ये कैसा बंधन – उमा वर्मा

आज सुबह सुबह खबर मिली कि तुम नहीं रहे ।यह तो होना ही था।कल  ही तो बेटे के साथ तुम्हे  देखने गयी थी ।बिस्तर पर पड़े असहाय सा मुझे देखते रहे तुम ।पलक भी नहीं झपका रहे थे ।न जाने क्या सोच रहे थे तुम ।पूरे शरीर पर मशीन लगी हुई थी ।डाक्टर ने तो साफ कह दिया कि अब कोई उपाय नहीं है इनको घर ले जायें ।कैन्सर का लास्ट स्टेज ।

तुम्हारी तथा कथित  पत्नी ने दरवाजा खोला ।”आइये “कहा ।मै चुप चाप बगल वाले सोफा पर बैठ गयी ।बगल मे मेरा बेटा भी जो शायद तुमहारा बेटा भी था।मेरी आखों से अतीत गुजरने लगा था ।शादी होकर दुलहन बन कर आयी थी तुम्हारे घर ।माता पिता ने तो खुश होकर ही स्वीकार किया था मुझे ।उनहोंने भरपूर प्यार भी लुटाया ।मैं एक साधारण घर की साधारण नाक नक्शे वाली थी और रंग भी साँवला ।

तुम्हें शायद पसंद नहीं थी मै।पहली रात ही तुमने मुझे साफ कह दिया कि की शादी तो माँ पिता जी के मन रखने के लिए कर लिया लेकिन मेरी पसंद कोई और है।खैर तुम नौकरी पर से पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर आये थे ।घर मे रहना ही था।चाहे मै पसंद नहीं थी तुम को लेकिन नव ब्याहता और जवान तो थी ही।तुम अपने मन को काबू में नहीं रख पाये।और उस एक दिन के सुख से मै अभिभूत हो गई थी ।छुट्टी बिताकर तुम दिल्ली चले गए वापस ।बस मै एक दिन की दुल्हन थी तब।

माता पिता को मालूम था कि बेटा कहीं और दिल लगा बैठा है किसी विजातीय से।उन्हे लगा था कि शादी के बाद बेटा सुधर जायेगा ।एक महीने के बाद मुझे अपने मे परिवर्तन महसूस हुआ ।तबियत खराब रहने लगी ।उल्टियाँ होने लगी ।सासूमा डाक्टर के पास लेकर गयी ।

डाक्टर साहब ने खुश खबरी सुनाई।”बधाई हो,आप दादी बनने वाली हैं “।पर मेरी खुशी का क्या? तुम ने तो पहले ही कह दिया था कि तुम किसी और के हो।मै कोई उम्मीद न रखूं तुम से।मेरी आखों के आगे अँधेरा छा गया ।कैसे होगा ।कौन करेगा देख भाल।जब अपनी जिंदगी का ही ठिकाना नहीं है उपर से यह बिन पिता का बच्चा ।तुम्हारे माता पिता मेरी खूब देख भाल करते ।दादी दादा बनने की खुशी महसूस करते ।

लेकिन मै तो अंदर से टूट रही थी ।तुम एक निश्चित रकम भेज देते थे।जिससे हम तीनों का खर्चा चल जाता था ।लेकिन एक पति और एक पिता का अपनापन और लगाव प्यार हमे कभी नहीं मिला ।ठीक समय पर मै एक बच्चे की माँ बन गई ।तुम पर ही गया था वह।पूरे वही नाक नक्शे ।गोरा चिट्टा रंग ।उसके रूप में मैंने तुम्हें पा लिया था ।मेरा बेटा राजू बहुत तेज और चंचल था।

बिलकुल तुम्हारी तरह ।वह धीरे-धीरे बढ़ता गया ।उसकी पढ़ाई पूरी होती गयी ।वह दसवीं मे ही था तभी तुम्हारे माता पिता दुनिया से चले गए ।माँ को हल्का सा ज्वर था लेकिन डाक्टर ने कहा कि बुखार माथे पर चढ़ गया है ।तीन दिन के अंदर ही वह नहीं रही ।और एक महीने के बाद पिता भी चले गए ।

कुछ बेटे का घर छोड़ने का गम , कुछ पत्नि का चले जाना और एक जवान बहू की चिन्ता, पोते की चिंता आखिर कितना बर्दाश्त करते ।जाते जाते मेरा हाथ पकड़कर इतना ही कहा “बेटा, सबकुछ जानते हुए भी मैंने तुमहारा जीवन बर्बाद कर दिया था ।सोचा था शादी हो जायेगी तो वह सुधर जायेगा “पर मेरी आशा पर पानी फेर दिया उसने ।तुम बहू होकर भी बेटी सा देख भाल करती रही ।बदले मे तुम को क्या मिला सिर्फ दुख के।मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा बेटा ।

