विश्वास की नई सुबह

अनघा ने बहुत ही शांत भाव से प्रणव की सारी बातें सुनीं और फिर मुस्कुराते हुए कहा, “प्रणव जी, जो बेटा अपने माता-पिता के दुख को देखकर खुद शादी से डरने लगे, वह इंसान दिल का कितना सच्चा होगा, यह समझने के लिए मुझे किसी परीक्षा की जरूरत नहीं है। माता-पिता का सम्मान करना किसी पर अहसान नहीं, बल्कि हमारा पहला कर्तव्य है। मैं इस घर में अलग होने नहीं, बल्कि आपके परिवार का हिस्सा बनने आऊंगी।”

अनघा के इस जवाब ने प्रणव के दिल के हर संशय को पूरी तरह धो दिया। दोनों परिवारों की रजामंदी से शुभ मुहूर्त में विवाह संपन्न हुआ।

अहमदाबाद की हल्की ठंड वाली शाम में बालकनी में खड़े होकर प्रणव दूर क्षितिज पर ढलते सूरज की लालिमा को देख रहा था। उसके हाथ में रखी चाय की प्याली से हल्की भाप उठ रही थी। पिछले कई महीनों से उसके मन के भीतर विचारों का जो एक अंतहीन द्वंद्व चल रहा था, आज अचानक उस पर एक ठहराव आ गया था। एक ऐसी स्पष्टता, जिसने उसके सीने पर रखे भारी पत्थर को एक ही पल में हटा दिया था। उसने गहरी सांस ली, कमरे की ओर मुड़ा और सीधे अपनी मां यशोदा जी के पास जाकर बैठ गया। यशोदा जी सोफे पर बैठी भगवद्गीता के पन्ने पलट रही थीं। प्रणव ने बड़े स्नेह से उनका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

प्रणव ने बहुत ही शांत और संजीदा आवाज में कहा, “मां, मुझे आपसे एक जरूरी बात कहनी है। अब मुझे लगता है कि शादी कर ही लेनी चाहिए, आखिर कब तक यूं अकेला जिंदगी की गाड़ी खींचूंगा। पिछले काफी समय से मेरे दिमाग में जो डर घर कर गया था, आज वो पूरी तरह निकल चुका है। मुझे समझ आ गया है कि दुनिया का हर वैवाहिक रिश्ता टूटन या कड़वाहट की तरफ नहीं जाता। सच कहूं तो मेरे दिल में सिर्फ एक ही खौफ था कि शादी के बाद आने वाली लड़की कहीं आपको और बाबूजी को मुझसे दूर न कर दे, या आप दोनों को उसकी वजह से कोई मानसिक क्लेश न झेलना पड़े। पर मां, अब मेरी सोच का नजरिया पूरी तरह बदल चुका है। अगर आपकी नजर में कोई अच्छी और संस्कारी लड़की हो, तो मैं आगे कदम बढ़ाने के लिए तैयार हूं।”

यह सुनते ही यशोदा जी की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उन्होंने तुरंत अपनी पोथी मेज पर रखी और प्रणव के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “मेरे बच्चे, आज तूने मेरे दिल का सबसे बड़ा बोझ हल्का कर दिया। तू बिल्कुल सच कह रहा है, शादी के बाद हर घर में आग नहीं लगती। कुछ लोगों के स्वभाव में ही ऐसा टकराव होता है कि वे रिश्ते को संवारने की बजाय उसे और ज्यादा उलझा देते हैं। तू अपने बड़े भाई मयंक और उसकी पत्नी की खींचतान को देखकर जरूरत से ज्यादा सहम गया था। हर इंसान की फितरत अलग होती है, दुनिया की हर बहू तुम्हारी भाभी की तरह स्वार्थी या कठोर दिल नहीं होती।”

प्रणव ने धीमे स्वर में कहा, “मां, गलती मेरी भी नहीं थी। इंसान जो अपनी आंखों से रोज घटते देखता है, उसी से सीखता और डरता है। जब अपने ही आंगन में खुशियों को बिखरते और आंसुओं को बहते देखा हो, तो कोई भी कैसे हिम्मत जुटा सकता था? मुझे लगता था कि अगर शादी का मतलब सिर्फ कलेश और अलगाव है, तो अकेला रहना ही बेहतर है।”

