

प्रेम और सकारात्मकता में दवाओं से भी बड़ा असर होता है। देवांग, जो जीने की उम्मीद छोड़ चुका था, अपनी पत्नी के इस बदले हुए रूप और आने वाले बच्चे की आस में भीतर से मजबूत होने लगा। उसकी कीमोथेरेपी के कठिन दौर में जब बाल झड़ने लगे और शरीर टूटने लगा, तो शिवानी रात-रात भर जागकर उसके पैर दबाती और उसका हौसला बढ़ाती। सदानंद जी और मालती जी ने अपनी सारी जमा-पूंजी और पेंशन देवांग के इलाज में लगा दी, और शिवानी ने अपने सारे गहने लाकर ससुर के हाथों में रख दिए कि “बाबूजी, देवांग की सांसों से बढ़कर मेरे लिए कोई गहना नहीं है।”

पांच महीने बाद, अस्पताल के प्रसूति वार्ड से एक गूंजती हुई किलकारी बाहर आई। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए बाहर आकर कहा, “बधाई हो, घर में लक्ष्मी आई है! नन्हीं परी हुई है।”

जब उस नवजात बच्ची को पहली बार व्हीलचेयर पर बैठे देवांग की गोद में दिया गया, तो उसकी आंखों से बहे आंसुओं ने बच्ची के गालों को भिगो दिया। मालती जी और सदानंद जी ने जब अपनी पोती को छुआ, तो उन्हें लगा मानो ईश्वर ने उनकी वर्षों पुरानी बेटी की मुराद पूरी कर दी हो। और सबसे बड़ा चमत्कार तब हुआ जब बच्ची के जन्म के तीन महीने बाद देवांग की नई पेट-स्कैन रिपोर्ट आई। डॉक्टरों की पूरी टीम हैरान थी—ट्यूमर अप्रत्याशित रूप से 80 प्रतिशत तक सिकुड़ चुका था और कैंसर का फैलाव पूरी तरह रुक गया था। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसे मेडिकल साइंस में मिरेकल कहते हैं, पर असल में यह आप सबकी सेवा, सकारात्मकता और इस बच्ची के भाग्य का असर है। देवांग अब खतरे से बाहर है और सामान्य जीवन की ओर लौट सकता है।”

उस दिन घर के मंदिर में दीया जलाते हुए शिवानी ने मालती जी के चरण छुए। मालती जी ने उसे गले से लगाते हुए कहा, “तूने आज साबित कर दिया कि तू सिर्फ बहू नहीं, इस घर की रक्षक और हमारी सबसे प्यारी बेटी है।” शिवानी ने मुस्कुराते हुए अपनी नन्हीं बेटी को देखा, जिसने न सिर्फ अपने पिता को नया जीवन दिया था, बल्कि एक बिखरते हुए परिवार को हमेशा के लिए अटूट प्रेम के धागे में पिरो दिया था।

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