ससुराल वालों ने जब महेंद्र जी के तेवर देखे, तो उनके होश उड़ गए। जो ससुर कल तक हाथ जोड़कर समझौते की भीख मांगता था, आज वह कानून और आत्मसम्मान की ढाल बनकर खड़ा था। जब ससुराल वालों ने समाज और बदनामी का डर दिखाने की कोशिश की, तो महेंद्र जी ने दो टूक जवाब दिया—”इज्जत इंसान की होती है, खोखले रिश्तों की नहीं। जो घर मेरी बेटी की सुरक्षा और सम्मान नहीं कर सकता, उस घर से हमारा कोई नाता नहीं।”
सोफे के कोने पर बैठीं सुशीला जी की लाल, सूजी हुई आँखें यह गवाही दे रही थीं कि बीती रात उनके लिए किसी भयावह मंजर से कम नहीं बीती थी। हाथ में पकड़ी हुई पानी की खाली ग्लास बार-बार कांप रही थी। सामने दीवार पर सजी बड़ी सी तस्वीर में उनकी इकलौती बेटी स्नेहा अपनी शादी के लाल जोड़े में खिलखिलाती हुई नजर आ रही थी। वही खिलखिलाहट, जो पिछले एक साल से धीरे-धीरे किसी गहरे कुएं में गुम हो चुकी थी।
कमरे के दूसरे कोने में खड़े महेंद्र जी लगातार खिड़की से बाहर शून्य में ताक रहे थे। उनके चेहरे की लकीरें सख्त थीं, लेकिन भीतर का खोखलापन उनके कांपते कंधों से साफ झलक रहा था। हाई ब्लड प्रेशर की दवा टेबल पर जस की तस पड़ी थी।
“महेंद्र जी, हाथ जोड़ती हूँ, यह बिस्कुट खाकर दवा ले लीजिए। कल शाम से आपने एक घूंट पानी तक नहीं पिया है। अगर आपको कुछ हो गया तो मैं स्नेहा के लिए किससे सहारा मांगूंगी?” सुशीला जी का गला रुंध गया। उनकी आवाज में एक बेबस मां की पूरी लाचारी सिमट आई थी।
महेंद्र जी मुड़े, उनकी आँखों में बेबसी और सामाजिक डर का एक अजीब सा द्वंद्व था। वे कुछ कहने ही वाले थे कि मुख्य दरवाजे की घंटी बजी। दोनों पति-पत्नी चौंक पड़े। घड़ी में सुबह के ठीक नौ बज रहे थे।
“लगता है मालती आ गई,” सुशीला जी ने अपने चेहरे से आंसुओं के सूखे निशान पल्लू से पोंछे और खुद को संभालते हुए दरवाजा खोलने बढ़ीं।
दरवाजा खुलते ही मालती अपने हाथ में डस्टर और झाड़ू संभाले अंदर दाखिल हुई। मालती पिछले सात सालों से इस घर में काम कर रही थी। वह सिर्फ एक कामवाली नहीं थी, बल्कि इस घर के हर सुख-दुख की मूक गवाह रही थी।
“अरे सुशीला भाभी, इतनी देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में? मैं तो डर ही गई थी कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई,” मालती ने अपने चिरपरिचित अंदाज में चप्पलें किनारे उतारते हुए कहा। लेकिन जब उसकी नजर सुशीला जी के चेहरे पर पड़ी, तो उसके कदम वहीं ठिठक गए।
“कुछ नहीं मालती, बस सिर भारी था तो लेटी हुई थी,” सुशीला जी ने नजरें चुराते हुए कहा।
मालती ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गई। रसोई में कदम रखते ही उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। सिंक पूरी तरह खाली था, स्लैब पर एक भी बर्तन नहीं था। गैस का चूल्हा ठंडा पड़ा था। अमूमन जब मालती सुबह आती थी, तो चाय के बर्तन, नाश्ते की प्लेटें और साहब की दवाइयों के रैपर हमेशा काउंटर पर मिलते थे। लेकिन आज तो मानो चूल्हा जला ही नहीं था।
“यह क्या माजरा है? न सुबह की चाय बनी, न नाश्ता… भाभी ने साहब को दवा भी नहीं दी क्या?” मालती ने मन ही मन सोचा। उसे समझ आ गया था कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। उसने बिना कोई आवाज किए बाहर आकर तेजी से झाड़ू लगाना शुरू कर दिया।
झाड़ू लगाते-लगाते जब वह मास्टर बेडरूम के दरवाजे के करीब पहुंची, तो अंदर से धीमी लेकिन तीखी फुसफुसाहट उसके कानों में पड़ी। उसके हाथ वहीं रुक गए।
