भाभी की यह बात सुनकर शालिनी का कलेजा भर आया। जहाँ वह कल तक भाभी पर गुस्सा हो रही थी, वहीं भाभी का यह निश्छल प्रेम देखकर उसकी आँखें फिर छलक पड़ीं। उसने अपने आँसू पोंछते हुए बेहद कोमल स्वर में कहा, “अरे नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं! आप कहीं वापस मत आइए। मेरी तो अचानक ही यहाँ आने की योजना बन गई थी। आप पूरे एक साल बाद अपने मायके गई हैं, अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ आराम से समय बिताइए। मुझे आपकी कोई शिकायत नहीं है।”
सुबह की सुनहरी धूप भोपाल के पुराने मोहल्ले में स्थित माथुर साहब के आँगन में आहिस्ता-आहिस्ता फैल रही थी। घर के शांत वातावरण में फोन की घंटी अचानक बजी, तो रसोई में चाय चढ़ा रहीं सुमित्रा जी ने हाथ पोंछते हुए रिसीवर उठाया। सामने से उनकी इकलौती बेटी शालिनी की चहकती हुई आवाज़ गूँजी।
“प्रणाम माँ! कैसी हैं आप? मैं बस अपना बैग बंद ही कर रही थी। दोपहर की इंटरसिटी एक्सप्रेस से मैं आरव और गुड़िया को लेकर सीधे इंदौर आ रही हूँ। कम से कम दस-बारह दिन तो आपके पास मजे से रहूँगी।”
सुमित्रा जी के चेहरे पर पहले तो मुस्कान आई, मगर कुछ सोचते ही उनके माथे पर हल्की सिलवटें उभर आईं। उन्होंने धीमे स्वर में पूछा, “अरे वाह बेटा, यह तो बहुत अच्छी खबर है। लेकिन कुछ दिन पहले तो मनीष कह रहा था कि बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में तुम लोग शिमला या मनाली घूमने की योजना बना रहे थे? अचानक क्या हो गया?”
फोन के उस पार से शालिनी की एक लंबी, खीझ भरी साँस सुनाई दी। वह तिनकते हुए बोली, “अरे माँ, छोड़िए भी! मेरी तकदीर में आराम से छुट्टियाँ बिताना कहाँ लिखा है। आपके दामाद जी को अपने दफ्तर के प्रोजेक्ट्स से कभी फुरसत मिले तब न! और उस पर तुर्रा यह कि जैसे ही बच्चों के स्कूल बंद हुए, उनकी दोनों छोटी बहनें, रश्मि और पल्लवी, अपने-अपने बच्चों को लेकर ससुराल में आ टपकीं। हर साल का यही रोना है माँ। आते ही हुक्म चलाना, उनकी पसंद का नाश्ता बनाओ, उनके बच्चों के पीछे-पीछे दौड़ो, घर को सराय बना रखा है। इससे पहले कि मैं वहाँ दिन-रात रसोई में खटती रहूँ और मेरा दिमाग खराब हो, मैंने मनीष से दो टूक कह दिया कि मैं बच्चों को लेकर अपने मायके जा रही हूँ। वे लोग रहें अपने भाई के पास, मुझे क्या!”
सुमित्रा जी कुछ पल के लिए अवाक रह गईं। उन्होंने गहरी साँस खींचते हुए कहा, “लेकिन बेटी… बात सुनो…”
“क्या बात सुनूँ माँ? आपको मेरी खुशी अच्छी नहीं लग रही क्या? या फिर आपको अपनी बेटी और नाती-नातिन का घर आना भारी लग रहा है?” शालिनी ने तुनककर सवाल दागा।
“कैसी बातें करती है पगली! मायका तो बेटी का अपना घर होता है। तू आ, मैं तेरा ही इंतज़ार कर रही हूँ,” सुमित्रा जी ने बात को संभालते हुए कहा और फोन काट दिया। लेकिन उनके चेहरे की उदासी छिपी नहीं रह सकी।
दोपहर के करीब दो बजे इंदौर रेलवे स्टेशन से ऑटो रिक्शा सीधे सुमित्रा जी के घर के सामने रुका। शालिनी अपने दोनों बच्चों, सात साल के आरव और पाँच साल की गुड़िया के साथ बड़े उत्साह से घर के भीतर दाखिल हुई। सुमित्रा जी ने आगे बढ़कर बेटी को गले से लगा लिया, बच्चों को दुलारा और उन्हें बैठक में बिठाया।
