“अवनि बिल्कुल सही कह रही है आलोक,” सुमित्रा जी की आवाज में एक मां की ममता से कहीं ज्यादा एक स्त्री के प्रति न्याय की दृढ़ता थी। “तू हमारा बेटा है, हमारे जिगर का टुकड़ा है, पर इस बच्ची ने हमारे लिए जो किया है, वो तू सात जन्मों में नहीं कर सकता। जब तू हमें बेसहारा छोड़कर भागा था, तब इस पराई बेटी ने हमें संभाला था। हम तेरे लौटने से खुश हैं, पर अपनी बहू के आत्मसम्मान की बलि चढ़ाकर हम यह खुशी नहीं मनाएंगे। अवनि का फैसला ही इस घर का अंतिम फैसला है।”
भोपाल के पुराने इलाके में स्थित ‘शांति निकेतन’ की बड़ी सी दालान में शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहरा रहा था। आंगन में लगे हरसिंगार के पेड़ से सफेद-नारंगी फूल चुपचाप झड़कर जमीन को महका रहे थे। रसोई से आती अदरक वाली चाय की खुशबू घर के शांत वातावरण में एक जानी-पहचानी गर्माहट घोल रही थी। अवनि हाथ में गर्म चाय की केतली और बिस्कुट की प्लेट लिए बाहर आई। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह एक गंभीर, मगर बेहद सौम्य ठहराव था। तीस वर्ष की उम्र में ही उसकी आंखों ने जिंदगी के इतने तीखे मोड़ देख लिए थे कि अब किसी भी बात पर घबराना या उत्तेजित होना उसके स्वभाव से कोसों दूर चला गया था।
तभी बाहर मुख्य लोहे के गेट के चरमराने की तीखी आवाज गूंजी। आमतौर पर शाम के इस वक्त डाकिया या अखबार वाला नहीं आता था। ड्राइंग रूम में बैठे ससुर हरिप्रसाद जी ने चश्मे के ऊपर से झांक कर देखा और सास सुमित्रा जी ने तुलसी की माला फेरते हुए हाथ रोक लिए। चौखट पर एक भारी सा सूटकेस जमीन पर रखने की आवाज आई। एक लंबा, थका हुआ और पश्चाताप से झुका हुआ साया दरवाजे के बीच खड़ा था।
“अम्मा… बाबूजी…” एक बेहद धीमी, थरथराती आवाज उभरी।
सुमित्रा जी के हाथ से रुद्राक्ष की माला छूटकर संगमरमर के फर्श पर बिखर गई। हरिप्रसाद जी के कांपते हाथ से शाम का अखबार गिर पड़ा। सामने खड़े युवक का चेहरा बदला हुआ था, आंखों के नीचे गहरे गड्ढे थे और चेहरे पर वर्षों की धूप-धूल की कालिख जैसी छाई थी।
“आलोक… मेरा बच्चा! तू आ गया?” सुमित्रा जी लड़खड़ाते कदमों से उठीं और अपने बेटे को सीने से चिपका लिया। उनकी आंखों से बरसों का सूखा आंसुओं की धार बनकर बह निकला। हरिप्रसाद जी भी खड़े हो गए, उनकी बूढ़ी आंखों में भी आंसुओं की चमक थी, पर उनके चेहरे पर ममता के साथ-साथ एक अजीब सा संकोच और गुस्सा भी तैर रहा था।
किचन के दरवाजे पर खड़ी अवनि के हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे एक पल के लिए भी नहीं कांपी। उसके कदमों में न कोई तेजी आई, न ही कोई कंपन हुआ। उसने शांति से ट्रे को सेंटर टेबल पर रखा और कुछ कदम पीछे हटकर हाथ बांधे खड़ी हो गई। उसकी नजरें उस शख्स पर टिकीं, जो पूरे सात साल, चार महीने और बारह दिन बाद इस घर की देहरी लांघ रहा था।
“देख अवनि! देख बहू… हमारा बेटा लौट आया। भगवान ने हमारी सुन ली, हमारे बुढ़ापे की लाठी, तेरी मांग का सिंदूर वापस आ गया बहू!” सुमित्रा जी ने आलोक का हाथ पकड़कर अवनि की तरफ खींचते हुए रुंधे गले से कहा। “अब पुरानी सारी कड़वाहट भूल जा बेटा। जो हुआ सो हुआ, वक्त का फेर था। तू इसे माफ कर दे। अब हमारा उजड़ा हुआ परिवार फिर से बस जाएगा।”