“आप क्यों नहीं समझते महेंद्र जी? उस लड़के की और उसकी मां की नीयत शादी के छह महीने बाद ही बदल गई थी। कल रात स्नेहा फोन पर जिस तरह चीख-चीख कर रो रही थी, क्या आपको वह सुनाई नहीं दिया? उन्होंने हमारी बच्ची पर हाथ उठाया है! सिर्फ इसलिए कि हम उनके नए बिजनेस के लिए पंद्रह लाख रुपये और नहीं दे पा रहे। आप अब भी कह रहे हैं कि यह पति-पत्नी का आपसी मामला है?” सुशीला जी की आवाज में आक्रोश और आंसुओं का सैलाब था।
“तो और क्या करूँ सुशीला? समाज में हमारी भी कोई इज्जत है या नहीं? इंदौर जैसे शहर के इतने बड़े घराने में हमने अपनी हैसियत से बढ़कर दान-दहेज देकर बेटी ब्याही थी। अब अगर साल भर में ही वह ससुराल छोड़कर मायके बैठ गई, तो चार लोग क्या कहेंगे? किस मुंह से हम अपनी बिरादरी में खड़े होंगे? हर घर में थोड़ा-बहुत तालमेल बैठाना पड़ता है। औरत को ही झुकना पड़ता है। अगर स्नेहा थोड़ा सब्र कर ले, सास की दो बातें सुन ले, तो बात बिगड़ने से बच जाएगी। हर छोटी बात पर मायके फोन करके तमाशा खड़ा करना कौन सी समझदारी है?” महेंद्र जी अपनी बात पर अड़े थे, हालांकि उनकी आवाज का खोखलापन उनके डर को छुपा नहीं पा रहा था।
“यह छोटी बात नहीं है महेंद्र जी! यह उसका आत्मसम्मान है, उसका जीवन है। कल को अगर उन्होंने हमारी बच्ची के साथ कुछ अनहोनी कर दी, तो क्या आपका यह समाज उसे वापस लौटा लाएगा?”
दरवाजे के बाहर खड़ी मालती की मुट्ठियां खिंच गईं। उसकी आंखों से चुपचाप आंसू बह निकले। तभी सुशीला जी को बाहर किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। उन्होंने मुड़कर देखा तो मालती दरवाजे पर खड़ी थी।
“मालती… तू यहां क्या कर रही है?” सुशीला जी ने झेंपते हुए पूछा।
मालती ने अपनी आंखें पोंछीं और सीधे सुशीला जी की आंखों में देखा। उस नजर में एक अजीब सी दृढ़ता थी। “भाभी जी, कमरे का झाड़ू बाकी था… पर आप चिंता मत करो, मैं रसोई में जा रही हूँ।”
पंद्रह मिनट बाद मालती हाथ में एक ट्रे लिए वापस आई। ट्रे में दो प्लेट गर्म दलिया और दो कप भाप उड़ाती अदरक वाली चाय रखी थी। उसने ट्रे को सेंटर टेबल पर रखा और दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
“भाभी जी, साहब जी… पहले आप दोनों यह नाश्ता करिए। मैं जानती हूँ कि कल दोपहर से इस घर में अन्न का एक दाना नहीं गया है। जब तक पेट में ताकत नहीं होगी, तब तक दिमाग सही फैसला नहीं ले सकता। आप लोग पहले यह खाइए, फिर मुझे आप दोनों से कुछ जरूरी बात करनी है।” मालती की आवाज में आज नौकरानी वाला संकोच नहीं, बल्कि परिवार के किसी बड़े सदस्य जैसी अधिकार भरी गूंज थी।
सुशीला जी और महेंद्र जी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। मालती के इस रूप ने दोनों को निशब्द कर दिया था। भारी मन से दोनों ने दो-दो चम्मच दलिया खाया और चाय की चुस्कियां लीं। महेंद्र जी ने अपनी दवा खाई।
जब प्लेटें खाली हो गईं, तो मालती सामने बिछे पायदान पर बैठ गई। उसने गहरी सांस ली और अपनी दोनों हथेलियां सामने फैला दीं। उसकी दाईं कलाई पर एक पुराना, गहरा जले का निशान था।
“साहब जी, आप समाज की बात कर रहे हैं न? चार लोग क्या कहेंगे, इसी बात से डर रहे हैं न आप?” मालती की आवाज भारी हो गई। “आज से ठीक दस साल पहले, मेरी भी एक बेटी थी… गुड्डी। बहुत प्यारी, बहुत हंसमुख, बिल्कुल अपनी स्नेहा बिटिया जैसी। जब उसकी शादी हुई, तो ससुराल वालों ने पहले महीने से ही बाइक और पैसों की मांग शुरू कर दी। गुड्डी हर हफ्ते रोती हुई मेरे पास आती थी, कहती थी—मां, वे मुझे मारते हैं, मुझे वहां मत भेजो। लेकिन मैं… मैंने भी आपकी ही तरह सोचा था साहब। मैंने कहा कि बेटी, डोली उठ गई है, अब वहीं से तेरी अर्थी उठनी चाहिए। ससुराल ही औरत का असली घर होता है, थोड़ा बर्दाश्त कर ले, सब ठीक हो जाएगा।”