सफर की थकान से चूर शालिनी सोफे पर पसर गई और बोली, “उफ़ माँ, गर्मी बहुत बढ़ गई है। ज़रा ठंडा पानी तो दिलवाइए।”
कुछ ही देर में सुमित्रा जी खुद काँपते हाथों में पानी की ट्रे लेकर बैठक में आईं। शालिनी ने चौंककर अपनी माँ की तरफ देखा। उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई, लेकिन पूरे घर में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। न कहीं बर्तनों की खनक थी, न ही बच्चों के हँसने की आवाज़।
“अरे माँ! आप क्यों पानी ला रही हैं? स्वाति कहाँ है? भैया तो बैंक चले गए होंगे, पर भाभी कहीं बाज़ार गई हैं क्या?” शालिनी ने पानी का गिलास थामते हुए हैरानी से पूछा।
सुमित्रा जी ने खुद को संभालते हुए बेहद शांत स्वर में उत्तर दिया, “नहीं बेटा, स्वाति यहाँ नहीं है। वह आज सुबह की बस से अपने मायके, ग्वालियर चली गई है।”
यह सुनते ही शालिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके चेहरे पर फैली राहत की जगह अचानक गुस्से और अपमान के भाव ने ले ली। उसने गिलास मेज पर ज़ोर से पटका, “क्या? भाभी मायके चली गईं? माँ, क्या आपने उन्हें बताया नहीं था कि मैं आज दोपहर तक बच्चों के साथ यहाँ पहुँच रही हूँ? यह कैसी बेरुखी है! जब उन्हें पता था कि उनकी ननद इतने दिनों बाद आ रही है, तो उनका फर्ज नहीं बनता था कि वे यहाँ रुकतीं? क्या इस घर में अब मेरी कोई कद्र नहीं बची? जब बेटी आ रही हो, तो बहू अपने मायके भाग जाए, यह तो सीधे-सीधे मेरा अनादर है!”
शालिनी की आवाज़ में नाराज़गी और आँसुओं का मिला-जुला सैलाब था। उसे लग रहा था कि घर में उसका वह रुतबा नहीं रहा जो शादी से पहले हुआ करता था।
सुमित्रा जी ने तनिक भी उत्तेजित हुए बिना कहा, “शांत हो जा शालिनी। इतनी आपाधापी क्यों कर रही है? भाभी नहीं है तो क्या हुआ, तेरी माँ तो तेरे सामने खड़ी है। तुझे जो खाना होगा मैं बना दूँगी। और वैसे भी, स्वाति के जाने का कार्यक्रम तो कई दिनों पहले से तय था। उसने तो अपनी सारी पैकिंग परसों ही पूरी कर ली थी।”
“पर माँ, आप उसे रोक तो सकती थीं ना!” शालिनी बिफर पड़ी, “आप घर की बड़ी हैं। आप कह देतीं कि ननद आ रही है, कुछ दिन बाद चली जाना। अब देखिए, भाभी अपने साथ रोहन को भी ले गईं। अब आरव और गुड़िया किसके साथ खेलेंगे? मैं तो यहाँ इसलिए आई थी कि थोड़ा मायके का सुख लूँगी, बातें करूँगी, आराम से रहूँगी। पर यहाँ आकर भी अगर मुझे ही रसोई संभालनी पड़े और बच्चों को अकेले देखना पड़े, तो मेरे यहाँ आने का क्या फायदा हुआ?”
सुमित्रा जी ने अपनी बेटी की आँखों में सीधे देखा। उनकी आँखों में ममता तो थी, लेकिन साथ ही एक गहरी वेदना और कठोर सच भी था। वे बोलीं, “बेटी, मैं उसे किस मुँह से रोकती? किस अधिकार से मैं उसे कहती कि तू अपनी ननद के स्वागत के लिए रुक जा? जब मैं अपनी कोख से जन्मी बेटी को ही ससुराल के रिश्तों का मान रखना नहीं सिखा पाई, तो उस पराए घर से आई बच्ची को त्याग का पाठ कैसे पढ़ाती?”
सुमित्रा जी के इस एक वाक्य ने जैसे कमरे के सारे शोर को सोख लिया।
शालिनी हक्की-बक्की रह गई। उसने अविश्वास से अपनी माँ की ओर देखा, “माँ! यह आप क्या कह रही हैं? मैंने ऐसा क्या गलत कर दिया जो आप मेरी तुलना भाभी से कर रही हैं?”
