रिश्तों की तिजोरी

  अलका सोफ़े पर बैठकर नए कंगन पहनकर देख रही थी और अपनी बड़ी बहू रुचिका को हिदायतें देती जा रही थी कि कौन सी साड़ी के साथ कौन सा हार जंचेगा। अगले हफ़्ते अलका के देवर हरीश की इकलौती बेटी नंदिनी का विवाह था। पूरा परिवार शादी की तैयारियों में व्यस्त था, लेकिन अलका की व्यस्तता किसी उत्सव की खुशी से ज़्यादा अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करने की होड़ जैसी लग रही थी।

तभी बाहर से अलका के पति भुवन घर में दाख़िल हुए। हाथ में दफ़्तर का बैग और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए जब वे हॉल में पहुँचे, तो कपड़ों और गहनों के बक्सों को देखकर चौंक गए। भुवन ने बैग मेज़ पर रखा और सोफ़े के एक कोने में बैठते हुए कहा, “अरे वाह अलका! लगता है नंदिनी बिटिया की शादी की तैयारियाँ सातवें आसमान पर हैं। पूरा बाज़ार ही घर उठा लाई क्या?”

अलका ने हाथ का कंगन घुमाते हुए गर्व से सिर उठाया और बोली, “और नहीं तो क्या भुवन जी! हमारे जेठ-जेठानी होने के नाते सब की नज़रें हम पर ही टिकी होंगी। शादी में हमारी तरफ़ से कोई कमी नहीं दिखनी चाहिए। हम इतने बड़े घराने से ताल्लुक रखते हैं, शहर में आपका इतना बड़ा कारोबार है, तो क्या हम सामान्य बनकर जाएँ? हम पूरे रौब और शान से जाएँगे ताकि हरीश के ससुराल वाले भी देखें कि नंदिनी के ताऊ-ताई किस हैसियत के लोग हैं।”

भुवन ने धीमे से मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा, “तुम्हारी यही शान-शौकत की बातें मुझे कभी-कभी परेशान कर देती हैं अलका। बात सिर्फ़ दिखने की नहीं, दिल से शामिल होने की है। ख़ैर, छोड़ो… यह बताओ कि नंदिनी के लिए जो सोने का उपहार तय किया था, वह ले आईं? ज़रा मुझे भी दिखाओ, मेरी भतीजी के लिए क्या पसंद किया है तुमने।”

अलका ने तुरंत रुचिका की तरफ़ इशारा किया, “बहू, ज़रा वह लाल मखमल का डिब्बा लेकर आना।”

रुचिका अलमारी से एक छोटा सा डिब्बा ले आई और भुवन के सामने खोलकर रख दिया। डिब्बे के भीतर एक बहुत ही महीन और हल्की सी सोने की चेन रखी हुई थी। भुवन ने जैसे ही उस डिब्बे को देखा, उनकी भौहें सिकुड़ गईं। उन्होंने डिब्बे को हाथ में उठाया, चेन को उंगलियों से टटोला और फिर गंभीर नज़रों से अलका की ओर देखा, “अलका! यह क्या है? इतनी पतली और हल्की चेन? तुमने नंदिनी के लिए सिर्फ़ यह पसंद किया है? जब बात हमारी इकलौती भतीजी की है, तो कम से कम एक अच्छा भारी सोने का हार या कंगन तो होना ही चाहिए था। यह तो दूर से भी देखने में बिल्कुल मामूली लग रही है।”