हरिप्रसाद जी ने भी अपनी नजरें अवनि के चेहरे पर गड़ाईं। उनकी आवाज में पिता का दर्द और संकोच दोनों थे, “हां बेटा अवनि… जिंदगी में खुशियां बड़ी मुश्किल से मिलती हैं। हम दोनों की उम्र ढल चुकी है, आज हैं कल नहीं। अब अपनी जिंदगी में फिर से खुशियों को जगह दे बेटा। इसे एक मौका दे दे।”
आलोक अवनि के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अवनि की आंखों में देखने की कोशिश की, मगर वहां न तो कोई गुस्सा था, न नफरत, और न ही कोई प्यार। वहां सिर्फ एक शून्य था, एक गहरी झील जैसी खामोशी, जिसमें कोई भी पत्थर फेंककर हलचल पैदा नहीं कर सकता था।
“अवनि… मुझे माफ कर दो,” आलोक दोनों हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आवाज आंसुओं से भीगी हुई थी। “मैं अपनी गलतियों, अपनी नादानियों के बोझ तले दब चुका हूं। उस वक्त मुझे लगता था कि मैं बहुत बड़ा कलाकार बनूंगा, अपने सपनों की उड़ान भरूंगा, और यह ब्याह मेरे पैरों की बेड़ी है। पर दुनिया ने मुझे ठोकरों के सिवा कुछ नहीं दिया। आज मैं तुम्हारे और अपने बेटे आरव के पास लौट आया हूं। मुझे बस एक मौका दे दो अवनि… मैं तुम दोनों को दुनिया की हर वो खुशी दूंगा जिससे तुम इतने साल वंचित रहे हो।”
अवनि के चेहरे पर एक अत्यंत सूक्ष्म, ठंडी मुस्कान उभरी। वह झुकी नहीं, न ही उसने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।
“माफी किस बात की आलोक जी?” अवनि की आवाज शांत, स्पष्ट और नपी-तुली थी, “आप तो पुरुष हैं। समाज ने पुरुषों को हमेशा से यह विशेषाधिकार दिया है कि जब उनका मन करे, वे बंधन तोड़कर उड़ जाएं, और जब उनके पंख थक जाएं, तो वे लौटकर अपनी पुरानी छांव तलाश लें। पुरुष का एक स्त्री को, उसके हाल पर छोड़कर चले जाना, इस दुनिया में कोई बहुत बड़ा अपराध तो कभी माना ही नहीं गया।”
“नहीं अवनि, ऐसा कहकर मुझे और मत मारो,” आलोक गिड़गिड़ाया, “मुझे पता है मैंने अक्षम्य अपराध किया है। पर अब मैं पूरी तरह बदल चुका हूं। तुम जो कहोगी, मैं करूंगा।”
अवनि ने एक गहरी सांस ली। सात साल की पूरी दास्तान एक झटके में उसके जेहन में कौंध गई।
“आप सात साल पहले जब इस घर से भागे थे, तो अपनी चिट्ठी में लिख गए थे कि मैं आपकी पसंद नहीं हूं। मेरे विचार, मेरी सादगी, मेरा रहन-सहन आपके आधुनिक सपनों से मेल नहीं खाता था। परिवार के दबाव में आपने मुझसे फेरे तो ले लिए, पर दिल से कभी मुझे अपना नहीं माना। आपकी यह नापसंदगी मैं समझ सकती थी आलोक जी… लेकिन आप जाने से पहले इस देह पर अपना अधिकार जमाना नहीं भूले थे। अपनी पसंद न होने के बावजूद, आप अपनी मर्दानगी का निशान और अपना अंश मेरी कोख में छोड़ गए थे।”
ड्राइंग रूम में सन्नाटा ऐसा छा गया मानो किसी की सांस भी पत्थरों से टकराकर गूंज रही हो। सुमित्रा जी ने नजरें झुका लीं।
