“भाभी, मैं उसी रात, उसी पल नीचे आकर बाबूजी, माँ और अपने भैया के सामने आपकी हकीकत खोल सकती थी। मैं चीख-चीख कर सबको बता सकती थी कि जिसे वे घर की लक्ष्मी समझ रहे हैं, उसने अपने झूठे घमंड में इस घर की खुशियों में आग लगाई है। अगर मैं ऐसा करती, तो भैया एक पल भी आपके साथ नहीं रहते। वे आपको उसी वक्त धक्के मारकर घर से निकाल देते। मगर मैंने ऐसा नहीं किया।”
राधिका की सुंदरता की चर्चा पूरे शहर में थी। बादामी आँखें, संगमरमर सा निखरा हुआ रंग, तीखे नैन-नक्श और घनी लहराती जुल्फें—जो भी राधिका को एक बार देखता, बस देखता ही रह जाता। कॉलेज के दिनों से ही राधिका को अपनी इसी सुंदरता पर बेहिसाब नाज था। वह जहाँ भी कदम रखती, सबकी निगाहें उसी पर टिक जातीं, और यही बात धीरे-धीरे उसके भीतर एक गहरे अहंकार का रूप ले चुकी थी। उसे लगता था कि इस दुनिया में रूप से बढ़कर कुछ नहीं होता और ईश्वर ने उसे सबसे खास बनाकर भेजा है। अपने इसी घमंड के चलते वह दूसरों को तुच्छ समझने लगी थी और किसी को अपने बराबर नहीं मानती थी।
राधिका के इसी रूप पर मोहित होकर भोपाल के एक बहुत बड़े कपड़ा व्यापारी परिवार के इकलौते बेटे निशांत ने उससे शादी का प्रस्ताव रखा था। निशांत न केवल एक सफल व्यवसायी था, बल्कि बेहद सुलझा हुआ, शांत और विनम्र इंसान भी था। जब निशांत के माता-पिता—सुमित्रा जी और हरीश जी—राधिका के घर रिश्ता लेकर पहुँचे, तो राधिका के परिवार वाले फूले नहीं समाए। इतना रईस, संस्कारी और प्रतिष्ठित घराना भला किसे नसीब होता है! राधिका भी इस बात से बेहद खुश थी कि उसे अपनी खूबसूरती की बदौलत ऐसा आलीशान ससुराल और प्यार करने वाला पति मिलने जा रहा था।
धूमधाम से शादी हुई और राधिका विदा होकर भोपाल की उस विशाल हवेलीनुमा कोठी में आ गई। ससुराल में पहले दिन से ही हर कोई बहू की खूबसूरती के कसीदे पढ़ रहा था। मुहल्ले की औरतें आतीं तो मुँह दिखाई की रस्म में राधिका को देखकर दाँतों तले उँगली दबा लेतीं। सुमित्रा जी अपनी सुंदर बहू को देखकर गर्व से भर उठती थीं और निशांत तो जैसे राधिका की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था।
राधिका अंदर ही अंदर अपनी किस्मत पर इतराती, मगर उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी बेरुखी और ठसक छाई रहती। वह ससुराल वालों से सीधे मुँह बात तक नहीं करती थी। नौकरों पर बेवजह चिल्लाना, सास-ससुर के प्रणाम करने पर सिर्फ सिर हिला देना और निशांत के लाड़-प्यार को अपना हक समझकर अहंकार दिखाना उसकी आदत बन चुका था। सुमित्रा जी और हरीश जी सोचते कि नई-नई शादी है, बड़े लाड़-प्यार से पली है, धीरे-धीरे घर के माहौल में ढल जाएगी। निशांत भी यही सोचकर चुप रह जाता कि उम्र के साथ उसमें समझदारी आ जाएगी।
शादी के करीब चार महीने बीत चुके थे। घर में अचानक एक दिन खुशियों की हलचल मच गई। निशांत की छोटी बहन तन्वी, जो जर्मनी से आर्किटेक्चर की उच्च शिक्षा हासिल कर रही थी, अपनी पढ़ाई का एक बड़ा प्रोजेक्ट पूरा करके छुट्टियों में घर लौट रही थी। तन्वी भाई की शादी में अपनी फाइनल परीक्षाओं के चलते नहीं आ पाई थी, जिसका उसे बेहद मलाल था। राधिका ने तन्वी की कुछ पुरानी तस्वीरें घर की दीवारों पर देखी थीं, जिनमें वह एक सीधी-सादी, चश्मा लगाए साधारण सी लड़की दिखती थी। राधिका को पूरा यकीन था कि उस घर में रूप की रानी सिर्फ वही रहेगी और कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता।
