चुप्पी की टूटी परतें

“मुझे माफ कर दो रोहिणी,” शैलेश जी का गला रुंध गया, “मैंने तुम्हें कभी वह साथी नहीं समझा जो बराबरी पर खड़ा होता है। मैंने हमेशा तुम पर अपनी मर्जी थोपी। आज मुझे एहसास हो रहा है कि बच्चे तो अपनी दुनिया में चले गए, अब इस ढलती उम्र में हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं। अगर आज भी मैं अपनी जिद और अहंकार पर अड़ा रहा, तो शायद मैं तुम्हें पूरी तरह खो दूंगा। मैं नहीं चाहता कि हमारे रिश्ते में यह घुटन और भड़ास बची रहे। मैं चाहता हूं कि तुम बोलो। तुम अपनी हर खुशी, अपनी हर नाराजगी, अपनी हर पसंद खुलकर मुझसे कहो। अगर मैं गलत होऊं, तो मुझे डांटो भी। पर अपने भीतर घुटो मत।”

परिवार की छोटी बहू अंजलि की बेटी यानी प्रज्ञा का विवाह दो दिन बाद ही था। पूरे घर में गेंदे के ताजे फूलों की महक, ढोलक की थाप, चूड़ियों की खनक और रिश्तेदारों की चहल-पहल तैर रही थी। मायके और ससुराल दोनों पक्षों के तमाम लोग एक छत के नीचे जमा थे। कोई चाट की प्लेट लिए छत की ओर जा रहा था, तो कोई बैठक में बैठकर पुरानी यादों की गठरी खोल रहा था।

इसी महफिल के बीच बैठक के बड़े से सोफे पर बैठे थे शैलेश जी, जो अंजलि के बड़े जेठ थे। हाथ में अदरक वाली चाय का कुल्हड़ थामे, वे अपने साढ़ू भाई हेमंत जी से बड़े रौब में बतिया रहे थे। तभी शैलेश जी की पत्नी, रोहिणी कमरे में दाखिल हुईं। रोहिणी जी का स्वभाव शुरू से ही बेहद शांत, गंभीर और जरूरत से ज्यादा सहनशील माना जाता था। वे कभी किसी बात पर ऊंची आवाज में नहीं बोलती थीं।

रोहिणी ने अपने हाथ में रखी लाल मखमली डिब्बी की ओर देखते हुए शैलेश जी से बड़े सहज भाव से कहा, “सुनिए जी, शाम को संगीत का कार्यक्रम है और कल फेरे हैं। मेरी जो पुरानी वाली कुंदन की बालियां हैं, उनका पेंच ढीला हो गया है और डिजाइन भी पुराना पड़ गया है। मैंने जौहरी से बात की थी, वह इसे बदलकर नया सेट देने को तैयार है। क्या आप थोड़ी देर के लिए मेरे साथ सराफा बाजार चलेंगे?”

शैलेश जी ने चाय की चुस्की ली और अपनी आदत के मुताबिक भौंहें सिकोड़ते हुए पूरे कमरे में बैठे लोगों को सुनाकर बोले, “अरे भई, तुम औरतों के साथ बाजार जाने का मतलब है अपना पूरा दिन बर्बाद करना! दुकान पर बैठोगी तो सौ डिब्बे खुलवाओगी, एक झुमका पसंद करने में चार घंटे लगा दोगी, फिर कहोगी कि वो पहला वाला ही ठीक था। अगर आधे घंटे में काम खत्म करना हो तो बताओ, वरना मेरे पास इतना फालतू वक्त और सब्र नहीं है कि तुम्हारी पसंद-नापसंद के चक्कर में शाम की महफिल छोड़ दूं।”

कमरे में बैठे कुछ रिश्तेदार शैलेश जी के इस पुराने और चिर-परिचित मजाक पर मुस्कुरा दिए। सबको लगा कि रोहिणी हमेशा की तरह अपनी नजरें नीची करेंगी, धीमी सी मुस्कान के साथ ‘कोई बात नहीं’ कहेंगी और बात वहीं खत्म हो जाएगी।

मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ।

रोहिणी वहीं रुक गईं। उन्होंने चेहरे पर कोई शिकन लाए बिना, बेहद ठंडे और नपे-तुले लहजे में कहा, “बाजार में चार घंटे मुझे अपनी पसंद ढूंढने में नहीं लगते शैलेश जी, बल्कि आपकी जेब की हैसियत और अपनी पसंद के बीच तालमेल बैठाने में लगते हैं। बात यह है कि जो चीज पहली नजर में भा जाती है, उसकी कीमत आपकी जेब के बजट से बाहर होती है। फिर मुझे घंटों उस दुकानदार से ऐसी चीज ढूंढवानी पड़ती है जो दिखने में भी सुंदर लगे, जिसे पहनकर आपकी बिरादरी में आपकी नाक भी ऊंची रहे और जब आप बिल चुकाने के लिए बटुआ खोलें तो आपके माथे पर बल भी न पड़े। अगर आज आप मुझे यह भरोसा दे दें कि जो मुझे पसंद आएगा, बिना नुक्ताचीनी किए आप उसका भुगतान कर देंगे, तो मैं दस मिनट में खरीदकर बाहर आ जाऊं।”

रोहिणी का यह जवाब किसी तीर की तरह सीधे निशाने पर लगा। बैठक में पल भर के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। जिन लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट थी, वे स्तब्ध रह गए।

शैलेश जी का चेहरा लाल पड़ गया। अपनी झेंप मिटाने के लिए वे पास बैठी अंजलि की तरफ देखकर हंसने की नाकाम कोशिश करते हुए बोले, “देखा अंजलि, तुम्हारी जेठानी जी को? पहले तो इनके मुंह से आवाज नहीं निकलती थी, आजकल तो ऐसा लगता है जैसे जुबान पर कैंची धर कर बैठी हैं। बात-बात पर ऐसा पलटवार करती हैं कि बंदा लाजवाब हो जाए!”

अंजलि के पति हेमंत जी ने भी माहौल को हल्का करने की नीयत से ठहाका लगाते हुए कहा, “भाई साहब, आप भी किससे गुहार लगा रहे हैं? अंजलि भी तो शुरू से हाजिरजवाबी का मेडल लेकर घूमती हैं। हम पतियों की तो किस्मत ही ऐसी है!”

सब हंस पड़े, मगर अंजलि नहीं हंसी। अंजलि अपनी बड़ी दीदी रोहिणी के चेहरे पर तैरती गहरी उदासी और उसके पीछे छिपे वर्षों के दर्द को बहुत अच्छी तरह समझती थी। अंजलि ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और सीधे शैलेश जी की आंखों में देखते हुए कहा, “जीजाजी, आप इसे दीदी की जुबान चलना कह रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह समझने की कोशिश की कि दीदी ने आज तक अपनी जुबान क्यों बांध रखी थी? और आज अचानक ये शब्द बाहर क्यों आ रहे हैं?”

शैलेश जी ने असहज होकर पूछा, “क्या मतलब? मैंने क्या कोई जुल्म किया है इन पर?”

अंजलि ने गंभीर स्वर में कहा, “जीजाजी, जब चिराग और नेहा छोटे थे, स्कूल जाते थे, तब आपने कितनी ही बार पूरे परिवार के सामने दीदी के मायके वालों का मजाक उड़ाया, उनकी पसंद को तुच्छ बताया और न जाने कितनी बार बिना सोचे-समझे उन्हें झिड़क दिया। तब भी दीदी चुप रहीं। कभी सोचा क्यों? इसलिए नहीं कि उनके पास शब्द नहीं थे या उन्हें बुरा नहीं लगता था। वे चुप इसलिए रहीं क्योंकि वे अपने बच्चों के मासूम दिलों पर उनके पिता की एक जिम्मेदार, सम्मानीय और आदर्श छवि बनाए रखना चाहती थीं। वे नहीं चाहती थीं कि बच्चे जब बड़े हों, तो उनके मन में यह कड़वाहट भरे कि उनके माता-पिता हर छोटी बात पर लड़ते हैं। वे बच्चों को एक शांत और खुशहाल घर का माहौल देना चाहती थीं, जिसकी कीमत उन्होंने अपनी ख्वाहिशों और अपने आत्मसम्मान का घूंट पीकर चुकाई।”

कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। हंसी-ठिठोली गायब हो चुकी थी।

अंजलि ने आगे कहा, “अब चिराग बेंगलुरु में एक बड़ी कंपनी में काम कर रहा है और नेहा शादी करके अपनी ससुराल में खुश है। दोनों बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं, उनका भविष्य सुरक्षित हो गया है। आज जब दीदी की वह जिम्मेदारी पूरी हो गई है, तो उनके भीतर बरसों से दबा हुआ लावा बाहर आ रहा है। यह कोई बदतमीजी नहीं है जीजाजी, यह पच्चीस साल की उस घुटन और समझौते की भड़ास है, जो उन्होंने इस घर को घर बनाए रखने के लिए झेली है। औरत जब तक मां के रूप में त्याग करती है, आप उसे देवी समझकर पूजते नहीं, बल्कि उसकी खामोशी को उसकी कमजोरी मान लेते हैं। अब जब वे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती हैं, तो आपको लग रहा है कि वे बदल गई हैं।”

अंजलि की एक-एक बात पत्थर की लकीर जैसी थी। बैठक में मौजूद अन्य महिलाएं—चाचियां, मामियां और भाभियां—खामोश थीं, लेकिन उनकी आंखें अंजलि की बात का मूक समर्थन कर रही थीं। मानो अंजलि ने उन सबकी दबी हुई पीड़ा को जुबान दे दी हो।

शैलेश जी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला, लेकिन उनके पास कोई दलील नहीं थी। वे चुपचाप उठकर आंगन की ओर चले गए।

उस रात घर में संगीत का कार्यक्रम धूमधाम से संपन्न हुआ। सबने नाचा-गाया, लेकिन शैलेश जी उस महफिल में होकर भी कहीं खोए हुए थे। उनके कानों में रोहिणी के वे शब्द और अंजलि का आईना दिखाना बार-बार गूंज रहा था—”आपकी जेब और अपनी पसंद का संतुलन…”, “बच्चों के मन में पिता की सम्मानीय छवि…”।

देर रात जब सारा शोर-शराबा थम गया, मेहमान अपने-अपने कमरों में सोने चले गए, तब शैलेश जी अपने बेडरूम में पहुंचे। कमरे में हल्की सी रोशनी थी। रोहिणी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी अपनी चूड़ियां उतार रही थीं। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन वही चिर-परिचित ठहराव भी था।

शैलेश जी धीरे से जाकर उनके पीछे खड़े हो गए। आईने में उन्होंने रोहिणी के चेहरे को देखा। उस चेहरे पर अब उम्र की लकीरें साफ दिखने लगी थीं, बालों में चांदी चमक रही थी। शैलेश जी को अचानक याद आया कि जब वे ब्याह कर इस घर में आई थीं, तो कितनी चंचल और बातूनी थीं। उनकी हंसी पूरे घर में गूंजती थी। फिर धीरे-धीरे वह हंसी कहां खो गई? कब वे सिर्फ ‘हां’ और ‘ना’ तक सीमित रह गईं, उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था। वे हमेशा अपनी मर्जी, अपनी सहूलियत और अपने अहंकार को ही परिवार की धुरी मानते रहे।

शैलेश जी ने आगे बढ़कर रोहिणी के कांधे पर हाथ रखा। रोहिणी थोड़ा चौंकीं, उन्होंने आईने में पति की ओर देखा।

“रोहिणी…” शैलेश जी की आवाज में वह पुरानी तल्खी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी कंपकपाहट थी।

“जी? कुछ चाहिए आपको? गर्म पानी लाऊं?” रोहिणी ने हमेशा की तरह एक कर्तव्यनिष्ठ पत्नी की तरह पूछा।

“नहीं, पानी नहीं चाहिए,” शैलेश जी ने एक गहरी सांस ली और पास रखी कुर्सी खींचकर उनके बिल्कुल सामने बैठ गए। उन्होंने रोहिणी के दोनों हाथ, जो अब पहले जैसे कोमल नहीं रहे थे, अपने हाथों में थाम लिए।

रोहिणी हैरान रह गईं। पच्चीस सालों में शायद यह पहला मौका था जब शैलेश जी ने इस तरह उनका हाथ पकड़ा था।

“रोहिणी, आज दोपहर में जो कुछ अंजलि ने कहा, और जो तुमने कहा… सच कहूं तो पहले मुझे बहुत गुस्सा आया था। मुझे लगा कि भरी महफिल में मेरा अपमान हुआ है। लेकिन शाम से अब तक जब-जब मैंने अपने बीते हुए कल को देखा, तो मुझे समझ आया कि कसूर तुम्हारा नहीं, मेरा था।” शैलेश जी की आंखें भर आईं।

रोहिणी ने अविश्वास से अपने पति को देखा। एक अहंकारी, रौबदार पुरुष अपनी भूल स्वीकार कर रहा था।

