समीर ने अपनी बांहों में माई को उठाया। उनका शरीर बर्फ जैसा ठंडा पड़ रहा था। वंदना ने तुरंत वही कत्थई ऊनी शॉल उठाई और माई के पूरे शरीर को कसकर लपेट दिया ताकि उनका तापमान न गिरे। मयंक ने तुरंत गाड़ी स्टार्ट की। समीर माई का सिर अपनी गोद में रखे पिछली सीट पर बैठ गया और वंदना लगातार उनकी हथेलियां और तलवे रगड़ती रही। बापूजी को सरिता के पास घर पर ही छोड़ना पड़ा ताकि उनकी तबीयत न बिगड़ जाए।
दिसंबर की हल्की सर्द सुबह में चाय की भाप खिड़की के शीशे पर हल्की धुंध पैदा कर रही थी। समीर ने बालकनी से भीतर आते हुए कोट उतारा और सोफे की पीठ पर रखते हुए एक गहरी सांस छोड़ी। रसोई के दरवाजे पर खड़ी अपनी पत्नी वंदना की ओर देखते हुए वह एकाएक बोला, “वंदना, इस बार कहीं बर्फ देखने या रिजॉर्ट में वक्त बिताने नहीं जाएंगे। इस दफा सचमुच अपने घर चलते हैं। कितने बरस बीत गए उस मिट्टी की खुशबू महसूस किए, हमें खुद खबर नहीं है।”
वंदना के हाथ में कलछी थमी की थमी रह गई। चूल्हे पर सिक रहे मेथी के परांठों की सोंधी महक के बीच उसके दिल में एक भूली-बिसरी तरंग जाग उठी। उसने चौंककर समीर की ओर देखा। हर साल दिसंबर की सर्दियों में समीर की यही जिद रहती थी कि बच्चों को किसी ठंडे पहाड़ी इलाके में ले जाएं, कहीं दूर किसी होटल की बालकनी में बैठकर चाय पिएं। उन सुनियोजित छुट्टियों की भागदौड़ में उनका अपना पुश्तैनी कस्बा, वो पुराना आंगन और अपनों की हंसी पीछे छूटती चली गई थी। वंदना को याद आया कि पिछली बार भी जब उसने गांव जाने की बात उठाई थी, तो अंतिम क्षणों में समीर की कंपनी में किसी नए प्रोजेक्ट की लॉन्चिंग आ गई थी। समीर मल्टीनेशनल फर्म में सप्लाई चेन का हेड था, उसकी एक दिन की गैरमौजूदगी भी ऑफिस में हलचल मचा देती थी। उस वक्त टिकटें रद्द करानी पड़ी थीं और मन मसोस कर वंदना ने खुद को व्यस्तताओं के हवाले कर दिया था। हालांकि समीर ने तब कहा भी था कि वह बच्चों को लेकर निकल जाए, पर वंदना बिना उसके अकेले उस बड़े घर में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी।
लेकिन आज समीर के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था, बल्कि एक अजीब सा सुकून और पुरानी जड़ों की ओर लौटने की ललक साफ दिखाई दे रही थी। वंदना की आंखों के सामने वो दिन तैरने लगे जब वह नई-नई ब्याह कर उस संयुक्त परिवार में आई थी। उम्र कच्ची थी, दुनियादारी की समझ कम थी, लेकिन उस घर की बड़ी-बूढ़ी सास, जिन्हें सब ‘माई’ कहते थे, उन्होंने कभी उसे पराएपन का अहसास नहीं होने दिया था। अगर कभी दाल में नमक तेज हो जाता या कोई रीति-रिवाज निभाने में चूक हो जाती, तो माई दूसरों के सामने बात संभाल लेती थीं और बाद में अकेले में प्यार से सिर पर हाथ फेरकर सही तरीका सिखाती थीं।
जब समीर की नौकरी बड़े शहर में लगी और उन्हें वो कस्बा छोड़ना पड़ा था, तब माई का चेहरा आंसुओं से भीग गया था। स्टेशन तक छोड़ते हुए माई ने अपने हाथों से बुनी हुई कत्थई रंग की एक ऊनी शॉल वंदना के कांधों पर डाली थी और बोली थीं, “परदेस की हवा बड़ी ठंडी होती है बहूरानी, जब भी ठंड लगे इसे ओढ़ लेना, ऐसा समझना कि मैं तुम्हारे साथ खड़ी हूं।” इसके अलावा सफर के लिए भुने हुए चने, मेवे और तिल की गज्जक के छोटे-छोटे डिब्बे भी थमाए थे। वे मेवे तो कब के खत्म हो गए थे, पर उन स्टील के डिब्बों को वंदना ने आज भी अपने मॉडर्न मॉड्यूलर किचन की सबसे ऊंची रैक पर हिफाजत से सजा रखा था।
नाश्ते की मेज पर जब समीर परांठे की पहली बाइट लेने ही वाला था कि ड्राइंग रूम में रखा उसका मोबाइल फोन बज उठा। स्क्रीन पर नजर पड़ते ही समीर के हाथ ठिठक गए। वह फोन उसके छोटे भाई मयंक का नहीं, बल्कि उसके बापूजी के पुराने नंबर से था। बापूजी, जो कई साल पहले पक्षाघात के हल्के झटके के बाद से बिस्तर पकड़ चुके थे और कभी फोन को हाथ तक नहीं लगाते थे, उनके नंबर से कॉल आना किसी अनहोनी का संकेत सा लगा। समीर का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने कांपती उंगलियों से कॉल रिसीव की और धीमे से कहा, “हेलो… बापूजी?”