लेकिन जिस दिन तन्वी ने घर की दहलीज पर कदम रखा, राधिका के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
कार से उतरकर जब तन्वी अंदर आई, तो पूरा आँगन उसकी खिलखिलाहट से गूँज उठा। सादगी में लिपटी तन्वी की खूबसूरती किसी अप्सरा से कम नहीं थी। प्राकृतिक रूप से दमकता हुआ गेहुँआ निखार, चेहरे पर खिली मासूमियत, गहरी बुद्धिमान आँखें और होंठों पर ऐसी मनमोहक मुस्कान जो किसी का भी दिल जीत ले। उसके व्यक्तित्व में एक अलग ही ठहराव, गरिमा और आकर्षण था। जैसे ही तन्वी ने माँ-बाबूजी के पैर छुए और भाई के गले लगी, पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
घर के नौकर से लेकर परिवार के हर सदस्य की आँखों में तन्वी के लिए जो आदर और प्यार था, उसने राधिका के दिल में अचानक जलन की आग सुलगा दी। सबसे बड़ी बात यह थी कि तन्वी को देखकर राधिका को पहली बार अपने रूप के फीके पड़ने का डर सताने लगा। जब तन्वी ने आगे बढ़कर राधिका के हाथ थामे और प्यार से कहा, “भाभी, भैया सच कहते थे, आप तो वाकई बहुत सुंदर हैं, हमारे घर को आपकी नजर न लगे,” तो उस निश्छल तारीफ के जवाब में राधिका ने बेहद रूखेपन से सिर्फ ‘थैंक यू’ कहा और अपना हाथ छुड़ा लिया।
तन्वी के आने के बाद घर का पूरा केंद्र जैसे बदल गया था। रिश्तेदार आते, तो तन्वी की पढ़ाई, उसकी समझदारी और उसकी सादगी की तारीफ करते नहीं थकते। राधिका का अहंकार हर पल तिलमिला उठता। उसे लगता कि तन्वी ने उससे उसकी तवज्जो छीन ली है। निशांत जब भी अपनी बहन की तारीफ करता या उसके साथ हँसी-मजाक करता, राधिका का मुँह बन जाता। तन्वी ने कई बार भाभी से घुलने-मिलने की कोशिश की, उनके लिए जर्मनी से लाए खूबसूरत तोहफे दिए, मगर राधिका का बर्ताव हमेशा तल्ख ही रहा।
इन्हीं दिनों तन्वी के लिए इंदौर के एक बेहद प्रतिष्ठित और संभ्रांत उद्योगपति परिवार से शादी का रिश्ता आया। लड़का, जिसका नाम मानव था, खुद एक बहुत बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और परिवार संस्कारों के मामले में अव्वल था। जब मानव और उसके माता-पिता तन्वी को देखने आए, तो वे तन्वी के विचारों, उसकी शालीनता और उसके संस्कारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत रिश्ते के लिए ‘हाँ’ कर दी।
चूँकि तन्वी को दो महीने बाद वापस अपनी डॉक्टरेट की तैयारी के लिए कुछ समय के लिए जाना था, इसलिए दोनों परिवारों ने तय किया कि एक हफ्ते के भीतर ही एक सादे और भव्य समारोह में सगाई की रस्म पूरी कर दी जाए।
हवेली में सगाई की तैयारियाँ जोरों पर शुरू हो गईं। पकवानों की सूची बन रही थी, गहने खरीदे जा रहे थे और सुमित्रा जी अपनी बेटी के हाथ पीले होने की खुशी में फूली नहीं समा रही थीं। पूरा घर रोशनी से नहाया हुआ था, सिवाय राधिका के मन के। राधिका के भीतर की ईर्ष्या अब विषैले साँप की तरह फन फैला चुकी थी। उसे यह बर्दाश्त ही नहीं हो रहा था कि तन्वी को इतना अच्छा, रईस और संस्कारी ससुराल मिले। उसे लगा कि अगर तन्वी की शादी इतने बड़े घर में हो गई, तो जीवन भर इस परिवार में तन्वी का ही पलड़ा भारी रहेगा और उसकी अपनी कोई पूछ नहीं रहेगी।
ईर्ष्या और घमंड ने राधिका की बुद्धि पर ऐसा पर्दा डाला कि उसने एक खौफनाक और घिनौनी साजिश रच डाली।
सगाई से ठीक एक दिन पहले, जब घर में संगीत और मेहंदी की तैयारियाँ चल रही थीं, अचानक मानव के पिता का गंभीर फोन हरीश जी के पास आया। उन्होंने भारी आवाज में कहा कि वे यह सगाई तुरंत प्रभाव से तोड़ रहे हैं और उनका परिवार अब यह रिश्ता नहीं रख सकता।
यह सुनते ही जैसे हँसते-खेलते घर पर बिजली गिर पड़ी। हरीश जी के हाथ से फोन छूट गया। सुमित्रा जी बदहवास होकर रोने लगीं। निशांत तुरंत मानव के घर इंदौर रवाना हुआ ताकि पता चल सके कि आखिर हुआ क्या है। कुछ घंटों बाद जब निशांत वापस लौटा, तो उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखों में गहरा आक्रोश था। उसने घर आकर जो बताया, उसे सुनकर सबके होश उड़ गए।
मानव के परिवार वालों को किसी अज्ञात महिला ने फोन करके यह बताया था कि तन्वी का जर्मनी में अपने एक सीनियर प्रोफेसर के साथ कई सालों से नाजायज रिश्ता है और वह वहाँ उसके साथ लिव-इन में रहती थी। उस अज्ञात कॉलर ने यह भी दावा किया था कि तन्वी की पढ़ाई का खर्च भी वही उठा रहा था और उसके पास इसके पुख्ता सबूत हैं। यह बात सुनते ही रूढ़िवादी और मान-मर्यादा वाले उस परिवार ने बिना तन्वी से बात किए रिश्ता तोड़ने का फैसला कर लिया था।
तन्वी के चरित्र पर लगे इस झूठे लांछन ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया। सुमित्रा जी छाती पीटकर रोने लगीं कि उनकी फूल जैसी संस्कारी बेटी पर ऐसा घिनौना आरोप किसने लगा दिया। हरीश जी समाज में अपनी पगड़ी उछलने के डर से सुन्न पड़ गए थे। तन्वी अपने कमरे में बंद होकर फूट-फूट कर रो रही थी। मगर इस पूरे मातम के बीच, राधिका अपने कमरे के आईने के सामने खड़ी होकर मन ही मन एक शैतानी मुस्कान बिखेर रही थी। उसे लग रहा था कि उसने तन्वी के पंख कतर दिए हैं।
सगाई टूट गई। मेहमानों को कोई पारिवारिक कारण बताकर मना कर दिया गया। बदनामी के डर से बात को दबा दिया गया, लेकिन घर की हँसी-खुशी हमेशा के लिए काफूर हो गई। इस हादसे के बाद तन्वी अंदर से बुरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन उसने अपने माँ-बाबूजी और भाई के आंसुओं को देखकर खुद को संभाला। उसने भरे गले से कहा, “बाबूजी, जिस इंसान ने मुझ पर भरोसा करने के बजाय किसी अनजान के झूठे फोन पर यकीन कर लिया, वह जिंदगी भर मेरा क्या साथ निभाता? अच्छा हुआ यह सच पहले ही सामने आ गया।”
कुछ ही दिनों बाद, भारी मन से तन्वी ने वापस जर्मनी जाने की तैयारी कर ली। विदाई की सुबह जब तन्वी घर से निकल रही थी, तो उसने राधिका के भी पैर छुए। राधिका ने दिखावे के लिए उसके सिर पर हाथ रखा, मगर नजरें चुरा लीं।
तन्वी के जर्मनी पहुँचे अभी तीन दिन ही हुए थे। शाम के समय राधिका अपने बेडरूम में आराम कर रही थी कि अचानक उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर एक अंतरराष्ट्रीय नंबर चमक रहा था—तन्वी का फोन था।
राधिका ने औपचारिकता निभाते हुए फोन उठाया, “हाँ तन्वी, कैसी हो? पहुँच गई आराम से?”
दूसरी तरफ से कुछ पलों की गहरी और भारी खामोशी रही। फिर तन्वी की अत्यंत शांत, मगर भीतर तक चीर देने वाली आवाज गूँजी, “भाभी… मैं जानती थी कि आप शायद मुझसे थोड़ा बहुत जलती हैं, या शायद मुझे पसंद नहीं करतीं। मगर आप मुझसे इतनी नफरत करती हैं और मेरे साथ इतना घिनौना खेल खेल सकती हैं… यह मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।”
राधिका के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं। उसने हकलाते हुए कहा, “त… तन्वी, तुम यह क्या बकवास कर रही हो? मैं कुछ समझी नहीं।”
“सब समझ रही हैं आप, भाभी,” तन्वी की आवाज में न कोई चीख थी, न गुस्सा, बस एक गहरा दर्द था। “मानव के घर जिस तथाकथित ‘शुभचिंतक’ ने फोन करके मेरे चरित्र की धज्जियाँ उड़ाई थीं, वह गंदी सोच किसी और की नहीं, आपकी थी। जिस दिन मेरी सगाई टूटी, उस रात जब पूरा घर मातम में डूबा था, आप छत के कोने में खड़े होकर अपनी सहेली नीता से फोन पर हँस-हँस कर अपनी इस ‘कामयाबी’ का बखान कर रही थीं। मैं अपनी सिसकियों को छुपाने छत पर जा रही थी, तभी मैंने अपने कानों से आपकी एक-एक बात सुनी थी।”
राधिका का कलेजा मुँह को आ गया। फोन उसके हाथ में काँपने लगा। उसकी जीभ जैसे तालू से चिपक गई थी।
तन्वी ने आगे कहा, “भाभी, मैं उसी रात, उसी पल नीचे आकर बाबूजी, माँ और अपने भैया के सामने आपकी हकीकत खोल सकती थी। मैं चीख-चीख कर सबको बता सकती थी कि जिसे वे घर की लक्ष्मी समझ रहे हैं, उसने अपने झूठे घमंड में इस घर की खुशियों में आग लगाई है। अगर मैं ऐसा करती, तो भैया एक पल भी आपके साथ नहीं रहते। वे आपको उसी वक्त धक्के मारकर घर से निकाल देते। मगर मैंने ऐसा नहीं किया।”
“क… क्यों नहीं किया तुमने?” राधिका के मुँह से डर के मारे मुश्किल से निकला।
तन्वी की आँखों से आँसू बह निकले, मगर उसकी आवाज अडिग थी, “क्योंकि मैं अपने भैया से अपनी जान से ज्यादा प्यार करती हूँ, भाभी। मेरे भैया का दिल बहुत कोमल है, वे टूट जाते। मैं अपना टूटा हुआ रिश्ता तो सह सकती थी, लेकिन अपने भाई का उजड़ा हुआ घर देखने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। और दूसरी बात… आपकी परवरिश और मेरी परवरिश में फर्क है। मुझे मेरे माँ-बाबूजी ने दूसरों का दर्द बाँटना सिखाया है, किसी की जिंदगी बर्बाद करना नहीं।”
राधिका का पूरा शरीर काँप रहा था। उसके पैरों से ताकत गायब हो चुकी थी और वह बिस्तर पर ढह गई।
“भाभी,” तन्वी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “आप इस बात से बिल्कुल बेफिक्र रहिएगा कि मैं यह बात कभी किसी को बताऊँगी। यह राज हमेशा मेरे और आपके बीच ही दफन रहेगा। आपके सुहाग को, आपके घर को मेरी वजह से कभी कोई आँच नहीं आएगी। लेकिन आज इतना जरूर कहूँगी… कि जिस खूबसूरती पर आपको इतना गुरूर था, उस खूबसूरती का पर्दा आज मेरी नजरों में तार-तार हो गया है। आप मेरी नजरों से इतनी नीचे गिर चुकी हैं कि जिंदगी में कभी उठ नहीं पाएँगी।”
तन्वी के ये शब्द राधिका की आत्मा पर किसी हथौड़े की तरह पड़े। उसका रूप, उसका घमंड, उसका सारा अहंकार एक झटके में रेत के महल की तरह ढह गया। उसे अपनी आँखों के सामने तन्वी की महानता और अपना घिनौना रूप साफ दिखाई देने लगा। वह उस लड़की से जल रही थी, जिसने खुद का सब कुछ लुट जाने के बाद भी उसी का घर बचा लिया था!
राधिका फूट-फूट कर रोने लगी। उसने काँपते हुए कहा, “तन्वी… मुझे माफ कर दो तन्वी! मैं अंधी हो गई थी… मैं अपने घमंड में पागल हो गई थी। आज मैं सिर्फ तुम्हारी नजरों में नहीं गिरी, मैं अपनी खुद की नजरों में भी गिर गई हूँ। मैं तुम्हारे सामने एक कीड़े जैसी तुच्छ महसूस कर रही हूँ। तुम्हारी शादी मेरी वजह से टूटी है… मैं इस गुनाह का बोझ लेकर कैसे जिऊँगी? मैं अपनी यह गलती सुधारूँगी तन्वी, मैं सब ठीक कर दूँगी…”
तन्वी ने रुंधे गले से कहा, “भाभी, गलती अनजाने में होती है, जो आपने किया वह जानबूझकर किया गया एक घिनौना गुनाह था। आपने उस औरत के आत्मसम्मान की हत्या की थी जो आपको अपनी बड़ी बहन मानती थी। अब आप कुछ ठीक नहीं कर सकतीं।”
इतना कहकर तन्वी ने फोन काट दिया।
फोन कटने की ‘बीप-बीप’ आवाज राधिका के कानों में गूँजती रही। वह जमीन पर बैठकर बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगी। बाहर का सारा बनावटी रूप, सारा सौंदर्य अब उसे अपने चेहरे पर कालिख जैसा लग रहा था। उसे समझ आ गया था कि चेहरे की सुंदरता तो एक छलावा है, असली सुंदरता तो मन की पवित्रता और त्याग में होती है, जो तन्वी के पास थी।
उस पूरी रात राधिका सो नहीं सकी। उसकी अंतरात्मा उसे कचोटती रही। सुबह होते-होते राधिका ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसमें उसका बचा-खुचा अहंकार पूरी तरह भस्म होने वाला था। उसने सोच लिया था कि वह अपने इस पाप का प्रायश्चित करके ही रहेगी, चाहे उसकी कीमत उसे अपनी शादी की बलि देकर ही क्यों न चुकानी पड़े।
सुबह आठ बजे, राधिका ने किसी को कुछ नहीं बताया। उसने अपनी गाड़ी निकाली और सीधे इंदौर के लिए रवाना हो गई। तीन घंटे का सफर उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा का सफर था। इंदौर पहुँचकर उसने मानव के घर का पता ढूँढा और सीधे उनके दरवाजे पर जा खड़ी हुई।
मानव के माता-पिता और मानव ने जब निशांत की पत्नी को अपने घर के सामने खड़ा देखा, तो वे हैरान रह गए। मानव के पिता ने कड़े स्वर में पूछा, “आप यहाँ क्यों आई हैं? हमने पहले ही कह दिया है कि हमारा उस परिवार से अब कोई संबंध नहीं है।”
राधिका ने बिना एक पल गँवाए, अपने दोनों हाथ जोड़े और मानव तथा उसके माता-पिता के पैरों में गिर पड़ी। उसकी आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही थी। एक बेहद घमंडी औरत को इस तरह पैरों में गिरकर रोते देख वे सब सन्न रह गए।
“मुझे माफ कर दीजिए… तन्वी बिल्कुल बेकसूर है, वह देवी जैसी पवित्र है!” राधिका ने रोते हुए चीख कर कहा।
मानव ने आगे बढ़कर उसे उठाया, “भाभी जी, यह आप क्या कह रही हैं? संभलिए और साफ-साफ बताइए।”
राधिका ने अपनी नजरें झुका लीं और बिना किसी लाग-लपेट के, बिना खुद को बचाए, अपनी ईर्ष्या, अपने अहंकार और उस झूठे फोन कॉल का पूरा सच उनके सामने उगल दिया। उसने काँपते हाथों से अपना वही फोन निकाला और वह नंबर दिखाया जिससे उसने कॉल की थी। उसने कहा, “तन्वी से जलकर यह नीच हरकत मैंने की थी। मैंने एक मासूम लड़की के चरित्र पर झूठा लांछन लगाया क्योंकि मैं उसके आगे खुद को छोटा महसूस करने लगी थी। तन्वी को जब मेरा सच पता चला, तब भी उसने मेरा घर बचाने के लिए मुझे माफ कर दिया और चुपचाप चली गई। अगर आपको सजा देनी है तो मुझे दीजिए, पुलिस के हवाले करना है तो मुझे कीजिए, लेकिन उस पवित्र और त्याग की मूरत जैसी लड़की को बदनाम मत कीजिए।”
मानव और उसके माता-पिता स्तब्ध रह गए। एक तरफ राधिका के किए पर उन्हें बेहद गुस्सा आया, मगर दूसरी तरफ एक इंसान को अपने गुनाह का इस तरह सबके सामने आकर प्रायश्चित करते देख और तन्वी के उस असीम त्याग और बड़प्पन को जानकर उनकी आँखें भी भर आईं।
मानव के पिता ने आगे बढ़कर कहा, “राधिका जी, आपने जो किया वह अक्षम्य था, लेकिन आज आपने यहाँ आकर जिस तरह अपनी गलती को स्वीकारा है और उस बच्ची के सम्मान को लौटाया है, उसने साबित कर दिया कि आपकी अंतरात्मा अभी मरी नहीं थी। हमें गर्व है कि तन्वी जैसी संस्कारी और ऊँचे चरित्र वाली बेटी हमारे घर की बहू बनने जा रही है।”
मानव ने तुरंत फैसला किया। उसी शाम, मानव और उसके माता-पिता राधिका को साथ लेकर भोपाल पहुँचे। जब निशांत के घर का दरवाजा खुला और सामने मानव के परिवार को देखा, तो हरीश जी और सुमित्रा जी घबरा गए।
मगर मानव के पिता ने आगे बढ़कर हरीश जी को गले लगा लिया और हाथ जोड़कर कहा, “समधी जी, हमें माफ कर दीजिए। हमने किसी की बातों में आकर अपनी अनमोल हीरे जैसी बहू को खोने की गलती कर दी थी। आज आपकी बड़ी बहू ने आकर हमारा भ्रम दूर कर दिया है। हम तन्वी को पूरे मान-सम्मान के साथ अपने घर ले जाने के लिए तैयार हैं।”
निशांत और उसके माता-पिता अवाक रह गए। राधिका एक कोने में सिर झुकाए आँसू बहा रही थी। उसने निशांत को अकेले में ले जाकर अपनी सारी करतूत सच-सच बता दी। निशांत पहले तो गुस्से और नफरत से भर गया, उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं, मगर जब उसने राधिका को अपने पैरों पर गिरकर तड़पते और सच्चे दिल से पश्चाताप करते देखा, तो उसका गुस्सा पिघल गया। उसने कहा, “राधिका, तुमने जो किया वह बहुत बुरा था, लेकिन आज तुमने अपनी उस गलती को सुधार कर तन्वी की जिंदगी बचा ली। अब तुम्हारी असली परीक्षा यह है कि तुम अपनी इस खूबसूरती का नहीं, अपने अच्छे कर्मों का आभूषण पहनो।”
उसी रात जर्मनी में तन्वी के फोन की घंटी बजी। वीडियो कॉल पर पूरा परिवार मौजूद था—मानव और उसके माता-पिता भी। मानव ने मुस्कुराते हुए कहा, “तन्वी, मुझे अपनी नासमझी के लिए माफ कर दो। मैं तुम्हारा हाथ थामने के लिए तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।”
तन्वी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। तभी कैमरे के सामने राधिका आई। उसने हाथ जोड़कर तन्वी से कहा, “तन्वी… मैं तुम्हारी नजरों में उठने के काबिल तो कभी नहीं बन पाऊँगी, लेकिन आज अपनी उस ननद का खोया हुआ सम्मान लौटाकर मैं अपने सीने का भारी बोझ थोड़ा हल्का कर पाई हूँ। मुझे अपनी बड़ी बहन समझकर सिर्फ एक मौका दो कि मैं तुम्हारे त्याग के कर्ज को जीवन भर प्यार बनकर चुका सकूँ।”
तन्वी ने स्क्रीन पर रोती हुई अपनी भाभी को देखा। उसने देखा कि उस चेहरे पर अब रूप का वह घिनौना घमंड नहीं, बल्कि पश्चाताप और प्रेम की सच्ची आभा थी। तन्वी मुस्कुराई और उसने कहा, “भाभी, जब आपने सच के आगे अपना शीश झुका दिया, तो आप उसी पल मेरी नजरों में फिर से उठ गईं। अब लौट कर आऊँगी, तो आपसे ढेर सारा प्यार और अपनी पसंदीदा मिठाई लूँगी।”
पूरा घर एक बार फिर हँसी, आंसुओं और अटूट प्रेम के बंधन में बँध गया था। राधिका समझ चुकी थी कि काँच की तरह टूटने वाला रूप कभी किसी को सम्मान नहीं दिला सकता; इंसान की असली पहचान उसके त्याग, प्रेम और साफ दिल से ही होती है।
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मूल लेखिका : शनाया अहम