अलका के चेहरे पर नाराज़गी के भाव उभर आए। उसने तपाक से जवाब दिया, “ज़रा ठहरिए और ज़्यादा दरियादिली मत दिखाइए। आपको शायद याद नहीं है, लेकिन मुझे पाई-पाई का हिसाब याद रहता है। तीन साल पहले जब हमारे बेटे आयुष की शादी हुई थी, तब आपके लाडले छोटे भाई हरीश और देवरानी सरला ने हमारी बहू रुचिका को मुँह दिखाई में क्या दिया था? उन्होंने भी तो बस ऐसी ही हल्की सी सोने की अंगूठी दी थी, जिसकी कीमत उस वक़्त बमुश्किल बीस-पच्चीस हज़ार रही होगी। जब उन्होंने हमें इतना सा दिया था, तो हम उन्हें पचास हज़ार या लाख रुपये का हार क्यों चढ़ाएँ? जितना उन्होंने दिया था, हम भी उतना ही लौटाएँगे। हिसाब बराबर होना चाहिए।”

भुवन ने गहरी साँस ली और दुख भरे स्वर में बोले, “अलका, तुम हर बात को तराजू पर क्यों तौलने लगती हो? तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि हरीश एक प्राइवेट स्कूल में मामूली शिक्षक है। उस समय उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, उसने क़र्ज़ लेकर अपने घर का ख़र्च चलाया था। उस तंगी के दौर में भी उसने अपने सामर्थ्य से बाहर जाकर हमारी बहू को सोने की अंगूठी दी थी ताकि बड़े भाई के सम्मान में कोई कसर न रह जाए। उसकी नीयत और श्रद्धा देखो, न कि धातु का वज़न। हमारी हैसियत आज ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छी है, तो क्या हमें उसके दिए हुए की गिनती करनी चाहिए? बेटी तो पूरे ख़ानदान की होती है, उसके कन्यादान में दिल बड़ा रखना चाहिए।”

अलका ने मुँह बनाते हुए साफ़ लफ़्ज़ों में कहा, “मुझे यह सब ज्ञान मत दीजिए। दुनियादारी ऐसे नहीं चलती भुवन जी। अगर हम दरियादिल बनकर भारी हार दे भी देंगे, तो कौन सा वह हमारी जय-जयकार करने लगेंगे? मैं तो बस इतना जानती हूँ कि जैसा उन्होंने किया, वैसा ही हम करेंगे। मैं एक रत्ती भी भारी चीज़ नहीं ख़रीदने वाली। बस यही चेन जाएगी।”

भुवन ने दुखी होकर पूछा, “तो क्या अगर उस समय हरीश कुछ भी न दे पाता, तो तुम आज नंदिनी की शादी में खाली हाथ चली जातीं? कोई उपहार ही न देतीं?”

“हाँ, बिल्कुल!” अलका ने बिना झिझके कहा, “आज का ज़माना यही है—एक हाथ दो, दूसरे हाथ लो। जब कोई हमारे लिए नहीं करता, तो हम किसी के लिए फ़ालतू में अपनी जेब क्यों ढीली करें?”

भुवन का चेहरा तमतमा उठा। उन्होंने अपनी पत्नी को देखा और बोले, “अलका, सच कहूँ तो तुम्हारी इस संकीर्ण सोच पर मुझे बेहद अफ़सोस हो रहा है। पिछले महीने जब तुम अपनी मौसी के लड़के की शादी में उदयपुर गई थीं, तब वहाँ से लौटकर तुम अपनी मौसी की कितनी तारीफ़ें कर रही थीं। तुम ही तो बता रही थी कि तुम्हारी विधवा मौसी ने अपनी ग़रीब भांजी के दिए हुए पाँच सौ रुपये के लिफ़ाफ़े में से चार सौ रुपये यह कहकर लौटा दिए थे कि ‘तेरा आशीर्वाद ही मेरे लिए बहुत है, तू यह पैसे अपने बच्चों के लिए रख’, और विदाई में उसे भी उतना ही कीमती जोड़ा दिया जितना बाक़ी अमीर बहनों को दिया था। तब तो तुम कह रही थीं कि रिश्ते ऐसे निभाए जाते हैं। फिर जब अपने घर की बात आती है, तो तुम्हारी यह सीख कहाँ चली जाती है?”

अलका कुछ पलों के लिए झेंप गई, लेकिन अपनी ज़िद पर अड़ी रही। उसने चिढ़कर कहा, “वह बात अलग थी, वह मौसी का अपना मामला था। यहाँ बात बराबरी की है। अब इस बहस को यहीं ख़त्म कीजिए। हमें पैकिंग भी करनी है।”

भुवन ने सिर झटका और अपनी जेब से चेकबुक निकालते हुए कहा, “चलो ठीक है, अगर तुम ज़ेवर में हिसाब बराबर कर रही हो, तो कम से कम विदाई के लिफ़ाफ़े में तो दरियादिली दिखाओ। मैं पाँच हज़ार के बजाय इक्कीस हज़ार रुपये का लिफ़ाफ़ा बना रहा हूँ। भाई की बेटी है, कुछ ज़रूरत का सामान ख़रीद लेगी।”

अलका ने तुरंत उनके हाथ से चेकबुक खींच ली और तीखे स्वर में बोली, “बिल्कुल नहीं! पाँच हज़ार एक सौ रुपये तय हुए थे, बस उतना ही जाएगा। एक पैसा ऊपर नहीं देंगे। अगर आप ज़्यादा पैसे लुटाएँगे तो लोगों को लगेगा कि हम दिखावा कर रहे हैं। जो तय हुआ है, वही लिफ़ाफ़ा बनेगा। चलिए, अब उठिए और पैकिंग करने में मेरी मदद कीजिए। कल सुबह ही हमें जयपुर से सीकर निकलना है।”

भुवन बेबसी से उठकर चले गए। वे समझ चुके थे कि अलका की आँखों पर लेन-देन और हिसाब-किताब की ऐसी पट्टी बंधी है जिसे केवल तर्कों से नहीं हटाया जा सकता।

अगले दिन सुबह पूरा परिवार सीकर पहुँचा। शादी का इंतज़ाम शहर के एक भव्य और प्रतिष्ठित रिसॉर्ट में किया गया था। जैसे ही भुवन की गाड़ी रिसॉर्ट के मुख्य द्वार पर पहुँची, हरीश और उसकी पत्नी सरला हाथ जोड़े दौड़े-दौड़े बाहर आए। हरीश की आँखों में बड़े भाई को देखकर जो चमक और आदर था, वह किसी भी औपचारिकता से परे था।

हरीश ने आगे बढ़कर भुवन के चरण स्पर्श किए और फिर अलका के पैर छूते हुए भावुक स्वर में कहा, “भाभी जी, आपके आने से हमारी नंदिनी का ब्याह पूरा हो गया। आपके बिना तो यह घर अधूरा था।”

सरला ने आगे बढ़कर अलका को गले लगा लिया और आदर से कहा, “दीदी, आइए… हमने आपके लिए रिसॉर्ट का सबसे बड़ा और सबसे खूबसूरत सुइट बुक करवाया है। हरीश जी कह रहे थे कि भैया-भाभी को किसी भी तरह की तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए। वे शहर के सबसे अच्छे माहौल में रहने के आदी हैं, इसलिए हमने पूरी व्यवस्था उन्हीं की सुविधा के हिसाब से करवाई है।”

जब अलका और भुवन उस आलीशान सुइट में पहुँचे, तो कमरे की भव्यता देखकर अलका की आँखें फटी की फटी रह गईं। कमरे के भीतर ताज़े फूलों की महक थी, मखमली कालीन बिछा था और बालकनी से रिसॉर्ट का सुंदर बगीचा दिखाई दे रहा था। मेज़ पर मेवे, ताज़े फल और तरह-तरह की मिठाइयाँ सजी हुई थीं। यह देखकर अलका के मन में अचानक एक अजीब सी हलचल मच गई। उसे उम्मीद थी कि हरीश अपनी तंगहाली के कारण किसी सस्ते धर्मशाला या साधारण होटल में कमरा देगा, जहाँ वह चार बातें सुनाकर अपनी श्रेष्ठता साबित कर सकेगी। लेकिन यहाँ तो हरीश और सरला ने अपनी हैसियत से कहीं आगे बढ़कर अपने जेठ-जेठानी के सम्मान में पलकें बिछा दी थीं।