सामने से भारी और थकी हुई, मगर परिचित आवाज आई, “भैया, मैं मयंक बोल रहा हूं। मेरा फोन चार्ज नहीं था, इसलिए बापूजी के फोन से लगा रहा हूं।”
समीर ने राहत की लंबी सांस ली, “अरे मयंक, तुम ठीक तो हो ना? बापूजी कैसे हैं?”
मयंक ने कुछ पलों की खामोशी के बाद संकोच भरे लहजे में कहा, “भैया, सब ठीक हैं। बस… इस बार सर्दियों में आपको और भाभी को घर आना ही होगा। कोई बहाना नहीं चलेगा। बहुत जरूरी है।” इतना कहकर मयंक ने बात को ज्यादा खींचे बिना फोन रख दिया।
समीर ने नाश्ता करते हुए वंदना को पूरी बात बताई, “मयंक का फोन था। कह रहा था घर आना बहुत जरूरी है। मुझे लगता है कोई बात है जो वो फोन पर नहीं बताना चाहता।”
वंदना ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगलियों पर हिसाब लगाया और बोली, “आपको याद नहीं रहता ना? अगले हफ्ते माई और बापूजी के विवाह की बावनवीं सालगिरह है। मयंक जरूर उसी के लिए हम सबको बुला रहा है।”
वंदना की बात सुनते ही समीर का चेहरा खिल गया। दूर रहकर भी वंदना ने उस घर की हर तारीख और हर रिश्ते को अपने सीने से लगा रखा था। भले ही सालों से वहां जाना नहीं हो पाया था, लेकिन हर तीज-त्योहार, जन्मदिन या सालगिरह पर शहर से कोई न कोई कुरियर उस कस्बे के पते पर जरूर पहुंचता था। कभी बापूजी के लिए गर्म कुर्ता, कभी माई के लिए सुंदर चश्मा, तो कभी मयंक के बच्चों के लिए खिलौने। फोन पर हर दूसरे दिन हाल-चाल लेना वंदना का नियम था। उसी वजह से इतने वर्षों की दूरी के बावजूद रिश्तों में कभी बर्फ नहीं जमी थी।
शाम को ही समीर ने ऑफिस से लंबी छुट्टी स्वीकृत करा ली और दोनों बच्चों, आरव और नव्या के साथ खरीदारी की योजना बन गई। वंदना सीधे बाजार गई और माई के लिए इस बार कोई साधारण साड़ी नहीं, बल्कि एक सुनहरी गोटे वाली लाल चुनरी, चांदी की सुंदर पायल और बापूजी के लिए रेशमी शॉल खरीदी। अलमारी के सबसे गहरे कोने से उसने माई की दी हुई वह पुरानी कत्थई शॉल निकाली, जिसे उसने नीम की सूखी पत्तियों के साथ एक मखमली थैले में सहेज कर रखा था। उसने तय किया कि वह इस सफर में वही शॉल ओढ़कर जाएगी, ताकि माई को लगे कि उनकी दी हुई सौगात आज भी उतनी ही अनमोल है।
ट्रेन का सफर पुरानी यादों की पटरी पर दौड़ता रहा। जब दोनों बच्चे पहली बार उस कस्बे के रेलवे स्टेशन पर उतरे, तो उनके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। शहर के कंक्रीट के जंगलों और ऊंची इमारतों से दूर, खुली धूप और ठंडी हवा का एक झोंका चेहरे को छू गया। स्टेशन से एक पुरानी टैक्सी करके जब वे अपने पुश्तैनी मोहल्ले में पहुंचे, तो समीर की नजरें बाहर की गलियों को तलाशने लगीं।
गाड़ी जैसे ही उस पुराने फाटक के सामने रुकी, समीर कुछ पलों के लिए अवाक रह गया। मिट्टी और चूने से पुता हुआ वो पुराना दालान अब गायब था। वहां सीमेंट का एक नया, आधा-अधूरा बना हुआ दोमंजिला मकान खड़ा था, जिस पर अभी प्लास्टर का काम भी पूरी तरह नहीं हुआ था। आंगन की वो तुलसी का चबूतरा अब भी वहीं था, लेकिन उसके आसपास का नक्शा बदल चुका था। समीर के मन में खयाल आया कि शायद बापूजी की पेंशन और मयंक की छोटी-मोटी कमाई का बड़ा हिस्सा इस मकान को खड़ा करने में लग गया था, तभी मकान अभी तक अधूरा था।
जैसे ही टैक्सी का दरवाजा खुला, अंदर से मयंक बाहर निकला। समीर की आंखें अपने छोटे भाई को देखकर भर आईं। कभी कॉलेज में चुलबुला और तंदुरुस्त दिखने वाला मयंक अब काफी दुबला हो गया था। उसके बालों में असमय सफेदी झांकने लगी थी और चेहरे पर जिम्मेदारियों और आर्थिक संघर्ष की गहरी लकीरें खिंची थीं। समीर ने आगे बढ़कर मयंक को कसकर गले लगा लिया। दोनों भाइयों के बीच कोई शब्द नहीं फूटा, सिर्फ एक गहरी, भीगी हुई चुप्पी थी जो बरसों की दूरी को एक झटके में मिटा रही थी।
भीतर आंगन में कदम रखते ही हीटर की धीमी आंच के पास तख्त पर बैठे बापूजी और माई नजर आए। बापूजी के हाथ थोड़े कांप रहे थे और माई के चश्मे का शीशा थोड़ा धुंधला था। वंदना ने आगे बढ़कर दोनों के चरण स्पर्श किए। माई ने जैसे ही वंदना के कांधे पर वही अपनी दी हुई कत्थई शॉल देखी, उनकी पथराई आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने थरथराते हाथों से वंदना का चेहरा थाम लिया और बोलीं, “मेरी बहूरानी… तूने इसे अब तक संभाल रखा है? मुझे लगा तू शहर जाकर अपने इस पुराने घर को भूल गई होगी।”
“माई, जो चीज दिल के करीब होती है, वो कभी पुरानी नहीं होती,” वंदना ने भावुक होकर कहा और माई के गले लग गई।
घर में जैसे एकदम से प्राण लौट आए थे। आरव और नव्या, जो हमेशा मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते थे, वे आंगन में इधर-उधर दौड़ने लगे। मयंक की पत्नी सरिता ने रसोई संभाल रखी थी, लेकिन वंदना तुरंत कपड़े बदलकर उसके साथ चूल्हे के पास जा खड़ी हुई। दोनों देवरानी-जेठानी में वही पुराना सामंजस्य था जो बरसों पहले हुआ करता था।
बातों-बातों में मयंक ने बताया कि कल माई और बापूजी की सालगिरह है और उसने पूरे मोहल्ले और दूर-दराज के कुछ रिश्तेदारों को न्योता दिया है। उसने कहा, “भैया, बापूजी की तबीयत का कोई भरोसा नहीं रहता। मेरी दिली ख्वाहिश थी कि इस बार उनकी सालगिरह पर हम सब एक साथ हों, ताकि वे अपनी बची हुई जिंदगी में इस खुशी को याद रख सकें।”
समीर ने मयंक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “तूने बिल्कुल सही किया मयंक। अब हम आ गए हैं, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।”
अगली सुबह से ही घर में उत्सव का माहौल बन गया। मोहल्ले के हलवाई ने दालान में कड़ाही चढ़ा दी थी। कचौड़ियों और जलेबियों की महक पूरे घर में फैल रही थी। दोपहर में एक ब्यूटी पार्लर वाली लड़की को बुलाया गया ताकि बहुएं और बच्चे तैयार हो सकें। जब माई से सजने-संवरने को कहा गया, तो उन्होंने हंसते हुए मना कर दिया और बोलीं, “इस उम्र में क्या तमाशा कराओगी! बस मेरे हाथों में थोड़ी सी हरी मेहंदी लगा दो, मुझे तो वही भाती है।” माई को आज भी बिना किसी मौके के अपने हाथों में मेहंदी रचाने का बड़ा शौक था। उनकी इस सादगी पर पूरा परिवार हंस पड़ा।
शाम ढलते ही आंगन को गेंदे के फूलों और पीली रोशनियों से सजा दिया गया। वंदना ने बड़े जतन से माई को वह सुनहरी गोटेदार लाल चुनरी ओढ़ाई, जो वह शहर से लाई थी। माई के पांवों में नई चांदी की पायल पहनाई गई। जब माई लाल चुनरी ओढ़कर, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाए और बापूजी नए सफेद कुर्ते-पायजामे में तख्त पर साथ बैठे, तो ऐसा लग रहा था मानो पचास साल पुराना कोई सुनहरा दौर फिर से लौट आया हो। मोहल्ले के लोग, पुराने पड़ोसी और रिश्तेदार जमा होने लगे। हर कोई माई के उस शांत, गरिमामय रूप की तारीफ कर रहा था। बापूजी के चेहरे पर भी बरसों बाद एक संतोष भरी मुस्कान खिली थी।