यशोदा जी ने एक ठंडी सांस ली और अतीत की यादों में खो गईं। उन्होंने कहा, “कुछ लोगों की मानसिकता ही ऐसी बन जाती है कि वे किसी के साथ मिलकर रहना ही नहीं चाहते। उन्हें सिर्फ अपनी सहूलियत, अपनी आजादी और अपना स्वार्थ दिखता है, चाहे उसमें पूरे परिवार की शांति छिन जाए या खुद उनके पति का सुख खत्म हो जाए। खैर, जो हुआ सो हुआ, मुझे इस बात का परम संतोष है कि तू उस बुरे साये से बाहर निकल आया है।”

दरअसल, बात कुछ साल पुरानी थी। प्रणव का बड़ा भाई मयंक स्वभाव से बेहद सीधा, शांत और पारिवारिक मूल्यों को मानने वाला इंसान था। मयंक की शादी जब तृषा से हुई, तो पूरा परिवार उम्मीदों से भरा था कि घर में खुशियों की बहार आएगी। लेकिन तृषा का मिजाज पहले ही दिन से बिल्कुल अलग था। वह बेहद तुनकमिजाज, बात-बात पर उबल पड़ने वाली और हर जिम्मेदारी से भागने वाली महिला थी। घर के किसी भी काम में हाथ बंटाना उसे अपनी शान के खिलाफ लगता था। मयंक एक निजी कंपनी में साधारण वेतन पर काम करता था, जिससे घर का खर्च और माता-पिता की दवाइयों का खर्च बमुश्किल चल पाता था। वह घर में दो-दो नौकर रखने की स्थिति में नहीं था।

नतीजा यह हुआ कि घर की रसोई से लेकर साफ-सफाई और मेहमानों की आवभगत का सारा जिम्मा बूढ़ी यशोदा जी की कमजोर कमर पर आ पड़ा। अगर कभी यशोदा जी या पिता जी धीरे से भी कुछ कह देते, तो तृषा पूरे घर में कोहराम मचा देती थी। थालियां पटकना, कमरे का दरवाजा धड़ाम से बंद कर लेना और मयंक पर चिल्लाना उसका रोज का नियम बन गया था। उसकी जुबान पर सिर्फ एक ही रट थी—”मुझे इस संयुक्त परिवार के झंझट में नहीं घिसना है। अगर मेरे साथ चैन से रहना है, तो इन बूढ़े सास-ससुर को छोड़ो और मेरे साथ अलग फ्लैट लेकर रहो।”

मयंक दोनों तरफ से पिस रहा था। एक तरफ जन्म देने वाले माता-पिता थे और दूसरी तरफ उसकी नई-नवेली गृहस्थी। घर के इस रोज-रोज के तमाशे ने पूरे परिवार का मानसिक सुकून छीन लिया था। अंत में, अपने बेटे की गिरती सेहत और उसकी वैवाहिक जिंदगी को बचाने के लिए खुद यशोदा जी और उनके पति उमाकांत जी ने भारी दिल से फैसला किया। उन्होंने मयंक से कहा कि वह तृषा को लेकर शहर के दूसरे कोने में किराए का मकान लेकर अलग रहने लगे। मयंक रोते हुए अलग तो हो गया, लेकिन इस पूरी त्रासदी का सबसे गहरा और भयानक असर छोटे भाई प्रणव के कोमल मन पर पड़ा।

प्रणव ने अपनी आंखों से देखा था कि कैसे एक लड़की के आने से उनका हंसता-खेलता परिवार दो हिस्सों में बंट गया था और बूढ़े मां-बाप अंदर से टूट गए थे। उस दिन से प्रणव ने अपने दिल के दरवाजे शादी के नाम पर पूरी तरह बंद कर लिए थे। जब भी रिश्ते की बात चलती, वह साफ मना कर देता कि वह कभी शादी नहीं करेगा।

