चाचा जी के बेटे की शादी में नीता सुंदर सी साड़ी पहने जब नई गाड़ी से उतरी, तो सब उसे देखते ही रह गए। भावना जी को अपने पति के किए फैसले पर आज बहुत गर्व हो रहा था। उनके ही कारण आज उनकी बेटी बहुत खुश भी थी और आत्मसम्मान के साथ जी रही थी।
आइए आपको उनके परिवार से मिलाऊं। वर्मा जी ऑफिस में डायरेक्टर थे। उनकी एक बेटी नीता थी और उनका विवाहित बेटा राजेश , अमेरिका में पिछले कई साल से कार्यरत था। राजेश साल में एक बार घर अवश्य आता था।
वर्मा जी की पत्नी भावना जी थी। नीता के विवाह योग्य होने पर वे उसके योग्य वर ढूंढ रहे थे। राजेश भी अपनी बहन के सुखी और संपन्न जीवन के लिए दहेज में कुछ भी देने के लिए तैयार था। शायद यही कारण था कि नीता के लिए बहुत से रिश्ते भी आ रहे थे परंतु वर्मा जी प्रत्येक रिश्ते को मना कर देते थे। उनका ख्याल था कि वह सब रिश्ते केवल उनके धन के कारण आ रहे हैं।
बचपन में हुए एक्सीडेंट के कारण नीता की एक टांग बहुत कमजोर हो गई थी। ऑपरेशन के बाद टांगें ठीक तो हो गई थी परंतु उसकी चाल थोड़ी सी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई थी। वैसे नीता सर्वगुण संपन्न, संस्कारी और गृह कार्य में कुशल थी। ग्रेजुएशन करने के बाद उसने कई सिलाई कढ़ाई आदि के कोर्स भी करे थे। वर्मा जी ने घर में सबकी इच्छा के विपरीत नीता का रिश्ता अपने मातहत सेवानिवृत्त क्लर्क मोहन जी के बेटे विनय से कर दिया था।
विनय मोबाइल और लैपटॉप की रिपेयरिंग का काम करता था और दफ्तर के सारे कंप्यूटर की रिपेयरिंग का ठेका उसे ही मिला हुआ था। विनय के पिता मोहन जी तो अपने बेटे के लिए ऐसा रिश्ता पाकर फूले नहीं समा रहे थे।
भावना और राजेश ने वर्मा जी को समझाने की बहुत कोशिश करी कि नीता की शादी ,आनंद जी के इंजीनियर बेटे से कर दो। उनके द्वारा मांगी गई गाड़ी और कैश देने में दोनों को कोई एतराज न था। उन्होंने वर्मा जी को बहुत समझाया कि जब कभी भी नीता अपनी बहनों और रिश्तेदारों से मिलेगी ,जो बहुत ही संपन्न हैं तो नीता और हम कितना अपमानित महसूस करेंगे ,लेकिन पापा का एक ही जवाब था मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि रिश्तेदारों के बीच नीता का सम्मान होगा
या नहीं लेकिन मेरे ख्याल से जिस घर में वह रह रही है ,उस घर में उसका सम्मान होना बहुत जरूरी है। वह अपने घर में सर उठाकर आत्मसम्मान से जिए मैं केवल इतना ही चाहता हूं। अगर बच्चे मेहनती और संस्कारी हैं ,तो उन्हें संपन्न बनने से कोई रोक भी नहीं सकता। हालांकि इस रिश्ते में राजेश और भावना जी रजामंदी ना होने के कारण बहुत समय तक भावना जी ने तो वर्मा जी से बात भी नहीं की थी।
शादी में आए ज्यादातर रिश्तेदारों ने बधाई से ज्यादा नीता की इस तरह के साधारण परिवार में शादी के लिए सहानुभूति प्रकट की। कई रिश्तेदारों ने चिंता भी जताई कि नीता कैसे उस छोटे से घर में अपने आप को ढाल पाएगी।
विवाह के उपरांत मोहन जी के घर में नीता का स्वागत ऐसे हुआ मानो सुदामा के घर में कृष्ण आ गए हों। नीता भी वहां सब का प्यार और मान सम्मान पाकर ऐसी खोई कि उसे उस घर में कोई कमी का एहसास ही नहीं हुआ।
