अपनो की चोट – बालेश्वर गुप्ता

तब का काला फोन सर्द ऋतु में सुबह सुबह टिन टिन करने लगा तो एक दम झुंझलाहट हुई।इतनी सुबह कैसे किसका फोन आ गया।फिर ख्याल आया कहीं किसी रिश्तेदार के यहां से कोई अनहोनी की सूचना न हो,यह सोचकर मैने फोन उठा ही लिया।उधर से कांति प्रसाद जी बोल रहे थे।मै उन्हें पिता तुल्य मानता था।

उनके हिचकी लेते हुए बोलना मुझे अंदर तक हिला गया।वे एक प्रकार से रोते हुए बोल रहे थे, उनके बोल मै समझ नहीं पा रहा था।पर ये समझ आ गया था,जरूर कोई ऐसी बात हुई है जो कांति प्रसाद जैसे जीवट रखने वाले व्यक्ति को रोने को विवश कर रही थी।मैने बस इतना कहा बाबूजी मै तुरंत आ रहा हूं।

           कांति प्रसाद जी यूं तो कपड़े की दुकान करते थे,पर थे बहुत अधिक सौम्य,व्यावहारिक और सामाजिक।नगर के हर सामाजिक कार्य में उनका योगदान रहता।ऐसे ही एक सामाजिक कार्यक्रम में मेरा उनसे परिचय हो गया।पहली ही मुलाकात में मै उनके व्यक्त्तिव से बहुत प्रभावित हुआ।

वे एक हिंदू प्रेरित संस्कारित स्कूल को संचालित कराना चाहते थे।बाद में उन्होंने एक विद्यालय को दो प्लॉट दान में दे दिये और कई लाख रुपए स्वयं तो स्कूल बिल्डिंग में लगाए ही,साथ ही नगर से चंदा तक एकत्रित कराया।मुझे भी वो अपना बेटा ही मानने लगे थे।उनका एक बेटा तथा दो पोते थे।बेटे की अलग से कपड़े की दुकान थी।पोते तब पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में थे।

        एक पारिवारिक कलेश जरूर सामने आ गया था,उनके पोते नहीं चाहते थे कि उनके बाबा यूं ही दान में दौलत उड़ाए,जबकि कांति प्रसाद जी का सोचना था कि जब बेटे को भरपूर दुकान अलग से करा दी साथ ही घर का ऊपरी पूरा पोर्शन भी बेटे को अलग से दे दिया तब यदि मै अपने सुकून के लिये सामाजिक कार्य करता हूं

तो इन्हें क्यों आपत्ति होनी चाहिए।इस घरेलू विवाद में मैने कभी बीच में पड़ना उचित नहीं माना।कांति प्रसाद जी का बेटा अवश्य ही मुझसे अपेक्षा रखता था कि मैं कांति प्रसाद जी को उनका पक्ष समझा कर उन्हें उनकी मन मुताबिक तैयार करूं।मै कभी इस झंझट में पड़ा नहीं।

       विद्यालय की बिल्डिंग कार्य प्रगति पर था,फंड कुछ कम पड़ा तो प्रधानाचार्य अवगत कराने कांति प्रसाद जी के घर पर आए थे।कांति प्रसाद जी के पोते को उनका आना अच्छा नहीं लगा,उसे लगा कि बाबा अब और पैसे स्कूल को दे देंगे।सो वह प्रधानाचार्य से बदतमीज़ी से बोलने लगा और उन्हें घर  न आने की हिदायत दे दी। खिसियाने से प्रधानाचार्य वहां से चले आए।

      इस बात को स्वयं कांति प्रसाद जी ने मुझे बताई,वे क्रोध में थे,उन्हें यह सब अपमानजक लग रहा था,उनका कहना था,मेरा घर है,उनसे अब खाली कराऊंगा।किसी प्रकार मैने उन्हें परिवार की शांति और सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला देकर मुश्किल से शांत किया।उनका बार बार यही कहना था कि मेरे घर में मेरा भी कुछ सम्मान है कि नहीं।मैने  कांति प्रसाद के बेटे से भी बात की तथा पोते की बदतमीज़ी को हद में रखने की सलाह दी।

        उस दिन जब उनका सुबह सुबह रोते हुए फोन आया तो मै उनके घर की ओर दौड़ लिया। वहां का दृश्य देख मै अवाक रह गया,कांति प्रसाद जी बुरी तरह बिलख रहे थे,मुझे देख वो और अधिक भावुक होकर मुझसे चिपट गए।मै उन्हें चुप कराने का प्रयास कर रहा था।मैने उनके घर में नजर दौड़ाई तो उनके बेटे को सिर पकड़ कर एक ओर बैठे देखा तो एक बड़े पोते को भी दूसरी ओर रोते हुए खड़ा पाया।समझ नहीं आ रहा था,मामला क्या है? हिचकीयों के बीच कांति प्रसाद जी ने बताया कि उनके पोते ने उन पर हाथ उठाया है।मेरा आत्मसम्मान आज मेरे ही घर में मेरे पोते ने ही धराशायी कर दिया है।मुझे झकझोर कर बार बार कह रहे थे कि बताओ अब कैसे जिऊं? मै असमंजस में था कि इस विवाद को कैसे सुलझाऊँ,यह छोटी बात नहीं थी,एक पोते का अपने बाबा पर हाथ उठाना।सच तो यह था कि मुझे भी यह सहन नहीं हो पा रहा था।इतने में उनका पोता रोते हुए मेरे पास आ गया,वो कुछ कहना चाहता था,पर मै अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाया।जैसे ही वह मेरे पास आया मैने एक जोरदार तमाचा उसको जड़ दिया और चिल्ला कर बोला,कांति प्रसाद जी मेरे भी पिता समान है,तुम्हारी उन पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे हुई?उनका पोता मेरे पैरो में गिर कर बार बार क्षमा मांग रहा था,गुहार लगा रहा था,बाबा से एक बार माफ करा दो, जिंदगी भर उनके पावं धोकर पियूँगा।मेरी हिकारत कम नहीं हो रही थी,पर मुझे कांति प्रसाद जी के बुढ़ापे को देख उनके लिए उनके घर में ही सम्मानजनक स्थान भी निर्माण करना था।

      मैने पूरे परिवार को एक साथ बिठाकर उन सबको उनकी इस घिनौनी हरकत का अहसास कराया,वो सब शर्मिंदा हो बार बार क्षमा याचना कर रहे थे।कांति प्रसाद जी आश्चर्यरूप से एक दम शांत  हो गए थे,वे कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे।उनका पोता उनसे बार बार क्षमा मांग रहा था।मैने भी कांति प्रसाद जी हाथ अपने हाथ में पकड़ कर उनके पोते के सिर पर रख दिया।

        मैने सोचा एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा।वहां से चला आया।एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि समाचार मिला कि कांति प्रसाद जी नहीं रहे, उनको हार्ट अटैक आ गया था।मै समझ गया था कि कांति प्रसाद जी जिन्होंने कभी कही भी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया था,तो अपने ही घर में कैसे स्वीकार करते?

      सब कह रहे थे कि हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई है,पर मै जानता था कांति प्रसाद जी तो उसी दिन स्वर्ग सिधार गए थे जब उनके पोते ने ही उनके सम्मान को चूर चूर कर दिया था।

स्वरचित, मौलिक।

           बालेश्वर गुप्ता, नोएडा

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