घर के ऊपरी हिस्से में, जहां पहले मयंक और तृषा रहते थे, वह पूरा तल खाली पड़ा हुआ था। घर का खर्च चलाने और उस खालीपन को भरने के लिए उमाकांत जी ने उस हिस्से को किराए पर देने का फैसला किया। कुछ ही हफ्तों में वहां एक युवा दंपत्ति रहने आ गया—कुणाल और उसकी पत्नी साक्षी। कुणाल की एक सरकारी बैंक में ट्रांसफर होकर पोस्टिंग हुई थी और साक्षी एक बेहद शांत, सुशील और सुशिक्षित युवती थी। दोनों की शादी को अभी मुश्किल से दो साल ही हुए थे।

शुरुआत में प्रणव के मन में किराएदारों को लेकर भी एक दूरी थी, लेकिन साक्षी के व्यवहार ने बहुत ही कम समय में सबका दिल जीत लिया। सुबह उठते ही जब भी साक्षी नीचे किसी काम से आती या सीढ़ियों से गुजरती, वह सबसे पहले उमाकांत जी और यशोदा जी के पैर छूकर आशीर्वाद लेती। उसके चेहरे पर हमेशा एक सहज और मीठी मुस्कान खिली रहती थी। कभी कोई तीखा शब्द नहीं, कभी कोई बनावटीपन नहीं। जब भी कुणाल के माता-पिता गांव से आते, साक्षी पूरे उत्साह और सम्मान के साथ उनकी सेवा करती। यही नहीं, जब साक्षी के खुद के मायके वाले मिलने आते, तब भी घर में वही सहजता और सादगी देखने को मिलती।

एक दोपहर, जब कुणाल बैंक में था, साक्षी नीचे यशोदा जी के लिए अपने हाथ से बनाई हुई गरमा-गरम मेथी की मठरी लेकर आई। यशोदा जी धूप में बैठी स्वेटर बुन रही थीं। साक्षी उनके पास ही पायदान पर बैठ गई और बोली, “आंटी जी, आज मैंने ताजी मठरी बनाई थी, सोचा आपको खिलाऊं। बाबूजी की चाय के साथ यह बहुत अच्छी लगेगी।”

यशोदा जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए बेहद अपनेपन से पूछा, “बेटी साक्षी, मैं अक्सर सोचती हूं कि तुम इतनी समझदार और पारिवारिक संस्कारों वाली लड़की हो, फिर तुम अपने सास-ससुर के साथ गांव में क्यों नहीं रहतीं? यहां किराए के मकान में अकेले गृहस्थी संभालना क्या तुम्हें भारी नहीं लगता?”

साक्षी ने बड़े ही भोलेपन और आदर के साथ सिर झुकाकर कहा, “आंटी जी, सच कहूं तो मेरा मन तो हमेशा यही करता है कि पूरा परिवार एक ही छत के नीचे साथ रहे। गांव में जब सब साथ होते हैं, तो त्योहारों की रौनक ही अलग होती है। पर कुणाल जी की नौकरी की वजह से हमें यहां आना पड़ा। यहां बाहर का खाना खाकर इनकी तबीयत अक्सर खराब रहने लगी थी। इसलिए मेरी सासू मां ने खुद अपने हाथों से मेरा हाथ कुणाल जी के हाथ में सौंपा और कहा कि पहले अपने पति के स्वास्थ्य और घर का ध्यान रखो। मैं तो कहती हूं आंटी जी, जितना परिवार हमसे बंधा होता है, उतना ही हमारा वजूद परिवार से होता है। पति के साथ रहना मेरा फर्ज है, लेकिन दिल से हम आज भी अपने गांव वाले पूरे परिवार से जुड़े हुए हैं।”

साक्षी की यह बात सुनकर यशोदा जी की आंखें भर आईं। खिड़की के पीछे खड़ा प्रणव भी साक्षी की बातें सुन रहा था। उसने मन ही मन सोचा कि सोच और संस्कारों का कितना बड़ा फर्क होता है। एक तरफ उसकी भाभी थी, जिसने मजबूरी न होते हुए भी परिवार को तोड़ा, और दूसरी तरफ यह लड़की थी, जो मजबूरी में दूर रहकर भी पूरे परिवार को अपने दिल में समेटे हुए थी।