अवनि आगे बोली, उसके स्वर में कोई चीख-पुकार नहीं थी, बस सच की ऐसी गूंज थी जो सीधे आत्मा को चीर दे, “जिस दिन आप गए, मैं टूटकर बिखर चुकी थी। पेट में पल रहा बच्चा और समाज के तीखे ताने… अगर बाबूजी और मां जी ने मेरी ढाल बनकर मुझे सहारा न दिया होता, तो मैं उसी हफ्ते बड़े तालाब में कूदकर अपनी जान दे चुकी होती। पर इन्होंने मुझे अपनी बेटी बनाया। इन्होंने मुझे सिर्फ रोटी नहीं दी, मुझे हिम्मत दी, मुझे फिर से पढ़ाया, मुझे अपने पैरों पर खड़ा किया।”
अवनि की नजरें खिड़की से बाहर खेल रहे छह साल के आरव पर टिक गईं।
“वो कोई एक-दो दिन या कुछ हफ्तों की बात नहीं थी आलोक जी, सात लंबे साल थे। उन सात सालों में जब आरव को आधी रात को तेज बुखार होता था, तो बाबूजी अपनी बूढ़ी हड्डियों के सहारे दवा लाने भागते थे। जब वो स्कूल के सालाना जलसे में पूछता था कि ‘सबके पापा आते हैं, मेरे पापा कहां हैं’, तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था। उन तन्हा रातों में जब तकिया आंसुओं से भीग जाता था, तब आप कहां थे? आरव का पूरा बचपन बिना पिता के बीत गया। क्या वे सात साल, वो बीता हुआ बचपन, वो सिसकियां आप मुझे लौटा सकते हैं?”
“अवनि, मैं जानता हूं मैं वो दिन नहीं लौटा सकता, पर आगे की जिंदगी…” आलोक की आवाज लड़खड़ा गई।
“आगे की जिंदगी?” अवनि ने उसे बीच में ही रोक दिया। “आपने मेरे तन पर तो ब्याह की पहली रात ही अधिकार पा लिया था। पर क्या मेरे मन में आप कभी जगह बना पाए थे? नहीं। क्योंकि आपने मुझे कभी एक इंसान, एक स्वतंत्र आत्मा समझा ही नहीं। आपने सिर्फ अपनी देह की तृप्ति देखी और फिर अपनी मर्जी से उड़ गए। हम स्त्रियां अक्सर इस गलतफहमी में अपनी पूरी जवानी गंवा देती हैं कि पति हमसे प्रेम करता है, जबकि कड़वा सच यह है कि कई बार पुरुष केवल उस स्त्री की देह और उसकी सेवा से प्रेम करता है, उसके वजूद से नहीं।”
अवनि ने अपने दोनों हाथों को देखा। उन हाथों में अब आत्मनिर्भरता की लकीरें थीं। वह शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में गणित की वरिष्ठ शिक्षिका थी, घर का आधा खर्च उठाती थी और अपने बेटे का भविष्य अपनी कमाई से संवार रही थी।
“अग्नि को साक्षी मानकर मैंने आपके साथ फेरे लिए थे। मेरे मां-बाप ने मुझे जो संस्कार दिए हैं, वे मुझे रिश्तों का अपमान करना नहीं सिखाते। मैं आपका तिरस्कार नहीं करूंगी, न ही आपको इस घर से बाहर जाने को कहूंगी। लेकिन…” अवनि की आवाज में स्वाभिमान का अडिग पर्वत खड़ा था, “आपके साथ उस कमरे में जाकर, आपकी पत्नी बनकर मैं अपनी ही नजरों में नहीं गिर सकती। मेरा आत्मसम्मान मुझे इसकी इजाजत कभी नहीं देगा। जिस दिन मैंने खुद को आपकी झूठी माफी के आगे समर्पित कर दिया, उस दिन मैं अपने उस सात साल के संघर्ष की हत्या कर दूंगी।”
कमरे में खड़े हरिप्रसाद जी और सुमित्रा जी अवनि के चेहरे के तेज को देख रहे थे।
“तो फिर मेरा क्या होगा अवनि? क्या मुझे इस घर में कोई जगह नहीं मिलेगी?” आलोक ने असहाय होकर पूछा।
“जगह मिलेगी आलोक जी,” अवनि ने बहुत दृढ़ता से कहा, “यह घर आपके माता-पिता का है। आप इस घर में जरूर रहेंगे, अपने बूढ़े माता-पिता के बेटे बनकर। उनकी सेवा कीजिए, उनके बुढ़ापे का सहारा बनिए, जिसका हक आपने इतने साल छीना। और… आप आरव के पिता बनकर रहेंगे। उसे जिस पिता के स्नेह और संरक्षण की जरूरत है, वो उसे दीजिए। स्कूल की फीस भरिए, उसके साथ खेलिए, उसे एक अच्छा इंसान बनाइए। मगर… मेरे पति बनकर नहीं। मेरे कमरे की चौखट आपके लिए हमेशा के लिए बंद है। मेरे जीवन में अब आपका स्थान सिर्फ मेरे बच्चे के पिता का है, इससे एक इंच ज्यादा सम्मान या अधिकार मैं आपको कभी नहीं दे पाऊंगी।”