उस घर में नीता का स्थान किसी देवी के समान था, कभी किसी ने उससे उसकी कोई भी कमी का जिक्र भी नहीं किया। यूं भी नीता को घर के सारे काम करने आते थे इसलिए उसे अपने घर का काम करने में भी कोई परेशानी नहीं हुई।
उसके ससुराल में साथ वाले घर में विनय के चाचा और चाचीजी रहते थे उनके कोई बच्चा ना होने के कारण वह विनय को ही अपना पुत्र मानते थे। नीता ने भी कभी सास ससुर और चाचा चाची में फर्क नहीं समझा। वह दोनों की सेवा समान रूप से ही करती थी। विनय की एक शादीशुदा बहन भी थी, अपने व्यवहार से दोनों एक दूसरे की प्यारी सखी में परिवर्तित हो चुकीं थी।
वर्मा जी ने विनय को मोबाइल और लैपटॉप का एक शोरूम खोलने की सलाह दी। विनय के चाचा जी ने अपने घर का नीचे का पूरा हिस्सा उसे शोरूम खोलने के लिए दे दिया। वर्मा जी ने शोरूम के लिए लोन अपने नाम पर ले कर के विनय को दे दिया। क्योंकि लोन वर्मा जी के नाम पर था
इसीलिए विनय को निश्चित समय पर एक निश्चित रकम वर्मा जी को ही देनी होती थी। विनय की हमेशा यही कोशिश होती थी कि समय से पहले ही लोन चुकता कर दिया जाए। धीरे धीरे सारा लोन चुकता रहा और उनके घर में संपन्नता भी बढ़ती रही ।विनय ने चाचा जी का और अपना दोनों घरों के नीचे के हिस्से को अपने शोरूम में परिवर्तित कर दिया था और ऊपर दो मंजिला घर बन चुका था।
मोहन जी और चाचा जी भी अपना खाली समय विनय के शोरूम में ही अपनी सेवाएं देकर बिताते थे। एक बार चाची जी की तबियत बहुत खराब हो गई थी, नीता ने चाची जी की सेवा में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
नीता के बेटा होने पर चाची जी ने अपने काफी जेवर नीता को दे दिए। चाचा जी ने भी अपनी प्रॉपर्टी का वारिस विनय को ही बना दिया था। समय के साथ विनय के व्यापार में बढ़ोतरी हो रही थी और उसने मार्केट में ही एक बहुत बड़ी दुकान और गाड़ी भी खरीद ली थी।
चाचा जी की बेटी की शादी में नीता अपने मायके में आई थी। आज नीता जब नई गाड़ी से उतरी तो उसके चेहरे और गहनों की चमक के साथ उसकी मुस्कुराहट भी देखते ही बनती थी। सहानुभूति करने वाले सारे रिश्तेदार आज वर्मा जी की समझदारी की सराहना कर रहे थे।
शादी संपन्न होने के बाद जब नीता अपने घर आई तो वर्मा जी ने नीता को कहा बेटा “मैं दहेज और दिखावे में विश्वास नहीं करता था” इसीलिए मैंने तेरी शादी में कुछ भी दहेज नहीं दिया, लेकिन तेरे हिस्से के पैसे मैंने अलग जमा करके रख दिए हैं, वही पैसे मैंने विनय को उसके शोरूम चलाने के लिए दिए थे।
विनय ने अब वह सारे पैसे वापस कर दिए हैं।तुम्हारे वह पैसे अभी मेरे पास रखे हैं ,मेहनत करनी तो विनय को आती ही है, अगर तुम अपने व्यापार को और आगे बढ़ाना चाहो तो और लोन ले लेना, वह पैसे तुम्हारे ही हैं।
पाठकगण अपने बच्चों के विवाह के लिए कोई बहुत बड़ा ऊंचा घर दहेज देकर देखने से अच्छा है, कि हम ऐसा घर देखें जिसमें कि बच्चे आपस में प्यार और सम्मान पा सके। अगर दोनों में बहुत प्यार है, और एक दूसरे के प्रति सम्मान है तो अपनी मेहनत के बल पर वह अपना लक्ष्य जरुर प्राप्त कर लेंगे। बेटी के विवाह के समय बड़ा घर देखने की अपेक्षा ऐसा घर देखना चाहिए जहां कि बेटी का आत्म सम्मान बना रहे परिश्रम के बूते पर वह संसाधन तो प्राप्त कर ही लेंगे।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा