बंद दरवाजों के पार

 फ़ोन की दूसरी तरफ़ नलिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक पल के लिए उसका दिमाग़ सुन्न हो गया। उसके कानों में सिर्फ़ सन्नाटा गूँजने लगा। क्रोध, घृणा, ग्लानि और डर—सारे भाव एक साथ उसके भीतर उमड़ पड़े। उसने तुरंत खुद को सँभाला। उसे पता था कि अगर इस वक़्त उसने अपना आपा खोया, तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। उसने अनन्या को पुचकारा, “बेटा, तू बिल्कुल शांत रह। मैं दो घंटे में वहाँ पहुँच रही हूँ। तू अपने कमरे में आरव के साथ रह, कहीं मत जाना।”

काँच के भारी गिलास में पानी का स्तर थरथरा रहा था। नलिनी की उंगलियाँ इतनी कसकर उस काँच से चिपकी थीं कि पोरों का रंग सफ़ेद पड़ चुका था। सामने सोफ़े पर बैठी आठ साल की अनन्या अपनी दोनों छोटी हथेलियों को घुटनों के बीच भींचे हुए फर्श की टाइल्स को ऐसे घूर रही थी, जैसे वहाँ कोई गहरा गड्ढा हो और नज़र हटते ही वह उसमें समा जाएगी। कमरे में चल रहे सीलिंग फ़ैन की हल्की-सी घरघराहट भी इस वक़्त किसी भारी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी।

“माँ… क्या मैंने कुछ ग़लत किया? आप गुस्सा हो मुझसे?” अनन्या की आवाज़ इतनी धीमी थी कि लगा जैसे शब्द होंठों तक आते-आते हवा में बिखर गए हों। उसकी आँखों के कोनों में जमे आँसू गालों पर लुढ़कने को बेताब थे।

नलिनी ने गिलास मेज़ पर रखा। उसकी अपनी साँसें भारी हो रही थीं, सीने में एक अजीब-सी घुटन थी जो गले को भींच रही थी। उसने आगे बढ़कर बच्ची को अपनी बाहों में खींच लिया। अनन्या का नन्हा सा जिस्म अभी भी सिहर रहा था। नलिनी ने उसके माथे को चूमा, उसके बिखरे बालों को सहलाया और बेहद रुंधे हुए गले से बोली, “नहीं मेरी जान, तेरी कोई ग़लती नहीं है। एक प्रतिशत भी नहीं। तूने बिल्कुल सही किया जो मुझे सब बता दिया। ग़लती बड़ों की होती है जब वे ज़रूरत से ज़्यादा लापरवाह हो जाते हैं।”

बात सिर्फ़ दो हफ़्ते पुरानी थी, लेकिन नलिनी को लग रहा था मानो बरसों का एक गहरा अंधेरा उनके बीच खिंच आया हो। नलिनी के पति सुमित एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में सिविल इंजीनियर थे। मध्य प्रदेश के एक दूरदराज़ पहाड़ी इलाक़े, पन्ना के घने जंगलों के पास एक बाँध परियोजना पर उनकी तैनाती थी। पूरा परिवार वहीं कंपनी की बनी शांत, हरी-भरी कॉलोनी में रहता था। शहर की आपाधापी से दूर वह जगह बेहद सुकूनदेह थी, लेकिन बरसात के बाद से वहाँ इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी का हाल बेहाल था।

अनन्या और उसका छोटा भाई आरव दोनों उस समय तीसरी और पहली कक्षा में थे। स्कूल की तरफ़ से प्रोजेक्ट्स, एक्स्ट्रा-करिकुलर असाइनमेंट्स और डिजिटल लाइब्रेरी के सारे काम ऑनलाइन ही भेजे जा रहे थे। आए दिन नेटवर्क चला जाता, कई-कई घंटे बच्चों के टैब स्क्रीन पर केवल बफ़रिंग का गोल घेरा घूमता रहता। अनन्या अक्सर रोने लगती कि उसका गृहकार्य समय पर जमा नहीं हो पाएगा और टीचर डांटेंगी।

उसी दौरान नलिनी की चचेरी बहन विशाखा का फ़ोन आया था। विशाखा जबलपुर शहर में एक बड़े और खुले बंगले में रहती थी। उसके पति का अपना मेडिकल डिस्ट्रीब्यूशन का कारोबार था और वे आर्थिक रूप से बहुत संपन्न थे। विशाखा ने जब नलिनी की परेशानी सुनी तो उसने बहुत सहजता से सुझाव दिया, “अरे नलिनी, तू इतनी चिंता क्यों कर रही है? पंद्रह-बीस दिनों की तो बात है जब तक तुम्हारे वहाँ का टावर ठीक नहीं होता। तू दोनों बच्चों को यहाँ भेज दे। यहाँ हाई-स्पीड वाई-फ़ाई है, कोई रुकावट नहीं होगी। वैसे भी मेरा बेटा तनिष्क दिनभर अकेले बोर होता है। वह दसवीं में आ गया है, पर जब से स्कूल में छुट्टियाँ हुई हैं, अकेले ही रहता है। बच्चों के आने से घर में रौनक भी हो जाएगी और तनिष्क तो पढ़ाई में भी अनन्या की मदद कर देगा।”

सुझाव में नलिनी को कोई बुराई नज़र नहीं आई थी। विशाखा उसकी अपनी बहन जैसी थी, बचपन साथ बीता था। तनिष्क पंद्रह साल का एक शांत, समझदार और संकोची सा लड़का दिखता था। नलिनी खुद बच्चों को कार से जबलपुर छोड़ आई थी। विशाखा ने बहुत लाड़-प्यार से बच्चों का स्वागत किया था। बड़ा सा घर, एसी कमरे, हर जगह तेज़ इंटरनेट और भाई-बहनों का साथ—सब कुछ एकदम मुकम्मल लग रहा था।

शुरुआती चार-पाँच दिन बहुत अच्छे गुज़रे। आरव और अनन्या दिन में ड्रॉइंग करते, शाम को लॉन में बैडमिंटन खेलते और रात को तनिष्क के साथ बैठकर ऑनलाइन क्लासेस के वीडियो देखते। नलिनी रोज़ सुबह-शाम वीडियो कॉल करती तो बच्चे खिलखिलाते हुए नज़र आते थे। विशाखा भी हँसते हुए कहती थी कि बच्चे बिल्कुल परेशान नहीं कर रहे, तनिष्क तो अपने छोटे भाई-बहनों का पूरा ख्याल रख रहा है।

लेकिन परसों की रात, जो घटा, उसने विश्वास की उस पूरी इमारत को हिला कर रख दिया।

गर्मियों की उस उमस भरी रात में घर के सभी बच्चे ऊपर की मंज़िल वाले बड़े बेडरूम में सोए हुए थे। आरव जल्दी सो गया था और गहरी नींद में था। तनिष्क अपने बिस्तर पर तकिए का सहारा लिए हाथ में स्मार्टफोन पकड़े हुए था। उसने दबे पाँव उठकर कमरे का दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया। अनन्या अभी जाग रही थी, अपने स्कूल की कहानी की किताब के पन्ने पलट रही थी।

तनिष्क उसके पास आया और बड़ी चाशनी भरी आवाज़ में बोला, “अनन्या, पढ़ाई बंद कर। देख मैं तुझे यूट्यूब पर एक बहुत मज़ेदार गेमिंग वीडियो दिखाता हूँ, तूने ऐसा पहले कभी नहीं देखा होगा।”

अनन्या मासूमियत से मुस्कुरा दी और भाई के पास खिसक आई। उसने सोचा शायद कोई कार्टून या नया मैजिक शो होगा। लेकिन जैसे ही तनिष्क ने स्क्रीन उसकी आँखों के सामने की, वहाँ कुछ ऐसा चल रहा था जिसे देखकर आठ साल की बच्ची का दिमाग़ सन्न रह गया। वह कोई खेल नहीं था, वह वयस्कों की अश्लील, अमर्यादित और विकृत सामग्री थी। इससे पहले कि अनन्या कुछ समझ पाती, तनिष्क ने बेहद अजीब और असहज तरीक़े से अनन्या के कंधे पर हाथ रखा और फुसफुसाया, “चुपचाप देख, बहुत मज़ा आता है… किसी को बताना मत, यह हम दोनों का सीक्रेट गेम है।”

अनन्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। भले ही वह उन दृश्यों का अर्थ पूरी तरह नहीं समझती थी, लेकिन उसका अंतर्मन, उसकी मासूम सहज बुद्धि चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी कि यह सब बहुत गंदा और ग़लत है। उसने एक झटके से तनिष्क का हाथ झटक दिया।

“नहीं भैया… यह बहुत गंदा है! मुझे यह नहीं देखना, मुझे डर लग रहा है!” अनन्या की आँखों से आँसू छलक पड़े और वह घबराकर पीछे हटने लगी।

अनन्या की आवाज़ सुनकर तनिष्क के चेहरे का रंग उड़ गया। उसका नशा जैसे एक झटके में उतर गया। उसने तुरंत मोबाइल की स्क्रीन लॉक की और अनन्या का हाथ पकड़ते हुए घबराकर बोला, “चुप… धीरे बोल! आरव जाग जाएगा। रो मत… सॉरी, सॉरी अनन्या। मैं तो बस मज़ाक कर रहा था। प्लीज़ मम्मी को मत बताना, वो मुझे मारेंगी। प्रॉमिस कर तू किसी से नहीं कहेगी।”

उस रात अनन्या सो नहीं पाई। वह अपने छोटे भाई आरव के पास दुबक कर बैठ गई और सुबह होने का इंतज़ार करती रही। उसका नन्हा मन बुरी तरह काँप रहा था।

अगली सुबह जब रोज़ की तरह नलिनी का फ़ोन आया, तो विशाखा ने फ़ोन अनन्या के हाथ में दे दिया। जैसे ही स्क्रीन पर माँ का चेहरा दिखा, अनन्या खुद पर क़ाबू नहीं रख सकी और फूट-फूट कर रोने लगी। विशाखा बगल में खड़ी होकर चौंक गई, “अरे क्या हुआ अन्नू? अभी तो अच्छी भली खेल रही थी!”

नलिनी ने हज़ारों मील दूर बैठे भी अपनी बेटी के रोने में छुपे उस अनजाने ख़ौफ़ को भाँप लिया। यह आम रोना नहीं था, यह किसी गहरे सदमे की चीख़ थी। नलिनी ने बहुत शांत रहकर कहा, “अनन्या, मेरी बच्ची, गहरी साँस ले। क्या हुआ है? मुझे सच-सच बता।”

अनन्या ने हिचकियों के बीच टूटे-फूटे शब्दों में कहा, “माँ… मुझे यहाँ नहीं रहना। तनिष्क भैया रात को कमरे का दरवाज़ा बंद करके फ़ोन में बहुत गंदी चीज़ें दिखा रहे थे… मुझे डर लग रहा है, मुझे घर आना है।”

फ़ोन की दूसरी तरफ़ नलिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक पल के लिए उसका दिमाग़ सुन्न हो गया। उसके कानों में सिर्फ़ सन्नाटा गूँजने लगा। क्रोध, घृणा, ग्लानि और डर—सारे भाव एक साथ उसके भीतर उमड़ पड़े। उसने तुरंत खुद को सँभाला। उसे पता था कि अगर इस वक़्त उसने अपना आपा खोया, तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। उसने अनन्या को पुचकारा, “बेटा, तू बिल्कुल शांत रह। मैं दो घंटे में वहाँ पहुँच रही हूँ। तू अपने कमरे में आरव के साथ रह, कहीं मत जाना।”

नलिनी ने बिना एक पल गँवाए गाड़ी की चाबी उठाई। सुमित उस वक़्त साइट पर थे, उन्हें फ़ोन पर संक्षेप में बताकर वह जबलपुर के लिए निकल पड़ी। गाड़ी की रफ़्तार के साथ-साथ नलिनी के भीतर विचारों का तूफ़ान दौड़ रहा था। उसका मन हुआ कि पहुँचते ही विशाखा पर बरस पड़े, तनिष्क को ज़ोरदार तमाचा जड़े और अपने बच्चों को लेकर लौट आए। लेकिन जैसे-जैसे पन्ना से जबलपुर की दूरी घट रही थी, उसका ग़ुस्सा एक परिपक्व माँ की दूरदर्शिता में बदलने लगा।

उसने सोचा—आख़िर ग़लती कहाँ हुई? क्या तनिष्क पैदाइशी बुरा है? नहीं, वह तो हमेशा से सीधा लड़का था। फिर यह भटकाव कैसे आया? उसने याद किया कि विशाखा कई बार बातों-बातों में गर्व से कहती थी कि तनिष्क इतना शरीफ़ है कि घंटों अपने कमरे में बंद रहकर लैपटॉप और फ़ोन पर पढ़ाई करता रहता है, बाहर दोस्तों के साथ मटरगश्ती भी नहीं करता। नलिनी को समझ आया कि जिस ‘अकेलेपन’ और ‘इंटरनेट’ को विशाखा बेटे का शराफ़त भरा गुण समझ रही थी, वही दरअसल उसके लिए एक ज़हरीला जाल बन चुका था।

पंद्रह साल की उम्र, शरीर में होते हार्मोनल बदलाव, इंटरनेट पर बिना किसी रोक-टोक की आज़ादी और माता-पिता की तरफ़ से निगरानी का अभाव—इन सबने मिलकर उस लड़के को उस दलदल में धकेल दिया था। अगर इस वक़्त तमाशा बनाया गया, तो न सिर्फ़ दोनों परिवारों के रिश्ते हमेशा के लिए टूट जाएँगे, बल्कि तनिष्क हमेशा के लिए उस अपराध-बोध और विद्रोह की आग में जलकर और ज़्यादा बिगड़ जाएगा। बात अनन्या की सुरक्षा की थी, लेकिन साथ ही तनिष्क के भविष्य को गर्त में जाने से बचाने का भी यह आख़िरी मौक़ा था।