अलका ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई और भुवन से धीरे से कहा, “अरे वाह! कमरा तो वाकई बहुत शानदार है। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि हरीश इतना बड़ा इंतज़ाम कर पाएगा। उसने तो हमारे लिए कोई कसर ही नहीं छोड़ी।”

भुवन ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ अलका की ओर देखा, लेकिन कुछ बोले नहीं। अलका ने अपने पर्स की तरफ़ देखा, फिर कमरे की सजावट को देखा और दबी आवाज़ में बोली, “सुनिए जी… मुझे लगता है कि पाँच हज़ार का लिफ़ाफ़ा कुछ ज़्यादा ही कम लगेगा। उन्होंने हमारे स्वागत में इतना ख़र्च किया है… ऐसा करिए, आप वह इक्कीस हज़ार वाला लिफ़ाफ़ा ही बना लीजिए।”

भुवन ने अपनी जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला और शांत स्वर में बोले, “अलका, तुम्हें क्या लगता है कि मैं तुम्हारे कहे अनुसार चल रहा था? मैंने घर पर ही इक्यावन हज़ार रुपये का लिफ़ाफ़ा बना लिया था। और सुनो, यह लिफ़ाफ़ा मैंने इस कमरे की चमक-दमक देखकर नहीं बनाया था। यह मैंने अपने भाई के उस प्यार और सम्मान के लिए बनाया था, जो हमेशा से उसके दिल में हमारे लिए रहा है। लेकिन तुम कहो तो मैं इसे वापस पाँच हज़ार का कर दूँ? क्योंकि तुम्हारे हिसाब से तो लेन-देन बराबर होना चाहिए ना?”

भुवन की यह बात अलका के सीने में तीर की तरह चुभी। वह चुपचाप नज़रें झुकाकर खड़ी रह गई और कोई जवाब न दे सकी। उसने जल्दी से तैयार होने का बहाना बनाया और अलमारी की तरफ़ मुड़ गई।

शाम को विवाह का समारोह शुरू हुआ। चारों तरफ़ शहनाइयों की गूँज थी और बारातियों का स्वागत हो रहा था। अलका भारी भरकम बनारसी साड़ी और हीरों के ज़ेवर पहनकर स्टेज के पास ही बैठी थी। उसने नंदिनी को वह हल्की सोने की चेन उपहार में दे दी थी। नंदिनी ने झुककर अलका के पैर छुए और बड़े प्यार से कहा, “बड़ी मम्मी, आपका आशीर्वाद मेरे लिए सब कुछ है।” उस मासूम बच्ची के चेहरे पर उस पतली चेन को लेकर कोई शिकायत नहीं थी, बस अपनी ताई के प्रति अगाध आदर था।

रात के समय जब फेरे हो रहे थे, तब थकान मिटाने के लिए अलका रिसॉर्ट के पीछे वाले बरामदे की तरफ़ टहलने निकल गई। वहाँ मंडप के पीछे वाले हिस्से में हल्की रोशनी थी। तभी उसे किसी के रोने की धीमी आवाज़ सुनाई दी। अलका ठिठक गई। उसने देखा कि कोने में हरीश और सरला खड़े थे। सरला की आँखों में आँसू थे और हरीश उसका हाथ थामे ढांढस बंधा रहा था।

अलका एक खंभे की ओट में खड़ी होकर उनकी बातें सुनने लगी।

सरला सिसकते हुए कह रही थी, “सुनिए जी, कैटरिंग वाले और रिसॉर्ट वाले का बाक़ी भुगतान कैसे होगा? शादी तो बहुत अच्छी निपट रही है, लेकिन मेरे मन में डर बैठ गया है। हमने दीदी और भैया के कमरे के लिए जो सबसे महंगा सुइट लिया था, उसका बिल बहुत बढ़ गया है।”