सुमित्रा जी ने शालिनी का हाथ अपने हाथों में लिया और बेहद धीमे मगर गंभीर लहजे में कहा, “शालिनी, ज़रा अपने गिरेबान में झाँक कर देख। तू आज सुबह ही तो मुझे फोन पर बता रही थी कि तेरी दोनों ननदें अपने बच्चों के साथ तेरे घर आ रही हैं। वे भी तो अपने मायके ही आ रही थीं ना? जिस तरह तू अपने इस घर को अपना मायका समझकर हर अधिकार से यहाँ आई है, उसी तरह रश्मि और पल्लवी के लिए भी तो वही घर मायका है जहाँ तू ब्याह कर गई है। उनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके लिए उनका मायका सिर्फ उनका भाई और तू ही तो हो। जब तुझे पता था कि वे दोनों छुट्टियाँ बिताने आ रही हैं, तो तू उनके आने से पहले ही घर में ताला लगाने जैसी स्थिति पैदा करके यहाँ भाग आई ताकि तुझे उनकी सेवा न करनी पड़े, उनके लिए खाना न बनाना पड़े।”
सुमित्रा जी ने आगे कहा, “अब तू खुद सोच, जब तू खुद एक ननद का आदर नहीं कर सकी, अपनी ननदों को देखकर तेरा माथा ठनक गया और तू घर छोड़कर भाग आई, तो फिर तेरी भाभी स्वाति से तू यह उम्मीद कैसे कर सकती है कि वह अपनी ननद के स्वागत में पलकें बिछाए बैठी रहे? तू अपनी ननदों के लिए जो काँटे बोकर आई है, वही काँटे तुझे अपने मायके में चुभ रहे हैं तो तुझे दर्द क्यों हो रहा है?”
माँ का एक-एक शब्द शालिनी के अंतर्मन को चीरता हुआ निकल रहा था। वह चाहकर भी अपनी सफाई में एक शब्द नहीं बोल पा रही थी। उसकी नज़रें ज़मीन पर टिक गईं।
सुमित्रा जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और समझाने के अंदाज़ में बोलीं, “रिश्ते कभी एकतरफा नहीं चलते बेटी। औरत ही तो घर को बनाती है और औरत ही बिगाड़ती है। जब हम खुद किसी की बेटी या बहन बनकर मायके में मान ढूँढते हैं, तो हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ससुराल में हम भी किसी की ननद की भाभी हैं। जैसा व्यवहार हम दूसरों की बेटियों के साथ करेंगे, कुदरत वही व्यवहार हमारे सामने लाकर खड़ा कर देगी। आज स्वाति को तो पता भी नहीं था कि तू आ रही है, फिर भी तुझे उसका जाना इतना खल गया। सोच, रश्मि और पल्लवी जब तेरे घर पहुँची होंगी और उन्होंने देखा होगा कि उनकी भाभी घर पर नहीं है, तो उनके दिल पर क्या बीती होगी? क्या उन्होंने मनीष से यह नहीं कहा होगा कि भाभी हमें देखकर मायके चली गईं?”
शालिनी का सिर शर्म से झुक गया था। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू टप-टप गिरकर उसकी हथेली को भिगोने लगे। उसे अपनी गलती का इतना तीव्र अहसास पहले कभी नहीं हुआ था। उसने अपने स्वार्थ और थोड़े से आराम के लिए पूरे परिवार की खुशियों को ताक पर रख दिया था। उस पूरी रात शालिनी करवटें बदलती रही। उसे बार-बार अपनी ननदों के वे चेहरे याद आ रहे थे, जो हमेशा उसके घर आने पर उसके लिए साड़ियाँ और बच्चों के लिए खिलौने लाती थीं। जब भी वे आती थीं, घर में रौनक हो जाती थी, लेकिन उसने हमेशा उन्हें एक बोझ ही समझा था।
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो शालिनी के फोन की रिंगटोन बजी। स्क्रीन पर देखा तो उसकी भाभी स्वाति का नाम चमक रहा था। शालिनी ने हिचकिचाते हुए फोन उठाया।
“हेलो, दीदी!” दूसरी तरफ से स्वाति की स्नेह भरी और घबराई हुई आवाज़ आई, “दीदी, मुझे अभी-अभी आपके भइया ने फोन पर बताया कि आप बच्चों के साथ इंदौर पहुँची हैं। दीदी, मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मम्मी जी ने भी मुझे पहले कुछ नहीं बताया, वरना मैं कभी ग्वालियर नहीं आती। आप इतने दिनों बाद आई हैं और मैं घर पर नहीं हूँ। मैं अभी अपनी मम्मी से बात करती हूँ और आज शाम की गाड़ी पकड़कर वापस इंदौर आ जाती हूँ। आप कहीं मत जाइएगा, हम सब मिलकर खूब मजे करेंगे।”