मालती का गला रुंध गया, उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह गूंज रही थी।
“फिर क्या हुआ मालती?” सुशीला जी ने कांपते होठों से पूछा।
“फिर वही हुआ भाभी, जो ऐसे घरों में होता है जहां बेटियों की चीखें समाज के डर से दबा दी जाती हैं। एक रात गुड्डी के ससुराल से फोन आया कि स्टोव भड़कने से वह जल गई। जब मैं अस्पताल पहुंची, तो मेरी फूल जैसी बच्ची एक कोयले का टुकड़ा बन चुकी थी। वह जिंदगी और मौत से लड़ रही थी। उसने दम तोड़ने से पहले सिर्फ एक बात मुझसे कही थी—’मां, काश तूने मुझे अपने घर की चौखट पर शरण दे दी होती, तो आज मैं जिंदा होती।’ उस दिन गुड्डी तो मर गई साहब, लेकिन उसके साथ ही मेरी आत्मा भी जलकर राख हो गई। यह हाथ का निशान देख रहे हैं? उसे आग से बचाते हुए नहीं, बल्कि उसकी चिता को मुखाग्नि देते वक्त मेरे हाथ पर यह अंगारा गिरा था। मैंने समाज की इज्जत तो बचा ली साहब, लेकिन अपनी कोख उजाड़ बैठी।”
मालती के यह शब्द महेंद्र जी के सीने में खंजर की तरह उतरे। वे सोफे से उठकर खड़े हो गए। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थीं। उनके कानों में कल रात स्नेहा की कही आखिरी बात गूंजने लगी—”पापा, मुझे यहां से ले जाइए, नहीं तो ये लोग मुझे मार डालेंगे।”
“साहब जी,” मालती ने आगे बढ़कर महेंद्र जी के पैर छू लिए, “स्नेहा बिटिया पढ़ी-लिखी है, समझदार है। उसकी किस्मत खराब नहीं है, उसके ससुराल वालों की नीयत खराब है। बिरादरी और समाज सिर्फ तमाशा देखने आता है साहब। जब बेटी की अर्थी उठती है, तो यही चार लोग कंधा देकर आगे बढ़ जाते हैं और पीछे से कहते हैं कि मां-बाप ने ही कुछ कमी छोड़ दी होगी। जो बेटी अपने पिता के घर में सिर उठाकर जी सकती है, उसे किसी लालची भेड़ियों के आगे घुटने टेकने के लिए क्यों मजबूर कर रहे हैं आप? अपने जीते जी अपनी बेटी को उस नरक में मत धकेलिए।”
मालती की बात ने महेंद्र जी के भीतर वर्षों से जमी पितृसत्तात्मक और सामाजिक बेड़ियों को एक झटके में तोड़ दिया। उनकी आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वे फूट-फूट कर रो पड़े। सुशीला जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
महेंद्र जी ने अपने आंसू पोंछे। उनकी आंखों में अब तक जो लाचारी और डर था, उसकी जगह अब एक पिता के स्वाभिमान और सुरक्षा के संकल्प ने ले ली थी।
“सुशीला! गाड़ी की चाबी निकालो,” महेंद्र जी की आवाज में एक गजब की दृढ़ता थी। “हम अभी इसी वक्त इंदौर निकल रहे हैं। मेरी बेटी उस घर में एक पल भी और नहीं रहेगी।”
“और समाज क्या कहेगा महेंद्र जी?” सुशीला जी ने भरी आंखों से पूछा, मानो वे उनके मुंह से वही सुनना चाहती थीं जो उन्होंने कहा।
“भाड़ में गया ऐसा समाज जो मेरी बेटी की बलि मांगता हो!” महेंद्र जी ने गरजते हुए कहा। “मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे मैंने किसी के हवाले कर दिया और अपना पल्ला झाड़ लिया। वह मेरी औलाद है, मेरा अंश है। उसने एमबीए किया है, वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है। जब तक उसका यह बाप जिंदा है, उसे किसी के आगे हाथ फैलाने या जुल्म सहने की जरूरत नहीं है।”
