आंसुओं की छांव में पनपती उम्मीद

 “अवनी, सच तो यह है कि उस दिन शायद मैं भी वही करता जो आज तुम्हारे पापा कर रहे हैं। शायद हर वो बाप यही करता है जिसकी बेटी बिना उसकी रज़ा के घर की दहलीज़ लांघ जाती है। हमें पापा की ज़बान से निकले उन कड़वे शब्दों को नहीं देखना चाहिए, हमें उस ज़हर के पीछे छिपे उनके उस अथाह दर्द को महसूस करना चाहिए जो पिछले दो सालों से उनके सीने में सुलग रहा है। ज़रा सोचो, हमारे जाने के बाद रिश्तेदारों ने उन पर क्या-क्या ताने कसे होंगे? मोहल्ले के लोगों ने उनके चरित्र, उनके संस्कारों और उनकी परवरिश पर कैसे-कैसे सवाल उठाए होंगे?

शाम ढल चुकी थी और भोपाल के एक छोटे से फ्लैट की बालकनी में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। उस बालकनी के एक कोने में खड़ी अवनी की नजरें सड़क पर दौड़ती गाड़ियों पर टिकी थीं, लेकिन उसका मन कहीं बहुत दूर भटका हुआ था। उसकी आंखों से बहते आंसू लगातार उसके गालों को भिगो रहे थे। उसकी सांसों में एक अजीब सी भारीपन थी और हाथों की उंगलियां अनजाने में ही अपनी हथेलियों को भींच रही थीं। कुछ ही देर पहले जो कुछ हुआ था, वह उसके कानों में बार-बार गूंज रहा था।

दरवाजे की घंटी बजी और कुछ पलों बाद घर के अंदर कदम रखते हुए शशांक ने अपनी चाबियां मेज पर रखीं। दिनभर के काम और आज शाम की अप्रिय घटना की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी, मगर जैसे ही उसने कमरे में अवनी को सिसकते हुए देखा, उसके चेहरे के भाव तुरंत बदल गए। वह सीधे बालकनी की तरफ बढ़ा और अवनी के कंधे पर हौले से हाथ रखा।

“अवनी… क्या बात है? तुम इतनी परेशान क्यों हो? खुद को संभालो, इस हालत में तुम्हारा यूं रोना सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है,” शशांक ने बेहद नर्म लहजे में कहा।

अवनी ने पलटकर शशांक को देखा। उसकी आंखें लाल थीं और चेहरे पर बेबसी का गहरा साया था। उसने शशांक के सीने पर सिर टिका दिया और फूट-फूटकर रो पड़ी। “शशांक, मैं पापा का यह रूप कभी नहीं देख सकती थी। उन्होंने आज बाज़ार में तुम्हारे साथ जिस तरह बात की, जिस तरह भरे समाज में तुम्हारी बेइज्ज़ती की… अपनी ही बेटी के पति को ऐसे ज़लील किया, मुझसे यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रहा। मेरी रूह कांप गई यह सब देखकर। तुम क्यों चुपचाप सुनते रहे? तुमने कुछ कहा क्यों नहीं?”

शशांक ने एक गहरी सांस ली और उसके आंसुओं को पोंछते हुए हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की। “बस इतनी सी बात पर मेरी समझदार पत्नी इतनी टूट गई? पगली, वो पापा हैं हमारे। अगर उन्होंने दो कड़वे बोल कह भी दिए, तो इसमें इतना बिलखने की क्या ज़रूरत है?”

अवनी ने गुस्से और दर्द के मिले-जुले भाव से अपना चेहरा पीछे किया। “पापा हैं तो क्या हुआ शशांक? वही पापा, जो कभी मेरे लिए दुनिया के सबसे बड़े आदर्श हुआ करते थे, जिनकी उंगली पकड़कर मैंने चलना सीखा था, आज वो मेरी नज़रों से गिर गए हैं। मुझे यकीन नहीं होता कि कोई पिता अपनी बेटी के जीवनसाथी के लिए इतने ज़हरीले शब्द इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने तुम्हें वो सब कहा जो कोई दुश्मन भी न कहे!”