देर रात तक बधाईयों, हंसी-मजाक, पुराने गानों और खान-पान का सिलसिला चलता रहा। आरव और नव्या ने अपने दादा-दादी के साथ ढेर सारी तस्वीरें खिंचवाईं। रात के करीब दो बजे जब सारे मेहमान विदा हो गए, तो पूरा परिवार आंगन में बिछे गद्दों पर थका-हारा सा बैठ गया। माई ने लाल चुनरी समेटते हुए कहा, “आज मेरा जीवन सफल हो गया। मेरे दोनों बच्चे, मेरी दोनों बहुएं और मेरे नाती-पोते सब मेरी आंखों के सामने हैं। भगवान से इससे ज्यादा और क्या मांगूं।” बापूजी का हाथ थामे माई अपने कमरे में सोने चली गईं और बाकी सब भी अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गए।
रात के सन्नाटे में करीब साढ़े तीन बजे अचानक माई के कमरे से एक अजीब सी भारी आवाज और बापूजी की लड़खड़ाती चीख सुनाई दी, “समीर… मयंक… दौड़ो!”
समीर और वंदना बदहवास होकर कमरे की तरफ भागे। पीछे-पीछे मयंक और सरिता भी आ पहुंचे। कमरे का दृश्य देखकर सबके पैरों तले जमीन खिसक गई। माई बिस्तर से नीचे फर्श पर बेसुध गिरी पड़ी थीं। उनका शरीर पूरी तरह शिथिल था और सांसें बेहद उखड़ी-उखड़ी चल रही थीं। बापूजी दीवार का सहारा लिए कांपते हुए खड़े थे, उनकी आंखों में गहरा खौफ था।
“माई! माई, आंखें खोलो!” समीर पागलों की तरह चिल्लाया और माई के चेहरे पर पानी के छींटे मारने लगा।
वंदना ने तुरंत उनकी कलाई थामी, नब्ज बहुत कमजोर और धीमी चल रही थी। मयंक बदहवासी में डॉक्टर का नंबर मिलाने लगा, लेकिन इस छोटे कस्बे में इतनी रात को किसी डॉक्टर का तुरंत घर पहुंचना नामुमकिन था। समीर ने बिना एक पल गंवाए कहा, “मयंक, गाड़ी निकालो! हम इन्हें कस्बे के सरकारी अस्पताल नहीं ले जाएंगे, सीधे जिला अस्पताल लेकर चलेंगे। कोई वक्त बर्बाद नहीं करेगा।”
समीर ने अपनी बांहों में माई को उठाया। उनका शरीर बर्फ जैसा ठंडा पड़ रहा था। वंदना ने तुरंत वही कत्थई ऊनी शॉल उठाई और माई के पूरे शरीर को कसकर लपेट दिया ताकि उनका तापमान न गिरे। मयंक ने तुरंत गाड़ी स्टार्ट की। समीर माई का सिर अपनी गोद में रखे पिछली सीट पर बैठ गया और वंदना लगातार उनकी हथेलियां और तलवे रगड़ती रही। बापूजी को सरिता के पास घर पर ही छोड़ना पड़ा ताकि उनकी तबीयत न बिगड़ जाए।
सफर का हर एक मिनट किसी सदियों लंबे इम्तिहान जैसा लग रहा था। समीर की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वह बार-बार माई के कान में कह रहा था, “माई, आपको कुछ नहीं होगा। देखिए, मैं आ गया हूं ना। अब मैं कभी आपको छोड़कर दूर नहीं जाऊंगा। प्लीज आंखें खोलिए।”
जिला अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचते ही डॉक्टरों की टीम हरकत में आ गई। ईसीजी मशीनें, ऑक्सीजन पाइप और मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज ने माहौल को और डरावना बना दिया। डॉक्टर ने प्राथमिक जांच के बाद बाहर आकर गंभीर चेहरे से कहा, “मैसिव कार्डियक अरेस्ट है। शरीर का तापमान बहुत गिर चुका था, गनीमत है कि आपने इन्हें गर्म कपड़ों में लपेटकर फौरन यहां पहुंचा दिया। अगले चौबीस घंटे बेहद नाजुक हैं। हम आईसीयू में शिफ्ट कर रहे हैं, दुआ कीजिए।”