महेंद्र जी ने तुरंत फोन निकाला और अपने वकील को कॉल मिलाया। उन्होंने साफ शब्दों में घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराने और कानूनी नोटिस तैयार करने का निर्देश दिया। इसके बाद उन्होंने स्नेहा को फोन लगाया।
जैसे ही उधर से स्नेहा की हिचकियों से भरी आवाज आई, “पापा…”, महेंद्र जी का दिल भर आया, लेकिन उन्होंने अपनी आवाज को बेहद मजबूत बनाए रखा।
“स्नेहा बेटा, रोना बंद करो। अपना बैग पैक करो और अपने सारे जरूरी दस्तावेज अपने पास रख लो। तुम्हारा पिता तुम्हें लेने आ रहा है। अब तुम्हें वहां एक पल भी डरने की जरूरत नहीं है। तुम्हारा यह घर, तुम्हारा कमरा और तुम्हारे मां-बाप हमेशा तुम्हारे साथ खड़े हैं।”
फोन कटने के बाद कमरे का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। घुटन की जगह अब उम्मीद की ताजी हवा ने ले ली थी। सुशीला जी ने मालती का हाथ थाम लिया, उनकी आंखों में मालती के लिए असीम कृतज्ञता थी। मालती ने एक नौकरानी का फर्ज नहीं, बल्कि उस घर की रक्षक बनकर एक बेटी की जिंदगी बचा ली थी।
शाम के पांच बजे तक महेंद्र जी और सुशीला जी इंदौर पहुंचे। ससुराल वालों ने जब महेंद्र जी के तेवर देखे, तो उनके होश उड़ गए। जो ससुर कल तक हाथ जोड़कर समझौते की भीख मांगता था, आज वह कानून और आत्मसम्मान की ढाल बनकर खड़ा था। जब ससुराल वालों ने समाज और बदनामी का डर दिखाने की कोशिश की, तो महेंद्र जी ने दो टूक जवाब दिया—”इज्जत इंसान की होती है, खोखले रिश्तों की नहीं। जो घर मेरी बेटी की सुरक्षा और सम्मान नहीं कर सकता, उस घर से हमारा कोई नाता नहीं।”
वे स्नेहा को लेकर उसी रात भोपाल लौट आए।
अगले कुछ महीने आसान नहीं थे। समाज ने उंगलियां भी उठाईं, कुछ रिश्तेदारों ने ताने भी कसे, लेकिन महेंद्र जी चट्टान की तरह अपनी बेटी के आगे खड़े रहे। उन्होंने समाज के तानों को अपनी चौखट के भीतर दाखिल नहीं होने दिया। स्नेहा ने धीरे-धीरे खुद को संभाला। उसने शहर की एक प्रतिष्ठित फाइनेंस कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन किया और अपनी योग्यता के दम पर एक बेहतरीन पद हासिल कर लिया।
एक साल बाद, उसी घर के ड्राइंग रूम में फिर से वही सुबह की धूप खिली थी। लेकिन आज माहौल बिल्कुल अलग था। स्नेहा अपनी पहली बड़ी पदोन्नति की खुशी में सबको मिठाई खिला रही थी। उसने सबसे पहला डिब्बा मालती के हाथों में थमाया।
“मालती मौसी, अगर उस दिन आपने पापा की आंखें न खोली होतीं, तो आज मैं यहाँ न होती,” स्नेहा ने मालती को गले लगाते हुए कहा।
मालती ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा, “बिटिया, उड़ने के लिए पंख तो भगवान ने दिए थे, बस तुम्हारे बाबूजी ने उस दिन पिंजरे का दरवाजा खोल दिया।”
महेंद्र जी दूर खड़े अपनी आत्मनिर्भर बेटी को गर्व से देख रहे थे। आज उन्हें समझ आ गया था कि बेटियों का असली मायका सिर्फ एक मकान नहीं होता, बल्कि पिता का वह मजबूत कंधा होता है जो वक्त आने पर पूरी दुनिया से टकराने का हौसला रखता है।
प्रिय पाठकों, आज भी हमारे समाज में हजारों ‘स्नेहा’ सिर्फ इसलिए खामोशी से जुल्म सहती हैं क्योंकि उनके मां-बाप को ‘चार लोग क्या कहेंगे’ का डर होता है। क्या बेटियों की डोली विदा करने के बाद माता-पिता का फर्ज वाकई खत्म हो जाता है? क्या समाज की झूठी प्रतिष्ठा किसी बेटी की जिंदगी और उसके आत्मसम्मान से ज्यादा कीमती है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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लेखिका : गरिमा चौधरी