आलोक स्तब्ध रह गया। उसे लगा था कि रोने-धोने और माफी मांगने से बरसों की गलती पल भर में धुल जाएगी, जैसा कि वह अक्सर फिल्मों और समाज में देखता आया था। पर यहां उसके सामने एक ऐसी स्त्री खड़ी थी, जिसने अपने आंसुओं से अपनी रीढ़ को फौलाद बना लिया था।
सुमित्रा जी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उन्होंने अपने बेटे आलोक के कंधे पर हाथ रखा और फिर मुड़कर अवनि के सिर पर अपना हाथ रख दिया।
“अवनि बिल्कुल सही कह रही है आलोक,” सुमित्रा जी की आवाज में एक मां की ममता से कहीं ज्यादा एक स्त्री के प्रति न्याय की दृढ़ता थी। “तू हमारा बेटा है, हमारे जिगर का टुकड़ा है, पर इस बच्ची ने हमारे लिए जो किया है, वो तू सात जन्मों में नहीं कर सकता। जब तू हमें बेसहारा छोड़कर भागा था, तब इस पराई बेटी ने हमें संभाला था। हम तेरे लौटने से खुश हैं, पर अपनी बहू के आत्मसम्मान की बलि चढ़ाकर हम यह खुशी नहीं मनाएंगे। अवनि का फैसला ही इस घर का अंतिम फैसला है।”
हरिप्रसाद जी ने भी आगे बढ़कर अवनि के कंधे को हौले से थपथपाया, “बहू, तूने हमें कभी झुकने नहीं दिया। आज हम तुझे झुकने नहीं देंगे। तूने जो लकीर खींच दी है, आलोक को उसी दायरे में रहना होगा।”
आलोक ने अपना सिर झुका लिया। उसके पास कहने को कोई शब्द नहीं बचे थे। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते माफी से फिर से जुड़ तो सकते हैं, लेकिन विश्वास और समर्पण का जो शीशा टूट चुका हो, उसमें पुराना चेहरा कभी साफ नजर नहीं आता। उसने चुपचाप अपना सूटकेस उठाया और बगल वाले गेस्ट रूम की ओर कदम बढ़ा दिए।
शाम की हवा में हरसिंगार की महक और गहरी हो गई थी। आरव बाहर से दौड़ता हुआ आया और अवनि के आंचल से लिपट गया, “मां! देखो, मैंने ड्राइंग में पहला इनाम जीता है!”
अवनि ने झुककर अपने बेटे को बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूम लिया। उसने दरवाजे की ओर देखा, जहां आलोक खड़ा अपने बेटे को देख रहा था। अवनि की आंखों में कोई कटुता नहीं थी, केवल एक नई सुबह की रोशनी थी—एक ऐसी सुबह, जहां कोई स्त्री लाचारी में नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान, मर्यादा और अधिकारों के साथ अपनी शर्तों पर जीना सीख चुकी थी। उसने बिना किसी द्वेष के आलोक को एक पिता का दायित्व निभाने का अवसर दिया था, और खुद के लिए आत्मसम्मान का एक ऐसा किला चुन लिया था जिसे कोई झूठी माफी भेद नहीं सकती थी।
जीवन में जब कोई आपको छोड़ जाए, तो टूटकर बिखर जाना आसान होता है, लेकिन अपने आत्मसम्मान को समेटकर खड़े होना ही सच्ची ताकत है। क्या अवनि ने आलोक को पति न मानकर केवल एक पिता और बेटे का दर्जा देकर सही किया? क्या हर गलती सिर्फ एक ‘माफी’ मांग लेने से भुलाई जा सकती है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : मोनिका रघुवंशी