शैलेश जी ने आगे कहा, “मैं हमेशा यह सोचता रहा कि मैं कमाता हूँ, घर चलाता हूँ, तो मैं ही सबसे बड़ा त्याग कर रहा हूँ। लेकिन मैं यह कभी देख ही नहीं पाया कि तुमने इस चारदीवारी को संभालने के लिए अपने वजूद का कितना बड़ा हिस्सा कुर्बान कर दिया। बच्चों को मेरी डांट से बचाना, मेरी कमियों को उनके सामने ढकना, मेरी हर कड़वी बात पर सिर्फ इसलिए मुस्कुरा देना ताकि घर की शांति भंग न हो… तुमने कितना कुछ सहा है रोहिणी। और मैंने क्या किया? तुम्हारी उस महान चुप्पी को तुम्हारी आदत समझ लिया। तुम्हारी उस सहनशीलता को तुम्हारा कर्तव्य मान बैठा।”

रोहिणी की आंखों से आंसुओं की एक बूंद टपक कर शैलेश जी की हथेली पर गिर गई।

“मुझे माफ कर दो रोहिणी,” शैलेश जी का गला रुंध गया, “मैंने तुम्हें कभी वह साथी नहीं समझा जो बराबरी पर खड़ा होता है। मैंने हमेशा तुम पर अपनी मर्जी थोपी। आज मुझे एहसास हो रहा है कि बच्चे तो अपनी दुनिया में चले गए, अब इस ढलती उम्र में हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं। अगर आज भी मैं अपनी जिद और अहंकार पर अड़ा रहा, तो शायद मैं तुम्हें पूरी तरह खो दूंगा। मैं नहीं चाहता कि हमारे रिश्ते में यह घुटन और भड़ास बची रहे। मैं चाहता हूं कि तुम बोलो। तुम अपनी हर खुशी, अपनी हर नाराजगी, अपनी हर पसंद खुलकर मुझसे कहो। अगर मैं गलत होऊं, तो मुझे डांटो भी। पर अपने भीतर घुटो मत।”

रोहिणी अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं। पच्चीस साल का जो दर्द सीने में बर्फ बनकर जमा था, वह आज पिघलकर बह निकला। उन्होंने अपना सिर शैलेश जी के कंधे पर रख दिया। यह रोना किसी बेबसी का नहीं था, यह उन अनकहे जज्बातों की मुक्ति थी जो बरसों से रिहाई मांग रहे थे।

शैलेश जी ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “कल सुबह शादी के फेरों से पहले, सबसे पहले हम दोनों सराफा बाजार जाएंगे। और इस बार कोई बजट की सीमा नहीं होगी। जो गहना तुम्हें भाएगा, वही तुम्हारा होगा। और हां, चाहे चार घंटे लगें या पूरा दिन, मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा।”

रोहिणी ने आंसुओं के बीच ही एक भीगी सी मुस्कान बिखेर दी।

अगली सुबह जब घर के लोग नाश्ते की मेज पर जमा हुए, तो उन्होंने एक सुखद बदलाव देखा। शैलेश जी खुद रोहिणी के लिए चाय की प्याली लेकर आए थे और दोनों के बीच एक सहज, दोस्ताना बातचीत चल रही थी। अंजलि ने दूर से अपनी दीदी और जीजाजी को देखा, तो उसकी आंखों में सुकून की चमक आ गई।

शादी के मंडप में जब फेरे हो रहे थे, तो रोहिणी के गले में वही नया कुंदन का हार चमक रहा था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा चमक उनके चेहरे पर थी। वह चमक किसी गहने की मोहताज नहीं थी, वह चमक उस सम्मान और समझदारी की थी, जो आखिरकार उनके रिश्ते को एक नई और मजबूत बुनियाद दे चुकी थी।

रिश्ते केवल मौन समझौतों से नहीं चलते, वे चलते हैं संवाद से, एक-दूसरे के त्याग को पहचानने से और समय रहते अपनी गलतियों को सुधारने से। शैलेश और रोहिणी की ज़िंदगी का दूसरा अध्याय अब शुरू हुआ था, जहाँ चुप्पी की कोई जगह नहीं थी, केवल प्रेम, सम्मान और बराबरी का अहसास था।

प्रिय पाठकों, हमारे समाज में न जाने कितनी औरतें परिवार और बच्चों की खातिर अपने आत्मसम्मान से समझौते करके खामोश हो जाती हैं। क्या आपके विचार में एक रिश्ते को निभाने की जिम्मेदारी सिर्फ स्त्री की ही होनी चाहिए? क्या पुरुषों को समय रहते उस ‘मौन त्याग’ का महत्व नहीं समझना चाहिए, इससे पहले कि वह घुटन और तल्खी का रूप ले ले? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!