शशांक ने अवनी के दोनों हाथ अपने हाथों में थामे और उसे कमरे के सोफे पर लाकर बैठाया। उसने एक गिलास पानी अवनी की तरफ बढ़ाया, जिसे उसने बिना पिए मेज पर रख दिया। शशांक ने उसके माथे को चूमा और बेहद संजीदगी से बोला, “अवनी, तुम कह रही हो कि पापा तुम्हारी नज़रों से गिर गए? लेकिन क्या तुमने एक पल के लिए भी यह सोचा कि उस दिन पापा की नज़रों में क्या बीती होगी, जिस दिन उनकी सबसे लाडली बेटी, जो उनका गुरूर थी, उनका मान थी, रातों-रात उनका घर छोड़कर मेरे साथ चली आई थी?”

अवनी चौंककर शशांक का चेहरा देखने लगी।

शशांक अपनी बात जारी रखते हुए बोला, “तुम पापा का गुरूर थीं अवनी। बचपन से उन्होंने तुम्हें अपनी पलकों पर बिठाकर पाला। समाज में जब भी किसी बेटी की परवरिश की बात होती थी, तो हरकिशन जी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। वो हर महफ़िल में कहते थे कि मेरी बेटी कभी ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे मेरा सिर झुके। और हमने क्या किया? हमने अपने प्यार को पाने की ज़िद में एक झटके में उनके उस जीवनभर के मान-सम्मान को तार-तार कर दिया। हमने भागकर शादी की थी अवनी। यह सच कभी नहीं बदलेगा। आज अगर वो मुझ पर या हम दोनों पर गुस्सा निकाल रहे हैं, तो उनका यह गुस्सा बेबुनियाद नहीं है, बिल्कुल जायज़ है।”

“पर शशांक,” अवनी रुंधे गले से बोली, “हमने सिर्फ प्यार ही तो किया था। हमने किसी की जान तो नहीं ली, कोई पाप तो नहीं किया था। जब मैंने उनसे तुम्हारे बारे में बात की थी, तो उन्होंने तुम्हारी जाति और हमारे खानदान के फर्क को आगे रखकर साफ़ मना कर दिया था। वो हमारी एक बात सुनने को राज़ी नहीं थे। हमारे पास अपनी ज़िंदगी बचाने और साथ रहने के लिए घर छोड़ने के अलावा और क्या रास्ता बचा था? क्या अपनी खुशी चुनना इतना बड़ा जुर्म है कि वो आज तक मुझे अपनी औलाद मानने से इनकार कर रहे हैं?”

शशांक ने बहुत धीरज के साथ कहा, “अवनी, तुम्हारी बात अपनी जगह बिल्कुल सही हो सकती है। हमारे लिए वह प्यार था, हमारे सपने थे, हमारा भविष्य था। लेकिन कभी एक पल के लिए खुद को हरकिशन जी की जगह रखकर देखो। आज जब तुम्हारे पेट में हमारा अंश पल रहा है, जब हमारे भीतर माता-पिता बनने का अहसास जाग रहा है, तब मुझे समझ आ रहा है कि औलाद क्या होती है। सोचो, कल को अगर हमारी बेटी बड़ी हो, हम उसे नाज़ों से पालें, अपनी हर खुशी उस पर कुर्बान कर दें, और एक दिन वह बिना हमें बताए, बिना हमारी इज़्ज़त की परवाह किए किसी के साथ चली जाए… तो मुझ पर या तुम पर क्या गुज़रेगी? क्या हम उस दर्द को बर्दाश्त कर पाएंगे?”