अगले शनिवार को बैंक की छुट्टी थी। सुबह से ही ऊपर के हिस्से से स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू आ रही थी। दोपहर के समय साक्षी नीचे आई और उसने बड़े आग्रह के साथ पूरे परिवार को ऊपर दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया। उमाकांत जी, यशोदा जी और प्रणव ऊपर पहुंचे। मेज पर तरह-तरह के पकवान सजे हुए थे—दाल बाटी, चूरमा, गट्टे की सब्जी और ताजी छाछ।

साक्षी रसोई से पसीने में भीगी लेकिन मुस्कुराती हुई गरम-गरम रोटियां लेकर आ रही थी। प्रणव से रहा नहीं गया, उसने संकोच छोड़ते हुए कहा, “भाभी, आप सुबह से इस गर्मी में रसोई में जुटी हुई हैं। कुणाल भाई की तो छुट्टी थी, आप दोनों आराम करते। हमारे लिए इतना सब कुछ बनाने की क्या जरूरत थी? आपको कितनी थकावट हो गई होगी।”

साक्षी ने प्लेट में घी परोसते हुए बड़ी सहजता से कहा, “अरे प्रणव भाई, आप भी कैसी बातें करते हैं! अपने परिवार और अपनों के लिए खाना बनाने में थकावट कैसी? थकावट तो तब होती है जब इंसान बेमन से कोई काम करे। जब दिल में अपनों को खिलाने की खुशी हो, तो पसीने की हर बूंद में भी सुकून मिलता है। मैं तो पिछले कई दिनों से आंटी जी से कह रही हूं कि अब आपकी भी शादी करवा देनी चाहिए। घर में एक और सदस्य आएगा, आंटी जी के हाथ बंटेंगे, शाम को सब साथ बैठकर हंसेंगे-बोलेंगे, तो इस पूरे घर में फिर से खुशियों के फूल खिल उठेंगे।”

कुणाल ने भी हंसते हुए कहा, “बिल्कुल प्रणव! जीवन में एक सही जीवनसाथी का होना ईश्वर के सबसे बड़े वरदान जैसा होता है। शादी का मतलब बंधन या कलह नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हाथ थामकर हर सुख-दुख को बांटना होता है।”

उस दोपहर भोजन की हर एक निवाले के साथ प्रणव के मन के सारे पुराने जख्म जैसे भरते चले गए। उसने देखा कि कैसे एक स्त्री अपने प्रेम, त्याग और सकारात्मक सोच से एक पराए मकान को भी स्वर्ग बना सकती है। रिश्तों में कड़वाहट किसी रस्म या शादी की वजह से नहीं आती, बल्कि वह इंसान की अपनी सोच और स्वार्थ की वजह से आती है। अगर दिल में प्यार और सम्मान की भावना हो, तो कोई भी रिश्ता बोझ नहीं बनता।

उसी शाम प्रणव ने अपनी मां से खुलकर अपने दिल की बात कह दी थी। यशोदा जी ने बिना देर किए अपने पारिवारिक पंडित जी और परिचितों से संपर्क साधा। कुछ ही दिनों में वडोदरा के एक बेहद सम्मानित और संस्कारी परिवार से एक रिश्ता आया। लड़की का नाम अनघा था। अनघा एक स्कूल में शिक्षिका थी और सादगी व शालीनता की मूरत थी। जब दोनों परिवारों की मुलाकात हुई, तो प्रणव ने अनघा से अकेले में बात की। उसने बिना कुछ छिपाए अपने परिवार के अतीत, अपने भाई के अलग होने के दर्द और अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी की बात साफ-साफ कह दी।