जबलपुर पहुँचते ही नलिनी ने सबसे पहले बच्चों को देखा। अनन्या दौड़कर माँ से लिपट गई। नलिनी ने उसे सीने से लगाया और प्यार से समझाया कि उसकी कोई ग़लती नहीं है और अब वह सुरक्षित है।

इसके बाद नलिनी ने विशाखा को इशारे से दूसरे कमरे में बुलाया और दरवाज़ा बंद कर दिया। विशाखा हैरान थी, “क्या हुआ नलिनी? तू अचानक आ गई और चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है? बच्चों में कोई झगड़ा हुआ है क्या?”

नलिनी ने विशाखा के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए। उसकी आँखों में सख़्ती थी, पर आवाज़ में बहनापा और दर्द था। उसने बिना किसी लाग-लपेट के, बेहद संयम के साथ, बीती रात की पूरी घटना विशाखा के सामने रख दी।

जैसे-जैसे नलिनी बोल रही थी, विशाखा का चेहरा पीला पड़ता गया। पहले तो उसने साफ़ इनकार करने की कोशिश की, “नहीं नलिनी! तू यह क्या कह रही है? मेरा तनिष्क ऐसा कभी नहीं कर सकता! वह तो मंदिर जाता है, किसी लड़की की तरफ़ आँख उठाकर नहीं देखता। ज़रूर अनन्या को कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी… बच्चे तो कुछ भी बोल देते हैं!”

नलिनी ने विशाखा के कंधे को थोड़ा ज़ोर से दबाया और कहा, “विशाखा! होश में आ। अनन्या आठ साल की बच्ची है, उसे इन गंदी चीज़ों की कल्पना भी नहीं हो सकती। अपनी ममता की पट्टी आँखों से उतार और सच का सामना कर। अगर आज तूने अपनी झूठी प्रतिष्ठा और लाड़-प्यार के पीछे इस बात को दबा दिया, तो तू अपने बेटे को हमेशा के लिए खो देगी। आज उसने सिर्फ़ दिखाया है, कल को अगर वह किसी संगीन अपराध की तरफ़ बढ़ गया, तब क्या करेगी?”

नलिनी की यह बात किसी चाबुक की तरह विशाखा के ज़मीर पर लगी। विशाखा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने काँपते हुए अपने सिर पर हाथ रख लिया। पुरानी कई घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं—तनिष्क का हमेशा दरवाज़ा बंद रखना, उसके अचानक कमरे में आते ही स्क्रीन का बदल जाना, चिड़चिड़ापन, आँखों के नीचे काले घेरे और रात-रात भर जागना।

“दीदी… मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई,” विशाखा रोते हुए ज़मीन पर बैठ गई। “मैं समझती थी कि बच्चा बड़ा हो गया है, अपनी प्राइवेसी चाहता है। हमने तो कभी उसके फ़ोन को चेक ही नहीं किया। अब मैं क्या करूँ? मैं तो मुँह दिखाने लायक नहीं रही।”

नलिनी उसके पास बैठी और उसे सहारा दिया, “रोने से कुछ नहीं होगा विशाखा। अच्छी बात यह है कि हमें यह बात उस वक़्त पता चली है जब चीज़ें सुधारी जा सकती हैं। तनिष्क अभी सिर्फ़ पंद्रह साल का है। उसका दिमाग़ भटका है, लेकिन वह अपराधी नहीं बना है। अभी अगर तू उस पर चिल्लाएगी, उसे मारेगी-पीटेगी, तो वह और ज़्यादा जिद्दी और कुंठित हो जाएगा।”

“फिर हम क्या करें?” विशाखा ने असहाय होकर पूछा।

“सबसे पहले, तनिष्क से खुलकर, बिना ग़ुस्से के बात करनी होगी। उसे समझाना होगा कि इंटरनेट पर जो कुछ दिखता है, वह हक़ीक़त नहीं बल्कि एक ज़हर है जो दिमाग़ को खोखला कर देता है। उसके कमरे से स्मार्ट गैजेट्स की आज़ादी छीननी होगी। स्क्रीन टाइम सिर्फ़ कॉमन हॉल में होगा। और सबसे ज़रूरी, कल ही तुम दोनों पति-पत्नी उसे लेकर किसी अच्छे बाल मनोचिकित्सक (चाइल्ड काउंसलर) के पास जाओगे। इसमें कोई शर्म नहीं है। यह कोई पागलपन नहीं, बल्कि एक लत का इलाज है।”