अवनी की आंखें शून्य में ताकने लगीं। शशांक के इन शब्दों ने उसके दिल के किसी बहुत पुराने घाव को कुरेद दिया था।

शशांक ने आगे कहा, “अवनी, सच तो यह है कि उस दिन शायद मैं भी वही करता जो आज तुम्हारे पापा कर रहे हैं। शायद हर वो बाप यही करता है जिसकी बेटी बिना उसकी रज़ा के घर की दहलीज़ लांघ जाती है। हमें पापा की ज़बान से निकले उन कड़वे शब्दों को नहीं देखना चाहिए, हमें उस ज़हर के पीछे छिपे उनके उस अथाह दर्द को महसूस करना चाहिए जो पिछले दो सालों से उनके सीने में सुलग रहा है। ज़रा सोचो, हमारे जाने के बाद रिश्तेदारों ने उन पर क्या-क्या ताने कसे होंगे? मोहल्ले के लोगों ने उनके चरित्र, उनके संस्कारों और उनकी परवरिश पर कैसे-कैसे सवाल उठाए होंगे? उन्होंने कितने अपमान के घूंट पिए होंगे, कितनी रातें बिना सोए काटी होंगी? हमने एक गलती की थी अवनी—घर से भागने की। वह गलती हो चुकी, अब हमें दूसरी गलती यह नहीं करनी कि हम अपने ही पिता से नफरत करने लगें। हमें उनके इस दर्द को समझना होगा और उसे अपने प्यार व सब्र से कम करना होगा।”

“लेकिन यह सब मुमकिन कैसे होगा शशांक?” अवनी की आंखों से फिर आंसू बह निकले। “तुमने खुद देखा ना, आज जब तुम उनसे मिलने उनके पास गए, तो उन्होंने तुम्हें धकिया दिया। वो हमारी तरफ देखना भी नहीं चाहते, हमारी कोई बात सुनना नहीं चाहते। मां भी डर के मारे फोन पर बात नहीं करतीं। हम उनके इस पत्थर जैसे दिल को कैसे पिघलाएंगे?”

शशांक ने अवनी को अपने सीने से लगा लिया। “पत्थर दिल नहीं है अवनी, वह एक घायल पिता का दिल है जो अपने टूटे हुए अभिमान की रक्षा के लिए गुस्से की ढाल बनाए बैठा है। हमें बार-बार कोशिश करनी होगी। चाहे वो हमें सौ बार दुत्कारें, चाहे वो मुझ पर हाथ उठा दें या हमें भरी सभा में बेइज़्ज़त कर दें, हमें पीछे नहीं हटना है। जब तक वह अपनी सारी भड़ास, सारा आक्रोश हमारे ऊपर नहीं निकाल लेंगे, तब तक उनका मन हल्का नहीं होगा। जिस दिन उनका यह गुबार पूरी तरह बाहर आ जाएगा, उस दिन उनके भीतर का वही पुराना प्यारा पिता फिर से बाहर आ जाएगा। हमें बस धैर्य रखना है।”

उस रात के बाद से हालात बदले नहीं, लेकिन अवनी और शशांक का नज़रिया पूरी तरह बदल गया था। अवनी अब अपने पिता की बातों पर तिलमिलाती नहीं थी, बल्कि उनकी आंखों के उस सूनेपन को समझने लगी थी।

कुछ महीने बीत गए। अवनी का गर्भावस्था का आठवां महीना चल रहा था। शशांक हर हफ्ते किसी न किसी बहाने से हरकिशन जी के घर के आसपास चक्कर लगाता। कभी वह चुपचाप घर के बाहर फल या दवाइयां रख आता, तो कभी अवनी की मां कौशल्या जी को दूर से ही देखकर उनका हालचाल जान लेता। कई बार हरकिशन जी ने उसे देखा और दरवाज़ा मुंह पर बंद कर लिया, कभी रास्ते में मिलने पर उसे खरी-खोटी सुनाई, लेकिन शशांक ने कभी पलटकर एक शब्द नहीं कहा। वह हमेशा हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर चुपचाप उनकी हर बात सुन लेता और अंत में सिर्फ इतना कहता, “पापा जी, अपना ख्याल रखिएगा।”