हरीश ने मुस्कुराते हुए सरला के आँसू पोंछे और बड़े शांत स्वर में कहा, “सरला, तुम चिंता क्यों करती हो? मेरी ज़िंदगी भर की जमा-पूंजी और मेरा प्रोविडेंट फ़ंड किस दिन काम आएगा? बेटी तो एक ही बार ब्याही जाती है। और जहाँ तक भैया-भाभी की बात है, तो भैया मेरे पिता समान हैं। जब पिताजी नहीं रहे थे, तब भैया ने ही मुझे उँगली पकड़कर चलना सिखाया था। आज अगर मैं उनके लिए अपनी पूरी ताकत लगाकर भी कुछ कर दूँ, तो वह कम है। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, पर मेरे भाई-भाभी मेरे भगवान हैं। उनके मान-सम्मान में अगर ज़रा भी कमी रह जाती, तो मेरी आत्मा मुझे कभी माफ़ नहीं करती। पैसे तो मैं आगे ट्यूशन पढ़ाकर भी कमा लूँगा, लेकिन अगर मेरे अपनों के सम्मान में कोई कसर रह जाती, तो वह कमी कभी पूरी नहीं होती।”

सरला ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ जी, आप सच कह रहे हैं। जब दीदी ने मंच पर आकर नंदिनी के गले में वह चेन पहनाई और अपना हाथ उसके सिर पर रखा, तो मुझे लगा कि मेरी बेटी को पूरे ख़ानदान का आशीर्वाद मिल गया। मुझे लगा मेरी सारी थकान मिट गई।”

खंभे के पीछे खड़ी अलका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके रोंगटे खड़े हो गए और आँखों से अनायास ही आँसुओं की धारा बह निकली। उसका कलेजा जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो। वह जिसे अपनी अमीरी का घमंड समझ रही थी, वह वास्तव में हरीश के त्याग और श्रद्धा के आगे तिनके के समान भी नहीं था। हरीश ने अपनी हैसियत नहीं देखी थी, उसने सिर्फ़ अपने बड़े भाई और भाभी के प्रति अपना अगाध समर्पण देखा था। और वह? वह इतने साधन संपन्न होने के बावजूद केवल कुछ हज़ार रुपयों का हिसाब लगा रही थी, धातुओं के वज़न और रुपयों की गिनती में उलझी हुई थी।

अलका को अपने आप पर इतनी घिन आई कि वह वहीं ज़मीन पर बैठ जाना चाहती थी। उसका सारा अहंकार, सारी तड़क-भड़क उस क्षण चूर-चूर हो गई। वह लड़खड़ाते कदमों से वापस अपने कमरे में लौटी। कमरे में भुवन अकेले बैठे कुछ कागज़ात देख रहे थे।

अलका को रोते हुए अंदर आते देख भुवन घबराकर उठ खड़े हुए, “क्या हुआ अलका? तुम रो क्यों रही हो? किसी ने कुछ कह दिया क्या? तबीयत ठीक है तुम्हारी?”

अलका ने भुवन के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए और फूट-फूटकर रोने लगी। भुवन ने उसे संभाला और सोफ़े पर बिठाया। अलका ने रोते हुए हरीश और सरला की सारी बातें भुवन को बता दीं।

अलका ने हिचकियों के बीच कहा, “भुवन जी, मैं कितनी अंधी हो गई थी। मैं पैसों के घमंड में यह भूल ही गई थी कि रिश्ते बाज़ार की चीज़ नहीं होते जिन्हें नफ़े और नुकसान की तराजू में तौला जाए। हरीश हमारे लिए क़र्ज़ में डूबने को तैयार हो गया, और मैं… मैं उस बेचारी बच्ची के लिए सिर्फ़ इसलिए हल्की चेन लाई क्योंकि उन्होंने कभी हमें कम दिया था। मेरी सोच कितनी छोटी, कितनी मैली थी। मुझे माफ़ कर दीजिए। अगर आज मैं अपनी ग़लती नहीं सुधार पाई, तो मैं कभी अपनी ही नज़रों में नहीं उठ पाऊँगी।”