उस शाम नलिनी ने तनिष्क को भी अकेले में बुलाया। तनिष्क अपनी नज़रें नहीं मिला पा रहा था, वह डर से काँप रहा था कि शायद पुलिस आ जाएगी या सब उसे मारेंगे। नलिनी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “तनिष्क, तू जानता है तूने क्या किया? अनन्या तेरी छोटी बहन जैसी है। जो तूने किया, वह अक्षम्य था, लेकिन मैं तुझे सज़ा देने नहीं, तुझे उस गड्ढे से बाहर निकालने आई हूँ जिसमें तू गिर रहा है। अगर तू सच में पछता रहा है, तो वादा कर कि अपनी माँ और डॉक्टर की हर बात मानेगा और इस गंदगी से बाहर निकलेगा।”

तनिष्क फफक कर रो पड़ा और नलिनी के पैर छूकर माफ़ी माँगने लगा, “मौसी… मुझे नहीं पता मुझे क्या हो गया था। दोस्तों के ग्रुप में यह सब वीडियो आते थे, मुझे लत लग गई थी। मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा।”

नलिनी उसी शाम अपने दोनों बच्चों को लेकर पन्ना लौट आई। घर लौटकर उसने अनन्या को पूरी तरह सहज किया, उसे समझाया कि ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ क्या होता है, और यह भी कि कभी भी कोई बात बुरी लगे तो बिना डरे माँ-बाप से कहना कितना ज़रूरी है। अनन्या के मन से धीरे-धीरे वह डर निकल गया क्योंकि उसकी माँ ने उस पर अविश्वास करने के बजाय उसका ढाल बनकर साथ दिया था।

उधर जबलपुर में विशाखा और उसके पति ने नलिनी की सलाह को पूरी गंभीरता से लिया। उन्होंने तनिष्क पर हाथ उठाने के बजाय उससे घंटों बातचीत की। उसे एक जाने-माने मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया। चार महीने तक चली थेरेपी, आउटडोर स्पोर्ट्स की आदत, परिवार के साथ बिताए गए समय और डिजिटल डिटॉक्स ने तनिष्क की ज़िंदगी बदल दी। उसके कमरे के दरवाज़े अब कभी बंद नहीं होते थे, और न ही उसके मन में कोई ऐसा राज़ था जिसे छिपाने की ज़रूरत पड़े।

लगभग छह महीने बाद, दिवाली के मौक़े पर विशाखा का फ़ोन नलिनी के पास आया। विशाखा की आवाज़ में एक अजीब-सी शांति और गहरा आभार था। उसने कहा, “दीदी, अगर उस दिन तूने समझदारी से काम न लिया होता और मुझे आईना न दिखाया होता, तो आज मेरा बेटा किस अँधेरे में होता, मैं सोच भी नहीं सकती। आज तनिष्क अपनी क्लास में टॉप भी आया है और रोज़ शाम को पापा के साथ वॉक पर जाता है। तूने सिर्फ़ अपनी बेटी को नहीं बचाया, मेरे बेटे को भी एक नया जीवन दिया है।”

नलिनी ने मुस्कुराते हुए खिड़की से बाहर देखा, जहाँ अनन्या और आरव आँगन में बेफ़िक्र होकर तितलियों के पीछे भाग रहे थे। उसने मन ही मन सोचा कि तकनीक बुरी नहीं है, लेकिन जब तक बच्चों की समझ इतनी परिपक्व न हो जाए कि वे सही और ग़लत का फ़र्क कर सकें, तब तक माता-पिता की सतर्क निगाहें ही उनके लिए सबसे सुरक्षित सुरक्षा कवच होती हैं। थोड़ी-सी सावधानी किसी भी घर को ताउम्र के पछतावे से बचा सकती है।

एक सजग समाज के रूप में यह हम सभी की ज़िम्मेदारी है कि हम अपने घरों में ‘डिजिटल सुरक्षा’ और ‘बच्चों की मानसिक स्थिति’ पर बिना किसी हिचकिचाहट के बात करें।

क्या आपको लगता है कि आज के दौर में बच्चों को बिना निगरानी के स्मार्टफ़ोन देना उनकी सुरक्षा के साथ एक बड़ा समझौता है? ऐसी संवेदनशील परिस्थितियों में एक अभिभावक के तौर पर आपका नज़रिया क्या होता? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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मूल लेखिका : संध्या त्रिपाठी

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