एक शाम अचानक मौसम बहुत खराब हो गया। मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और तेज आंधी चलने लगी। शहर की कई सड़कों पर पानी भर गया था। उसी रात अचानक अवनी की तबीयत बिगड़ने लगी। उसके पेट में असहनीय दर्द उठने लगा। शशांक घबरा गया। उसने तुरंत एम्बुलेंस को फोन लगाया, लेकिन तेज बारिश और रास्तों में जलभराव के कारण एम्बुलेंस को आने में बहुत देर लगने वाली थी। शशांक ने अपनी पुरानी गाड़ी निकाली और अवनी को संभालते हुए पास के एक निजी अस्पताल की ओर रवाना हुआ।

अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने अवनी की जांच की और बताया कि स्थिति थोड़ी गंभीर है, तुरंत एक छोटे ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ सकती है और कुछ खास दवाओं व खून की तुरंत आवश्यकता है। शशांक अकेला था। एक तरफ अवनी दर्द से कराह रही थी और दूसरी तरफ अस्पताल की औपचारिकताएं थीं। शशांक का दिल घबराहट से बैठने लगा। ऐसी नाज़ुक घड़ी में इंसान को सिर्फ अपने बुजुर्गों, अपने परिवार का ही सहारा सूझता है।

शशांक ने कांपते हाथों से फोन निकाला। उसने एक पल की भी झिझक के बिना हरकिशन जी का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही, बजती रही। तीसरी बार में फोन उठा। उस पार से हरकिशन जी की भारी और सख्त आवाज़ आई, “कितनी बार कहा है कि इस नंबर पर दोबारा फोन मत करना! क्या चाहते हो तुम?”

शशांक फूट पड़ा। उसकी आवाज़ में सिर्फ एक असहाय दामाद नहीं, बल्कि एक डरा हुआ पिता बोल रहा था। “पापा जी… मुझे जितनी सज़ा देनी हो दे लीजिए, लेकिन इस वक्त अवनी को आपकी ज़रूरत है। हम सिटी केयर अस्पताल में हैं। अवनी की हालत बहुत नाजुक है… डॉक्टर कह रहे हैं कि कुछ भी हो सकता है… पापा जी, मैं अकेला पड़ गया हूँ, मेरी अवनी को बचा लीजिए…”

इतना कहकर शशांक रोने लगा। फोन दूसरी तरफ से कट गया। शशांक फर्श पर बैठकर अपना सिर पकड़कर रोने लगा। उसे लगा कि शायद आज भी पिता का गुस्सा उनके बेटी के प्यार पर भारी पड़ गया।

लेकिन बीस मिनट भी नहीं बीते थे कि अस्पताल के गलियारे में तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। शशांक ने सिर उठाकर देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। सामने हरकिशन जी खड़े थे। उनके कपड़े बारिश में आधे भीगे हुए थे, उनके चेहरे पर पसीना और बेतहाशा खौफ साफ झलक रहा था। उनके पीछे कौशल्या जी भी रोती हुई चली आ रही थीं।

शशांक लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। हरकिशन जी सीधे उसके सामने आए। उनके होंठ कांप रहे थे। “कहाँ है मेरी बच्ची? कैसी है वो?”

शशांक ने आईसीयू के दरवाज़े की तरफ इशारा किया। हरकिशन जी ने कांच की खिड़की से अंदर झांका, जहां अवनी दर्द में आंखें बंद किए लेटी थी। उस मंज़र को देखकर उस बूढ़े पिता का सारा अहंकार, सारा गुस्सा और दो साल से जमा हुआ सारा मैल एक पल में बह गया। उनके घुटने कमज़ोर पड़ गए और वह वहीं दीवार के सहारे टिक गए।

“डॉक्टर क्या कह रहे हैं?” हरकिशन जी ने भर्राई आवाज़ में पूछा।

शशांक ने रुंधे गले से बताया, “पापा जी, बी-पॉजिटिव खून की ज़रूरत है, ब्लड बैंक में अभी खत्म हो गया है और बाहर बारिश की वजह से आने में वक्त लग रहा है।”

हरकिशन जी ने तुरंत अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ाई। “मैं दूंगा! मेरी बेटी है वो, मेरा खून है उसमें। नर्स… कहाँ है डॉक्टर? मेरा खून लो!”