भाभी की यह बात सुनकर शालिनी का कलेजा भर आया। जहाँ वह कल तक भाभी पर गुस्सा हो रही थी, वहीं भाभी का यह निश्छल प्रेम देखकर उसकी आँखें फिर छलक पड़ीं। उसने अपने आँसू पोंछते हुए बेहद कोमल स्वर में कहा, “अरे नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं! आप कहीं वापस मत आइए। मेरी तो अचानक ही यहाँ आने की योजना बन गई थी। आप पूरे एक साल बाद अपने मायके गई हैं, अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ आराम से समय बिताइए। मुझे आपकी कोई शिकायत नहीं है।”
स्वाति ने संकोच से कहा, “पर दीदी, आप तो इतने दिनों बाद मायके आई हैं…”
“भाभी, मैं फिर कभी आ जाऊँगी,” शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “सच कहूँ तो मैं भी यहाँ बस आज भर ही हूँ। कल सुबह की ट्रेन से मैं वापस भोपाल लौट रही हूँ।”
“इतनी जल्दी क्यों दीदी? अभी तो आप पहुँची ही थीं!” स्वाति ने आश्चर्य से पूछा।
शालिनी ने एक गहरी साँस ली और कमरे के दरवाजे पर खड़ी अपनी माँ को देखते हुए कहा, “भाभी, मेरी दोनों ननदें, रश्मि और पल्लवी, अपने बच्चों के साथ भोपाल आई हुई हैं। सासू माँ के न रहने के बाद अब उनका मायका मुझसे और मनीष से ही तो है। अगर मैं ही घर पर नहीं रहूँगी, तो उनका मायका सूना हो जाएगा। एक भाभी का फर्ज सिर्फ अपने मायके का सुख लेना ही नहीं होता, बल्कि अपनी ननदों के लिए ससुराल को उनका सच्चा मायका बनाए रखना भी होता है। मैं जा रही हूँ ताकि जब वे सुबह उठें, तो उन्हें अपनी माँ की कमी महसूस न हो।”
फोन पर कुछ पलों का सन्नाटा छा गया, मानो स्वाति भी अपनी ननद के इस बदले हुए रूप से भावुक हो गई हो। स्वाति ने बस इतना कहा, “दीदी, आप सच में बहुत अच्छी हैं।”
फोन कटने के बाद शालिनी ने देखा कि सुमित्रा जी की आँखों में गर्व के आँसू थे। शालिनी ने आगे बढ़कर अपनी माँ के चरण स्पर्श किए।
“माँ, आपने कल मेरी आँखें खोल दीं। अगर आपने मुझे वह आईना न दिखाया होता, तो शायद मैं ज़िंदगी भर यही समझती रहती कि दुनिया मेरे साथ गलत कर रही है, जबकि गलती तो मेरी अपनी सोच में थी।”
उस दिन शालिनी के भीतर एक नई ऊर्जा, एक नया उत्साह था। उसने दिन भर अपनी माँ के साथ मिलकर घर का सारा काम निबटाया। शाम को वह माँ को लेकर इंदौर के प्रसिद्ध सराफा और राजवाड़ा बाज़ार गई। उसने अपनी दोनों ननदों के लिए उनकी मनपसंद चंदेरी की साड़ियाँ खरीदीं और उनके बच्चों के लिए सुंदर कपड़े और ढेर सारी मिठाइयाँ लीं।
अगली सुबह स्टेशन पर जब ट्रेन की सीटी बजी, तो सुमित्रा जी ने शालिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे आशीर्वाद दिया।
“सदा सुखी रहो मेरी बच्ची। हमेशा याद रखना, एक स्त्री ही समाज की सबसे मजबूत कड़ी होती है। वह कभी बेटी बनती है, कभी बहू, कभी ननद तो कभी भाभी। जब वह अपनी हर भूमिका को उसी तराजू से तोलेगी जिससे वह दूसरों को तौलती है, तो कोई भी परिवार कभी टूट नहीं सकता। रिश्तों में जो सम्मान हम पाना चाहते हैं, पहले वही सम्मान हमें दूसरों को देना पड़ता है।”
ट्रेन जब छुक-छुक करते हुए भोपाल की ओर बढ़ने लगी, तो शालिनी खिड़की से बाहर देखते हुए मुस्कुरा रही थी। अब उसके मन में कोई बोझ नहीं था, कोई खीझ नहीं थी। अब वह सिर्फ एक ननद नहीं थी जो अपने मायके से लौट रही थी, बल्कि वह एक ऐसी भाभी बनने जा रही थी जिसकी छत्रछाया में उसकी ननदें अपने मायके का असीम सुख महसूस करने वाली थीं।
एक स्त्री के रूप में हम अक्सर अपने मायके में अपने अधिकारों को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं, लेकिन क्या हम वही संवेदनशीलता अपनी ससुराल में अपनी ननदों के प्रति दिखा पाते हैं? क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में संतुलन तभी बन सकता है जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखें? इस विषय पर आपके क्या विचार हैं, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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