और उस रात पिता जी ने भी आँखे मूंद ली।मै अब पूरी तरह अनाथ हो गई ।माता पिता के क्रिया कर्म मे आ कर सब निभा गये ।जितना बेटे के लिये जरूरी होता है ।साथ मे वह भी आयी थी।दिखने में काफी सुन्दर थी वह।तभी तो अपने मोहपाश मे बाँध लिया तुम को ।मुझ मे शायद कोई कमी रही होगी ।पर रवि, काश मुझे अपनाकर तो देखते तुम ।

सबकुछ न्योछावर कर देती तुम पर।फिर तुम अपने माता-पिता को जो राशि भेज रहे थे वह अब बंद कर दिया ।काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा हमे।घर तो खैर था ही लेकिन जीवन चलाने के लिए मैंने सिलाई बुनाई शुरू कर दिया ।और मेरा बेटा पढ़ाई के साथ टयूशन पढ़ाने लगा ।हमारे जीवन का पहिया चलने लगा अपनी रफ्तार से ।जिन्दगी कहाँ रूकती है?वह तो चलती रहती है ।

मेरा बेटा तुम्हारे बारे में सवाल करता तो मैंने सबकुछ साफ और सच बता दिया ।छिपाने से कोई फायदा नहीं था।लेकिन मेरे मन का पंछी तो उड़ने को बेताब था तुम्हारे पास ।लेकिन उसकी कोई उम्मीद नहीं थी ।फिर एक दिन किसी से खबर मिली कि तुम बहुत बीमार रहने लगे हो।डाक्टर ने कैन्सर बताया है ।

लास्ट स्टेज ।मुझ  से मिलना चाहते हो।लेकिन तुम ने कभी सोचा कि मै कैसे रह रही हूँ ।क्या खा और पहन रही हूँ ।तुम्हारा बेटा कैसे पढ़ाई कर रहा है ?मैंने तो अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे नाम कर दी थी।तुम रूप रंग  मे खो गये थे ।मेरी सेवा भावना तो देखते ।लेकिन जाने दो।मेरा मन तो अब भी जुड़ा हुआ है तुम से।न जाने कैसा ये बंधन है।चाह कर भी नहीं दूर जा पाई।

बेटे ने कहा भी कि ” माँ जब उन्हे हमारी चिंता नहीं रही कभी तो हम कयों चिंता करें उनकी? “मरने दो उनको।जैसा किया है तो भुगतने दो।मैंने बेटे के मुँह पर हाथ रख दिया ।” ऐसा नहीं कहते “वह आखिर तुम्हारे पिता हैं ।उनहोंने जो किया  उनका धर्म ।

हम जो करेंगे हमारा धर्म ।होगा ।फिर तुम्हारे यहाँ पहुँच गए हम।तुम को देख कर बहुत दुःख हुआ ।कैसा थे , कैसा हो गये? तुम ने हाथ जोड़कर मांफी माँगी हमसे ।”मैं तुमहारा गुनहगार हूँ ।बहुत दुख पहुंचाया है तुम्हे ।हो सके तो माफ कर देना “माफ तो कर दूँ तुम्हे लेकिन मेरे जीवन के पच्चीस साल कैसे लौटाओगे?

मेरे उन आँसू की बूंदों का हिसाब कैसे करोगे? फिर बेटे ने कहा-“छोड़ दो न माँ पुरानी बातें “अब कोई फायदा नहीं है कहने से।”तुम्हारी पत्नी ने चाय लाकर दी ।हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी ।”दीदी,मैंने आपका सबकुछ छीन लिया था ।असली गुनाह गार तो मैं हूँ “इनको माफ कर दीजिये और शांति से जाने दीजिये ।एक घंटे के बाद हम लोग  लौट गये ।

उतनी दूर का सफर था ।तुम्हे देखने की लालसा लिए आई थी।वरना दिल्ली कौन आता ।और आज ही खबर मिली कि तुम नहीं रहे ।हम अपने शहर वापस भी नहीं आ पाये कि फिर आना पड़ा ।तुम्हारी पत्नी ने अनुरोध किया की एक पिता के लिए बेटे का फर्ज निभाने दीजिए दीदी ।और मेरा बेटा तो बिलकुल सीधा सादा है तुरंत तैयार हो गया ।

“जाने दो माँ उनहोंने जो किया  उनको मिल गया ।अब मुझे निभाने दो।शायद मेरे कल के लिए उनका आशीर्वाद हो।” घर मे कोई परिवार नहीं था।कुछ पड़ोसी और मेरा  बेटा  अंतिम तैयारी में लग गये ।एक आशा निराशा मे बदल गयी थी ।दो औरतों के माथे का सिन्दूर धुल गया था ।

रीती रिवाज के नाम पर ।पता नहीं किसका हक था यह।पर मेरे लिए तो न जाने कैसा ये बंधन था?तीन दिन का हवन रखा गया ।कुछ पड़ोसी और हम तीन ही।बेटे ने कहा “छोटी माँ का क्या दोष है?असली दोषी तो पिता ही थे।इनहे अकेले कैसे छोड़ दें?”और हम तीनों एक ही नाव पर सवार जीवन नैया को खेने निकल पड़े।

—उमा वर्मा ।रांची  झारखंड ।

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