भुवन की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने अलका के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अलका, इंसान ग़लती तभी करता है जब वह दिल की जगह दिमाग़ से रिश्ते चलाने लगता है। मुझे खुशी है कि आज तुम्हारी आँखें खुल गईं।”

अलका तुरंत उठी। उसने अपनी अलमारी खोली और शादी में पहनने के लिए लाया गया अपना सबसे भारी, पुश्तैनी नौलखा सोने का हार निकाला, जिसे उसने अपनी बहू के लिए भी सँभाल कर रखा था। इसके साथ ही उसने अपनी चेकबुक निकाली।

अलका ने भुवन से कहा, “चलिए मेरे साथ।”

विदाई का समय हो चुका था। मंडप में सब लोग नम आँखों से नंदिनी को विदा करने की तैयारी कर रहे थे। तभी अलका आगे बढ़ी। उसने सबके सामने नंदिनी को अपने सीने से लगा लिया। अलका के आँसू नंदिनी के आंचल को भिगो रहे थे। अलका ने अपने हाथों से वह भारी सोने का हार निकाला और नंदिनी के गले में पहना दिया।

हरीश और सरला घबरा गए। हरीश ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “भाभी जी, यह क्या कर रही हैं? यह तो आपका पुश्तैनी हार है, यह बहुत कीमती है। आप पहले ही नंदिनी को चेन दे चुकी हैं, इतना बड़ा उपहार हम नहीं ले सकते।”

अलका ने आगे बढ़कर अपने देवर हरीश के सिर पर हाथ रखा और भर्राए हुए गले से कहा, “हरीश, चुप रहो। आज कोई छोटा अपने बड़े के आगे नहीं बोलेगा। यह हार इस बेटी के प्यार और तुम्हारे उस त्याग के आगे बहुत छोटा है जो तुमने आज हमारे सम्मान के लिए किया है। मैं इतने सालों से तिजोरी में बंद दौलत को ही सब कुछ समझती रही, पर आज तुमने मुझे सिखाया कि असली दौलत तो रिश्तों के उस प्यार में है जो बिना किसी शर्त के निभाया जाता है।”

अलका ने मुड़कर भुवन की ओर देखा। भुवन ने तुरंत मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर हरीश के हाथ में रिसॉर्ट और कैटरिंग के पूरे भुगतान का चेक और साथ ही विदाई का लिफ़ाफ़ा थमा दिया। हरीश ने संकोच से मना करना चाहा, लेकिन भुवन ने उसे गले से लगाते हुए कहा, “पगले, जब बाप समान भाई मौजूद हो, तो छोटा भाई क़र्ज़ के बोझ तले दबेगा क्या? यह तेरा हक़ है, और हमारा फ़र्ज़।”

मंडप में मौजूद हर व्यक्ति की आँखें इस दृश्य को देखकर छलक आईं। हरीश और सरला ने रोते हुए भुवन और अलका के चरण छू लिए। अलका का दिल आज पहली बार किसी भार से पूरी तरह मुक्त था। उसे समझ आ चुका था कि लेन-देन की दुकानों में कभी रिश्ते नहीं पनपते; रिश्ते तो केवल त्याग, आदर और खुले दिल से लुटाए गए प्यार से ही अमर होते हैं।

दोस्तों, क्या आपके आस-पास भी लोग आज रिश्तों को उपहारों और लिफ़ाफ़ों के मोल से तौलने लगे हैं? क्या पारिवारिक रिश्तों में लेन-देन का यह हिसाब-किताब सही है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखकर बताएं।

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