इमरजेंसी वार्ड के बाहर का वह बरामदा समीर के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। वह दीवार से सिर टिकाए फूट-फूट कर रो पड़ा। मयंक ने अपने बड़े भाई को संभाला। समीर ने मयंक के हाथ थामे और रुंधे गले से कहा, “मयंक, मुझे माफ कर दे। मैं परदेस में बैठकर सिर्फ पैसे और करियर के पीछे भागता रहा। मुझे खबर ही नहीं थी कि तुम लोग यहां किन मुश्किलों से जूझ रहे हो। अगर आज माई को कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।”
मयंक ने नम आंखों से कहा, “भैया, अपने आपको दोष मत दीजिए। आपने कभी हमारे हक में कमी नहीं की। बस हालात ऐसे हो जाते हैं कि इंसान दूरियों में बंध जाता है। माई बहुत मजबूत हैं, वे हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगी।”
आईसीयू के शीशे के बाहर खड़े होकर वंदना हाथ जोड़े लगातार प्रार्थना कर रही थी। अगली सुबह की पहली किरण जब अस्पताल की खिड़कियों से छनकर आई, तो आईसीयू का दरवाजा खुला। वरिष्ठ डॉक्टर बाहर निकले और उनके चेहरे पर एक हल्की राहत भरी मुस्कान थी।
डॉक्टर ने कहा, “चमत्कार ही कहिए। मरीज ने दवाओं पर बहुत अच्छा रिस्पॉन्स दिया है। दिल की धड़कन अब स्थिर है और खतरे का सबसे बड़ा दौर टल चुका है। उन्हें होश आ गया है और वे अपने परिवार को देखना चाहती हैं।”
यह सुनते ही समीर और मयंक की आंखों से राहत के आंसू बह निकले। जब वे दोनों भीतर गए, तो ऑक्सीजन मास्क के पीछे से माई ने बेहद कमजोर मुस्कान के साथ अपने दोनों बेटों को देखा। उन्होंने अपनी कांपती हुई उंगलियों से दोनों बेटों के हाथ थाम लिए और उन दोनों के हाथों को एक-दूसरे के ऊपर रख दिया। बिना कुछ बोले माई ने यह साफ कर दिया था कि उनकी सबसे बड़ी दौलत उनके बच्चों की एकता ही है।
दो हफ्ते बाद जब माई पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटीं, तो उस आंगन का रूप बिल्कुल बदला हुआ था। समीर ने शहर की भागदौड़ से एक बड़ा फैसला ले लिया था। उसने अपनी कंपनी से पूरी तरह वर्क फ्रॉम होम (घर से काम करने) की अनुमति ले ली थी। उसने तय किया कि अब वह अपनी जड़ों से कटकर नहीं रहेगा।
समीर ने मयंक के साथ बैठकर उस आधे-अधूरे मकान को पूरा कराने का जिम्मा संभाला। बच्चों का दाखिला भी कस्बे के पास के एक अच्छे स्कूल में कराने की तैयारी शुरू हो गई ताकि वे अपनी मिट्टी, अपने संस्कारों और अपने बुजुर्गों की छांव में बड़े हो सकें।
उस शाम, जब आंगन में फिर से गुनगुनी धूप फैली हुई थी, बापूजी और माई तख्त पर साथ बैठे थे। माई के कांधों पर वही पुरानी कत्थई शॉल थी और चेहरे पर एक असीम शांति। समीर और मयंक आंगन में खड़े होकर मकान के आगे के काम की योजना बना रहे थे, और रसोई से वंदना तथा सरिता के ठहाकों की आवाजें आ रही थीं।
रिश्ते कभी पुरानी इमारतों की तरह ढहते नहीं हैं, बशर्ते कोई एक बार पलटकर उन्हें अपनी मौजूदगी की गर्माहट देने के लिए तैयार हो। घर सिर्फ ईंट-गारे की दीवारों का नाम नहीं होता, घर वहां होता है जहां अपनों की सांसें एक साथ सुकून पाती हैं।
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