अस्पताल का स्टाफ तुरंत हरकत में आया। हरकिशन जी ने बिना एक पल गंवाए अपनी बेटी के लिए रक्तदान किया। खून की व्यवस्था होते ही डॉक्टरों ने अपनी प्रक्रिया शुरू की। बाहर गलियारे में सन्नाटा पसरा हुआ था। शशांक एक कोने में हाथ जोड़े भगवान से प्रार्थना कर रहा था। तभी उसने महसूस किया कि कोई उसके कंधे पर हाथ रख रहा है।

शशांक ने मुड़कर देखा। सामने हरकिशन जी खड़े थे। उनकी आंखों में आंसू थे। शशांक ने तुरंत झुककर उनके पैर छूने चाहे, लेकिन हरकिशन जी ने उसे रोक लिया। उन्होंने शशांक को उठाया और सीधे अपने सीने से लगा लिया।

“मुझे माफ़ कर दो बेटा…” हरकिशन जी फफक पड़े। “मैं अंधा हो गया था अपने झूठे मान-सम्मान के पीछे। मैं भूल गया था कि दुनिया की कोई भी इज़्ज़त मेरी बच्ची की मुस्कान से बड़ी नहीं हो सकती। तुमने पिछले दो सालों में जितना अपमान सहा, जितना सब्र दिखाया, उतना तो शायद मैं भी नहीं दिखा पाता। तुमने साबित कर दिया कि तुम मेरी बेटी के लिए मुझसे भी बेहतर रक्षक हो। मैं एक पिता होकर भी हार गया था, और तुम एक पति होकर जीत गए।”

शशांक ने उनके आंसुओं को पोंछा। “नहीं पापा जी, आप कभी नहीं हारे। आपका गुस्सा हमारा हक़ था। अगर आप हमें डांटते नहीं, हम पर गुस्सा नहीं होते, तो हमें अपनी गलती का अहसास कभी नहीं होता। हमने आपका दिल दुखाया था, और उस दर्द को सहने की सज़ा हमें मिलनी ही चाहिए थी।”

कौशल्या जी ने भी आगे बढ़कर शशांक के सिर पर हाथ फेरा।

करीब दो घंटे बाद आईसीयू का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान थी। “बधाई हो, जच्चा और बच्चा दोनों बिल्कुल सुरक्षित हैं। एक नन्हीं परी आई है आपके घर।”

यह सुनते ही हरकिशन जी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। जब वे सब अंदर कमरे में गए, तो अवनी ने धीरे से अपनी आंखें खोलीं। उसके सामने शशांक खड़ा था और उसके ठीक बगल में उसके पापा खड़े थे, जिनकी गोद में एक नन्हीं सी जान कपड़े में लिपटी हुई सो रही थी।

अवनी ने अपने पापा को देखा तो उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। “पापा…”

हरकिशन जी आगे बढ़े और नन्हीं बच्ची को एक हाथ से संभालते हुए दूसरा हाथ अवनी के सिर पर रख दिया। “रो मत मेरी गुड़िया। आज तूने मुझे नाना बना दिया है। और तेरे इस पति ने मुझे सिखा दिया कि रिश्तों में गुस्सा नहीं, माफ करने का हौसला सबसे बड़ा होता है। मुझे अपनी बेटी भी मिल गई और एक बेटे जैसा दामाद भी।”

अवनी ने शशांक की तरफ देखा। शशांक की आंखों में वही शांत, धीर और गहरा प्यार था, जिसने आज उनके पूरे परिवार को बिखरने से बचा लिया था और उनके आंसुओं की तपिश को आशीर्वाद की शीतल छांव में बदल दिया था।

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क्या आपको लगता है कि अगर शशांक ने हरकिशन जी के गुस्से का जवाब गुस्से से दिया होता, तो यह परिवार कभी एक हो पाता? क्या हमारे माता-पिता का गुस्सा उनकी नफ़रत होती है या उनके आहत स्वाभिमान का दर्द? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें ज़रूर बताएं।

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