अनघा ने बहुत ही शांत भाव से प्रणव की सारी बातें सुनीं और फिर मुस्कुराते हुए कहा, “प्रणव जी, जो बेटा अपने माता-पिता के दुख को देखकर खुद शादी से डरने लगे, वह इंसान दिल का कितना सच्चा होगा, यह समझने के लिए मुझे किसी परीक्षा की जरूरत नहीं है। माता-पिता का सम्मान करना किसी पर अहसान नहीं, बल्कि हमारा पहला कर्तव्य है। मैं इस घर में अलग होने नहीं, बल्कि आपके परिवार का हिस्सा बनने आऊंगी।”

अनघा के इस जवाब ने प्रणव के दिल के हर संशय को पूरी तरह धो दिया। दोनों परिवारों की रजामंदी से शुभ मुहूर्त में विवाह संपन्न हुआ।

शादी के बाद जब अनघा दुल्हन बनकर उस घर में आई, तो उसने सचमुच उस सूने घर को खुशियों के गुलशन में बदल दिया। वह सुबह उठकर सबसे पहले यशोदा जी और ससुर जी के लिए काढ़ा और दवाइयां तैयार करती, फिर मुस्कुराते हुए घर के कामों में हाथ बंटाती। साक्षी और अनघा के बीच भी बहुत जल्द सगी बहनों जैसा गहरा और अटूट रिश्ता बन गया। दोनों मिलकर कभी नीचे, तो कभी ऊपर एक साथ त्यौहार मनातीं।

एक शाम आंगन में सब साथ बैठे थे। हवा में हल्की ठंड थी और सब मिलकर चाय और पकोड़ों का आनंद ले रहे थे। उमाकांत जी के चेहरे पर सालों बाद वह निश्चिंतता और संतोष दिखाई दे रहा था जो मयंक के जाने के बाद खो गया था।

अचानक दरवाजे की घंटी बजी। प्रणव ने दरवाजा खोला तो सामने उसका बड़ा भाई मयंक खड़ा था। मयंक के चेहरे पर उदासी थी। मयंक ने कहा, “प्रणव, मुझे पता चला कि तूने शादी कर ली। मैं खुद को रोक नहीं पाया… बस मां-बाबूजी से मिलने चला आया।”

प्रणव ने बिना किसी कड़वाहट के बड़े भाई को गले से लगा लिया, “भैया, यह आपका भी घर है। अंदर आइए।”

जब मयंक अंदर आया, तो अनघा ने तुरंत आगे बढ़कर बड़े जेठ के पैर छुए और बड़े आदर से उन्हें सोफे पर बिठाकर पानी दिया। अनघा का यह निस्वार्थ सम्मान देखकर मयंक की आंखें भर आईं। उसने यशोदा जी के चरणों में सिर रख दिया और कहा, “मां, मुझे माफ कर देना। मैं अपनी गृहस्थी के चक्कर में आप लोगों से दूर हो गया था।”

यशोदा जी ने मयंक को उठाकर गले से लगाया और कहा, “बेटा, मां-बाप कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं होते। आज इस घर में जो खुशियां वापस आई हैं, उसमें तेरा भी उतना ही हक है।”

उस दिन घर में किसी के मन में कोई मैल नहीं बचा था। प्रणव ने दूर खड़े होकर अपनी मां की खिलखिलाती हंसी और अनघा के चेहरे के संतोष को देखा। उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने सही समय पर साक्षी के जरिए उसकी आंखें खोल दी थीं। जिंदगी में कभी किसी एक बुरे अनुभव को अपनी पूरी तकदीर का फैसला नहीं मान लेना चाहिए। रात कितनी भी अंधेरी क्यों न हो, विश्वास और सही नजरिए की एक किरण पूरे जीवन को उजाले से भर सकती है।

अक्सर हम अपने जीवन में किसी एक रिश्ते के कड़वे अनुभव को देखकर पूरी दुनिया और सभी रिश्तों को उसी तराजू में तौलने की भूल कर बैठते हैं। क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के जीवन में कभी ऐसा दौर आया है जब किसी दूसरे के अच्छे आचरण ने रिश्तों के प्रति आपका भरोसा फिर से जगा दिया हो? अपनी सच्ची राय और विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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